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नए राज्य/दो दशक/झारखंड : राजनीति का मकड़जाल

झारखंड बीस साल का हो गया है, मगर जो बनना चाहिए था, वह नहीं बन पाया
देवघर में निर्माणाधीन एम्स अस्पताल

झारखंड बीस साल का हो गया है, मगर जो बनना चाहिए था, वह नहीं बन पाया। देश की 40 प्रतिशत खनिज संपदा समेटे झारखंड जब बिहार से अलग हुआ तो धारणा थी कि यह तरक्की के कीर्तिमान बनाएगा। जब बिहार और झारखंड अलग हुए तो एक बात कही जाती थी कि बिहार के पास बचा क्‍या है, सिर्फ बाढ़, बालू, आलू और लालू। बिहार ने इस परेशानी को चुनौती के रूप में लिया। अच्‍छी सड़कों का जाल बिछाया और वहां बिजली की स्थिति भी सुधरी है। हाल के वर्षों में कानून-व्‍यवस्‍था की हालत भी बदली है। लेकिन झारखंड की राजधानी रांची में ही जीरो कट के वादे को छोड़िए, नियमित बिजली भी नहीं मिल पाती। रांची में बदला तो बहुत कुछ मगर अपेक्षा के अनुरूप नहीं। यहां रातू रोड, हरमू या दूसरी प्रमुख सड़कों का काम नक्‍शे पर ही चल रहा है। और तो और, पांच साल तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद रघुवर दास अपने शहर जमशेदपुर को रांची से जोड़ने वाली सड़क का निर्माण पूरा नहीं करा सके।

आर्थिक पैमाने पर राज्य की हालत देखिए। प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार, झारखंड से पीछे जरूर है मगर उसकी रफ्तार तेज है। झारखंड में प्रति व्‍यक्ति आय 1999-2000 में 10,451 रुपये थी और बिहार की इसकी आधी थी। 2019-20 के बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 2017-18 में प्रति व्यक्ति आय 42,242 रुपये थी जो 2018-19 में 47,541 रुपये हो गई। सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार 2017-18 में झारखंड की प्रति व्यक्ति आय 69,265 रुपये थी। रैंकिंग के हिसाब से झारखंड 25वें और बिहार 28वें नंबर पर है, यानी ज्यादा फर्क नहीं पड़ा।

अस्थिर सरकार और वित्तीय प्रबंधन ठीक नहीं होने का नतीजा रहा कि झारखंड पर कर्ज बढ़ता गया। 31 मार्च 2001 को राज्‍य पर 6,189 करोड़ रुपये का कर्ज था, जो आज बढ़कर करीब 93 हजार करोड़ का हो गया है। यह राज्य के 86,370 करोड़ के बजट से भी अधिक है। नया राज्‍य बनने के बाद 2001-02 में 7,174 करोड़ रुपये का बजट पास हुआ था। अब यह करीब 12 गुना बढ़कर 86,370 करोड़ का हो गया है।

दरअसल, राजनीतिक अस्थिरता, बेलगाम राजनीति और भ्रष्टाचार ने प्रदेश को पनपने नहीं दिया। एक समय झारखंड की स्थिति क्या थी, यह ख्‍यात पत्रकार और राज्‍यसभा के उपसभापति हरिवंश लिखित पुस्‍तक झारखंड: समय और सवाल से समझा जा सकता है। ‘चरित्रहीन पार्टियां, ब्‍लैकमेलर विधायक, रंगबाज मंत्री और असहाय झारखंड’, ‘अंधा युग और झारखंड’, ‘राज्‍य नक्‍सलियों का या सरकार का’ और ‘नेता ही भ्रष्‍टाचार के उद्गम’ इस पुस्तक के कुछ अध्याय के शीर्षक हैं।

झारखंड में करीब 15 वर्षों तक राजनीतिक अस्थिरता रही। एक से एक प्रयोग हुए। निर्दलीय मधु कोड़ा भी मुख्मंत्री बने, जेल भी गए। बीस साल में 11 सरकारें बनीं, तीन बार राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। 2014 में भाजपा और आजसू के गठबंधन ने बहुमत हासिल किया। रघुवर दास मुख्यमंत्री बने और झारखंड के इतिहास में पहली बार पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। बीते विधानसभा चुनाव में यूपीए गठबंधन ने मजबूत जनादेश हासिल किया और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने।

ऐसा नहीं कि प्रदेश में विकास के काम हुए ही नहीं। बाबूलाल मरांडी पहले मुख्‍यमंत्री बने तो उनके कार्यकाल में बड़े पैमाने पर सड़कों का निर्माण हुआ। गांवों को सड़कों से जोड़ा गया। बाद के मुख्‍यमंत्रियों ने भी इसे आगे बढ़ाया। रांची से विभिन्‍न शहरों और दूसरे प्रदेशों को जोड़ने वाली सड़कों का कायाकल्‍प हुआ। विधानसभा बनी, नया हाइकोर्ट भवन भी लगभग तैयार है। विशाल खेल गांव स्टेडियम, मोरहाबादी मैदान की सूरत बदली। पलामू, हजारीबाग और दुमका में मेडिकल कॉलेज बने।

28 माह शासन करने वाले प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी कहते हैं कि राज्य में होने वाले बदलाव को समझने के लिए बीस साल पीछे चलना होगा। वे अपने गिरिडीह जिले के तिसरी ब्लॉक के कोदाईबांक गांव का जिक्र करते हैं। वहां जाने का रास्ता तक नहीं था, बिजली क्या होती। उग्रवाद चरम पर था। किसान गांव छोड़ शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। नक्सली दिन-दहाड़े घूमते थे और समानांतर सरकार चला रहे थे। जंगलों में उनके बड़े-बड़े बंकर थे। गांवों को सड़कों से जोड़ने के बाद स्थिति बदलने लगी। मरांडी एक और वाकया बताते हैं। आज का प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल रिम्स तब रांची मेडिकल कॉलेज था। मरांडी वहां गए तो देखा मरीज नहीं हैं। कमरों में कुत्ते घूम रहे थे। तब जाकर अस्पताल का नक्शा बदला। हालांकि वे मानते हैं कि अब भी जिला स्तर पर अस्पतालों के लिए बहुत काम करने की जरूरत है।

देश का 40 फीसदी खनिज अपने गर्भ में रखने वाले झारखंड में उद्योग की काफी संभावनाएं हैं, मगर अब तक उम्‍मीदों पर पानी ही फिरा है। राज्‍य बनने के बाद कोई बड़ा उद्योग नहीं आया है। सिंगल विंडो से लेकर तमाम तरह की नीतियां बनी हैं। उद्यमी सम्‍मेलन ‘मोमेंटम झारखंड’ का आयोजन किया गया, जिसमें दो सौ से अधिक कंपनियों के साथ सरकार का करार हुआ। सवा तीन लाख करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्‍ताव आया, लेकिन धरातल पर ठोस कुछ नहीं दिखता। बल्कि जमीन पर उतरा हुआ फूड पार्क भी सरकारी असहयोग के कारण खुलने से पहले बंद हो गया। टेक्‍सटाइल के क्षेत्र में कई कंपनियां आई थीं, मगर दो बड़ी कंपनियों ने अपना कारोबार समेट लिया है।

सरकार की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार राज्‍य में एक लाख से अधिक लघु उद्योग लगे हैं, जिनमें करीब पांच हजार करोड़ रुपये का निवेश हुआ और साढ़े आठ लाख लोगों को रोजगार मिला है। मुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन कहते हैं कि कोरोना काल में उन्‍हें प्‍लानिंग के स्‍तर पर बहुत काम करने का मौका मिला है। अब वे बात नहीं काम करेंगे ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा निवेश हो और रोजगार के अवसर मिलें। मगर इसके लिए बिजली, सड़क, जमीन और सुरक्षा की जरूरत के साथ से मुक्ति भी चाहिए।

हेमंत सरकार में वित्त मंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष रामेश्‍वर उरांव मानते हैं कि बीस साल में झारखंड आगे बढ़ा है। सड़क, शिक्षा, आधारभूत संरचना के क्षेत्र में तरक्‍की की है। लेकिन स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में अपेक्षित काम नहीं हो पाया है। कोरोना काल में इसका एहसास हुआ। शिक्षा में सुधार हुआ मगर शिक्षकों की अभी बहुत कमी है। पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए काम हुए मगर अभी लंबी दूरी तय करनी है।

कुछ और कमियां गिनाते हुए उरांव कहते हैं, “सड़कें बनीं मगर स्थिति यह भी रही कि पांच साल मुख्‍यमंत्री रहने वाले रघुवर दास रांची से अपने शहर जमशेदपुर जाने वाली सड़क को पूरा नहीं करा सके। हम कैनाल और डैम को भी संभालकर नहीं रख सके।” झारखंड की अर्थव्‍यवस्‍था कृषि आधारित है। लोग जान के साथ जमीन की भी सुरक्षा चाहते हैं। आदिवासी के साथ गैर मजरुआ जमीन की जमकर लूट हुई है। इसलिए उरांव कहते हैं, “पहले कृषि को मजबूत करना होगा उसके बाद उद्योग और सर्विस सेक्‍टर को।”

बीते बीस साल में स्‍कूलों और विश्‍वविद्यालयों की संख्‍या काफी बढ़ी। नतीजतन साक्षरता दर 54 फीसदी से बढ़कर 81 फीसदी हो गई। यह अलग बात है कि शिक्षकों और गुणवत्‍तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। पंचायतों में सरकार ने महिलाओं के लिए पचास फीसदी का आरक्षण किया तो 60 फीसदी महिलाएं मुखिया बन गईं। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के शासन और बढ़ी साक्षरता के बावजूद जनजातीय और कमजोर वर्ग के लोगों में डायन बिसाही का अंधविश्‍वास नहीं निकला। डायन के नाम पर देश में सर्वाधिक हत्‍याएं झारखंड में हो रही हैं।

पहली बार पांच साल सरकार चलाने वाले और भाजपा के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष रघुवर दास मानते हैं कि राजनीतिक अस्थिरता के कारण जितना काम होना चाहिए था, नहीं हो पाया। किसी राज्य के विकास के लिए स्थायी सरकार को होना जरूरी है। इसके बावजूद 20 वर्षों में काफी काम हुए। अपने शासन की चर्चा करते हुए कहते हैं कि 2014 में स्थायी सरकार आई तो विकास की गति तेज हुई। विधानसभा और हाइकोर्ट भवन का निर्माण हुआ, सड़कों का जाल बिछा। हालांकि वे महसूस करते हैं कि पलायन सूबे के लिए अभिशाप है। वे कहते हैं, “इसे रोकने के लिए निवेश पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। निवेश बढ़ेगा तो रोजगार भी बढ़ेंगे।” वे मानते हैं कि झारखंड देश को आर्थिक सुपर पावर बनने में अहम भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसके लिए नीति के साथ नीयत भी अच्‍छी होनी चाहिए।

लेकिन सवाल है कि नीयत और नीति कब साफ होगी, ताकि लोग पलायन पर मजबूर न हों। पलायन ही दुर्दशा की कहानी कहता है।

झारखंड

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