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खुली हर गांठ

आजसू का साथ छूटने से बैकफुट पर सत्तारूढ़ भाजपा, विपक्षी कांग्रेस, झामुमो और राजद गठजोड़ में भी बगावत के स्वर
कांग्रेस, झामुमो, राजद गठजोड़ का ऐलान

झारखंड में 81 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव की प्रक्रिया पूरे परवान पर है। पांच चरणों में होने वाले चुनाव के दो चरणों की अधिसूचना भी जारी हो चुकी है। राजनीतिक दलों के सामने प्रत्याशियों के चयन से पहले चुनाव पूर्व गठबंधन की चुनौती थी, जिसकी तसवीर कमोबेश साफ हो गई है। राज्य में सत्तारूढ़ एनडीए भी एकजुट नहीं रह सका, और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेतृत्व वाला विपक्षी महागठबंधन अब महज तीन दलों का गठबंधन रह गया है। तालमेल और सीट बंटवारे की कोशिशों का कुल जमा नतीजा यही रहा कि राज्य की अधिकांश सीटों पर अब बहुकोणीय मुकाबले होंगे। इस मुकाबले का एक कोण जहां सत्तारूढ़ भाजपा है, वहीं दूसरे कोण पर झामुमो के नेतृत्व वाला गठबंधन है, जिसमें कांग्रेस और राजद भी हैं। बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) ने सभी 81 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। इनके अलावा एनडीए से अलग हुए आजसू, आम आदमी पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), झारखंड पार्टी और वाम दल भी हैं। हालांकि वाम दल दो-तीन सीटों पर ही असर डालने में सक्षम हैं। आम आदमी पार्टी ने 25 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है। इतनी पार्टियों के कारण झारखंड की चुनावी तसवीर बेहद दिलचस्प हो गई है।

सत्तारूढ़ एनडीए में कई दौर की बातचीत के बाद भाजपा और आजसू ने अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया है। दो बार दिल्ली जाकर अमित शाह के दरबार में हाजिरी के बावजूद आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को कुछ नहीं मिला। उनकी पार्टी ने पहले 20 सीटों पर दावेदारी की थी, जिसे घटाकर उसने पहले 19 किया और अंततः 15 पर आ गई। लेकिन भाजपा उन्हें 12 से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं हुई। हालांकि आजसू ने पिछला विधानसभा चुनाव भी अकेले ही लड़ा था, लेकिन चुनाव के बाद भाजपा के साथ हो गई थी। लोकसभा चुनाव में उसका भाजपा से तालमेल था।

भाजपा और आजसू की दोस्ती फिलहाल क्यों टूटी, यह जानना भी दिलचस्प है। भाजपा ने ‘65 प्लस’ का लक्ष्य हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाई और दूसरे दलों के विधायकों को अपने पाले में लाने का अभियान शुरू कर दिया। 2014 के विधानसभा चुनाव के फौरन बाद भाजपा ने झाविमो के आठ में से छह विधायकों को तोड़ लिया। इस चुनाव से पहले उसने झाविमो के एक और विधायक के अलावा झामुमो और कांग्रेस के दो-दो विधायकों को अपने पाले में कर लिया। इनके अतिरिक्त दूसरे दलों के कई बड़े नेता और पूर्व नौकरशाह भी भाजपा में शामिल हुए हैं। जाहिर है, इन सभी को भाजपा ने टिकट का भरोसा दिया था। चुनाव आया तो कई सीटों पर आजसू के साथ उसका टकराव होने लगा। आजसू ने खास कर चंदनकियारी, पाकुड़, लोहरदगा और हुसैनाबाद पर दावेदारी की, जबकि भाजपा ये सीटें छोड़ना नहीं चाहती।

उधर, झामुमो के नेतृत्व वाले गठबंधन की शुरुआत लोकसभा चुनाव से पहले हुई थी। इसी साल 24 मार्च को झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के आवास पर झामुमो, कांग्रेस और झाविमो नेताओं ने साथ मिल कर लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। तब यह भी कहा गया कि विधानसभा चुनाव भी मिलकर लड़ा जाएगा। लेकिन विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होते ही विपक्ष की एकजुटता तार-तार हो गई। कई दौर की बातचीत के बाद झामुमो, कांग्रेस और राजद एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतर चुके हैं। झामुमो 43 और कांग्रेस 31 सीटों पर लड़ेगी। राजद के हिस्से में सात सीटें आई हैं। इस बीच, तालमेल के खिलाफ कांग्रेस के भीतर बगावती स्वर उठने लगे हैं। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू ने पार्टी छोड़ने की घोषणा की है। गुमला और चाईबासा की जिला समितियों में इस्तीफे का दौर शुरू हो गया है।

पिछले चुनाव में झाविमो के आठ विधायक चुने गए थे, लेकिन सात विधायक भाजपा में चले गए। इस बार पार्टी प्रमुख बाबूलाल मरांडी अपनी राजनीतिक ताकत के सटीक आकलन के लिए तैयार हैं। उन्होंने सभी 81 सीटों के लिए उम्मीदवार तय कर लिए हैं। लोकसभा चुनाव में बुरी तरह विफल रहने के बाद यह बाबूलाल मरांडी की राजनीतिक इच्छाशक्ति ही है कि वे अकेले दम पर पूरे राज्य में चुनाव लड़ने जा रहे हैं।

झारखंड की लगभग सभी सीटों पर राजनीतिक दलों में ‘छप्पन छुरी, बहत्तर पेच’ की स्थिति है। पाकुड़, जरमुंडी, बरकट्ठा, बड़कागांव, सिमरिया, चंदनकियारी, चक्रधरपुर, तमाड़, हटिया और लोहरदगा सीट पर भाजपा और आजसू के बीच मामला फंसा, जिसकी वजह से गठबंधन टूटा। राजधानी रांची की हटिया सीट पर भाजपा ने नवीन जायसवाल को मैदान में उतारा, पर आजसू इसे अपनी सीट बताकर दावा कर रही थी। भाजपा लोहरदगा सीट पर कांग्रेस से आए सुखदेव भगत को उतारना चाहती है, पर आजसू इसे छोड़ना नहीं चाहती। चंदनकियारी सीट पर भाजपा अमर बाउरी को लड़ाना चाहती है, तो आजसू नेता उमाकांत रजक की भी पूरी तैयारी है। बड़कागांव सीट पर आजसू ने रोशनलाल चौधरी को उम्मीदवार बनाया तो भाजपा कार्यकर्ता अपना उम्मीदवार उतारे जाने की मांग करने लगे। तमाड़ में आजसू के टिकट पर विकास सिंह मुंडा ने विजय हासिल की थी। बाद में वे बागी होकर झामुमो में चले गए। यह सीट पहले जदयू के टिकट पर चुनाव जीते रमेश सिंह मुंडा की थी। नक्सली हमले में उनके मारे जाने के बाद उनके बेटे विकास सिंह मुंडा ने जीत दर्ज की। तमाड़ के परासी में सोने की खान है और इस लिहाज से इसका वाणिज्यिक महत्व भी जबर्दस्त है। इस सीट पर आजसू किस कदर अपना हक मानती थी, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पार्टी प्रमुख सुदेश महतो ने अपनी झारखंड स्वाभिमान यात्रा की शुरुआत तमाड़ के अड़की से की थी। यहीं एक सभा में उन्होंने गांव की सरकार बनाने का मंत्र दिया था। लेकिन भाजपा यहां अपना उम्मीदवार उतारना चाहती है। तमाड़ सीट पर झामुमो और कांग्रेस भी अपने-अपने प्रत्याशी उतारना चाहती है।

तमाड़ के अलावा कांग्रेस और झामुमो में जिन सीटों पर पेच फंस रहा है, उनमें चक्रधरपुर, घाटशिला, चाईबासा, पाकुड़ और बहरागोड़ा शामिल हैं। कांग्रेस और राजद के बीच विश्रामपुर और बरकट्ठा सीट को लेकर तनातनी है। जरमुंडी में लोजपा और भाजपा आमने-सामने हैं और इसी सीट पर वर्तमान विधायक कांग्रेस के बादल पत्रलेख भी हैं। लोजपा इस सीट से वीरेंद्र प्रधान को उम्मीदवार बनाना चाहती है, जबकि भाजपा अपना उम्मीदवार चाहती है।

कुल मिलाकर, स्थिति किसी के लिए भी एकतरफा नहीं है। आजसू से गठबंधन टूटने के बाद भाजपा के लिए '65 प्लस' का लक्ष्य दूर जाता दिख रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री और भाजपा के अकेले खेवनहार रघुवर दास का दावा है कि उनकी सरकार के पांच साल के कामकाज को जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है। वे कहते हैं, “इस चुनाव में जनता झामुमो-कांग्रेस-राजद के गठबंधन को इतनी बुरी तरह नकारेगी कि ये पार्टियां भी याद करेंगी।”

लेकिन झामुमो प्रवक्ता विनोद पांडेय कहते हैं कि झारखंड की जनता इस बार भाजपा को सत्ता से बाहर करेगी। कांग्रेस नेता शशिभूषण राय के मुताबिक राज्य में अगली सरकार झामुमो-कांग्रेस-राजद की बनेगी। झामुमो नेता हेमंत सोरेन की पार्टी ने तो नारा भी लगा दिया है, ‘अबकी बार झामुमो सरकार, भाजपा गठबंधन झारखंड पार।’

उधर, आजसू के प्रवक्ता डॉ. देवशरण भगत कहते हैं, “हमने हमेशा गठबंधन धर्म का पालन किया और अब भी एनडीए में हैं। भाजपा बड़ा भाई है और उसे छोटे भाई का ध्यान रखना चाहिए। उसने खेती तो खरीद ली, लेकिन खेत तो आजसू का है। भाजपा को यह याद रखना होगा।” झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी के भी अपने दावे हैं। उनका कहना है कि राज्य की जनता झाविमो का साथ देने का फैसला कर चुकी है। वे कहते हैं, “भाजपा सरकार ने राज्य की अस्मिता को गिरवी रख दिया और इसके दरवाजे पूंजीपतियों के लिए खोल दिए। झारखंड का जनमानस इसके प्रति सचेत है और इस बार उसके मन में कोई दुविधा नहीं है।” अब जनता का फैसला देखना है।

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