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लिबरल बनाम पेशेवर पढ़ाई

बिजनेस एजुकेशन में अब फंडामेंटल आर्ट्स और विज्ञान के तमाम क्षेत्रों पर फोकस
आइआइएम इंदौर ने आइपीएम नाम से समग्र कोर्स शुरू किया

लिबरल एजुकेशन और किसी प्रोफेशनल करिअर की ट्रेनिंग के बीच क्या संबंध है? परिभाषा के हिसाब से तो ये एकदम अलग हैं। वास्तव में, दोनों को एक-दूसरे के विपरीत कहा जाता है। लिबरल स्टडी का कोर्स किसी खास विषय में विशेषज्ञता हासिल कर ज्ञान का विस्तार करने के लिए होता है, उससे किसी ख्‍ाास नौकरी-पेशा या करिअर का संबंध नहीं होता है। इसके विपरीत पेशेवर कोर्स किसी खास करिअर में प्रशिक्षण के लिए होता है। लिबरल या एक मायने में पारंपरिक शिक्षा में तमाम संभावनाओं के दरवाजे खुले होते हैं, किसी खास पेशे से उसका संबंध नहीं होता, जबकि प्रोफेशनल एजुकेशन में खास करिअर से जुड़े विषय पर ही जोर होता है, दूसरे विषयों के अध्ययन पर ज्यादा ध्यान नहीं देना होता है।

पठन सामग्री में कोई अंतर नहीं होता, बल्कि नजरिया अलग होता है। एक ही विषय लिबरल या प्रोफेशनल कोर्स में हो सकता है, लेकिन फर्क उसे पढ़ने-पढ़ाने के तरीके में होता है। मसलन, बायोलॉजी लिबरल आर्ट है, जबकि मेडिसिन नहीं; राजनीतिशास्‍त्र लिबरल आर्ट है, जबकि कानून की पढ़ाई नहीं; अर्थशास्‍त्र लिबरल आर्ट है, लेकिन एकाउंटेंसी नहीं। लिबरल आर्ट्स निश्चित रूप से पुराना है। वह उस कालखंड में थमा हुआ है, जब सभी विषय मानविकी का हिस्सा थे- यहां तक कि गणित भी, जो अब विज्ञान में आता है।

आलोचक लुइस मेनांड कहते हैं कि लगभग सभी विषय अपनी व्यावहारिकता के अाधार पर लिबरल या नॉन-लिबरल हो सकते हैं। जैसे, अंग्रेजी विभाग लेखन या प्रकाशन पाठ्यक्रम चला सकता है; मूल या अमूर्त गणित विभाग व्यावहारिक गणित या इंजीनियरिंग कोर्स चला सकता है; समाजशास्‍त्र में सामाजिक कार्य का व्यावहारिक पहलू है तो जी‌वविज्ञान में मेडिसिन का मूल निहित है; राजनीतिशास्‍त्र और सामाजिक सिद्धांत, कानून और सार्वजनिक प्रशासन का आधार तैयार करते हैं। दोनों के बीच में अंतर 18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक एमेनुअल कांट के समय से है। कांट के प्रतिपादित सिद्धांत के आधार पर ही पश्चिम के आधुनिक विश्वविद्यालय बने। उन्होंने अपनी पुस्तक द कॉन्फ्लिक्ट ऑफ द फैकल्टीज में अध्यात्म, कानून और मेडिसिन (क्रमशः पादरियों, वकीलों और डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने के लिए) को उच्चतर संकाय माना। निचले संकाय में उन सभी विषयों को शामिल किया, जो आधुनिक विश्वविद्यालय में कला और विज्ञान के क्षेत्र में आते हैं।

कांट ने उच्चतर संकाय के सदस्यों को “िबजनेसमैन या पढ़ाई के टेक्नीशियन” कहा। ये लोग प्रशासनिक नीतियां तैयार करेंगे और जैसा उन्होंने कहा, “इन लोगों का जनता पर कानूनी प्रभाव होगा।” लेकिन इसमें एक उलझन है, और यह बकौल, एक दूसरे विद्वान मार्क टेलर, ‘उच्च’ और ‘निम्न’ शब्दों के विरोधाभास को लेकर है। कांट ने स्पष्ट किया है कि निचले संकाय को अधिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता की दरकार है। उच्च संकाय छात्रों को सार्वजनिक जीवन की प्रमुख संस्थाओं के लिए प्रशिक्षित करता है, लेकिन इसी वजह से ये विषय सरकारी नियंत्रण और सेंसरशिप से बंधे होते हैं। दरअसल निचला संकाय ही अपने तरीके से अपने ज्ञान के विस्तार के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है और सरकार तथा निहित स्वार्थों के दखल से मुक्त है।

कांट के अनुयायी विद्वान और शिक्षाविद विलहेम वॉन हमबोल्ट ने यह सिद्धांत 1810 में स्थापित यूनिवर्सिटी ऑफ बर्लिन में लागू किया। हमबोल्ट का लागू किया गया कांट मॉडल ही आधुनिक विश्वविद्यालयों का आधार बना। इसी से विश्वविद्यालयों का स्व-शासन का ढांचा विकसित हुआ जिसमें अलग-अलग तरह के अनुसंधान, प्रशिक्षण और पेशेवर प्रशिक्षण पर जोर होता है। अमेरिका के बड़े विश्वविद्यालयों के कैंपस का ढांचा भी यही कहानी बताता है। डिपार्टमेंट ऑफ लिबरल आर्ट्स एेंड साइंसेज में साहित्य, भौतिकी, इतिहास, दर्शनशास्‍त्र, गणित और अर्थशास्‍त्र जैसे विषय हैं। बिजनेस, मेडिसिन, कानून, इंजीनियरिंग, शिक्षा जैसे विषयों के लिए बड़े प्रोफेशनल स्कूल हैं जो पूरी तरह से अलग कैंपस में स्थित हैं।

कानून और मेडि‌िसन अब भी प्रमुख प्रोफेशनल संकाय बने हुए हैं, लेकिन पादरियों को प्रशिक्षण देना आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष विश्वविद्यालयों में बंद हो गया। 20वीं सदी में नया प्रोफेशनल प्रोग्राम मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (एमबीए) सामने आया। लिबरल स्टडीज में अंडरग्रेजुएट डिग्री पाने वाले छात्र पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री के तौर पर एमबीए की पढ़ाई कर सकते हैं। हालांकि भारतीय कंपनियां उन छात्रों को वरीयता देती हैं, जो इंजीनियरिंग में अंडरग्रेजुएट की डिग्री लेने के बाद एमबीए करते हैं। किसी आइआइटी से बीटेक की डिग्री के बाद आइआइएम जैसे शीर्ष मैनेजमेंट संस्थान से एमबीए की डिग्री आज सबसे अच्छा मिश्रण माना जाता है।

मेनांड के सिद्धांत के अनुसार सभी प्रोफेशनल विषयों का गहरा संबंध उनसे जुड़े लिबरल विषयों से होता है। स्टीव डेनिंग ने 2014 में फोर्ब्स में प्रकाशित एक लेख में अमेरिकी मैनेजमेंट कंसल्टेंट पीटर ड्रकर के विजन का जिक्र करते हुए लिखा कि भविष्य के कॉरपोरेशन का अहम कार्य आर्थिक संगठन, मानव संगठन और सामाजिक संगठन के तौर पर त्रि-आयामी संतुलन बनाने का होगा। ड्रकर ने 20वीं सदी में जिस भविष्य की कल्पना की थी, हम उसमें गहरे प्रवेश कर चुके हैं। इसलिए बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई अब अत्यंत पेचीदा हो गई है। अब इसके कई पहलू कला और विज्ञान जैसे विषयों को भी छूते हैं।

िबजनेस एजुकेशन में लिबरल और प्रोफेशनल अध्ययन की समग्र परिकल्पना का बेहतरीन उदाहरण आइआइएम इंदौर का इं‌िटग्रेटेड प्रोग्राम ऑफ मैनेजमेंट (आइपीएम) है। पांच साल के इस कोर्स में तीन साल का लिबरल स्टडीज प्रोग्राम और दो साल का एमबीए शामिल है। यह कोर्स लाने के पीछे सोच ऐसी प्रोफेशनल ट्रेनिंग देने की है, जिसका आधार बहुआयामी हो और जिसमें मानविकी और समाजशास्‍त्र के लिए विशेष स्थान हो। इस कोर्स में मैनेजमेंट के अध्ययन में पीटर ड्रकर जैसी परिकल्पना को 21वीं सदी के अनुरूप ढाला गया है। आइआइएम बेंगलूरू में कॉरपोरेट स्ट्रेटजी के प्रोफेसर और आइआइएम इंदौर के पूर्व डायरेक्टर ऋषिकेश कृष्णन कहते हैं, “अर्थशास्‍त्र, सांख्यिकी और मनोविज्ञान के साथ मानविकी और समाजशास्‍त्र को मिलाकर मैनेजमेंट का बेहतरीन आधार तैयार होता है।” कृष्णन मानते हैं कि आइपीएम के छात्र एमबीए प्रोग्राम में अलग नजरिया लेकर आते हैं। इससे विविधता पैदा होती है, जो आवश्यक है। आइपीएम प्रोग्राम के छात्र हर साल एमबीए छात्रों में शीर्ष पर होते हैं। वह कहते हैं, “हमारा मानना है कि आइपीएम के छात्र अग्रणी साबित होंगे। समय ही बताएगा कि यह बात सही है या नहीं।”

देश के ज्यादातर प्रबंधन शिक्षाविद बिजनेस एजुकेशन में लिबरल आर्ट्स की अहमियत को लेकर एकमत हैं। आइआइएम अहमदाबाद में बिजनेस पॉलिसी के एसोसिएट प्रोफेसर मुकेश सूद के अनुसार स्टार्टअप और वेंचर कैपिटल, यानी इंटरप्रेन्योरशिप के जमाने में तो इसका महत्व और बढ़ गया है। वह याद दिलाते हैं कि इंटरप्रेन्योरशिप जितना करीब बिजनेस ट्रेनिंग से है, उतना ही करीब फंडामेंटल आर्ट्स और विज्ञान से है। वह कहते हैं, “आदर्श रूप से किसी भी इंटरप्रेन्योरशिप सेंटर को बिजनेस, लिबरल आर्ट्स और इंजीनियरिंग पर बराबर ध्यान देना चाहिए।”

उच्च शिक्षा के विशेषज्ञ भी मानते हैं कि स्थायी और नैतिक विकास के लिए बिजनेस स्कूल में लिबरल आर्ट्स आवश्यक है। ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हायर एजुकेशन रिसर्च एेंड कैपेसिटी बिल्डिंग की एसोसिएट प्रोफेसर और डिप्टी डायरेक्टर मौसमी मुखर्जी कहती हैं, “बिजनेस स्कूल में लिबरल आर्ट्स को समाहित करना स्थायी विकास के दौर में बहुत महत्वपूर्ण है। खासकर तब जब आज का बिजनेस पृथ्वी को विध्वंस की ओर ढकेल रहा है।” जैसी ड्रकर ने परिकल्पना की थी कि बिजनेस आर्थिक होने के साथ मानवीय और सामाजिक भी होना चाहिए। आज स्थायी विकास को इसकी सबसे बड़ी जरूरत है। मुखर्जी कहती हैं, “सिर्फ लिबरल आर्ट्स ही आज के बिजनेस लीडर्स को समझा सकता है कि भविष्य में हर कारोबार के लिए उन्हें आम लोगों और पृथ्वी, दोनों की भलाई को ध्यान में रखना होगा।”

(अशोका यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी और क्रिएटिव राइटिंग के प्रोफेसर तथा 2018 में प्रकाशित कॉलेजः पाथवेज ऑफ पॉसिबिलिटी सहित कई पुस्तकों के लेखक)

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