“सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का खेल खतरनाक”

सीताराम येचुरी
सीताराम येचुरी
जितेंद्र गुप्ता

चुनावों में भारतीय जनता पार्टी जिस तरह खर्च कर रही है, सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी उसे कॉरपोरेट-सांप्रदायिक गठजोड़ मानते हैं। सरकार कॉरपोरेट को छूट देती है, जिसका फायदा उसे चुनावी फंडिंग में मिलता है। स्थानीय मुद्दों के बजाय राष्ट्रवाद के नाम पर चुनाव लड़े जाने पर उनका मानना है कि रोज की परेशानियों और नौकरी का सवाल आएगा तभी चीजें बदलेंगी। इन विषयों पर डिप्टी एडिटर एस.के. सिंह ने उनसे बात की। मुख्य अंश :

 

अभी जो विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उसमें लेफ्ट की क्या भूमिका है?

फिलहाल, लेफ्ट का उद्देश्य भाजपा और सांप्रदायिकता को हराना है। हम चाहते थे कि सेकुलर पार्टियों के बीच वोटों के बंटवारे से भाजपा को जो फायदा होता रहा है, वह न हो। अफसोस, कि कई पार्टियों के दिग्गज नेता भाजपा में चले गए। या तो धमकी चल रही है या पैसा चल रहा है। आम चुनाव के बाद देश में दक्षिणपंथ की तरफ झुकाव बढ़ा है और दक्षिणपंथ का मुकाबला वामपंथ से ही हो सकता है।

अगले साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में लेफ्ट और कांग्रेस में तालमेल की कितनी संभावना है?

अभी कुछ तय नहीं है। लोकसभा चुनाव में भी हमने कांग्रेस को प्रस्ताव दिया था, लेकिन किसी वजह से समझौता नहीं हो पाया। वहां माहौल ममता सरकार के खिलाफ है। लोगों को तृणमूल को हराना था, इसलिए उन्होंने भाजपा को वोट दिया। पिछले आठ साल में 200 से ज्यादा लोगों की हत्या हुई है, चालीस हजार लोग अपने घर नहीं जा सकते, गए तो जानलेवा हमले का डर है, दस हजार से ज्यादा लोगों पर झूठे मुकदमे लगाए गए हैं। लोकसभा चुनाव में इन सबके खिलाफ लोगों का गुस्सा प्रकट हुआ।

पश्चिम बंगाल में तितरफा लड़ाई हुई तो फायदा तो भाजपा को होगा। इसे रोकने के लिए आप क्या करेंगे?

तृणमूल कांग्रेस नफरत और हिंसा की राजनीति कर रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हाल में नरेंद्र मोदी और अमित शाह से मिली हैं। सबको पता है कि सारदा केस में उनके नेता फंसे हैं। सीबीआइ इस केस में चुप क्यों है? पी. चिदंबरम के खिलाफ तो केस भी साबित नहीं हुआ, लेकिन वे जेल में हैं। तृणमूल नेताओं के खिलाफ केस साबित हुआ, गिरफ्तारी वारंट जारी हुए, फिर भी सीबीआइ चुप है। भाजपा ने तृणमूल के जरिए ही तो पश्चिम बंगाल में प्रवेश किया था।

केरल में लेफ्ट और कांग्रेस के मोर्चे में टक्कर है। केरल में अलग और पश्चिम बंगाल में अलग नीति को कैसे उचित ठहराएंगे?

यह पहले से रहा है, और मेरे विचार से इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। केरल में मुख्य टकराव कांग्रेस के फ्रंट और लेफ्ट के फ्रंट के बीच रहा है। यही वजह है कि वहां भाजपा का वोट प्रतिशत घट गया।

आज सबसे बड़ी राजनैतिक चुनौती क्‍या है?

जाहिर तौर पर भाजपा। आज सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और आर्थिक नीतियों में अंतर नहीं रह गया है। भाजपा ने चुनाव में बेतहाशा खर्च किया, यह कॉरपोरेट और सांप्रदायिक गठजोड़ को साबित करता है। सरकार कॉरपोरेट को छूट दे रही है। पिछले पांच वर्षों में साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये के कर्ज माफ कर दिए। देश में मंदी है, लोगों के पास खरीदारी के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन सरकार राहत दे रही है कॉरपोरेट को। इसका फायदा इलेक्टोरल फंडिंग में मिलता है। एडीआर का अनुमान है कि पिछले लोकसभा चुनाव में 54 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए। इसमें 27 हजार करोड़ भाजपा ने खर्च किए।

हर आम चुनाव में माकपा का वोट कम हो रहा है। 2009 में 5.33% और 2014 में 3.25% था, इस बार 1.75% रह गया है। वजहें क्या हैं?

इसके कई कारण हैं। 2004-09 के बीच घटनाक्रम पर गौर कीजिए। (अमेरिका से) परमाणु करार के सवाल को हम जनता के बीच ठीक से लेकर नहीं जा सके। हमने अपने बारे में ज्यादा और यूपीए के बारे में कमतर अनुमान लगाया। चुनाव में हमने वैकल्पिक सरकार का नारा दिया था, बाद में लगा कि वह नारा ही गलत था। लोगों के साथ जो जुड़ाव होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। संगठन में कुछ बदलाव के फैसले हुए, लेकिन उन्हें लागू करने में देरी हुई।

महाराष्ट्र चुनाव में क्या उम्मीद है?

हमारे पास जो एक सीट (कलवण) है, उसे जरूर जीतेंगे। तीन और सीटों पर जीत की संभावना है।

चुनावों में जाति और धर्म के मुद्दे ज्यादा हावी हैं। इसका मुकाबला कैसे करेंगे?

महाराष्ट्र के शाहपुर में हमने बड़ी रैली की थी। वहां 72 आदिवासी गांवों को खाली कर, निजी कंपनियों को खनन के लिए जमीन देने की तैयारी थी। रैली में पंद्रह हजार आदिवासी निकले। इसके बाद सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा। जाति और धर्म की जितनी भी बात कर लें, वास्तविक मुद्दों से दूर नहीं हो सकते। लेकिन यह सही है कि इन दिनों वास्तविक मुद्दों की राजनीति नहीं हो रही है। देश में सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का खेल चल रहा है। आज हिमाचल-उत्तराखंड समेत 12 ऐसे राज्य हैं जहां लोग जमीन नहीं खरीद सकते, लेकिन मुद्दा सिर्फ कश्मीर को बनाया जा रहा है।

संवैधानिक संस्थाओं के रवैए पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

बहुत बुरी स्थिति है। संविधान इन्हीं संस्थाओं के बल पर खड़ा होता है। सबसे महत्वपूर्ण है कोर्ट। अगर कोर्ट पर ही अंगुलियां उठने लगें तो अफसोस की बात है। चुनाव आयोग ने अभी तक लोकसभा चुनाव के अंतिम आंकड़े जारी नहीं किए। पहले एक हफ्ते में आ जाते थे। सीबीआइ में क्या हो रहा है? जो भाजपा के विरोधी हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है। भाजपा के आरोपी नेताओं की सूची ज्यादा लंबी है, लेकिन उनके खिलाफ कुछ नहीं हो रहा है। इतना खुलेआम पक्षपात पहले कभी नहीं देखा गया। रिजर्व बैंक के साथ खिलवाड़ हो रहा है। पहली बार अंतरिम बजट के आंकड़े ही जुलाई में पूर्ण बजट में रख दिए गए। क्या इतने महीने देश में कुछ नहीं हुआ? सीएजी बजट से पहले आंकड़ों को देखता है, वह कहां है?

क्या राजद्रोह कानून सरकार के विरोध को चुप कराने का जरिया बन गया है?

जिन 49 लोगों के खिलाफ राजद्रोह का आरोप लगाया गया, उन्होंने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी। वर्धा में कुछ छात्रों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी तो उनको यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया। विरोध ज्यादा होने पर सरकार को पीछे हटना पड़ा। प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखना राजद्रोह कैसे हो सकता है?

आम चुनाव में आपने विपक्ष को साथ लाने की कोशिश की थी। नए सिरे से कुछ कर रहे हैं?

हम रोजमर्रा के मुद्दों को वापस लाना चाहते हैं। इसलिए सभी वामपंथी पार्टियों ने मिलकर तय किया है कि मौजूदा आर्थिक हालात के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे। बाकी पार्टियों से भी कह रहे हैं कि या तो हमारे साथ आइए या स्वतंत्र रूप से इन मुद्दों को उठाइए।

बहुत लोगों का मानना था कि अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर का विशेष दर्जा नहीं हटाया जा सकता। लेकिन विपक्ष छोटे-मोटे विरोध के अलावा कुछ नहीं कर रहा। क्यों?

विरोध दिखाया नहीं जा रहा है। तमिलनाडु में सभी पार्टियों ने मिलकर प्रदर्शन किया। जो भी कश्मीर पर सरकार का विरोध कर रहा है, उसे आतंकवादियों का समर्थक बता दिया जाता है। हमारे नेता मोहम्मद यूसुफ तरीगामी अनंतनाग से 24 साल से लगातार चुनाव जीत रहे हैं, जिसे आतंकवाद का गढ़ माना जाता है। जो लोग आतंकवाद से लड़ रहे थे, उन्हें नजरबंद कर दिया गया।

कश्मीर पर चीन की कूटनीति क्या है?

हमारी जानकारी के मुताबिक ममल्लापुरम में भी चीन के राष्ट्रपति ने कश्मीर का मुद्दा उठाया। मेरे विचार से कोई ऐसा देश नहीं जिसने कश्मीर में मानवाधिकारों पर चिंता न जताई हो।

दुनिया में नए तरह का राष्ट्रवाद और पूंजीवाद उभर रहा है, लेकिन पुर्तगाल में कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में भागीदार बनी है। क्या इसे लेफ्ट पार्टियों के फिर से उभरने का संकेत माना जाए?

अभी कहना जल्दबाजी होगी। जब पूंजीवादी व्यवस्था में वैश्विक संकट पैदा होता है, तो दक्षिणपंथ को बढ़ावा दिया जाता है। 1929 में भीषण मंदी की शुरुआत हुई। तब भी दक्षिणपंथ को बढ़ावा मिला, जिसका नतीजा हिटलर-मुसोलिनी जैसे तानाशाह हैं। 2007-08 के आर्थिक संकट के दस साल बाद भी समस्याएं बनी हुई हैं। वामपंथी सत्ता में आए तो पूंजीवादी व्यवस्था को खतरा होगा, इसलिए दक्षिणपंथ को बढ़ावा दिया जा रहा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप दक्षिणपंथी विचारधारा की बातें कहकर ही सत्ता में आए। ब्राजील और तुर्की में भी यही हुआ। अच्छी बात यह है कि प्रतिरोध भी बढ़ रहा है।

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से