आपका बैंक कितना भरोसेमंद!

प्रशांत श्रीवास्तव
कहीं नहीं सुनवाईः आरबीआइ के खिलाफ प्रदर्शन करते पीएमसी बैंक के ग्राहक
कहीं नहीं सुनवाईः आरबीआइ के खिलाफ प्रदर्शन करते पीएमसी बैंक के ग्राहक
पीटीआइ

प्रशांत श्रीवास्तव
विजय माल्या, नीरव मोदी और पीएमसी घोटाले ने बिगड़ते भारतीय बैंकिंग सिस्टम की खामियों को सबके सामने उजागर कर दिया है। अब जरूरत इस बात की है कि आरबीआइ और सरकार मिलकर लोगों के डगमगाते भरोसे को दोबारा स्थापित करें

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने हाल ही में अपनी वेबसाइट पर एक नया संदेश लिखा, “भारतीय बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित है। ग्राहकों को किसी भी तरह से घबराने की जरूरत नहीं है। ग्राहक अफवाहों पर ध्यान न दें।” लेकिन देश के लोगों को यही सवाल मथ रहा है कि अपने करीब 84 साल के इतिहास में आरबीआइ का पहली दफा ऐसा संदेश देना, क्या किसी बड़े खतरे का संकेत है? क्या बैंक डूबने वाले हैं? क्या बैंकों में रखी लोगों की जमा-पूंजी सुरक्षित नहीं है? इन सवालों ने लोगों के भरोसे को डगमगा दिया है। खतरे की खबरें हैं कि घटने के बजाय दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही हैं। इस बीच, 2018 में सरकार लोगों को आश्वस्त करने के बदले फाइनेंशियल रिजॉल्यूशन ऐंड डिपॉजिट इन्श्योरेंस विधेयक लाने की तैयारी में थी, जिसमें वह बैंक जमा पर मिलने वाली इन्श्योरेंस सुविधा को ही खत्म करना चाहती थी। हालांकि बढ़ते विरोध के कारण सरकार को उसे वापस लेना पड़ा।

अब आइए पहले जरा इन खबरों को देख लें। ताजातरीन तो पंजाब ऐंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) का 4,355 करोड़ रुपये का घोटाला है। इसके सामने आने के बाद कम से कम छह खाताधारक अकाल मौत के शिकार हो चुके हैं। हालत यह है कि बैंक के 50 हजार से ज्यादा ग्राहक अपनी जमा-पूंजी पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन कहीं उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। वे बैंकिंग रेग्युलेटर आरबीआइ से लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तक का दरवाजा खटखटा चुके हैं। उन्हें अभी तक आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला है।

मुंबई में हुए इस बैंकिंग फ्रॉड का असर देश के सुदूर कोने तक दिख रहा है।  उत्तर प्रदेश के सलेमपुर में एक निजी बैंक की खाताधारक नूरजहां बैंक में जाकर पूछती हैं, “क्या बैंक भागने वाला है? अगर ऐसा है तो बाबू बता दीजिए, जीवन भर की जो जमा-पूंजी है उसे निकालकर हम अपने घर रख लें। अखबार में बहुत छप रहा है कि बैंक डूब गया है, लोग आत्महत्या कर रहे हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे साथ भी ऐसा हो।” ऐसा ही कुछ हाल लखीमपुर खीरी में बैट्री के डिस्ट्रीब्यूटर जितेन्द्र वर्मा का है, उन्होंने कोऑपरेटिव बैंक में रखे अपने पांच लाख रुपये एक निजी बैंक में जमा करा दिए। वह कहते हैं, “कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि पैसे कहां रखें। पता नहीं कब बैंक कह दे कि अब पैसे नहीं मिलेंगे।”

चिंता की बात यह है कि बैंकिंग फ्रॉड थमने के बजाय लगातार बढ़ते जा रहे हैं। आरबीआइ की ट्रेंड ऐंड प्रोग्रेस रिपोर्ट के अनुसार 2013-14 से लेकर मार्च 2018 के बीच बैंक फ्रॉड के मामलों में 400 फीसदी बढ़ोतरी हुई। 2013-14 में 10,170 करोड़ रुपये के फ्रॉड हुए थे। यह 2017-18 में बढ़कर 41,167 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

भारतीय बैंकिंग सेक्टर की मौजूदा स्थिति पर नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्‍त्री अभिजीत बनर्जी ने हाल ही में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, “जिस तरह रोजाना बैंकिंग फ्रॉड के नए मामले सामने आ रहे हैं, उससे अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है। इसके लिए ग्राहकों को दोष नहीं दिया जा सकता है। एक बात साफ है कि भारतीय रिजर्व बैंक बहुत सतर्क नहीं है। वह बैंकों को सचेत करने में असफल रहा है। यह बहुत चिंताजनक स्थिति है। परेशान करने वाली बात यह है कि अचानक एक दिन हमें पता चलता है कि एक बैंक संकट में आ गया है। यह स्थिति गंभीर समस्या को इंगित करती है।”

जितेंन्द्र वर्मा हों या फिर नूरजहां, ऐसा नहीं है कि इन लोगों का बैंकों पर भरोसा केवल पंजाब ऐंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) के डिफॉल्ट की स्थिति में पहुंचने से हिल गया है। इसकी शुरुआत नवंबर 2016 से हो गई थी, जब कारोबारी विजय माल्या बैंकों का करीब 9,000 करोड़ रुपये लेकर देश छोड़कर भाग गया। उसके बाद हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने पंजाब नेशनल बैंक को 11,400 करोड़ रुपये की चपत लगा दी। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। सितंबर 2018 में देश की सबसे बड़ी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में से एक आइएल ऐंड एफएस पेमेंट डिफॉल्ट के संकट में फंस गई। बात सामने आते ही पूरा बैंकिंग सिस्टम डगमगा गया। आइएल ऐंड एफएस में भारतीय स्टेट बैंक से लेकर एलआइसी जैसी कंपनियों ने निवेश कर रखा है, इसलिए दिग्गज फाइनेंशियल कंपनियों की स्थिति बिगड़ने का खतरा बढ़ गया। रही सही कसर इस साल सितंबर में लक्ष्मी विलास बैंक, यस बैंक और दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड  (डीएचएफएल) की वित्तीय स्थिति बिगड़ने का मामला सामने आने से पूरी हो गई।

बिगड़ते हालात और ग्राहकों के टूटते भरोसे का एहसास अब बैंकों को भी होने लगा है। इसीलिए प्रमुख निजी बैंक एचडीएफसी ने अपने ग्राहकों के पासबुक पर डिपॉजिट इन्श्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (डीसीजीआइसी) के नियम की बात लिखनी शुरू कर दी है। बैंक ग्राहकों को बाकायदा मुहर लगाकर नियम याद दिलाते हुए कह रहा है कि बैंक के डूबने की स्थिति में जमाराशि पर केवल एक लाख रुपये की इन्श्योरेंस सुविधा मिलती है। जब इस तरह की पोस्ट को एक ग्राहक ने सोशल मीडिया पर वायरल किया तो बैंक ने सफाई में कहा, “आरबीआइ के निर्देशों के अनुसार 22 जून 2017 से बैंकों को डिपॉजिट इन्श्योरेंस की जानकारी पासबुक पर देना अनिवार्य है, इसलिए यह सूचना दी गई है।”

 

क्या है डिपॉजिट इन्श्योरेंस

डिपॉजिट इन्श्योरेंस वह सुविधा है जिसके तहत बैंक के डूबने की स्थिति में बीमित राशि ग्राहकों को मिल जाती है। यह इस समय केवल एक लाख रुपया है। यानी आपके बैंक खाते में चाहे जितने पैसे जमा हों, अगर बैंक डूब जाता है तो उस परिस्थिति में आपको केवल एक लाख रुपये ही मिलेंगे। एसबीआइ रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1,508 डॉलर (एक लाख रुपये) की तुलना में रूस में 19,210 डॉलर (12.67 लाख रुपये), ब्राजील में 64,025 डॉलर (42.25 लाख रुपये), जापान में 88,746 डॉलर (58.57 लाख रुपये), ब्र‌िटेन 1.11 लाख डॉलर (73.26 लाख रुपये) और अमेरिका में 2.5 लाख डॉलर (1.68 करोड़ रुपये) इन्श्योरेंस की सुविधा मिलती है।

जाहिर है, दुनिया की प्रमुख इकोनॉमी वाले देशों की तुलना में भारत के बैंक ग्राहकों को उनकी जमाराशि पर बेहद कम सुरक्षा की गारंटी है। इस पर एसबीआइ के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्यकांति घोष द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट कहती है, “1935 से 1969 के बीच में 1,565 बैंक फेल हो गए थे। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद यह सिलसिला काफी हद तक थम गया। लेकिन पीएमसी बैंक के फेल होने के बाद इस बात की बेहद जरूरत है कि डिपॉजिट इन्श्योरेंस की सीमा बढ़ाई जाए। अभी बैंक ग्राहकों को 1993 में तय की गई एक लाख रुपये की इन्श्योरेंस की सुविधा मिलती है। आज के दौर में बैंकों में लोगों की जमा राशि को देखते हुए यह बेहद कम है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि नब्बे के दशक में एक लाख रुपये के इन्श्योरेंस कवर से बैंकों में जमा 75 फीसदी राशि कवर हो जाती था। लेकिन मार्च 2018 में इन्श्योरेंस कवर राशि केवल 28 फीसदी रह गई।” रिपोर्ट में कहा गया है कि डिपॉजिट इन्श्योरेंस को दो वर्गों में बांट देना चाहिए। बचत खाते पर एक लाख रुपये और टर्म डिपॉजिट यानी एफडी, आरडी जैसी जमा पर दो लाख रुपये का इन्श्योरेंस कवर मिलना चाहिए। अगर ऐसा किया जाता है तो बचत खाते में जमा 90 फीसदी रकम और टर्म डिपॉजिट में 70 फीसदी रकम इन्श्योर्ड हो जाएगी।

गहराते अविश्वास पर नोबेल पुरस्कार विजेता बनर्जी ने जिस समस्या की ओर इशारा किया है, उसे बैंकों और कॉरपोरेट जगत के खतरनाक गठजोड़ से समझा जा सकता है। पीएमसी बैंक ने आरबीआइ के नियमों की अनदेखी करते हुए अपने कुल कर्ज की 70 फीसदी राशि हाउसिंग डेवलपमेंट ऐंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एचडीआइएल) को दे डाली। बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर थॉमस जॉय ने आरबीआइ को लिखे अपने कबूलनामे में कहा है कि 21,049 डमी एकाउंट के जरिए यह धोखाधड़ी की गई। इसी तरह पंजाब नेशनल बैंक के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी करते हुए 11,400 करोड़ रुपये नीरव मोदी की कंपनी को दे डाले। इस गठजोड़ का ही परिणाम है कि बैंकों की गैर निष्पादित संपत्तियां (एनपीए) रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2016 के बाद से बैंकों ने 17 लाख करोड़ रुपये के एनपीए की पहचान की है। रिपोर्ट कहती है कि बैंकों के एनपीए का स्तर मार्च 2020 तक गिरकर उनके कुल कर्ज का केवल आठ फीसदी रह जाएगा। यह मार्च 2018 में 11.5 फीसदी था। क्रिसिल के सीनियर डायरेक्टर कृष्णन सीतारमण के अनुसार बैंकों द्वारा कर्ज राइट ऑफ करने और इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी) लागू होने के बाद से एनपीए में कमी आ रही है। लेकिन बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज राइट ऑफ करने पर भी सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट करके कहा, “नोटबंदी ने क्रोनी कैपिटलिस्ट की ब्लैकमनी को व्हाइट कर दिया और अब आम आदमी की 3.16 लाख करोड़ रुपये की गाढ़ी कमाई को राइट ऑफ कर बैंक कॉरपोरेट को फायदा पहुंचा रहे हैं।”

आरबीआइ से एक आरटीआइ के जरिए जवाब से पता चला है कि बैंकों ने 2014-15 से 2018-19 तक 4.80 लाख करोड़ रुपये का कर्ज राइट ऑफ किया है। दरअसल, राइट ऑफ के जरिए बैंक अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा करते हैं। लेकिन राइट ऑफ किए गए कर्ज की वसूली वास्त‌विके कर्ज से बहुत कम होती है। इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया की ताजा रिपोर्ट को देखा जाए तो वह भी अच्छी तसवीर नहीं दिखा रही है। इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (आइबीबीआइ) की रिपोर्ट के अनुसार 30 सितंबर 2019 तक बोर्ड के पास 2,542 मामले आए। इनमें से 1,497 मामले अभी तक सेटल नहीं हो पाए हैं। उससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि 535 मामले 270 दिन की समय सीमा से आगे निकल चुके हैं। यानी उन्हें निपटाने में जरूरत से ज्यादा देरी हो रही है।

 

भरपाई छोटे ग्राहकों से

इस पूरी कवायद में बैंकों के सामने कमाई के अवसर घटते जा रहे हैं। ऐसे में वे उन्हीं ग्राहकों पर बोझ बढ़ा रहे हैं, जो खास तौर से उनके लिए ईमानदार हैं और बड़े कॉरपोरेट्स की तरह डिफॉल्ट करने से परहेज करते हैं। बैंकों ने ऐसे ग्राहकों से वसूली के लिए कई ऐसे चार्ज लगाने शुरू कर दिए हैं, जो पहले नहीं लिए जाते थे। मसलन, कई बैंकों ने बचत खाते में न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने पर ऊंचा चार्ज वसूलना शुरू कर दिया है। इसी तरह बैंकों ने एटीएम से नकद निकालने (फ्री ट्रांजेक्‍शन) की सीमा भी घटा दी है। अब यह देश के महानगरों में तीन और दूसरे शहरों में पांच कर दी गई है। इसी तरह बैंकों ने ब्रांच में जाकर कैश जमा करने पर भी सख्ती कर दी है। एक सीमा के बाद नकद जमा करने पर बैंक चार्ज वसूलने लगे हैं। मसलन, अगर आप एसबीआइ के ग्राहक हैं, तो एक महीने में तीन बार ही मुफ्त में कैश जमा कर सकेंगे। उसके बाद हर बार नकद जमा करने पर आपको 50 रुपये शुल्क और जीएसटी चुकाना होगा। इसी तरह एचडीएफसी बैंक चार बार तक कैश डिपॉजिट पर कोई चार्ज नहीं लेता है। उसके बाद प्रति जमा पर 150 रुपये चार्ज वसूलता है।

यह वसूली बैंकों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रही है। मार्च 2014 से लेकर सितंबर 2018 तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने सिर्फ एटीएम पर लगने वाले चार्ज से 4,327 करोड़ रुपये कमा लिए। न्यूनतम बैलेंस मेंटेन नहीं करने के नाम पर सार्वजनिक बैंकों ने इसी अवधि में 6,244 करोड़ रुपये की कमाई कर ली। ऑल इंडिया बैंक कर्मचारी संगठन के पूर्व जनरल सेक्रेटरी अश्विनी राणा का कहना है कि बैंक इस समय काफी दबाव में हैं। उनकी कमाई रुक गई है। ऐसे में उन्हें जहां भी मौका दिख रहा है, कमाई की कोशिश कर रहे हैं।

एक तरफ तो बैंक तरह-तरह के चार्ज आम ग्राहकों से वसूल रहे हैं, दूसरी तरफ कई मूल सुविधाएं भी हटाते जा रहे हैं। मसलन, एटीएम की संख्या लगातार कम होती जा रही है। आरबीआइ की ट्रेंड ऐंड प्रोग्रेस रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2018 तक देश में एटीएम की संख्या एक हजार घटकर गई है। मार्च 2017 में 2.08 लाख बैंक एटीएम थे।  इसी तरह बैंकों ने नई शाखाएं खोलने में भी कटौती करनी शुरू कर दी है। साल 2015-16 में बैंकों ने जहां 9,038 नई बैंक शाखाएं खोली थीं, 2017-18 में यह कम होकर केवल 3,948 रह गईं।

जाहिर है, इस समय भारतीय बैंकिंग सिस्टम के सामने अपनी साख को बरकरार रखने की बेहद कठिन चुनौती है। लेकिन इसका रास्ता खुद बैंकों, उसके नियामक आरबीआइ और उन पर नियंत्रण रखने वाली भारत सरकार को ही निकालना पड़ेगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार पिछली यूपीए सरकार के समय 'फोन बैंकिंग' के जरिए होने वाले भ्रष्टाचार की दुहाई दे चुके हैं, लेकिन सत्ता में दोबारा वापसी के बाद अब उनकी जवाबदेही है। क्योंकि अगर पीएमसी जैसे मामले सामने आते रहे, तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण केवल यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकेंगी, कि बैंक आरबीआइ के अधीन आते हैं और पीएमसी जैसे मामले में सरकार की सीधे कोई भूमिका नहीं है।

इन्श्योरेंस गारंटी तीन लाख तक

बढ़ते फ्रॉड के मामले और चौतरफा आलोचना के बीच सरकार अब फाइनेंशियल रिजॉल्यूशन डिपॉजिट इन्श्योरेंस विधेयक को फिर से लाने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार वित्त मंत्रालय नए विधेयक को शीतकालीन सत्र में संसद में पेश कर सकता है। इसमें बैंक जमा पर मिलने वाली इन्श्योरेंस की राशि एक लाख रुपये से बढ़ाकर तीन लाख रुपये करने पर विचार किया जा रहा है। इसके अलावा नए विधेयक में जमा लेने वाली गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की जमा को भी इन्श्योरेंस के दायरे में लाया जाएगा। अभी तक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, कोऑपरेटिव बैंक, इन्श्योरेंस कंपनियां ही इन्श्योरेंस कवर के दायरे में आती हैं। बैंक जमा पर इन्श्योरेंस कवर की सीमा 26 साल पहले 1993 में बढ़ी थी। बैंकिंग इंडस्ट्री के सूत्रों के अनुसार अब लिमिट बढ़ाने का सही समय है। अगर ऐसा होता है तो इससे छोटे जमाकर्ताओं की पूंजी की सुरक्षा बढ़ जाएगी। हालांकि यह कवर सेविंग और टर्म एकाउंट के लिए अलग-अलग हो सकता है। यानी सेविंग एकाउंट पर इन्श्योरेंस की सुविधा टर्म एकाउंट की तुलना में कम रहेगी।

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