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पेशेवरो खबरदार खतरे में है सोशल लाइफ

ऑफिस में काम का दबाव सोख रहा है जिंदगी का रस, थकान बेहिसाब, सेक्स लाइफ घटी, नींद उड़ी, घर-परिवार के लिए वक्त सिकुड़ा
आवरण कथा/स्वास्थ्य सर्वे

आप उच्च शिक्षा पाए हुए हैं, ऊंची कमाई की नौकरी करने वाले पेशेवर हैं, आलीशान लकदक जीवन जीते हैं तो सावधान, ऑफिस में बढ़ते काम के घंटे आपकी जिंदगी का रस चूस रहे हैं। आप पर तनाव तारी रहता है, घर में भी ऑफिस का काम उठा लाते हैं, बदलती जीवनशैली और रोज की भागदौड़ में अपने और अपने परिवार के लिए वक्त भी थोड़ा ही निकाल पाते हैं, फुर्सत पाते ही विस्तर पकड़ने को मचलते हैं तो जरा ठहर कर सोचिए! आपमें बच्चों और अपने पार्टनर की बातें खीझ पैदा करने लग सकती हैं, खाना या ज्यादातर फास्ट फूड जल्दी-जल्दी गड़प लेने का मन हो सकता है। सेक्स लाइफ तो शिथिल या कम से कम हुआ महसूस हो सकता है। ये सभी उस तनाव के लक्षण हैं जो निरंतर बढ़ते काम के घंटे और काम के बोझ से उपजा और आपकी सेहत की खुशहाली लील रहा है। हाल ही में खासकर शहरी उच्च उपभोक्ता वर्ग में किए गए आउटलुक-कार्वी इनसाइट्स सर्वे के नतीजे ऐसे ही हालात की भरपूर गवाही दे रहे हैं।

इस साल 23 जुलाई से 1 अगस्त के बीच आठ बड़े शहरों में उच्च उपभोक्ता वर्ग के 1,648 लोगों के बीच यह सर्वेक्षण किया गया। विभिन्न आयु वर्ग के लोगों में हुए इस सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि थकान और शिथिलता के कारण 35 साल से अधिक उम्र के लोगों में 67% की सेक्स लाइफ प्रभावित हो रही है, एक-तिहाई अवसाद से ग्रस्त हो रहे हैं, 37% लोग ठीक से सो नहीं पाते, 76% के लिए काम में ध्यान लगाना मुश्किल होता है और 61% लोग परिवार के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाते (सर्वेक्षण के अलग-अलग नतीजों के चार्ट बगल की स्टोरी में देखें)।

आम धारणा के विपरीत सर्वेक्षण में एक चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि महानगरों की तुलना में अन्य शहरों में लोग ज्यादा देर तक काम करते हैं। महानगरों में हर व्यक्ति रोजाना औसतन 8.3 घंटे, जबकि अन्य शहरों में 8.8 घंटे काम करता है। हालांकि काम के बढ़ते घंटे हर जगह लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। सर्वेक्षण में शामिल 13% लोगों ने कहा कि उन्हें रोजाना 10 घंटे से ज्यादा काम करना पड़ता है, और 27% ऑफिस के बाद घर पर भी ऑफिस का काम करते हैं। घर में ऑफिस का काम करने वालों की संख्या महानगरों में 25% और अन्य बड़े शहरों में 30% है। काम पर ध्यान केंद्रित करने के मामले में महानगर के लोग आगे हैं। यहां 79% ने कहा कि वे जो भी करते हैं, ध्यान लगाकर करते हैं। अन्य शहरों में ऐसे लोगों की संख्या सिर्फ 69% है। काम के बाद परिवार को समय देने के मामले में महानगर और अन्य शहरों में ज्यादा अंतर नहीं है। महानगरों में 33% और अन्य शहरों में 37% लोगों के पास काम के बाद परिवार के लिए समय नहीं होता है।

ग्रेटर नोएडा के कैलाश हॉस्पिटल में गंभीर रूप से बीमार मरीजों का इलाज करने वाले इंटेन्सिविस्ट डॉ. प्रशांत गुप्ता का कहना है कि बदलती जीवनशैली से कई तरह की बीमारियों का जोखिम बढ़ गया है। हमारे पास सबसे ज्यादा ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और श्वास रोग से पीड़ित लोग आ रहे हैं। चिंता की बात यह है कि ये बीमारियां काफी कम उम्र में लोगों को हो रही हैं। 30 साल से कम उम्र के लोग भी ऐसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। ऐसे में खान-पान और जीवनशैली बदलने की सख्त जरूरत है।

सेक्स लाइफ

सर्वे में शामिल आधे से ज्यादा (53%) लोगों ने कहा कि शारीरिक और मानसिक थकान के चलते उनकी सेक्स लाइफ प्रभावित हो रही है। महानगरों में ऐसे लोगों की संख्या 59% और अन्य शहरों में 44% है। हालांकि यहां एक विरोधाभास भी दिखा। सेक्स लाइफ भले ही महानगरों में ज्यादा प्रभावित होती हो, लेकिन सेक्स लाइफ के प्रति ज्यादा संतुष्ट भी यहीं के लोग हैं। महानगरों में 65% और अन्य शहरों में 59% लोगों ने कहा कि वे अपनी सेक्स लाइफ से संतुष्ट हैं। शायद इसलिए कि लोगों ने गिरती सेक्स लाइफ को सामान्य मान लिया है। 35-55 साल तक के लोगों में 86-87% ने कहा कि वे अपनी सेक्स लाइफ से संतुष्ट हैं। जो संतुष्ट नहीं हैं, उनमें ज्यादातर ने समय नहीं मिलने को इसकी सबसे बड़ी वजह बताया। महानगरों में 11% लोगों ने कहा कि वे कम सेक्स करते हैं, लेकिन इससे उन्हें कोई परेशानी नहीं है। अन्य शहरों में यह सोच रखने वाले 17% लोग हैं। महानगरों में तीन फीसदी और अन्य शहरों में छह फीसदी लोगों ने यह भी कहा कि सेक्स से उन्हें बोरियत महसूस होती है।

बढ़ रहे डिप्रेशन के मामले

बदलती जीवनशैली के कारण लोग कम उम्र में ही डिप्रेशन यानी अवसाद के शिकार होने लगे हैं। सर्वे में शामिल एक-चौथाई लोगों ने कहा कि पिछले साल भर में कम से कम एक बार वे अवसाद के शिकार हुए हैं। महानगरों में 25% और अन्य शहरों में 23% लोग पिछले एक साल के दौरान अवसादग्रस्त हुए। इनमें पुरुषों की संख्या ज्यादा है। उम्र बढ़ने के साथ यह समस्या बढ़ती जाती है। 35 साल से अधिक उम्र वालों में एक-तिहाई डिप्रेशन के शिकार हुए। हालांकि अवसादग्रस्त होने के बावजूद सभी इसकी दवाई नहीं लेते। अवसाद के शिकार लोगों में सिर्फ 31% ने इसकी दवा ली। दवा नहीं लेने वालों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। योजना आयोग (अब नीति आयोग) में स्वास्थ्य मामलों की समिति के सदस्य रहे डॉ. रमेश चंद्र त्रिपाठी का कहना है कि डिप्रेशन एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। चिंताजनक बात यह है कि आज की भागम-भाग में युवा इसके ज्यादा शिकार हो रहे हैं। इसकी एक प्रमुख वजह अकेलापन और छोटे होते परिवार हैं। कम उम्र में डिप्रेशन का शिकार होने का लंबी अवधि में बेहद बुरा असर होता है। यह व्यक्तित्व में भी नकारात्मक बदलाव लाता है।

कम हो रही है नींद

काम का ही दबाव है कि लोगों की नींद कम होती जा रही है। लोग रोजाना औसतन 7.2 घंटे ही सो पाते हैं। सर्वेक्षण में यह भी पता चला कि किसी भी आयु वर्ग में लोग 7.4 घंटे से ज्यादा नहीं सोते, फिर भी 90% लोगों को लगता है कि वे पर्याप्त नींद सोते हैं। महानगरों में 91% और अन्य शहरों में 89% लोगों को लगता है कि वे पूरी नींद सोते हैं। लगभग एक-तिहाई लोगों ने माना कि वे गहरी नींद नहीं सो पाते हैं। महानगरों में 34% और अन्य शहरों में 35% ने कहा कि उन्हें गहरी नींद नहीं आती है।

छूट रहा है एक वक्त का खाना

कामकाज की व्यस्तता बढ़ने से लोग खान-पान में अनियमितता बरतने लगे हैं। कई बार तो लोग दिन में एक वक्त का खाना ही छोड़ देते हैं। महानगरों में 23% और दूसरे शहरों में 28% लोग एक वक्त का खाना अक्सर नहीं खाते। इसी तरह, देर रात यानी 10 बजे के बाद खाना खाने वाले महानगरों में 41% और अन्य शहरों में 48% हैं। दो फीसदी लोग रोजाना खाने के लिए बाहर जाते हैं या बाहर से खाना मंगवाते हैं। महानगरों की तुलना में दूसरे शहरों के लोग खान-पान में ज्यादा अनियमितता बरतते हैं। महानगरों में 23% लोगों ने कहा कि अक्सर वे एक वक्त का खाना नहीं खाते। दूसरे शहरों में ऐसे लोगों की संख्या 28% है। आम धारणा के विपरीत देर से खाना खाने वालों में पुरुष ज्यादा हैं। महानगरों में 64% लोग रोजाना फल खाते हैं, लेकिन ये जंक फूड और तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन भी दूसरों की तुलना में ज्यादा करते हैं। इसके बावजूद महानगरों में 91% लोगों को लगता है कि वे सेहतमंद खाना खाते हैं। विभिन्न आयु वर्ग के छह से सात फीसदी लोग मानते हैं कि उनका खाना सेहतमंद नहीं होता। सेहतमंद खाना क्यों नहीं खाते, यह पूछने पर आधे लोगों ने कहा कि फास्ट फूड आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इसके अलावा खाना बनाने का समय नहीं मिलना और सेहतमंद खाना महंगा होना भी इसके कारण हैं।

हेल्थ सप्लीमेंट का बढ़ा जोर

खान-पान ठीक से नहीं होने के कारण लोग इसकी भरपाई कैल्शियम, विटामिन, प्रोटीन जैसे हेल्थ सप्लीमेंट से करते हैं। सर्वेक्षण में शामिल 30% लोगों ने कहा कि वे इनका इस्तेमाल करते हैं। महानगरों में इनकी संख्या 35% और अन्य शहरों में 26% है। हेल्थ सप्लीमेंट का इस्तेमाल करने वालों में 35% ने कहा कि वे तनाव दूर करने के लिए इसका सेवन करते हैं। इसकी अन्य वजहों में शारीरिक ऊर्जा बढ़ाना और भोजन में पोषक तत्वों की कमी शामिल है। जो लोग हेल्थ सप्लीमेंट का इस्तेमाल नहीं करते उनमें लगभग 80% ने कहा कि उन्हें इसकी जरूरत महसूस नहीं होती। साइड इफेक्ट और आदत लगने की डर से भी लोग इन्हें खाने से बचते हैं।

68% लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा नहीं

सर्वे में शामिल सिर्फ 32% लोगों ने कहा कि उनके पास स्वास्थ्य बीमा है। यानी 68% के पास स्वास्थ्य बीमा नहीं है। महानगरों में बीमा वाले लोगों की संख्या 33% और अन्य शहरों में 30% है। इस मामले में महिला और पुरुष का अंतर भी दिखता है। सिर्फ 27% महिलाओं के पास स्वास्थ्य बीमा है जबकि पुरुषों के मामले में यह संख्या 36% है। खुद को सेहतमंद समझने वाले 31% लोगों ने स्वास्थ्य बीमा करवा रखा है, जबकि खुद को बीमार समझने वाले 36% लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है। आश्चर्यजनक बात यह है कि 56% लोगों ने कहा कि उन्हें स्वास्थ्य बीमा की जरूरत महसूस नहीं होती। बीमा नहीं करवाने के अन्य कारणों में इसका महंगा होना, लंबी प्रक्रिया, बीमा कंपनियों पर अविश्वास, जानकारी का अभाव और नियोक्ता कंपनी द्वारा मेडिकल बिल का भुगतान शामिल हैं।

परिवार और नौकरी की चिंता से तनाव

काम के दबाव से लोगों में थकान और शिथिलता बढ़ रही है। महानगरों के 20% और अन्य शहरों के 35% लोगों ने कहा कि वे रोजाना थकान महसूस करते हैं। लगभग आधे लोगों ने ऑफिस में ज्यादा काम को थकान और तनाव की मुख्य वजह बताया। एक-तिहाई ने कहा कि उन्हें शहर में आने-जाने में काफी समय लगता है, इस वजह से थकान महसूस होने लगती है। एक-तिहाई लोगों ने आर्थिक जिम्मेदारियों को इसकी वजह बताया। अन्य कारणों में भावनात्मक मुद्दे, पारिवारिक संबंधों में तनाव, नौकरी को लेकर असंतोष, सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताना और बीमारियां शामिल हैं।

सबसे बड़ा रुपैयानहीं, सबसे बड़ा परिवार

लोग परिवार को सबसे ज्यादा और पैसे को सबसे कम अहमियत देते हैं। सर्वेक्षण में शामिल 67% लोगों ने परिवार को पहली प्राथमिकता बताया। 26% के लिए स्वास्थ्य सबसे महत्वपूर्ण था। नौकरी चार फीसदी और पैसा सिर्फ तीन फीसदी लोगों के लिए सबसे अधिक महत्व रखता है। इस मामले में महानगरों और अन्य शहरों में ज्यादा फर्क नहीं दिखा। महिलाएं सबसे ज्यादा परिवार को ही महत्व (73%) देती हैं। सिर्फ दो फीसदी महिलाएं हैं जिनके लिए पैसे की अहमियत सबसे ज्यादा है। यह सोच रखने वाले पुरुष चार फीसदी हैं। 61% पुरुष परिवार को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं।

कॉस्मेटिक सर्जरी का बढ़ता चलन

जीवनशैली और खान-पान के कारण वजन बढ़ता है और वजन कम करने के लिए लोग डायटीशियन के पास जाते हैं। महानगरों में 10 और अन्य शहरों में सात फीसदी लोग डायटीशियन के पास जाते हैं। लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि कॉस्मेटिक सर्जरी कराने में अन्य शहर काफी आगे हैं। महानगरों में सिर्फ एक फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने कॉस्मेटिक सर्जरी कराई है, जबकि अन्य शहरों में 6% ने कॉस्मेटिक सर्जरी कराने की बात बताई। उम्र बढ़ने के साथ कॉस्मेटिक सर्जरी का चलन बढ़ जाता है। 35-44 और 45-55 आयु वर्ग के पांच-पांच फीसदी लोगों ने कॉस्मेटिक सर्जरी कराई है। कम उम्र के लोगों में इनकी संख्या एक से तीन फीसदी तक रही। व्यस्तता के कारण लोग व्यायाम भी नहीं कर पाते हैं। महानगरों में तो आधे लोग कभी व्यायाम करते ही नहीं, हालांकि अन्य शहरों में ऐसे लोगों की संख्या सिर्फ 27% है। व्यायाम नहीं करने वालों में आधे से ज्यादा लोगों ने कहा कि उनके पास पर्याप्त समय नहीं होता है। महानगरों में 37% लोगों ने कहा कि वे रोजाना व्यायाम करते हैं। अन्य शहरों में ऐसे लोगों की संख्या 44% है। आधे से ज्यादा लोग फिटनेस रखने और पूरे दिन ऊर्जावान रहने के लिए व्यायाम करते हैं। लोग स्वास्थ्य की नियमित जांच करवाने में भी लापरवाही बरतते हैं। 30% लोगों ने तो कहा कि उन्होंने कभी जांच करवाई ही नहीं। सिर्फ 17% ने कहा कि बीते छह महीने के दौरान उन्होंने जांच करवाई है। स्वास्थ्य जांच करवाने वालों में से ज्यादातर (59%) में पीठ का दर्द, रक्तचाप, डायबिटीज, कैल्शियम और विटामिन की कमी जैसी समस्याएं पाई गईं। हालांकि समस्या का पता चलने के बाद भी 54% से 75% मामलों में लोगों ने दवा नहीं ली। जांच ही नहीं, लोग डॉक्टर के पास जाने से भी कतराते हैं। सर्वेक्षण में शामिल 62% लोगों ने कहा कि वे छह महीने से भी ज्यादा समय से डॉक्टर के पास नहीं गए। महानगरों में ऐसे लोगों की संख्या 66% और अन्य शहरों में 57% है। मोबाइल फोन पर समय बिताने के मामले में महानगर हों या दूसरे बड़े शहर, लगभग बराबर हैं। महानगरों में 48% और अन्य शहरों में 46% लोगों ने कहा कि उनका काफी वक्त मोबाइल फोन पर बीतता है। महानगरों के 42% लोग चाहते हैं कि मोबाइल पर उनका समय कम हो। दूसरे शहरों में ऐसे लोगों की संख्या 49% है।

 

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बदलती जीवनशैली से कई तरह की बीमारियों का जोखिम बढ़ा, लोग कम उम्र में ही ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और श्वास रोग से ग्रस्त हो रहे हैं

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अकेलापन और छोटे होते परिवार के चलते युवा िडप्रेशन के शिकार ज्यादा हो रहे हैं। कम उम्र में डिप्रेशन से व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है

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