Advertisement
28 नवंबर 2022 · NOV 28 , 2022

स्मृति: गांधी की दृष्टि वाला मार्क्सवादी आलोचक

मैनेजर पांडे हिंदी के योग्यतम अध्यापकों में थे
मैनेजर पांडे (23 सितंबर 1941 – 6 नवंबर 2022)

मैनेजर पांडे के निधन से हिंदी आलोचना का नुकसान तो हुआ ही है, यह मेरा व्यक्तिगत नुकसान भी है। पिछले 35-40 साल से मेरे उनसे पारिवारिक संबंध थे। वे बिहार के गोपालगंज जिले के लोहाटी गांव में पैदा हुए थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई, फिर बनारस में। मेरा गांव भी उनके गांव के पास है। हमारा उनका रिश्ता गांव-देहात का था। धीरे-धीरे यह पारिवारिक मित्रता में बदल गया। कितने अवसर आए जब सुख-दुख में हम साथ खड़े रहे। परेशानियों में कभी मैं उनके साथ खड़ा रहा, कभी वे हमारे साथ। हम साथ में परेशानियों के समाधान ढूंढते रहे। पढ़ाई-लिखाई में कई बातें उनसे सीखीं, पूछीं। आज उनके न रहने पर लग रहा है कि दिल्ली में संदर्भ-कोश जैसा जो इंसान था मेरे लिए, अब वह नहीं रहा।

उन्होंने गोपालगंज से लेकर दिल्ली तक जो यात्रा की, जो स्थान बनाया, वह चमत्कृत करने वाला है। साधारण किसान परिवार से निकल कर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तक पहुंचकर उन्होंने हिंदी आलोचना और अपनी धरती को सार्थक किया। वे हिंदी के योग्यतम अध्यापकों में थे। हिंदी के कुशल वक्ता थे। उन्होंने अपने अध्यापन कर्म के जरिये, भाषणों के जरिये, किताबों और लेखों के जरिये हिंदीभाषी समाज, हिंदी की युवा पीढ़ी को शिक्षित करने और प्रशिक्षित करने का काम किया। मैनेजर पांडे उन लोगों में थे जिनके लेखन की दिशा स्पष्ट थी। वे किसी भी तरह की दुविधा में रहने वाले न इंसान थे, न आलोचक। हिंदी के बुद्धिजीवियों में कई बार कई तरह की दुविधाएं मिलती हैं। ये दुविधाएं इसलिए होती हैं कि हिंदी के बुद्धिजीवी कई तरह की सुविधाओं पर नजर लगाए रहते हैं, लेकिन मैनेजर पांडे उन सुविधाओं से मुक्त खुद में रहने वाले और अपनी बात ठीक ढंग से कहने वाले आलोचक थे। अपने शिक्षण और लेखन के जरिये उन्होंने हिंदी आलोचना और हिंदी के बौद्धिक समाज का विस्तार किया, उसकी भलाई के लिए काम किया। उसके धरातल को उन्नत किया।

मैनेजर पांडे ने कई किताबें लिखीं। ‘शब्द और कर्म’ उनकी पहली किताब थी। ‘शब्द और कर्म’ की एकरूपता पर जोर देने वाली किताब और शब्द को कर्म बनाने वाले, क्रियाशील बनाने वाली दृष्टि, हिंदी आलोचना में इतनी लोकप्रिय हुई कि वह किताब बहुत पढ़ी गई। ‘शब्द और कर्म’ से शुरू करके मैनेजर पांडे ने ‘भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य’ जैसी पुस्तक भी लिखी। यह पुस्तक मध्यकालीन भक्ति कवित्त की नई व्याख्या लेकर आई। मैनेजर पांडे ने इस पुस्तक के जरिये भक्ति काव्य में उस पक्ष की ओर इशारा किया जिसकी हिंदी आलोचना में प्रायः अनदेखी हुई थी। रामविलास शर्मा मानते थे कि सूरदास चरवाहा संस्कृति के लेखक हैं, किसान चेतना के सर्वश्रेष्ठ कवि तो तुलसीदास हैं। मैनेजर पांडे ने अपनी पुस्तक में विस्तार से रामविलास जी की इस स्थापना का खंडन किया। उन्होंने बताया कि सूरदास समाज से निरपेक्ष कवि नहीं हैं। साथ ही यह भी बताया कि वे चरवाहा संस्कृति के कवि नहीं हैं। सूरदास के काव्य में किसान जीवन की छवियां हैं, किसान जीवन का यथार्थ है, किसान जीवन का चित्र है और सूर किसान जीवन के बहुत मजबूत कवि हैं। इस तरह से भक्ति समाज की आलोचना का विकास उन्होंने किया। एक तरह से मैनेजर पांडे ने हिंदी में समाजशास्त्रीय आलोचना की नींव रखी। उन्होंने ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ नामक पुस्तक लिखकर पहली बार हिंदी में समाजशास्त्रीय आलोचना का वातावरण तैयार किया और लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। एक महत्वपूर्ण दृष्टि के साथ वे हमारे सामने समाजशास्त्रीय आलोचक के रूप में उभरे।

मैनेजर पांडे ने साहित्य चिंतन तो किया ही, इसके अलावा उन्होंने व्यावहारिक आलोचना भी लिखी। उन्होंने रेणु पर, जैनेन्द्र पर, नागार्जुन की कविताओं पर, कुमार विकल की कविताओं पर और अनेक रचनाकारों पर लिख कर अपनी व्यावहारिक आलोचना क्षमता का परिचय दिया। एक सिद्धांतकार के साथ-साथ व्यावहारिक आलोचना लिखने वाले आलोचक के रूप में भी उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी। मैनेजर पांडे ने इससे आगे बढ़ कर हिंदी में उपन्यास आलोचना को मजबूत करने का काम किया। हिंदी में उपन्यास आलोचना की दशा ठीक नहीं थी। तब बहुत थोड़े आलोचक थे जिन्होंने हिंदी उपन्यास आलोचना पर काम किया था। नलिन विलोचन शर्मा उनमें से एक हैं। मैनेजर पांडे ने नलिन विलोचन शर्मा और अन्य आलोचकों द्वारा आलोचना संबंधी किए गए कार्यों को आगे बढ़ाया और कुछ नई बातें जोड़ीं। उन्होंने उपन्यास आलोचना को लोकतंत्र के विकास के साथ रख कर देखा। उनकी लिखी हुई उपन्यासों की आलोचना व्यावहारिक है। जैसे, उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आंचल’, जैनेन्द्र के ‘सुनीता’, ‘त्यागपत्र’ पर लिखा। ये दोनों लेखक मार्क्सवादी नहीं थे, जबकि मैनेजर पांडे मार्क्सवादी आलोचक थे।

प्रायः मार्क्सवादी आलोचकों जैसे, नामवर सिंह या रामविलास शर्मा का रवैया जैनेन्द्र कुमार या फणीश्वरनाथ रेणु के प्रति बहुत ही नकारात्मक था, उपेक्षापूर्ण था। हिंदी आलोचना में जैनेन्द्र और फणीश्वरनाथ रेणु को असामाजिक लेखक मानने की दृष्टि विकसित हो रही थी। मैनेजर पांडे ने उसका जवाब दिया। वे मार्क्सवादी आलोचक थे लेकिन उन्होंने बाकी मार्क्सवादी आलोचकों से भिन्नता प्रकट की। उन्होंने जैनेन्द्र और फणीश्वरनाथ रेणु का नया मूल्यांकन प्रस्तुत किया। इस तरह से उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टि के साथ हिंदी आलोचना में गांधीवादी दृष्टि का समन्वय किया। उन्होंने जैनेन्द्र कुमार के उपन्यासों की सामाजिकता और उसके पीछे गांधी की गहरी सामाजिक दृष्टि और इस दृष्टि से प्रभावित होने वाली जैनेन्द्र की औपन्यासिक दृष्टि को रेखांकित किया। इसी तरह ‘मैला आंचल’ पर लिखते हुए उन्होंने गांधीवादी दृष्टि को खोजते हुए इसका महत्व रेखांकित किया। एक तरह से उन्होंने मार्क्सवादी आलोचना का विस्तार किया। उन्होंने मार्क्सवादी आलोचना को बहुत ही सकारात्मक दृष्टि दी। यह मैनेजर पांडे की देन है।

मार्क्सवादी आलोचना मैनेजर पांडे से विस्तृत होती है। मैनेजर पांडे ने हिंदी आलोचना में स्त्री मुद्दे के सवालों को उठाया। भक्त कवियों पर लिखते हुए उन्होंने मीराबाई के सवाल को उठाया। आधुनिक काल की कवयित्री महादेवी वर्मा की कविताओं की पुस्तक शृंखला पर लिखते हए उन्होंने भारतवर्ष में स्त्रियों की दुर्दशा की पड़ताल की और स्त्रियों की अलग साहित्यिक दृष्टि की खोज की। मीराबाई, महादेवी वर्मा और दूसरी महिला रचनाकारों में उन्होंने इसकी खोज की और हिंदी साहित्य में इसकी जरूरत क्यों है यह बतलाया। आलोचक के रूप में इसका पूरा श्रेय मैनेजर पांडेय को जाता है कि उन्होंने हिंदी आलोचना में स्त्री मुक्ति के महत्व को रेखांकित किया और उस आधारभूमि को तैयार किया जहां खड़े होकर हम साहित्य को स्त्री के नजरिये से देख सकते हैं। उन्होंने हिंदी आलोचना में दलित साहित्य की वकालत की। रामविलास शर्मा और नामवर सिंह जैसे मार्क्सवादी आलोचकों की दलित साहित्य को लेकर राय बहुत सकारात्मक नहीं थी। मैनेजर पांडे ने आगे बढ़कर दलित साहित्य का समर्थन किया उसे आगे बढ़ाने की दिशा में अपना योगदान भी दिया। साथ ही आलोचकीय योगदान भी दिया। उनकी एक प्रसिद्ध पंक्ति है, “रस्सी ही जानती है, तनने का स्वाद।” दलित जो लिख रहे थे, भोग रहे थे और भोग कर जो लिख रहे थे उसका मर्म तो वही जान सकता है, जिसने वह भोगा है। कुछ लोग दलित साहित्य में कुछ शिल्पगत कमजोरियां, संरचना संबंधित कमजोरियां देख रहे थे। मैनेजर पांडे ने कहा कि हां, इसमें ये कमजोरियां हैं। जैसे भारतेंदु काल का साहित्य थोड़ा कमजोर था, लेकिन उसकी दिशा आधुनिकता की थी, जागरण की थी, वैसे ही अभी दलित साहित्य का प्रथम उत्थान है। इसमें बनावट संबंधी कुछ कमजोरियां हैं जो दूर होंगी और दलित साहित्य आगे बढ़ेगा, इसलिए इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

इस तरह हम देखें तो ‘शब्द और कर्म’ से शुरू होकर मैनेजर पांडे जहां तक पहुंचे, जैसे उपन्यास की आलोचना, दलित साहित्य की आलोचना, स्त्री साहित्य की आलोचना और मार्क्सवादी आलोचना में गांधी की दृष्टि का समावेश, यह हिंदी आलोचना का विस्तार था। मैनेजर पांडे की पहचान मार्क्सवादी आलोचक के रूप में है लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी मार्क्सवादी दृष्टि वह नहीं है जो रामविलास शर्मा या नामवर सिंह की है। यह दृष्टि उससे आगे बढ़ी हुई है। इसमें अधिक से अधिक भारतीय, देशज दृष्टि का समावेश है। भारतीय सामाजिकता, भारत के विचारकों, सामाजिक आंदोलनकारियों का भी समावेश है।

मैनेजर पांडे के निधन पर इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और उनको अपना अंतिम प्रणाम देता हूं।

गोपेश्वर सिंह

(लेखक प्रतिष्ठित आलोचक हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष हैं)

Advertisement
Advertisement
Advertisement