कंपनियों के दबाव में है एफएसएसएआइ

स्वदेशी जागरण मंच के नेशनल कनवीनर अश्विनी महाजन
स्वदेशी जागरण मंच के नेशनल कनवीनर अश्विनी महाजन
त्रिभुवन तिवारी

एक तरफ भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार देश में कुपोषण को दूर करने के लिए खाद्य पदार्थों में फोर्टिफिकेशन का रास्ता अपना रही है, दूसरी तरफ पार्टी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा स्वदेशी जागरण मंच सरकार के इस कदम को खतरनाक बता रहा है। उसका कहना है कि फूड रेग्युलेटर एफएसएसएआइ कंपनियों के दबाव में काम कर रहा है। इस संबंध में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखने जा रहा है। संगठन फोर्टिफिकेशन को क्यों गलत मान रहा है, इस मसले पर एसोसिएट एडिटर प्रशांत श्रीवास्तव ने स्वदेशी जागरण मंच के नेशनल को-कनवीनर अश्विनी महाजन से बात कर उनकी दलीलें जानने की कोशिश की...

कुपोषण को दूर करने के लिए क्या फोर्टिफिकेशन का विकल्प सही है?

खाने के उत्पादों में फोर्टिफिकेशन की शुरुआत नमक में आयोडीन मिलाकर की गई थी। स्वदेशी जागरण मंच हमेशा से इस तरह की पहल का विरोध करता रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि खाने के पदार्थों में अलग से पोषक तत्वों को मिलाने से कुपोषण दूर हो जाता है, इसका कोई प्रमाण नहीं है। इस संबंध में हम सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा भी जीत चुके हैं। आयोडीन के मामले में ही लॉबिस्ट का दावा था कि देश भर के लोगों में आयोडीन की कमी है। इसलिए आयोडीन युक्त नमक देना जरूरी है। लेकिन हकीकत इंडियन न्यूट्रिशन इंस्टीट्यूट के सर्वेक्षण से सामने आई, जिसमें यह पाया गया कि देश के केवल दो प्रतिशत जिले हैं, जहां यह समस्या थी। उस समय से यह आशंका थी कि आने वाले दिनों में डबल फोर्टिफिकेशन का मामला उठेगा। अब विटामिन ए और डी को शामिल करने की बात कही जा रही है। जो पूरी तरह से गलत है।

आपके अनुसार ऐसा करने से लोगों की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है?

जब किसी व्यक्ति के शरीर में विटामिन ए और डी की कमी होती है, तो उसे डॉक्टरों की  निगरानी में दिया जाता है। ऐसे में हर किसी को देने के लिए अनिवार्य करना, कहां तक सही है? ऐसा कर हम जनता को खतरे में डालेंगे। असल में दुनिया की तीन-चार कंपनियां हैं, जो इस तरह के कदम उठाने के लिए लॉबिंग करती हैं। यह उसी का परिणाम है। इन कंपनियों का खतरनाक गठजोड़ है, जो रेग्युलेटर पर ऐसा करने का दबाव बनाती हैं।

क्या रेग्युलेटर एफएसएसएआइ दबाव में काम कर रहा है?

देखिए, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) का काम है कि लोगों को अच्छा भोजन मिले, उसमें किसी तरह की मिलावट नहीं हो। लेकिन एफएसएसएआइ फोर्टिफिकेशन की बात कर रहा है, जो हकीकत में उसका काम नहीं है। इस बात को, वह स्वदेशी जागरण मंच को आरटीआइ के तहत दिए गए जवाब में खुद स्वीकार कर चुका है। उल्टे एफएसएसएआइ उन कंपनियों के साथ काम कर रहा है, जिन पर खुद आरोप है। मैगी मामले में नेस्ले के ऊपर आरोप थे, अब वह एफएसएसएआइ का पार्टनर बन गया है। ऐसे में आप क्या कोई सकारात्मक उम्मीद कर सकते हैं?

क्या खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियां भी इस खेल में शामिल हैं?

एक जाल बुना गया है, जिसमें लोगों को मजबूर किया जा रहा है कि फोर्टिफाइड खाद्य उत्पाद खरीदें। लेकिन अमूल ने ऐसा करने से मना कर दिया है। अब बताइए फोर्टिफाइड दूध की क्या जरूरत है?  एफएसएसएआइ लोगों पर दबाव बना रहा है कि वह ऐसा करें, जो पूरी तरह से गलत है। मेरा कहना है कि इसकी तो सीबीआई जांच होनी चाहिए। हम तो जनता को आगाह करते हैं कि जब तक फोर्टिफाइड दूध के बारे में निश्चित न हो जाए कि इसे पीने से फायदा होगा या नुकसान, उस वक्त तक इसका कोई उपयोग नहीं करे।

इसे रोकने के लिए स्वदेशी जागरण मंच की क्या रणनीति है?

हम हर जगह जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखेंगे, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से भी संपर्क करेंगे। साथ ही एफएसएसएआइ के चेयरपर्सन से भी मिलूंगा, जिससे कि ऐसा नहीं हो।

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