बाढ़ प्राकृतिक या मानव निर्मित?

मुंबई से कंचन श्रीवास्तव
तबाही का मंजरः सांगली में लोगों को बचाने के लिए एनडीआरएफ के साथ सेना-नौसेना को भी उतरना पड़ा
तबाही का मंजरः सांगली में लोगों को बचाने के लिए एनडीआरएफ के साथ सेना-नौसेना को भी उतरना पड़ा
गैटी इमेजेज

मुंबई से कंचन श्रीवास्तव
बांधों के कुप्रबंधन और लापरवाहियों से वर्षों बाद ऐसी तबाही मची कि 50 से ज्यादा लोगों की जान गई, हजारों बेघर हो गए

तीस साल के रविराज मोहिते महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के करवीर तालुका के आरे गांव के किसान हैं। 8 अगस्त 2019 को आई बाढ़ में उनका घर ढह गया। करीब 3,500 की आबादी वाले गांव का निचला इलाका चार दिनों तक डूबा रहा। आरे गांव तुलसी और भोगवती नदी के बीच है। दोनों पंचगंगा की सहायक नदियां हैं। पंचगंगा आगे चलकर महाराष्ट्र की सबसे बड़ी कृष्णा नदी में मिलती है। 5 से 8 अगस्त तक मूसलाधार बारिश के चलते उस दिन ये सब नदियां उफान पर थीं। मोहिते ने बताया, “8 अगस्त की दोपहर अचानक पानी तेजी से बढ़ने लगा। बाढ़ की आशंका को देखते हुए गांव में जितने ट्रैक्टर थे, उनमें बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को ऊंची जगहों पर रिश्तेदारों के घर भेज दिया गया। रात होते-होते पानी कंधे तक आ गया था। बचने के लिए हमने मानव शृंखला बनाई, तब गांव से बाहर निकले।” भीगने के कारण सबके मोबाइल फोन और दूसरे जरूरी सामान खराब हो गए थे। पानी उतरने के बाद गांववाले लौटे तो देखा करीब 50 लोगों के घर गिर गए हैं। ये अपने परिवार के साथ पड़ोसी के घर में रह रहे हैं। इन घरों की भी स्थिति ऐसी है मानो गिरने ही वाले हैं। मोहिते कहते हैं, “हम लोग रिफ्यूजी की तरह कब तक रहेंगे? दो कमरे, रसोई और टॉयलेट बनवाने के लिए कम से कम दो लाख रुपये चाहिए। सरकार ने पांच हजार रुपये मुआवजा दिया है। कुछ संगठनों ने चावल और गेहूं दिया है। इससे मुश्किल से दो महीने का गुजारा होगा।”

यहां गन्ने की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है। 25 साल के किसान कुणाल जाधव कहते हैं, “हमारी असली मुश्किल तो कुछ महीने बाद शुरू होगी, क्योंकि अगली फसल कम से कम 10 महीने बाद आएगी।” सांगली जिले में शिरगांव तालुका के वालवा गांव के किसान विशाल गोसावी का परिवार भी बेघर हो गया है। वह कहते हैं, “दुख की बात है कि बाढ़ प्राकृतिक नहीं, मानव निर्मित आपदा थी। बांध कुप्रबंधन के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा मिलनी चाहिए।”

आरे और वालवा महाराष्ट्र के सांगली और कोल्हापुर जिलों के उन सैकड़ों गांवों में हैं, जहां अगस्त के दूसरे हफ्ते में बाढ़ के चलते 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई, हजारों बेघर हो गए और फसलें बर्बाद हो गईं। नदियों के करीब बसे गांव ही नहीं, बल्कि सांगली और कोल्हापुर शहर के निचले इलाकों में भी पानी भरने से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया।

पश्चिमी महाराष्ट्र की जन सुराज्य शक्ति पार्टी के वरिष्ठ नेता समित कदम कहते हैं, “जिले में 2005 में भी बाढ़ आई थी, लेकिन इस बार जलस्तर काफी ज्यादा होने से नुकसान भी ज्यादा हुआ है।” सांगली के पुलिस अधीक्षक सुहेल शर्मा बताते हैं, “कृष्णा नदी में जलस्तर 58 फुट तक पहुंच गया था। 2005 की बाढ़ की तुलना में इस बार जलस्तर 5.5 फुट ज्यादा था। सांगली शहर वारना और कृष्णा नदियों के संगम पर स्थित है, इसलिए चार दिन की बारिश में पानी अकल्पनीय तरीके से बढ़ गया। लोगों को बचाने का काम एक अगस्त से ही शुरू हो गया था। 8 अगस्त तक बहुत से लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचा दिया गया था।”

शर्मा ने न सिर्फ अपनी देखरेख में बचाव कार्यों को अंजाम दिया, बल्कि बचाव दल को प्रोत्साहित करने के लिए खुद उफनती कृष्णा नदी में उतर गए। उनकी टीम ने 750 बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को बचाया। बाढ़ की स्थिति गंभीर हो गई तो मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण किया। महाराष्ट्र से सटा उत्तरी कर्नाटक भी बाढ़ में डूब गया था। वहां के मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा ने फड़नवीस को लिखा कि कोयना बांध से ज्यादा पानी छोड़ने से उत्तरी कर्नाटक बाढ़ की चपेट में आ गया। जवाब में फड़नवीस ने येदियुरप्पा से अलमाटी बांध से पानी छोड़ने का आग्रह किया ताकि महाराष्ट्र में बाढ़ के असर को कम किया जा सके। अलमाटी से पानी छोड़ने के बाद ही महाराष्ट्र में पानी उतरा। दरअसल, महाराष्ट्र से निकलने के बाद कर्नाटक में कृष्णा नदी पर पहला बांध अलमाटी ही है।

महाराष्ट्र सरकार ने इस आपदा में मरने वालों के परिजनों को 5-5 लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है। प्रभावित परिवारों को 5-5 हजार रुपये नकद देने और 15-15 हजार रुपये बैंक खाते में जमा करने का भी वादा किया गया है। जिनके घर गिर गए हैं, उन्हें एक लाख रुपये मिलेंगे। होटल मालिक शैलेश नायक कहते हैं, “सांगली और कोल्हापुर को पहले की स्थिति में लौटने में कम से कम 10 साल लग जाएंगे।”

 

बाढ़ पर राजनीति

अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले आई बाढ़ के कारण राजनीति भी उफान पर है। विपक्षी दल कांग्रेस और राकांपा मुख्यमंत्री पर देर से जागने और राहत के बजाय चुनाव अभियान को तरजीह देने का आरोप लगा रहे हैं। भाजपा इसके लिए पिछली कांग्रेस-राकांपा सरकार को दोषी ठहरा रही है। प्रदेश कांग्रेस प्रमुख बालासाहब थोराट ने आरोप लगाया, “मुख्यमंत्री ने बाढ़ पीड़ितों की मदद के बजाय महा-जनादेश यात्रा को तरजीह दी।” विधानसभा चुनाव को देखते हुए फड़नवीस ने 1 अगस्त को यह यात्रा शुरू की थी, जो 6 अगस्त तक चली। फड़नवीस 7 अगस्त को भाजपा नेता सुषमा स्वराज के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए गए, तब जाकर इसे रद्द किया गया।

कांग्रेस नेता नाना पटोले ने बॉम्बे हाइकोर्ट से प्रदेश की बाढ़ को मानव-निर्मित आपदा घोषित करने का आग्रह किया है। चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोग को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा है, “कोर्ट द्वारा गठित समिति को इस बात की जांच करनी चाहिए कि देर से कदम उठाने के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं।” राकांपा प्रवक्ता नवाब मलिक कहते हैं, “फड़नवीस का हेलीकॉप्टर सर्वे और कुछ नहीं, बस ‘आपदा पर्यटन’ है। हजारों अधिकारी उनकी सेवा में लगे हैं। उनका काम मुंबई में बैठकर हर काम की निगरानी करना था। उनकी अक्षमता का ही नतीजा है कि सांगली में बचाव कार्य में लगी नाव डूब गई और दर्जन भर लोग मारे गए।” मंत्री गिरीश महाजन का सेल्फी वीडियो वायरल हुआ तो उन पर भी ‘बाढ़ पर्यटन’ के आरोप लगे। इस वीडियो में वे हंसते हुए हाथ हिला रहे थे। वह उस वक्त बाढ़ प्रभावितों से मिलने जा रहे थे।

पिछली कांग्रेस-राकांपा सरकार पर दोष मढ़ते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने कहा, “पिछली सरकार ने अलमाटी बांध की ऊंचाई बढ़ा दी। सांगली और कोल्हापुर में बाढ़ की यह प्रमुख वजह थी। जब बांध की ऊंचाई बढ़ाई गई तब केंद्र, महाराष्ट्र और कर्नाटक, तीनों जगह कांग्रेस की ही सरकारें थीं। इसलिए मौजूदा हालात के लिए वह ही जिम्मेदार है।”

पर्यावरण कार्यकर्ता नदियों के पास डूब वाले इलाके में बेतहाशा निर्माण कार्यों को मंजूरी देने को इस संकट की एक वजह मानते हैं। पुणे स्थित पर्यावरणविद सारंग यादवदकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “कोल्हापुर की विकास योजना में 500 हेक्टेयर का जो इलाका प्रतिबंधित क्षेत्र होना चाहिए था, उसे आवासीय क्षेत्र बना दिया गया। इससे वहां बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुए।” पर्यावरणविद इसके खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) गए, जिसने राज्य सरकार से नए सिरे से डूब वाला इलाका तय करने को कहा। इसके लिए सर्वे जून 2017 में पूरा हो गया। लेकिन रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ने अक्टूबर 2018 में मुख्यमंत्री फड़नवीस को लिखा कि एक और डूब इलाका घोषित होने से भ्रम की स्थिति पैदा होगी। नए डूब इलाके का काफी इलाका विकसित भी हो गया है। यादवदकर आरोप लगाते हैं, “तब नवंबर 2018 में मुख्यमंत्री ने सिंचाई विभाग को पुराना डूब इलाका ही बरकरार रखने का निर्देश दिया।” पर्यावरणविदों के आरोपों पर भाजपा के प्रदेश प्रमुख ने मीडिया से कहा, “2,500 एकड़ जमीन विकसित करने का प्रस्ताव था। लेकिन बाढ़ के बाद हम इस पर पुनर्विचार करेंगे।”

जुलाई में ही महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में भारी बारिश के बाद तिवारे बांध टूटने से 25 लोगों की मौत हो गई थी। लगातार दो हादसों के बाद महाराष्ट्र के बड़े बांध एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं, खासकर उनका रखरखाव, संचालन, निर्माण की गुणवत्ता और सबसे ज्यादा राजनैतिक हस्तक्षेप। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि देश में सबसे ज्यादा बड़े बांध महाराष्ट्र में ही हैं। पूरे भारत में 5,264 बड़े बांध हैं, इनमें से 2,069 महाराष्ट्र में हैं और 285 बन रहे हैं। सबसे ज्यादा बांध होने के बावजूद राज्य का सिर्फ 22 फीसदी क्षेत्र सिंचित है।

राहत कार्यों में भी राजनीति हावी नजर आई। प्रभावित लोगों के बीच 10-10 किलो गेहूं और चावल के जो पैकेट बांटे गए, उन पर हंसते मुख्यमंत्री और स्थानीय भाजपा विधायक सुरेश हलवंकर की तसवीरें थीं। हंगामा हुआ तो मुख्यमंत्री ने प्रशासन को राहत पैकेट पर किसी की तसवीर लगाने से मना किया। बाढ़ ने भले अमीर और गरीब में कोई भेद न रखा हो, राहत कार्यों में यह अंतर साफ दिख रहा है। गरीबों का कहना है कि प्रभावित इलाकों से उन्हें बाद में निकाला गया। पूरे महाराष्ट्र से जो मदद पहुंच रही है, उसे पाने में भी उनका नंबर अंत में आता है। सांगली के एक व्यक्ति ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, “ऊंचे तबके के लोगों को ज्यादा राहत सामग्री मिल गई, लेकिन बहुत से गरीब परिवारों को तो कुछ मिला ही नहीं। कुछ को तो वे 5,000 रुपये भी नहीं मिले जो तत्काल बांटे गए थे।” हालांकि आरे जैसे गांव भी हैं जिन्होंने बोर्ड लगा दिया है- ‘हमारे पास पर्याप्त अनाज हो गया है। अब कृपया दूसरे जरूरतमंद गांवों की मदद कीजिए।’

पानी उतरने के बाद गंदगी, कीचड़ और सड़ते अनाज से बदबू फैलने लगी है। पूरे प्रदेश से बड़ी संख्या में आए डॉक्टर लोगों के इलाज में लगे हैं। राजनैतिक दलों और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने मुफ्त में दवाएं देने के लिए चिकित्सा शिविर लगाए हैं। शिवसेना नेता और मंत्री एकनाथ शिंदे और उनके सांसद पुत्र डॉ. श्रीकांत शिंदे 100 डॉक्टरों की टीम लेकर आए थे। इसी टीम के साथ आईं डॉ. श्वेता घरवाड़ ने बताया, “सांगली और कोल्हापुर के गावों में 72 चिकित्सा शिविर लगाए गए। इनमें डेंगू, वायरल बुखार और डिसेंट्री के अनेक मरीज आए।”

बांध ही बन रहे हैं बाढ़ का कारण

कृष्णा नदी महाबलेश्वर से निकलकर चार राज्यों से 1,400 किलोमीटर से ज्यादा लंबे सफर के बाद बंगाल की खाड़ी में गिरती है। महाराष्ट्र में इस नदी पर 188 छोटे-बड़े बांध हैं। ज्यादातर बांध सांगली और कोल्हापुर के पास ही हैं। अगस्त के पहले हफ्ते तक अधिकतर बांध भर चुके थे। सांगली-कोल्हापुर में चार दिनों तक भारी बारिश के बाद बांधों से पानी छोड़ा जाने लगा। कृष्णा नदी महाराष्ट्र से निकलकर जब कर्नाटक में प्रवेश करती है तो पहला बांध अलमाटी में है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच समन्वय नहीं होने के कारण उस समय अलमाटी बांध से पानी नहीं छोड़ा गया जिससे संकट गहराया।

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स ऐंड पीपुल (एसएएनडीआरपी) ने अगस्त के दूसरे हफ्ते में जारी रिपोर्ट में कहा कि अलमाटी से पानी छोड़ने में देरी के कारण महाराष्ट्र में कृष्णा नदी का स्तर बढ़ गया और बाढ़ आ गई। रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अगस्त तक कृष्णा नदी पर बने सबसे बड़े कोयना, वारना, उझानी और खड़कवासला बांधों में पानी पूरी क्षमता तक भर चुका था। 1 से 9 अगस्त तक सामान्य से 400 फीसदी ज्यादा बारिश हुई थी लेकिन इससे निपटा जा सकता था। अगर इन बांधों से 25 जुलाई से ही पानी छोड़ना शुरू कर दिया जाता, जब वे आधे भर चुके थे, तो बाढ़ का असर बहुत कम होता। रिपोर्ट कहती है कि बड़े बांध बनाने का मकसद बाढ़ को रोकना है, जबकि वास्तव में यही बाढ़ का कारण बन रहे हैं।

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, “बांध संचालक प्रोटोकॉल का ध्यान नहीं रखते। जब तक स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं हो जाती, तब तक वे जितना हो सके पानी जमा करने की कोशिश करते हैं। स्थानीय किसानों और उद्योगों के नाम पर राजनीतिक लॉबी के दबाव में ऐसा किया जाता है।” महाराष्ट्र राहत एवं पुनर्वास प्राधिकरण के डिप्टी चेयरमैन और भाजपा प्रवक्ता माधव भंडारी आरोप लगाते हैं, “बीते 20 वर्षों के दौरान कांग्रेस-एनसीपी के शासनकाल में स्थानीय हितों के चलते राजनीतिक हस्तक्षेप होते थे, जिससे बांध संचालन का प्रोटोकॉल पूरी तरह बैठ गया है। इस सिस्टम को दोबारा खड़ा करने में थोड़ा समय लगेगा।” इस बीच, अमोल पवार नाम के कार्यकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। वह चाहते हैं कि कोर्ट महाराष्ट्र और कर्नाटक को बांध प्रोटोकॉल का पालन करने का निर्देश दे।

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