महाबली की धोबी पछाड़

मुंबई से गिरिधर झा
नई भूमिकाः मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपनी पत्नी के साथ राज्यपाल भगत सिंभह कोश्यारी से मिलते हुए
नई भूमिकाः मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपनी पत्नी के साथ राज्यपाल भगत सिंभह कोश्यारी से मिलते हुए
पीटीआइ

मुंबई से गिरिधर झा
किंगमेकर कहलाने वाले ठाकरे परिवार के उद्धव मुख्यमंत्री बने, लेकिन शरद पवार ने दिखाया मराठा दमखम

वर्षों तक जो मातोश्री मुंबई में सत्ता का समानांतर केंद्र हुआ करता था, अब उसकी छवि बदलने वाली है। ठाकरे परिवार अभी तक पर्दे के पीछे रह कर सत्ता पर अपना नियंत्रण रखता था, लेकिन अब यह सत्ता में सीधे भागीदार होगा। उद्धव ठाकरे 28 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं। इसके साथ ही महाराष्ट्र ने ऐसे किंगमेकर को देखा जो अब खुद किंग बनने जा रहा है, चाहे वह चाहता न रहा हो। शिवसेना संस्थापक बालासाहब ठाकरे के 60 वर्षीय पुत्र, उद्धव खुद मानते हैं कि उन्होंने कभी मुख्यमंत्री बनने की बात नहीं सोची थी। आखिरकार वे कई पार्टियों के गठबंधन की सरकार का नेतृत्व करने के लिए राजी हुए और 33 दिनों तक चले राजनीतिक थ्रिलर का अंत हुआ। 24 अक्टूबर को जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आए, तो उद्धव सिर्फ इतना चाहते थे कि भाजपा ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद पर राजी हो। इसका कारण बालासाहब ठाकरे से किया उनका वह वादा था, कि एक दिन शिवसैनिक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा। चुनाव के बाद उन्हें लगा कि इस वादे को पूरा करने का वक्त आ गया है। उद्धव का दावा है कि इस साल के शुरू में बातचीत के दौरान खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सत्ता में 50:50 भागीदारी पर हामी भरी थी। इसमें मुख्यमंत्री का पद भी शामिल था। लेकिन भाजपा ने उनके इस दावे को खारिज कर दिया। देवेंद्र फड़नवीस ने कहा कि दोनों सहयोगी दलों के बीच कभी ऐसा समझौता नहीं हुआ था। व्यथित उद्धव ने भाजपा से नाता तोड़ लिया। इसके साथ ही महाराष्ट्र ऐसे राजनीतिक भंवर में फंस गया जिसकी परिणति उद्धव के मुख्यमंत्री बनने में हुई। लेकिन उद्धव की राह आसान नहीं रही। इस लड़ाई में अगर वे भाजपा को मात देने में सफल रहे, तो इसका पूरा श्रेय मराठा महाबली शरद पवार को जाता है।

79 वर्षीय शरद पवार ने शुरू में सरकार बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। यही कहते रहे कि महाराष्ट्र की जनता ने राकांपा-कांग्रेस गठबंधन को विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है। भाजपा और शिवसेना के बीच झगड़ा बढ़ा तो उद्धव ने अपने खासमखास संजय राउत के जरिए शरद पवार को संदेश भेजवाया। तब पवार ने भाजपा को सत्ता से बाहर रखने की कुशल रणनीति तैयार की। इसका अंदाजा किसी को नहीं था, क्योंकि जनता ने 21 अक्टूबर के चुनावों में 288 सदस्यों वाली विधानसभा में 161 सीटों के साथ भाजपा-शिवसेना गठबंधन को वापस सत्ता में आने के लिए मतदान किया था।

अपने 50 साल के लंबे राजनीतिक जीवन में पवार ऐसे अस्थिर राजनीतिक हालात पहले भी देख चुके थे, लेकिन वे जानते थे कि इस बार उनका सामना उस भाजपा से है जिसके शीर्ष पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे नो-नानसेंस नेता हैं। इसलिए वे शिवसेना जैसी वैचारिक रूप से अलग पार्टी के साथ ‘अपवित्र’ गठबंधन बनाकर पिछले दरवाजे से सत्ता हथियाने के लिए बेसब्र नहीं दिखना चाहते थे। उन्होंने शिवसेना को संदेश दिया कि जब तक वह भाजपा के साथ सभी संबंध नहीं तोड़ेगी, तब तक न तो राकांपा और न ही कांग्रेस शिवसेना की अगुआई वाली सरकार को समर्थन देगी।

दरअसल, मराठा दिग्गज आगे बढ़ने से पहले शिवसेना के भाजपा के पास लौटने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहते थे। केंद्र में मोदी सरकार में शिवसेना के एकमात्र मंत्री अरविंद सावंत के इस्तीफे के बाद ही उन्होंने उद्धव और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच भरोसेमंद पुल बनने का फैसला किया। हालांकि, उन्हें पता था कि कांग्रेस आलाकमान शुरू में शिवसेना जैसी कट्टर हिंदुत्ववादी पार्टी के साथ जुड़ने के लिए उत्सुक नहीं होगा, लेकिन उन्होंने सोनिया से दो बार और अहमद पटेल तथा मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे उनके शीर्ष सलाहकारों से कई बार मुलाकात की, ताकि उन्हें इस बात के लिए मनाया जा सके कि भाजपा को बड़ा झटका देने के लिए शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार बनाने की जरूरत है।

शुरू में कांग्रेस, शिवसेना की अगुआई वाली सरकार में शामिल होने के बजाय बाहर से समर्थन देने पर राजी हुई। इससे बातचीत कुछ दिनों के लिए अटक गई। लेकिन पवार को इस बात का एहसास था कि यह लंबे समय तक गठबंधन सरकार चलाने के लिए अच्छा नहीं होगा। आखिरकार उन्होंने कांग्रेस को एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत सरकार में शामिल होने के लिए राजी कर लिया। लेकिन फिल्म अभी बाकी थी!

गठबंधन के नेता जब सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मिलने वाले थे, उसके एक दिन पहले शरद के भतीजे अजित पवार ने बगावत कर दी। इससे शरद पवार हतप्रभ रह गए। पार्टी में अजित की हैसियत नंबर दो की थी। जब शरद पवार नई गठबंधन सरकार को आकार देने में व्यस्त थे, उसी समय अजित विरोधी खेमे में शामिल हो गए। रातो-रात हुई बगावत के बाद देवेंद्र फड़नवीस ने 23 नवंबर को तड़के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और अजित डिप्टी सीएम बन गए।

सात बार के विधायक अजित अपने चाचा से संभवत: इसलिए खफा थे कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद का कार्यकाल बांटने के लिए उद्धव ठाकरे पर दबाव नहीं डाला। अजित का संभवत: मानना था कि शिवसेना के मुकाबले राकांपा की सिर्फ दो सीटें कम हैं (शिवसेना 56, राकांपा 54), इसलिए दोनों पार्टियों की ओर से मुख्यमंत्री ढाई-ढाई साल के लिए होना चाहिए। लेकिन शरद पवार ऐसा नहीं चाहते थे। यही वजह रही कि अजित पवार, देवेंद्र फड़नवीस के संपर्क में आए और उनके साथ वह समझौता कर लिया जो वे चाहते थे। राकांपा विधायक दल का नेता होने के नाते उन्होंने राकांपा के सभी 54 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र भी राज्यपाल कोश्यारी को दे दिया। इसके बाद राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश कर दी। प्रधानमंत्री ने अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए बिना कैबिनेट बैठक के इस सिफारिश को आधी रात को मंजूरी दे दी और फिर राष्ट्रपति के पास भेज दिया। शनिवार सुबह तक फड़नवीस और अजित को राजभवन में शपथ दिलाने के लिए रास्ता साफ हो गया था।

शरद पवार को जैसे ही अजित की बगावत की खबर मिली, तो वे डैमेज-कंट्रोल में जुट गए। सबसे पहले तो उन्हें इस धारणा को तोड़ना था कि अजित के फैसले के पीछे असली दिमाग उन्हीं का है। उन्हें सभी नवनिर्वाचित विधायकों को अपने साथ रखना भी था। एक तरफ गठबंधन के दूसरे नेता राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रहे थे, तो दूसरी तरफ पवार विधायकों को वापस लाने में लगे हुए थे। सोमवार की शाम को शक्ति प्रदर्शन करते हुए उन्होंने गठबंधन पार्टियों के 162 विधायकों को एक साथ ला खड़ा किया।

दूसरी तरफ, भाजपा इस भरोसे थी कि अजित पवार अपने साथ बहुमत के लिए जरूरी विधायक ले आएंगे। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा को शायद यह लग रहा था कि अजित राकांपा विधायक दल के नेता चुन लिए गए थे, इसलिए उनके व्हिप से डरकर पार्टी के सभी विधायक भाजपा सरकार के पक्ष में वोट डालेंगे। लेकिन शरद पवार की रणनीति और सुप्रीम कोर्ट के 26 नवंबर के फैसले ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम.वी. रमन्ना, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने 27 नवंबर को फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया। साथ ही गोपनीय वोटिंग पर रोक लगा दी। इसके बाद अजित पवार को लग गया कि वे राकांपा के विधायकों को तोड़ नहीं पाएंगे। तब वे फड़नवीस के घर गए और इस्तीफा दे दिया। भाजपा को भी साफ हो गया था कि बहुमत नहीं मिलने वाला है। इसलिए अजित के इस्तीफे के कुछ ही देर बाद फड़नवीस ने भी इस्तीफा दे दिया। इस तरह उनका दूसरा कार्यकाल चार दिन भी नहीं चला। यही नहीं, भ्रष्टाचार के आरोपी अजित पवार से समर्थन लेने के कारण पार्टी में उनकी आलोचना भी होने लगी है। खास कर जिस तरीके से अजित पवार के उप-मुख्यमंत्री बनने के तत्काल बाद सिंचाई घोटाले के कई मामले बंद किए गए। अब विपक्ष की सीट पर बैठ कर अपने फैसले का नफा-नुकसान सोचने के लिए फड़नवीस के पास काफी वक्त होगा।

रोचक बात यह रही कि बगावत के बावजूद शरद पवार ने भतीजे अजित को पार्टी से नहीं निकाला। इसके उलट, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और परिजनों के माध्यम से उन पर इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाते रहे। प्रफुल्ल पटेल, जयंत पाटिल और छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेता और सुप्रिया सुले के पति सदानंद सुले समेत परिवार के कई सदस्यों ने राकांपा में वापसी के लिए अजित से बात की। आखिरकार अजित मान गए और पार्टी में लौट आए।

इस हाइ-वोल्टेज राजनीतिक ड्रामे के अंत में शरद पवार नई सरकार के मुख्य वास्तुकार के रूप में उभरे हैं। यह भी स्पष्ट है कि गठबंधन में शामिल पार्टियों के बीच वैचारिक मतभेदों के चलते उद्धव को सरकार चलाने में हमेशा उनकी सलाह लेनी पड़ेगी। इस तरह, महाराष्ट्र के किंगमेकर का पता अब बदल गया है। अब यह मातोश्री नहीं, बल्कि शरद पवार का घर सिल्वर ओक हो गया है।

 

- महाराष्ट्र के किंगमेकर का पता बदल गया है। अब यह मातोश्री नहीं, बल्कि शरद पवार का घर सिल्वर ओक हो गया है

- अजित पवार इसलिए खफा थे कि शरद पवार ने मुख्यमंत्री पद का कार्यकाल बांटने के लिए उद्धव पर दबाव नहीं डाला

- हम साथ-साथः मुंबई में एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस विधायक एकजुटता की शपथ लेते हुए

- नई भूमिकाः मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपनी पत्नी के साथ राज्यपाल भगत स‌िंह कोश्यारी से मिलते हुए

 

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 मराठा मास्टर स्ट्रोक

भाजपा और चुनाव पूर्व उसकी सहयोगी शिवसेना में अप्रत्याशित झगड़े से पैदा हुई अस्थिरता के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के संस्थापक 79 वर्षीय शरद पवार महाराष्ट्र में नई सरकार के वास्तुकार के रूप में उभरे हैं। आइए जानते हैं कि उन्होंने किस तरह से राज्य विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए कुशल रणनीति तैयार की।

1. भाजपा और शिवसेना के बीच ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद को लेकर तीखे तेवरों के बाद शरद पवार ने सत्ता की लड़ाई में कूदने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। पहले उन्होंने यही कहा कि महाराष्ट्र की जनता ने राकांपा-कांग्रेस गठबंधन को विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है।

2. वह तब तक इंतजार करते रहे जब तक भाजपा के खिलाफ लड़ाई में शिवसेना उस हद तक नहीं पहुंच गई, जहां से उसके लिए लौटना असंभव हो गया। सरकार बनाने की बातचीत शुरू करने से पहले उन्होंने शिवसेना को अपने 30 साल पुराने सहयोगी भाजपा के साथ संबंध तोड़ने को मजबूर कर दिया।

3. वे कांग्रेस के बिना भी सरकार नहीं बनाना चाहते थे। हिंदुत्व पर आक्रामक रुख के कारण सोनिया गांधी शुरू में शिवसेना की अगुआई वाली सरकार का समर्थन करने में संकोच कर रही थीं, लेकिन पवार ने उन्हें आश्वस्त किया कि महाराष्ट्र जैसे अहम राज्य में भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए यह वक्त की जरूरत है।

4. कांग्रेस बाहर से सरकार का समर्थन करने पर सहमत हुई, लेकिन पवार ने तब तक इंतजार किया जब तक वह गठबंधन सरकार में शामिल होने पर राजी नहीं हुई। पवार जानते थे कि सरकार लंबे समय तक चले, इसके लिए यह जरूरी था।

5. भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं को गफलत में रखने के लिए पवार ने बातचीत के दौरान सरकार बनाने को लेकर कभी भी प्रतिबद्धता नहीं दिखाई।

6. उन्होंने यह भी तय किया कि ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद जैसा कोई विवाद न हो। सभी पांच साल तक शिवसेना का मुख्यमंत्री बनाने पर सहमत थे।

7. उन्होंने युवा आदित्य ठाकरे या शिवसेना के किसी और नेता के बजाय उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनने के लिए भी मना लिया।

8. भतीजे अजित पवार की बगावत के बावजूद उन्होंने आपा नहीं खोया और आश्वस्त किया कि सभी नवनिर्वाचित विधायक उनके साथ बने रहें।

9. उन्होंने 162 विधायकों के समर्थन का दावा करने के लिए एक होटल में तीनों दलों के विधायकों की संयुक्त परेड कराई।

10. अजित पवार के विद्रोह के बाद उन पर दबाव डाला और उनकी वापसी के लिए पार्टी के दरवाजे खोले रखा। यह अचूक दांव साबित हुआ और विश्वासमत का सामना करने से पहले ही देवेंद्र फड़नवीस को इस्तीफा देना पड़ा।

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