फिल्म और गांधी

अरविंद कुमार
फिल्म नाइन ऑवर्स टु रामा में गांधी पर बंदूक दागता नाथूराम गोडसे
फिल्म नाइन ऑवर्स टु रामा में गांधी पर बंदूक दागता नाथूराम गोडसे

अरविंद कुमार
महात्मा का महिमामंडन और खंडन करने वाली फिल्में 1920 के दशक से ही बनने लगीं और बनती रहेंगी

गांधी की छाप? आप किसी से हिमालय की छाप के बारे में पूछ सकते हैं! -जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

 गांधी कहो, मोहनदास करमचंद गांधी कहो, महात्मा गांधी कहो, ‘कुख्यात बागी गांधी’ कहो या ‘बीसवीं सदी का पैगंबर’ कहो – पिछली सदी के दूसरे दशक से अब इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत तक, और कहें तो गांधी आया था आंधी बन कर, गोडसे की अंधी घृणा का शिकार हो कर दुनिया से चला तो गया पर सदियों तक संसार में सौहार्द तथा शांति की शीतल समीर बहाता रहेगा। जीवन के हर क्षेत्र पर असर डालने वाले गांधी का कहना था, “मेरा जीवन ही मेरी कला है”, हजारों कलाकार मूर्तियों, चित्रों और कार्टूनों में उसे और उसका संदेश अंकित करते रहे हैं। उसने कुल दो फिल्में देखीं, लेकिन उस पर और उसके विचारों पर उसका महिमामंडन और महिमा खंडन करने वाली कई फिल्में बनीं और बनती रहेंगी।

विदेश में गांधी आरंभ से ही घृणा और प्रेम, जिज्ञासा और उत्सुकता का विषय बना रहा है। मशहूर फ्रांसीसी कंपनी पाथे की ब्रिटिश शाखा ने 1922 में घैंडी नाम की न्यूजरील बनाई। सींकिया पहलवान-सा चुस्त सचेतन गांधी भीड़ को भाषण दे रहा है। नीचे लिखा था, “गांधी को छह साल की जेल! कुख्यात बागी की एकमात्र सिनेमाई तस्वीरें।” 1932 की एक और न्यूजरील मिलती है – “अस्पृश्यताविरोधी भूख हड़ताल से भारत में नया संकट।” ब्रिटिश सरकार हॉलीवुड के डी.डब्लू. ग्रिफिथ से गांधी जी के खिलाफ पूरी फीचर फिल्म बनवाना चाहती थी, लेकिन बर्थ आफ ए नेशन (1915), इनटॉलेरेंस (1916) और ऑरफंस ऑफ द स्टॉर्म (1921) जैसी क्लासिक बनाने वाले निर्देशक ने साफ इनकार कर दिया था।

गांधी जी पर पहली डॉक्यूमेंटरी बनाई थी पाथे की अमेरिकी शाखा ने। शीर्षक था, महात्मा गांधी: बीसवीं सदी का पैगंबर।

न्यूजरील फोटोग्राफर ए.के. चेट्टियार ने संसार भर में घूम कर गांधी जी के बारे में पचास हजार फुटेज संकलित की और काट-छांट और संपादित करके इक्कीस मिनट की डॉक्यूमेंटरी तैयार की। 1931 में बनी अमेरिका की न्यूजरील महात्मा गांधी टॉक्स अब यू-ट्यूब पर भी उपलब्ध है। इसने पूरी दुनिया के कानों तक गांधी की आवाज पहुंचा दी। गुजरात के आणंद जिले के बोरसड़ गांव तक फिल्म कैमरा और सामग्री पहुंचाने के लिए बैलगाड़ियों में सफर किया गया।

अमेरिका में ही गांधी जैसे दो पात्रों वाली पहली फिल्म बनी 1939 में। नाम था गंगादीन। इसमें गांधी की खिल्ली उड़ाई गई थी। आरकेओ पिक्चर्स निर्मित और जार्ज स्टीवंस निर्देशित गंगादीन रुडयार्ड किपलिंग की एक कविता और कहानी पर आधारित अपने जमाने की बड़ी फिल्मों में गिनी जाती है। ठगी प्रथा के जमाने में तीन ब्रिटिश सैनिकों (कलाकार कैरी ग्रांट, विक्टर मैक्लैग्लेन और डगलस फेअरबैंक्स जूनियर) का एक सहायक है भिश्ती गंगादीन (सैम जैफ)। उसकी वेशभूषा गांधी जैसी ही है। यह सुपर हिट फिल्मों में गिनी जाती है। खलनायक था खूंखार ऐडुआर्डो चिआनेल्ली। इसे भी गांधी के विकृत रूप में, व्यंग्य के रूप में ढाला गया है। इसी तरह 1934-35 की एवरीबडी लाइक्स म्यूजिक में एक नीच पियक्कड़ पात्र को गांधी जैसा बनाया और एक औरत के साथ अश्लील नृत्य करते दिखाया गया था।

अमेरिका की बात चालू रखते मैं जिक्र करना चाहता हूं वंचित कालों के पैगंबर मार्टिन लूथर किंग जूनियर के गांधी प्रेम का। पिछली सदी में अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर (जन्म 1929 – मृत्यु 1968) 1955 से आजीवन गांधीवादी नागरिक अधिकार आंदोलन चलाते रहे। सत्य, अहिंसा और जनता से सीधा संपर्क, काले लोगों को दमित रखने वाले गोरों के दिलों तक पहुंचने की उनकी कोशिश और सफलता आधुनिक अमेरिकी इतिहास का हिस्सा बन गई हैं। तब से अब तक मार्टिन लूथर किंग से प्रेरित अमेरिकी लोक संस्कृति में, फिल्मों में और टीवी सीरियलों में गांधी जी विराजमान हैं। दोनों के काल्पनिक वार्तालापों पर संगीतबद्ध काव्य सीरीज ईपिक रैप बैटल्स ऑफ हिस्टरी की एक किस्त में स्लमडॉग मिलियनेअर की तर्ज पर गांधी को स्लमडॉग स्किलिनेयर कहा गया है।

आइए अब हम अपने देश की बात करें। महात्मा: गांधी एक जीवनी 1869-1948 नाम की 1968 की 33 रीलों में 14 अध्यायों वाली और 330 मिनट लंबी यह डॉक्यूमेंटरी बंबई में माधुरी संपादन काल में देखी थी। भारत सरकार के फिल्म डिवीजन के लिए तमाम उपलब्ध फुटेज खोजकर, उनका संकलन, संपादन किया, पटकथा लिखी और फिल्म में सार्थक टिप्पणियां भी स्वयं की थीं। इसके कई छोटे संस्करण भी मिलते हैं। जब गांधी के पीछे चलते देश को देखना, उनके कहे पर लोगों का कुछ करने या मरने पर आमादा हो जाना– अपने आप में रोमांचक अनुभव था।

आश्चर्य की बात है कि 1963 तक स्वयं गांधी जी पर कोई फीचर फिल्म नहीं बनी थी। और उस साल जो बनी, वह थी ब्रिटेन-अमेरिका की राजनीतिक मर्डर-थ्रिलर कोटि की नाइन अवर्स टु रामा। स्टैनली वूलपर्ट के उपन्यास पर इस फिल्म का विषय था, गांधी जी की हत्या से नौ घंटे पहले नाथूराम गोडसे। गांधी जी की भूमिका में जे.एस. कश्यप गांधी जी जैसे ही लगते थे। नायक था नाथूराम गोडसे– हत्या से नौ घंटे पहले से उसका क्रियाकलाप, फ्लैश बैक में उसके जीवन के दृश्य।

नाथूराम गोडसे की भूमिका की थी जरमन अभिनेता हौर्स्ट बुखोल्ज ने। दिखाया गया था कि गोडसे की कम-उम्र पत्नी सांप्रदायिक दंगे में बलात्कार के बाद मर गई थी। यह भी दिखाया गया था कि वह एक विवाहिता का दीवाना हो गया था, बाद में एक वेश्या से भी लगा रहा था। गोडसे के विषाक्त मन में हिंदुओं के तथाकथित द्रोही महात्मा गांधी के प्रति घोर घृणा भरी है। भारतीय पुलिस अधिकारी गोपाल दास हत्या निवारण की सतत कोशिश करता है, पर सफल गोडसे होता है।

हंगरी के गैबरीअल पास्कल और इंग्लैंड के डेविड लीन भी गांधी जी पर फिल्म बनाना चाहते थे। डेविड लीन तो 1958 में भारत भी आए, पर उनकी पटकथा पर बात नहीं बन पाई। ब्रिटेन में रहने वाले मोतीलाल कोठारी ने बातचीत करना शुरू किया रिचर्ड एटनबरो से। फिल्म गांधी का बनना तय हो गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सलाह दी, “चाहे जो भी करना, गांधी को भगवान मत बनाना। हम भारत में यही करते आ रहे हैं। वे महान इनसान थे, उन्हें इनसान ही रहने देना।” निस्संदेह 1982 की एटनबरो की फिल्म गांधी जी पर ईपिक स्केल पर बनी सर्वोत्तम और विशाल फिल्म है। शुरू में ही निर्देशक कहता है, “किसी एक कृति में किसी व्यक्ति के जीवन को समेटा नहीं जा सकता। संभव नहीं है कि हर साल की उसकी करनी को समान महत्व दिया जाए। हर उस व्यक्ति का जिक्र किया जाए, जिससे उसे कुछ मिला। जो भी किया जा सकता है, वह है कि उसकी भावना को पूरी निष्ठा से दिखाने और उसके हृदय तक पहुंचने की कोशिश की जाए।”

फिल्म शुरू होती है– 30 जनवरी शाम, बिड़ला भवन, गांधी जी की प्रार्थना सभा शुरू होने को है, लोग आ रहे हैं, उनमें है नाथूराम गोडसे और उसके साथी। दूर कही तांगें की पिछली सीट पर बैठा दाड़ी वाला आदमी उन्हें आगे बढ़ने का इशारा करता है। पोतियों के कंधों का सहारा लिए गांधी जी आ रहे हैं। भीड़ में से आगे बढ़ गोडसे उनके पैर छूता है, उठता है, छाती में गोली दाग देता है। अगला दिन– गांधी जी की शवयात्रा। शव के पास बैठे हैं सरदार पटेल, आगे ट्रक में खड़े हैं जवाहरलाल नेहरू। कमेंटेटर रेडियो पर विश्व के नेताओं के संदेश सुना रहे हैं।

कभी बहुत साल पहले, दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन चल रही है। इसी ट्रेन से शुरू हुआ था गांधी जी की विरोध यात्रा का प्रयाण। अंत तक हम गांधी जी के जीवन के कुछ दृश्य देख कर पैठते हैं उनकी विचारधारा में। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कुछ प्रकरण... देश का विभाजन न रोक पाने की उनकी निराशा.... सब कुछ हमारे सामने घटित हो रहा है...

गांधी स्वयं गांधी जी पर थी, तो केतन मेहता निर्देशित 1993 की सरदार थी सरदार पटेल पर। उसमें गांधी जी के साथ जवाहरलाल नेहरू जैसे अनेक नेता पात्र थे।

शुरू में दोस्तों के साथ ताश खेलते वल्लभ भाई पटेल गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन की खिल्ली उड़ा रहे हैं। बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल ने गांधी से मिलवाया और एक जनसभा में उनका भाषण सुना तो उनके साथ हो लिए। गुजरात में आंदोलनों का नेतृत्व किया। फिल्म में 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के बाद आता है आजादी के रास्ते में भयानक मोड़। मुसलिम लीग के डायरेक्ट ऐक्शन आंदोलन से भड़के भीषण हिंदू-मुसलिम दंगे। ठोस जमीनी हकीकत को समझ कर सरदार पटेल ने ही नेहरू और गांधी को और कांग्रेस कार्यकारिणी को विभाजन मानने को राजी किया।

फिल्म दिखाती है आजादी के बाद उनमें और नेहरू में उपजे मतभेद, और गांधी जी की हत्या के बाद दोनों ने कंधे से कंधा मिला कर देश चलाया, देसी राज्यों को केंद्र सरकार के अंतर्गत शामिल किया। अंत में हम देखते हैं, गांव में विश्राम करते सरदार पटेल को संतोष है- कश्मीर से कन्या कुमारी तक स्वंतत्र भारत एक है। सरदार पटेल की भूमिका में परेश रावल की अभिनय क्षमता जाज्वल्यमान है।

श्याम बेनेगल की द मेकिंग आफ द महात्मा है तो डॉक्यूमेंटरी पर लंबी फीचर फिल्म जैसी दिलचस्प भी है। भारत-दक्षिण अफ्रीका के सहयोग से बनी श्याम बेनेगल की फिल्म, मेरी राय में, गांधी के विकास का महत्वपूर्ण चित्रण है।

श्याम बेनेगल की फिल्म गांधी के गांधी बनने के लंबे सफर का ब्योरा देती है, तो 2000 की हिंदी, तमिल, तेलुगु और इंग्लिश भाषाओं में बनी कमल हासन की सबसे बड़ी फिल्म हे राम! एक समीक्षक के अनुसार, “यह गांधी की कीर्ति और कृत्यों का बखान नहीं ही है। उनको लेकर जो अति असहनशीलता है या जो अज्ञानता का जाल उनके चारों तरफ डाल दिया गया है, उसे काटने का प्रयास है। तत्कालीन घटनाओं पर आधारित अर्धकथात्मक कृति है, क्लासिक ऐफर्ट है, भारतीय सिनेमा की महान उपलब्धि है।”

गांधी, माई फादर फिल्म के एक दृश्य में आगा खां जेल में गांधी जी के पैर दबाता हरिलाल

 अब हमारे फिल्मकार जागे। गांधी जी को अलग-अलग तरह से देखने-दिखाने लगे...

निर्देशक राज कुमार हीरानी की 2006 की लगे रहो मुन्ना भाई न तो गांधी जी की जीवनी थी, न उन पर कोई डॉक्यूमेंटरी। ‘गांधीगीरी’ शब्द चालू करने वाला हंसी का यह फव्वारा गांधी जी की कथनी और करनी का संदेश दूर-दूर तक पहुंचाने का अद्वितीय माध्यम होने के साथ-साथ निर्माता विधु विनोद चोपड़ा का खजाना लबरेज करने का साधन भी सिद्ध हुआ। कहा जाता है कि यूएनओ में दिखाई जाने वाली यह पहली हिंदी फिल्म थी, और 2007 के कान फिल्म फेस्टिवल के ‘तू ले सिनेमा दु मोंद’ सेक्शन में भी प्रदर्शित की गई थी।

मुन्ना भाई में गांधी छाया के रूप में मिलते हैं तो मैंने गांधी को नहीं मारा का बूढ़ा नायक दुःस्वप्न से ग्रस्त है।

सामने फैले विशाल सागर के तट पर खड़ा है एक बूढ़ा। सागर की उत्ताल तरंगों में एक बेटी ढूंढ़ रही है अनेक प्रश्नों के उत्तर। पीछे है उनका घर। एक सीढ़ी ऊपर चढ़ती नीचे उतरती। खुली खिड़कियों में लहराते उड़ते परदे। खाली डाइनिंग टेबल। यह है प्रसिद्ध हिंदी विद्वान प्रोफेसर उत्तम चौधरी का घर। यह है 2005 की अनुपम खेर निर्मित और जाह्‍नु बरुआ निर्देशित दिलचस्प मनोवैज्ञानिक फिल्म मैंने गांधी को नहीं मारा।

अनुपम खेर का भारतीय राजनीति पर अपना दृष्टिकोण है। निर्देशक बरुआ को ऐसी फिल्म लिखना और चित्रांकित करना अच्छा लगता है। मुख्य कलाकार थे– अनुपम खेर और उर्मिला मातोंडकर।

वह दिखाता है आज की दुनिया में गांधी होने का मतलब। आज किसी को अपनी अंतरात्मा की फिक्र नहीं है। जो कुछ है वह पैसा है, अमीरी है। कहां गई ईमानदारी, सहनशीलता, अहिंसा? गांधी क्यों बनकर रह गया मात्र एक सड़क का नाम, एक डाक टिकट, एक मूर्ति? गांधी कहता है, तुम लोग मुझे बस 2 अक्तूबर और 30 जनवरी को याद करते हो।

31 जनवरी 1948 को राजघाट की ओर जाते जनसमूह में कोई एक हरिलाल भी था, वह कौन था, कोई जानता नहीं था, पहचानता नहीं था।

गांधी जी के बड़े बेटे इस हरिलाल मोहनदास गांधी की कहानी पर बनी 2007 की अनिल कपूर निर्मित और फीरोज अब्बास खान निर्देशित गांधी, माई फादर इतनी मर्मस्पर्शी थी कि दिल्ली-गाजियाबाद बार्डर पर आनंद विहार रेल टर्मिनल और बस अड्डे के पास ईडीएम मॉल के पीवीआर सिनेमाघर में फिल्म खत्म होने पर मैं कुछ देर तक उठ नहीं सका था।

द गार्जियन ने लिखा, “जिन लोगों के लिए गांधी सिर्फ रिचर्ड एटनबरो तक सीमित है, गांधी माई फादर देखकर उनकी आंखें फटी रह जाएंगी। गांधी माई फादर ए-क्लास फिल्म है।”

“टुकड़े देश के नहीं, मुसलमानों के हुए थे,” कहने वाली रोड टू संगम (2010) में बहाना है साठ साल पुरानी ‘फोर्ड वी-8’ कार के इंजन की मरम्मत का, विषय है स्वतंत्रता के बाद भारतीय मुसलमान, उनमें से कई का पाकिस्तान प्रेम और कई का अपने सच्चे भारतीय होने में गर्व, और जरा से शक पर पूरे मुहल्ले के निवासियों को आतंकवादी घोषित करने की सत्ता के कुछ तत्वों की प्रवृत्ति।

गांधी जी पर और उनकी मान्यताओं पर जो फिल्म बनी है, मेरी राय में यह उनमें उच्चतम कोटि में गिनी जाने लायक है।

मेरे लिए 2011 की डीयर फ्रेंड हिटलर का महत्व इस बात से है कि एक भारतीय ने विदेशी जमीन पर सभी विदेशी पात्रों की जगह भारतीय कलाकारों को रख कर हिटलर के नाम गांधी जी के दो पत्रों के बहाने द्वितीय महायुद्ध के नाजी जर्मनी को दिखाने की कोशिश की।

अगर नाइन अवर्स टु रामा में गोडसे सहित अधिकांश पात्र जर्मन और अमेरिकी हो सकते हैं, तो हमारी फिल्म में हिटलर सहित सभी विदेशी पात्र भारतीय क्यों नहीं। विदेशी समाचार पत्रों ने फिल्म की निंदा की, भारतीय समीक्षक भी पीछे नहीं रहे। निर्माता थे राकेश रंजन कुमार, पटकथा भी उन्होंने लिखी थी। दो साल गहन रिसर्च करके कहानी लिखी थी नलिन सिंह और राकेश रंजन कुमार ने, निर्देशन भी किया था राकेश रंजन कुमार ने। पत्र लिखने वाले गांधी की भूमिका की थी अभिजित दत्त ने और पत्र पाने वाला हिटलर बनाया गया था रघुबीर यादव को।

अगर 2011 की गांधी माई फादर बाप-बेटे के बिगड़े संबंधों की मार्मिक कहानी थी, तो 2014 की वेल्कम बैक गांधी सामायिक राजनीतिक टिप्पणी थी। मृत्यु के साठ साल बाद गांधी जी (एस. कनकराज) वापस आते हैं। तब से अब तक देश बदल गया है, ऊंची-ऊंची इमारतें हैं, स्त्रियों की वेशभूषा तो बिलकुल ही बदल गई है। लोग पैसा कमाने में लगे हैं। निर्देशक बालकृष्णन की तीन करोड़ रुपये में बनी फिल्म की शूटिंग चेन्नै में चालीस दिन में पूरी हुई थी। द हिंदू ने लिखा, “तमाम कमियों के बावजूद यह अनुकरणीय सद्प्रयास है, इसकी सफलता से प्रेरित होकर अन्य लोग भी ऐसी फिल्में बनाना चाहेंगे।”

भारत में गांधी जी का मजाक उड़ाना असह्य हो सकता है। विदेशों में ऐसी कोई रोकटोक नहीं है। 2001 में एनिमेटेड टीवी शो था स्कूलों में ऐतिहासिक हस्तियों की लैंपूनिंग का ‘क्लोन हाई’। अब्राहम लिंकन का दोस्त है गांधी जी का क्लोन। महात्मा से जो कुछ अपेक्षित होता है, उसके बोझ से दबा गांधी का क्लोन पियक्कड़ बन गया है। वहां यह सीरियल खूब लोकप्रिय हो रहा था। भारत में इसके विरुद्ध कोहराम मचा तो एमटीवी ने इसे उन्नीसवीं किस्त के बाद बंद कर दिया।

लेकिन साउथ पार्क ऐंड फैमिली गाई का हश्र थोड़ा-सा हट कर हुआ। गांधी जी की एनिमेटेड आकृति का शरीर अड़बंगा है, मुंह से झड़ती हैं चुनी गालियां। कभी-कभी वह स्टैंडअप कामेडियन का पार्ट भी अदा करती है। अमेरिकी काली औरतों और हिंदुस्तानी औरतों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के जोक पसंद नहीं किए गए। ‘साउथ पार्क फिल्म बिग्गर लौंगर ऐंड अनकट’ में मुख्य पात्र की उनसे मुलाकात होती है नरक में। एमटीवी के शो सेलेब्रिटी डेथमैड में भयानक दंगल में उनकी टक्कर होती है चंगेज खान से। टाइम मशीन में दोनों के मस्तिष्क आपस में उलझ गए हैं। अब अहिंसा का पुजारी पूरी तरह बदल गया है।

यूएचएफ नाम की कामेडी में पैरोडी कलाकार वेअर्ड अल यांकोविच, गांधी-2 फिल्म के भीतर एक और ‌फिल्म के फेक ट्रेलर का गांधी गोली पहले मारता है, पूछता बाद में है। 2002 की मोहनदास ऐंड बैट्टी: ए लव स्टोरी ने तो कमाल ही कर दिया। सेवानिवृत्त पुरातत्ववेत्ता के माध्यम से हॉलीवुड अभिनेत्री से गांधी की प्रेम कहानी का राज पहली बार खुला, जो वास्तव में कभी थी ही नहीं।

कभी गांधी जी ने कहा था कि आंख के बदले आंख की नीति का मतलब होगा सारे संसार का अंधा हो जाना। मार्टिन मैकडोनाफ की सेवन साइकोपैथ्स में दो गैंग्सटर इस तर्क का अर्थ समझने की कोशिश कर रहे हैं, “एक आंख वाला एक बंदा बचेगा, तो आखिरी अंधा उस एक आंख वाले की दूसरी आंख कैसे निकाल पाएगा! उसे तो बस भाग कर झाड़ी में छिप जाना है। साबित हुआ गांधी गलत था!”

(पूर्व संपादक, चर्चित फिल्म पत्रिका माधुरी)

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