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2 मार्च 2026 · MAR 02 , 2026

बाल फिल्में: जाने कहां ये फिल्में गई

बच्चों की फिल्में केवल अर्थशास्त्र का ही मसला नहीं, बल्कि इसके पीछे वह कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता है, जो दिन ब दिन सिकुड़ती जा रही है
कोई मिल गया फिल्म का पोस्टर

यह 2009 की गर्मियों की एक रविवार की सुबह है। स्कूल की छुट्टियां चल रही हैं, गर्मी जल्दी आ गई है और घर में सामान्य से अधिक शांति है। माता-पिता देर तक सोना चाहते हैं, लेकिन बच्चे नहीं। डाइनिंग टेबल पर एक अखबार पड़ा है, जो सुर्खियों के बजाय टेलीविजन कार्यक्रमों की सूची के लिए खुला है। उंगलियां उत्सुकता से कॉलम पलट रही हैं। आज कौन सी फिल्में दिखाई जा रही हैं? जवाब जल्दी मिल जाता है, भूतनाथ, तारे जमीन पर, ता रा रम पम, टूनपुर का सुपरहीरो। ये ऐसी फिल्में हैं, जो मानती हैं कि बच्चे भी गहराई से महसूस कर सकते हैं और वे भी दर्शक हैं। ऐसे दर्शक जिन्हें हर बात समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसा नहीं है कि ये फिल्में वयस्कों के लिए नहीं हैं लेकिन हां इतना जरूर है कि ये फिल्में उन्हें केंद्र में रख कर नहीं बनी हैं। लेकिन अब बच्चे के नजरिये से देखने, सुनने की धारणा हिंदी सिनेमा की बुनियाद नहीं रह गई। कहीं न कहीं इसका दोष बढ़ती टिकट कीमतों, मैटिनी संस्कृति खत्म होने और ‘फैमिली एंटरटेनमेंट’ के ढीले-ढाले विचार के बीच है, जिसके कारण बच्चों की फिल्में चुपचाप फ्रेम से बाहर होती चली गईं। इसका न कहीं विरोध हुआ न कोई शोर-शराबा हुआ। ये फिल्में बस उदासीनता के साथ बाहर हो गईं।

दर्शक के रूप में बच्चे

एक समय था, जब हिंदी सिनेमा बच्चों को अलग दर्शक वर्ग के रूप में देखता था न कि सिर्फ कहानी आगे बढ़ाने के साधन या भावनात्मक शॉर्टकट के रूप में। केबल टेलीविजन ने इसमें अपनी भूमिका निभाई। टार्जन: द वंडर कार (2004), फरारी की सवारी (2012), भूत एंड फ्रेंड्स (2010) और आबरा का डाबरा (2004) जैसी फिल्में बार-बार टीवी पर दिखाई जाती थीं। ये फिल्में ओपनिंग वीकेंड कमाई से नहीं, बल्कि बार-बार देखे जाने से यादगार बनीं। ये फिल्में परफेक्ट नहीं थीं। कहीं असमान, कहीं लड़खड़ाती हुई लेकिन वे उस भाषा में बात करती थीं, जिसे बच्चे समझते थे- जिज्ञासा, डर, खेल और चाहत।

आज वह भाषा लगभग गायब है। वजह आर्थिक है। सिनेमा जाना महंगा हो गया है। परिवार के पास मनोरंजन के दूसरे साधन हैं। अब यह ऐसा उद्योग हो गया है, जो बड़े पैमाने और तमाशे पर चलता है। बच्चों की फिल्में शायद ही ऐसा मुनाफा दे पाती हों। बच्चों की फिल्मों से मोटी कमाई का जोखिम नहीं उठाया जा सकता। लेकिन सिर्फ पैसा ही इन फिल्मों के गायब होने की पूरी कहानी नहीं है। ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि बच्चों के लिए क्या बनाया जाना चाहिए, कैसे बनाया जाना चाहिए, यह कल्पनाशीलता लगभग खत्म ही गई है। इस पर विचार होना जरूरी है।

तारे जमीं पर

तारे जमीं पर

अतीत की नजर

बहुत पहले, जब बच्चों की फिल्मों को ‘जोखिम भरी’ नहीं माना जाता था, तब सत्यजीत राय ने बहुत सोच-समझकर एक फैसला लिया। गोपी गायेन बाघा बायेन (1969) की शुरुआत फिल्म के रूप में नहीं हुई थी। संदेश नाम की पत्रिका में यह बाल कहानी के रूप में छपी थी, जिसे राय के दादा उपेन्द्र किशोर राय चौधरी ने शुरू किया था। राय उसी दुनिया में पले-बढ़े थे, जहां कल्पना को हल्के में नहीं लिया जाता था और हास्य अर्थ रखता था।

1960 के दशक तक राय अपने संयमित और गंभीर सिनेमा के लिए प्रसिद्ध हो चुके थे। फिर भी, उन्हें बच्चों के लिए कुछ बनाने की जरूरत महसूस हुई। उनके जीवनीकार एंड्र्यू रॉबिन्सन के अनुसार, यह प्रेरणा निजी थी। राय अपने बेटे के लिए ऐसी फिल्म बनाना चाहते थे, जिसमें वह यथार्थ से दूर हुए बिना कल्पना में प्रवेश कर सके। 1969 में, वित्तीय परेशानियों के बाद भी बनी गोपी गायेन बाघा बायेन का जादू चल गया। फिल्म का संगीत उम्दा था और इसमें किरदारों को सतही बनाए बिना नैतिक स्पष्टता भी थी। यह फिल्म आलोचनात्मक और व्यावसायिक दोनों स्तरों पर सफल रही। 1970 में इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। राय ने दिखा दिया कि बच्चों की फिल्में हाशिए पर रहने के लिए नहीं होतीं। वे भी बिना खोखली हुए उतनी ही चंचल हो सकती हैं। सतही हुए बिना कल्पनाशील हो सकती हैं और बिना दर्शक वर्ग खोए, कलात्मक रूप से महत्वाकांक्षी भी हो सकती हैं।

खिल ही नहीं पाई कली

स्टेनली का डब्बा (2011) के निर्देशक और तारे जमीन पर (2007) के लेखक अमोल गुप्ते इस धारणा को चुनौती देते हैं कि हिंदी सिनेमा में बच्चों की फिल्में “कम” हो गई हैं। वे कहते हैं, “कम होने के लिए पहले लगातार आना जरूरी है। भारत में बच्चों का सिनेमा वास्तविकता में कभी फला-फूला ही नहीं।” गुप्ते का तर्क है कि जिन फिल्मों को हम बच्चों की फिल्में मानते हैं, असल में वे बच्चों के जरिये कही गई वयस्कों की कहानियां हैं। वे कहते हैं, “उनमें शायद ही कभी बच्चे की नजर होती थी।” वे कहते हैं, “बच्चा मौजूद होता था, अहम भी होता था, लेकिन भावनात्मक केंद्र वयस्कों का ही रहता था।”

यह फर्क महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, बच्चों का सिनेमा उम्र के हिसाब से पैकेजिंग नहीं, बल्कि दृष्टिकोण से परिभाषित होता है। वह पूछता है कि बच्चा क्या देखता है, किससे डरता है, क्या गलत समझता है, क्या कल्पना करता है। हिंदी सिनेमा में बच्चे अक्सर मासूमियत, सुधार या राष्ट्र के भविष्य के प्रतीक बनकर रह जाते हैं। उन्हें शायद ही कभी बिना व्याख्या के भावनात्मक जटिलता मिलती है।

गुलजार

हम कहते हैं कि बच्चे देश का भविष्य हैं, लेकिन हमारे काम उस झुठलाते हैं। बच्चे चुप हैं, मगर फिल्में नदारद हैं- गुलजार, प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक

बच्चों के सिनेमा की कोई एक वैश्विक परिभाषा नहीं है। लेकिन संस्कृतियों के पार कुछ सिद्धांत दोहराए जाते हैं। बच्चों की फिल्में वयस्क फिल्मों के सरल संस्करण नहीं होतीं। वे नैतिक उपदेशों से ढकी कहानियां नहीं होतीं। वे ऐसी कथाएं होती हैं जो बच्चे की बुद्धि, भावनात्मक दायरे और स्वतंत्रता का सम्मान करती हैं।

फिल्म एडिटर और लेखिका दीपा भाटिया कह चुकी हैं कि भारतीय सिनेमा अक्सर सुलभता और उपेक्षा के बीच का अंतर नहीं समझ पाता। वे कहती हैं। “हम सोचते हैं कि सरल भाषा में बात करना मतलब बात को नीचे गिरा देना है। बच्चे अस्पष्टता को हमारी सोच से कहीं बेहतर संभाल सकते हैं।”

यह तब और साफ होता है, जब हिंदी सिनेमा की तुलना ईरानी फिल्मों, जापानी एनीमेशन और यूरोपीय बच्चों की फिल्मों से की जाती है, जहां दुख, अकेलापन और नैतिक द्वंद्व बिना जरूरत से ज्यादा समझाया या दिखाया जाता है। इसके उलट, हिंदी सिनेमा अक्सर भावनाओं को नरम या ज्यादा स्पष्ट कर देता है।

पहले वयस्क, बाद में बच्चे

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के शोधकर्ता यू झू का हालिया अकादमिक अध्ययन तारे जमीन पर (2007) और बजरंगी भाईजान (2015) जैसी फिल्मों का विश्लेषण करता है। इस अध्ययन के मुताबिक इन फिल्मों में बार-बार दोहराया जाने वाला एक तरह का ढांचा दिखता है- बच्चे का दुख और पीड़ा, दरअसल बड़ों के भीतर बदलाव लाने का माध्यम बन जाता है। भावनात्मक यात्रा तब पूरी होती है जब बड़े बदलते हैं, जबकि बच्चे की अंदरूनी दुनिया गौण रह जाती है।

नंदिता दास

मैं 55 साल पुरानी संस्था को तीन साल में नहीं बदल सकती थी। लेकिन मैंने ऐसे बदलाव की कोशिश की जो मेरे बाद भी टिके, बच्चों के लिए उपदेश है या उबाऊ कथानक- नंदिता दास, अभिनेत्री, निर्देशक

नतीजा यह होता है कि सिनेमा दिखने में, तो बच्चा-केंद्रित लगता है, लेकिन असल में वह बड़ों से बात कर रहा होता है। यह एक व्यापक सामाजिक रवैये को दर्शाता है। बच्चों की तारीफ तो बहुत होती है, लेकिन उन्हें गंभीरता से सुना नहीं जाता है।

कवि और फिल्मकार गुलजार लंबे समय से इस विरोधाभास की ओर इशारा करते आए हैं। द हिंदू को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “हम कहते हैं कि बच्चे देश का भविष्य हैं, लेकिन हमारे काम उस विश्वास को झुठलाते हैं।” पुस्तकालयों, खेल के मैदानों और सांस्कृतिक जगहों की कमी बच्चों के सिनेमा में निवेश की असमानता को भी दिखाती है। बच्चों की ओर से बोला तो जाता है, लेकिन उनसे बात कम की जाती है।

ओटीटी पर भी वही समस्या

स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को अक्सर समाधान के रूप में पेश किया जाता है। यहां सामग्री की भरमार है। एनीमेशन फल-फूल रहा है। एल्गोरिदम लगातार सुझाव देते रहते हैं। कागज पर समस्या हल लगती है। लेकिन व्यवहार में, ऐसा नहीं है। ओटीटी प्लेटफॉर्म सामग्री देते हैं, उद्देश्य नहीं। बच्चों की सामग्री ज्यादातर आयातित फॉर्मेट्स, डब किए गए एनीमेशन और परफॉर्मेंस मैट्रिक्स से तय होती है। भारतीय बचपन पर आधारित लाइव-एक्शन कहानियां आज भी दुर्लभ हैं।

स्कूल सिनेमा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की फिल्म पेडागॉजी हेड और आर्टिस्टिक डायरेक्टर नेहा जैन एक दशक से ज्यादा समय से बच्चों और सिनेमा के साथ शैक्षणिक ढांचे पर काम कर रही हैं। स्कूल सिनेमा स्कूलों के लिए उम्र-अनुकूल फिल्में चुनता है और फिर चर्चा के जरिये सिनेमा को मनोरंजन नहीं, चिंतन का माध्यम बनाता है। जैन के लिए असली मुद्दा ऑथरशिप यानी किसकी सोच से सामग्री बन रही है उसका है।

उनका कहना है, ‘‘जब बच्चों के लिए बनाया गया कंटेंट पूरी तरह एल्गोरिदम पर आधारित हो जाता है, तो वह अपनी सांस्कृतिक पहचान खो देता है। तब वही बनाया जाता है, जो अच्छा ‘परफॉर्म’ करता है न कि वह जो सच में जरूरी है।”

थिएटर में दिखाई जाने वाली बच्चों की फिल्में कभी जो अनुभव देती थीं, स्ट्रीमिंग में वह एहसास कभी नहीं मिल सकता। साथ बैठकर देखने का आनंद, एक जैसी भावनात्मक लय। अब वह माहौल टूट गया है। देखना अकेली गतिविधि बन गया है। बच्चा अब दर्शक नहीं सिर्फ “डेटा पॉइंट” बन गया है।

संस्थागत असफलता

अगर भारत में बच्चों के सिनेमा का कभी कोई संरक्षक था, तो वह चिल्ड्रन्स फिल्म सोसाइटी ऑफ इंडिया (सीएफएसआइ) थी। 1955 में स्थापित इस संस्था ने 250 से ज्यादा फिल्में बनाईं। कई फिल्में कल्पनाशील थीं, क्षेत्रीय जड़ों से जुड़ी थीं और बच्चे की भीतरी दुनिया पर ध्यान देती थीं। लेकिन ज्यादातर फिल्में सीमित दायरे से बाहर नहीं जा सकीं।

अभिनेत्री और फिल्मकार नंदिता दास, 2009 से 2012 तक सीएफएसआइ की चेयरपर्सन रहीं। वे अपने कार्यकाल को संतोषजनक लेकिन बेहद निराशाजनक बताती हैं। वे कहती हैं, “मैं 55 साल पुरानी संस्था को तीन साल में नहीं बदल सकती थी। लेकिन मैंने ऐसे बदलाव शुरू करने की कोशिश की जो मेरे बाद भी टिक सकें।” उनका जोर संरचनात्मक सुधार और गुणवत्ता पर था, न कि सिर्फ संख्या पर।

उन प्रयासों में से एक नतीजा गट्टू थी, जो सीएफएसआइ की पहली फिल्म बनी और जिसे ठीक से थिएटर में रिलीज मिली। वे कहती हैं, ‘‘मुझे उम्मीद थी कि यह एक मिसाल बनेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।” दास आगे कहती हैं, ‘‘इसमें वितरण सबसे बड़ी समस्या बना रहा। विकल्पों की कमी यहां साफ दिखाई देती है। जो कुछ है, वह या तो बहुत उपदेशात्मक और उबाऊ है, या जरूरत से ज्यादा हल्का और कभी-कभी हिंसक भी है।” वे इस धारणा को खारिज करती हैं कि सार्थक बच्चों का सिनेमा व्यावसायिक रूप से संभव नहीं है। नंदिता समझाती हैं कि “कम बजट में भी ऐसी फिल्में बन सकती हैं, जो रोचक हों और उपेक्षा न करें। बच्चों की फिल्म को कोई ‘संदेश’ ढोने की जरूरत नहीं है, उसे बस जिम्मेदार होना चाहिए।”

उनके अनुसार, जिम्मेदारी का मतलब यह समझना है कि सिनेमा बच्चे की भावनात्मक दुनिया को कितनी गहराई से प्रभावित करता है। बच्चों की अच्छी फिल्म जिज्ञासा, रोमांच और आश्चर्य से जुड़ती है। वे कहती हैं, “यह बच्चों को दुनिया को समझने में मदद करती है और उम्मीद भी देती है।”

युवा फिल्मकारों के लिए यह कमी निजी है। हाल ही में नेटफ्लिक्स पर आई सीरीज ज्वेल थीफ के असोसिएट डायरेक्टर रह चुके मुंबई के फिल्मकार हितार्थ देसाई, अपनी शॉर्ट फिल्मों में लगातार बच्चों को केंद्र में रखते हैं। वे कहते हैं, “मैंने बच्चों की फिल्में बनाने का इरादा नहीं किया था, मेरे पास बस कहानियां थीं, और वे बच्चों के नजरिये से थीं।’’ बचपन में मकड़ी (2002), कोई मिल गया (2003) और तारे जमीन पर (2007) जैसी फिल्मों ने उन पर गहरी छाप छोड़ी। वे याद करते हैं, “फिल्मों से ज्यादा, टीवी ने हमें आकार दिया। सोन परी (2000–2004), शाका लाका बूम बूम (2002–2004), करिश्मा का करिश्मा (2003–2004) मुझे याद हैं। लेकिन हम डब की गई सामग्री पर भी निर्भर थे। पोगो पर हैरी पॉटर किसी भी चीज से बड़ा था।”

उनके लिए आखिरी यादगार बच्चों की फिल्म अविनाश अरुण की किल्ला (2014) थी। वे कहते हैं, “दुख की बात है, आज बच्चों की फिल्में बहुत कम बन रही हैं।” उनके अनुसार समस्या रचनात्मक भरोसे की नहीं, बल्कि आर्थिक डर की है। “लेखक बच्चों को जटिल किरदार मान सकते हैं। मुझे नहीं लगता कि निर्माता ऐसा करते हैं।”

उनका मानना है कि बच्चों की फिल्में तभी लौटेंगी जब कोई ताकतवर व्यक्ति एक ऐसी फिल्म बनाने का फैसला करेगा। वे कहते हैं, “पश्चिम में बच्चों की फिल्में सबसे ज्यादा कमाई करती हैं। यहां हम एक सफलता का इंतजार कर रहे हैं, जो बातचीत बदल दे।”

अतीत का ही नहीं, ध्यान का भी नुकसान

बच्चों की फिल्मों का गायब होना सिर्फ एक जॉनर के खोने की बात नहीं है। यह एक बड़े सांस्कृतिक बदलाव का संकेत है। सिनेमा अब बच्चे की नजर पर नहीं रुकता। बच्चे या तो “फैमिली ऑडियंस” में घुल जाते हैं या स्क्रीन के हवाले कर दिए जाते हैं। उनकी अंदरूनी दुनिया अनदेखी रह जाती है। जैसा कि गुलजार ने कहा था, ‘‘बच्चे चुप और वंचित हैं।’’ शायद सवाल यह नहीं है कि बच्चों की फिल्में कहां चली गईं, बल्कि यह है कि वे आई ही कब थीं। शायद वे कभी पूरी तरह मौजूद नहीं थीं। शायद उन्हें थोड़ी देर के लिए जगह मिली, फिर उन्हें ज्यादा सुरक्षित, ज्यादा शोर वाली कहानियों ने हटा दिया।

लेकिन बच्चे अब भी देख रहे हैं। यादें बना रहे हैं। खोज रहे हैं। जैसा कि देसाई कहते हैं, “वे फिर आएंगी, अगर हमें उनकी मांग दिखाई दे।” असली सवाल यही है कि क्या हिंदी सिनेमा बच्चों को भविष्य के वयस्क नहीं, बल्कि आज के इंसान के रूप में देखने को तैयार है।

 

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