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फीस बढ़ाना जरुरत या साजिश?

फिर साबित हुआ कि विकास और ज्ञान की सरकारी परिभाषा में गांव-कस्बों के छात्र शामिल नहीं
अधिकार की लड़ाई: जेएनयू में फीस बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन

इन दिनों जेएनयू के विद्यार्थियों की ओर से हॉस्टल मैन्युअल के खिलाफ किया जा रहा आन्दोलन काफी चर्चा में है। कुछ लोग इसे जायज, तो कुछ लोग फालतू का हंगामा बता रहे हैं। समर्थन या विरोध में अपनी राय बनाई जाए, उससे पहले यह जरूरी है कि इसके संबंध में कुछ बुनियादी तथ्य जान लिए जाएं। जेएनयू के विद्यार्थियों का आंदोलन पिछले एक महीने से चल रहा है। आंदोलन कर रहे विद्यार्थियों की मुख्य मांग यह है कि हॉस्टल फीस में वृद्धि वापस ली जाए। प्रशासन का तर्क है कि यूजीसी से जो फंड मिलता है, उसमें यूनिवर्सिटी को चलाना संभव नहीं है, इसलिए विद्यार्थियों की फीस बढ़ाना जरूरी है। साथ ही, ज्यों-ज्यों यूनिवर्सिटी का खर्च बढ़ेगा, उस अनुपात में विद्यार्थियों की फीस में बढ़ोतरी आगे भी होती रहेगी। फिलहाल, जेएनयू की हॉस्टल फीस दूसरे केंद्रीय विश्वविद्यालयों के समान ही है। विद्यार्थी लगभग तीन हजार रुपये महीना मेस बिल के देते हैं, लेकिन नए नियमों के बाद जेएनयू देश का सबसे महंगा केंद्रीय विश्वविद्यालय हो जाएगा। विद्यार्थियों को हॉस्टल में रहने के लिए लगभग सत्तर हजार रुपये सालाना देने होंगे। यहां यह भी जानना जरूरी है कि खुद जेएनयू प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, 40 फीसदी विद्यार्थियों के परिवार की सालाना आय डेढ़ लाख रुपये से कम है।

सवाल उठता है कि क्या देश की सरकार के पास सचमुच विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं? सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017-18 में सेकेंडरी और हायर एजुकेशन सेस से लगभग 84 हजार करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे, जिनको सरकार ने अभी तक खर्च नहीं किया है। प्रधानमंत्री ने लाल किले से अपने भाषण में कहा था कि नोटबंदी के बाद तीन लाख करोड़ रुपये का काला धन भी सरकार के पास आया है। अभी कुछ दिनों पहले रिजर्व बैंक का सरप्लस भी सरकार ने ले लिया है। अजीब बात है कि देश के प्रधानमंत्री लगातार पचास खरब डॉलर की इकोनॉमी बनाने की बात कह रहे हैं, उनकी सरकार एक मूर्ति पर तीन हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है, नेताओं के लिए 200 करोड़ रुपये के प्राइवेट जेट खरीद रही है, विधायकों को एक लाख रुपये महीना हाउस रेंट अलाउंस दे रही है, लेकिन गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए उस (सरकार) के पास पैसा नहीं है। ऐसे में यह साफ जाहिर होता है कि सवाल यहां नीति का नहीं बल्कि नीयत का है। एक प्रगतिशील समाज को शिक्षा को निवेश के नजरिए से देखना चाहिए, न कि खर्च के। लेकिन हर साल दिल खोलकर अमीरों के अरबों रुपये के लोन माफ करने वाली सरकारें सरकारी शिक्षण संस्थानों के बजट में लगातार कटौती कर रही हैं और शिक्षा को बाजार के हवाले कर रही हैं।

जेएनयू की फीस बढ़ाकर सरकार ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि विकास की उसकी परिभाषा में हमारे गांव-कस्बों के लोग शामिल ही नहीं हैं। जिन किसान-मजदूरों के टैक्स के पैसे से विश्वविद्यालय बना, उनके ही बच्चों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। देश के लोगों के टैक्स के पैसे से बने सरकारी उपक्रम लगातार निजी क्षेत्र के हवाले किए जा रहे हैं। उद्योग धंधों और कल-कारखानों को बेच देने के बाद सरकार की नजर अब विश्वविद्यालयों पर है। सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है, और निजी स्कूल देश की बहुसंख्यक आबादी के बजट से बाहर हो चुके हैं। दम तोड़ते इन्हीं सरकारी स्कूलों से पढ़कर अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा पास करके जब गरीबों के बच्चे देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में पहुच रहे हैं तो यह बात भी देश के करोड़पति सांसदों और सरकार के राग-दरबारियों को अखर रही है।

अभी पिछले साल ही सरकार ने जियो यूनिवर्सिटी को देश का  ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस’ घोषित किया था। यह यूनिवर्सिटी अभी तक कहीं खुली ही नहीं है। न बिल्डिंग है, न वेबसाइट, न टीचर है, न स्टूडेंट। लेकिन देश की सरकार के मुताबिक ये देश का सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान है। अम्बानी ग्रुप के मुंबई में चलने वाले स्कूल की नर्सरी क्लास की फीस ही लाखों में है, तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जियो यूनिवर्सिटी में किस वर्ग के विद्यार्थियों को पीएचडी करने का मौका मिलेगा। आज शिक्षा के जेएनयू मॉडल पर लगातार हमला इसीलिए किया जा रहा है ताकि जियो यूनिवर्सिटी के मॉडल को देश में स्थापित किया जा सके जहां सिर्फ अमीरों के बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। फूको ने कहा है कि ‘नॉलेज इज पावर’। ज्ञान में वह ताकत है जिसके बलबूते गरीब और वंचित समुदाय के विद्यार्थी अपनी जिंदगी बदल सकते हैं। लेकिन देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संसाधनों पर कब्जा करके रखने वाले लोग गरीबों को ज्ञान प्राप्ति से भी दूर कर देना चाहते हैं और इसीलिए इन्हें जेएनयू मॉडल से इतनी नफरत है। 

असल में मामला सिर्फ पैसे का नहीं, बल्कि गरीब किसान-मजदूरों के बच्चों को कैंपस से दूर रखने की साजिश का है। हमारे देश में लड़कियों को पढ़ने-लिखने के लिए कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ता है। अधिकतर मामलों में मिडिल क्लास के परिवार लड़कियों की शिक्षा पर पैसा खर्च नहीं करना चाहते, क्योंकि हमारा समाज आज भी दहेज के चंगुल में फंसा हुआ है। सरकार ने बड़े जोर-शोर से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना लागू की, लेकिन इस योजना के तहत देश में बेटियों के लिए आज तक एक भी स्कूल या कॉलेज खोला नहीं गया है। इस योजना के तहत सिर्फ पूरे देश में प्रधानमंत्री जी की फोटो के साथ होर्डिंग्स लगाए गए हैं। जेएनयू में लगातार कई सालों से लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक रही है और यहां भी फीस बढ़ाकर सरकार ने न जाने कितनी लड़कियों के बेहतर कल के सपने चकनाचूर कर दिए हैं।

सत्ता पर काबिज लोग गरीब घरों के बच्चों को उच्च शिक्षा से दूर रखने के लिए और भी कई तरह की साजिशें कर रहे हैं। पहले गरीब और पिछड़े क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों को डेप्रीविएशन पॉइंट देने वाली जेएनयू की प्रवेश परीक्षा का मॉडल बदल दिया गया, और अब मौजूदा सरकार फीस बढ़ाकर इन तबकों से आने वाले विद्यार्थियों के हौसलों और उम्मीदों को भी तोड़ देना चाहती है। कहा जा रहा है कि बीपीएल तबकों से आने वाले विद्यार्थियों को फीस में 50% छूट मिलेगी। विश्वविद्यालय कोई मॉल नहीं है जहां आप 50% डिस्काउंट का बोर्ड लटका दें और जिसके पास जितना पैसा हो उस हिसाब से डिग्री खरीद ले। यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हमारे देश में बीपीएल श्रेणी का मतलब है सालाना 27 हजार रुपये से कम आय। मतलब लगभग दो हजार रुपये महीने कमाने वाले परिवार के विद्यार्थी को लगभग सात हजार रुपये महीना हॉस्टल फीस देनी होगी। यह गरीबों के साथ मजाक नहीं तो और क्या है?

विद्यार्थियों के विरोध-प्रदर्शन की आलोचना करने वाले लोग दो बातें प्रमुख रूप से कह रहे हैं। या तो गरीब बच्चे पार्ट टाइम जॉब करके अपनी पढ़ाई करें या एजुकेशन लोन ले लें। अमीर के बच्चे निश्चिंत होकर पढ़ें और गरीब के बच्चे पार्ट टाइम जॉब करके फीस चुकाएं, यह असमानता बढ़ाने वाली बात है या नहीं? क्या हम युवाओं की ऐसी पीढ़ी बनाना चाहते हैं जो लोन लेकर पढ़ाई करे और बाद में कर्ज चुकाने में ही उनकी हालत इतनी ज्यादा खराब हो जाए कि उसके पास बुनियादी सवाल उठाने का न समय हो न ही ताकत। पिछले कुछ सालों में अमीरों के लगभग पांच हजार करोड़ रुपये के लोन माफ किए जा चुके हैं। सरकार अमीरों के अरबों-खरबों रुपये के लोन माफ करती जाए और गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए लोन लेने पर मजबूर किया जाए, यह किस तरह का न्याय है?

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में एक और अफवाह फैलाई जा रही है कि जेएनयू में विद्यार्थी 40 साल की उम्र तक पढ़ते हैं। सच्चाई यह है कि पीएचडी पूरी करने के लिए पूरी दुनिया की तरह जेएनयू में भी पांच साल ही दिए जाते हैं। थीसिस जमा करते ही एक हफ्ते के अन्दर हॉस्टल खाली करना होता है। जेएनयू अपनी रिसर्च क्वालिटी के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। जिन लोगों को लगता है ‌कि सोशल साइंस पढ़ने पर टैक्स का पैसा क्यों ‘बर्बाद’ किया जाए, उन्हें यह समझना जरूरी है कि समाज में मौजूद बुराइयों को दूर करने के लिए उसका इतिहास समझना जरूरी है। भूगोल की पढ़ाई किए बिना भूजल की समस्या नहीं सुलझाई जा सकती। न्याय, समानता और स्वंतत्रता केवल शब्द नहीं हैं, इसके पीछे एक पूरी विचारधारा होती है जिसको पढ़े बिना समाज में मौजूद जातिगत, धार्मिक और लैंगिक असमानता को दूर करने की नीतियां बनाना संभव नहीं है।  

इतिहास गवाह है कि सत्ता पर काबिज ताकतों ने हमेशा वंचित लोगों को ज्ञान से दूर रखने के लिए तमाम तरह के षड़यंत्र रचे हैं। द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा इसलिए कटवा दिया ताकि राजा का बेटा अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बना रहे। आज भी सत्ता पर काबिज ताकतें ज्ञान पर मुट्ठी भर लोगों का कब्जा बनाए रखना चाहती हैं, क्योंकि ज्ञान में वह ताकत है जिसके बलबूते गरीबों के बच्चे अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं। ये ताकतें चाहती हैं कि फीस इतनी अधिक हो कि गरीब का बच्चा पीएचडी करके किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर न बने। वह दसवीं पास करके ढाबा पर काम करे या बीए करके घर-घर जाकर सामान की डिलीवरी करे।

रोज टीवी डिबेट में बैठकर जेएनयू के छात्रों की आलोचना करने वाले अमीरों को लगता है कि सरकार सिर्फ उनके इनकम टैक्स के पैसे से चलती है, इसलिए सब सुविधाएं सिर्फ उन्हीं के बच्चों को मिलनी चाहिए। लेकिन वे भूल जाते हैं कि गरीब से गरीब आदमी भी जब बाजार से कुछ खरीदता है तो उस पर जीएसटी देता है। अमीरों के एसी, फ्रिज और गाड़ियों से निकलने वाले धुंए से प्रदूषित हवा में सांस गरीब भी लेता है। शिक्षा का अधिकार हमें संविधान से मिलता है और यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सबको बेहतर और समान शिक्षा उपलब्ध कराए।

यह बेहद अफसोसजनक बात है कि सरकार में बैठे लोग चाहते हैं कि किसानों को सब्सिडी न मिले, लेकिन उसी किसान की फसल पर बने खाने पर संसद की कैंटीन में देश के करोड़पति सांसदों को सब्सिडी मिलती रहनी चाहिए। यूनिवर्सिटी में गरीब बच्चों को रहने के लिए फ्री में हॉस्टल न मिले, लेकिन सरकार से लाखों रुपये तनख्वाह पाने वाले इन्हीं करोड़पति सांसदों को लुटियंस में फ्री में रहने के लिए बंगला मिलता रहना चाहिए।

साज‌िश करके जेएनयू के बारे में गलत बातें फैलाई जा रही हैं। जैसे, यह कहा जा रहा है कि यहां हॉस्टल फीस बस दस रुपये महीना है, जबकि सच तो यह है कि यहां के हॉस्टल में विद्यार्थी पहले से ही लगभग तीन हजार रुपये महीने मेस बिल देते आए हैं। यही नहीं, जो लोग जेएनयू में पांच साल में पीएचडी करने की बात कहते हैं, उन्हें असल में यह पूछना चाहिए कि यूपी-बिहार के सरकारी कॉलेजों में आज भी तीन साल का बीए पांच साल में क्यों हो रहा है। लेकिन उन्हें दिक्कत इस बात से है कि सब्जी का ठेला लगाने वाले का बच्चा रशियन या फ्रेंच भाषा पढ़के टूरिज्म के क्षेत्र में अपनी कंपनी क्यों खोल रहा है, या फिर अफ्रीकन या लेटिन अमेरिकन स्टडीज में पीएचडी करके फॉरेन पॉलिसी एक्सपर्ट कैसे बन रहा है। 

आज उन तमाम लोगों को सामने आकर जेएनयू के संघर्ष में शामिल होना चाहिए जो सरकारी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई करने के बाद सरकार को इनकम टैक्स और जीएसटी दोनों दे रहे हैं। अगर आज वे चुप रहे तो कल उनके बच्चों को लोन लेकर या पार्ट टाइम जॉब करके पढ़ाई करनी पड़ेगी। पूरे देश में सरकारी कॉलेजों की फीस लगातार बढ़ाई जा रही है और जेएनयू ने हर बार इसके खिलाफ आवाज़ उठाई है। आज जेएनयू को बचाने का संघर्ष किसी एक विश्वविद्यालय को बचाने का संघर्ष नहीं, बल्कि समानता और न्याय के उन मूल्यों को बचाने का संघर्ष है जिनकी बुनियाद पर हमारे लोकतंत्र की स्थापना की गई है।

  (लेखक जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और सीपीआइ की नेशनल एक्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य हैं)      

 

- देश के संसाधनों पर कब्जा जमाने वाले गरीबों को ज्ञान प्राप्ति से भी दूर कर देना चाहते हैं, इसलिए उन्हें जेएनयू मॉडल से नफरत है

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