संकट यकीनन गहरा, सरकारी कोशिशें थोड़ी

सेंटर फॉर पॉलिसी अल्टरनेटिव के चेयरमैन मोहन गुरुस्वामी
सेंटर फॉर पॉलिसी अल्टरनेटिव के चेयरमैन मोहन गुरुस्वामी

इकोनॉमी की मौजूदा स्थिति को आप किस तरह देखते हैं?

मोहन गुरुस्वामी

आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। सरकार अब भी मूल समस्या को हल करने की जगह दिखावे पर ही फोकस कर रही है। इस समय पूंजीगत खर्च बेहद कम हो गया है। सरकार वेतन-भत्ते आदि पर ही सारा खर्च कर रही है। जीडीपी के आंकड़े इकोनॉमी की सही तसवीर पेश नहीं कर रहे हैं। सरकार ने जीडीपी कैलकुलेशन का तरीका बदल दिया है। जीडीपी ग्रोथ रेट वास्तव में 2.5-3.0 फीसदी है। बचत और निवेश के अनुपात भी लगातार गिर रहे हैं, जो इकोनॉमी के गहरे संकट में जाने की ओर इशारा कर रहे हैं।

डॉ. टी. हक

जीडीपी ग्रोथ पांच तिमाही से लगातार गिर रही है। इस साल अप्रैल-जून में पांच फीसदी ग्रोथ रेट के साथ यह छह साल के निचले स्तर पर है। कृषि, छोटे-मझोले उद्योगों, कंस्ट्रक्शन और ऑटोमोबाइल सेक्टर में आर्थिक सुस्ती का असर ज्यादा है। कृषि क्षेत्र 5.0 फीसदी ग्रोथ रेट के मुकाबले 2.0 फीसदी, मैन्युफैक्चरिंग 12.1 फीसदी के मुकाबले 0.6 फीसदी और कंस्ट्रक्शन क्षेत्र 9.6 फीसदी के मुकाबले 5.7 फीसदी पर आ गया है। बेरोजगारी दर भी अब तक के उच्चतम स्तर पर है। निर्यात में पिछले साल सुधार दिख रहा था, लेकिन उसमें भी गिरावट है। ये सभी संकेत मंदी का इशारा कर रहे हैं। अगर जल्दी ढांचागत सुधार नहीं किए गए, मौद्रिक और राजकोषीय प्रबंधन पर नीतिगत कदम नहीं उठाए गए, तो हम मंदी से भी बड़े आर्थिक संकट में फंस जाएंगे।

डी.के. जोशी

इसमें अब कोई शक नहीं कि इकोनॉमी में सुस्ती है। लगातार दूसरी तिमाही में ग्रोथ रेट छह फीसदी से नीचे रही है। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में हम 5.0 फीसदी पर आ गए हैं। ऐसा 2011-12 की दो तिमाही में ही हुआ था। उस साल पहली तिमाही में ग्रोथ रेट 4.9 फीसदी और चौथी तिमाही में 4.8 फीसदी थी। इसलिए यह समझना चाहिए कि यह सामान्य नहीं है।

एन.आर. भानुमूर्ति

इकोनॉमी बहुत कमजोर स्थिति में है। सभी सेक्टर से मांग में भारी कमी आई है। असल में इकोनॉमी में आर्थिक सुस्ती की शुरुआत करीब डेढ़ साल पहले ही हो गई थी। लेकिन दुर्भाग्य से सरकार ने इसे उस समय स्वीकार नहीं किया। पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट जिस तरह से गिरी है, उससे लगता है कि पूरे साल में ग्रोथ रेट पिछले साल की तुलना में भी कम रहेगी।

 

क्या हम गंभीर ढांचागत समस्या के भंवर में फंस गए हैं?

मोहन गुरुस्वामी

यह आर्थिक संकट पूरी तरह से ढांचागत समस्या की वजह से खड़ा हुआ है। जब इकोनॉमी में पूंजी निर्माण के लिए निवेश नहीं होगा, सरकार सारा खर्च वेतन-भत्ते आदि पर करने लगेगी तो ऐसी स्थिति आएगी ही।

डॉ. टी. हक

मौजूदा आर्थिक संकट ढांचागत और थोड़ा चक्रीय है। पूरी दुनिया की इकोनॉमी में चक्रीय सुस्ती का असर दिख रहा है। भारत उससे अछूता नहीं रह सकता। लेकिन कृषि और असंगठित क्षेत्र में आने वाले छोटे-मझोले उद्योग इस समय ढांचागत समस्या से जूझ रहे हैं। इसका सीधा असर उनकी घटती आय के रूप में दिख रहा है।

डी.के. जोशी

जब भी इकोनॉमी खराब परफॉर्म करती है तो ऐसी बातें उठने लगती हैं कि ढांचागत समस्याओं की वजह से ऐसा हो रहा है। मेरा मानना है कि यह चक्रीय समस्या ज्यादा है। जो ढांचागत मुद्दे हैं, वह तो पहले से बने हुए हैं। एक अहम चिंता की बात यह है कि बचत दर लगातार गिर रही है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हालत खराब है। इसे बढ़ाना बड़ी चुनौती है।

एन.आर. भानुमूर्ति

मैं शुरू से कह रहा हूं कि इकोनॉमी इस समय ढांचागत और चक्रीय सुस्ती, दोनों का सामना कर रही है। शुरुआत चक्रीय सुस्ती से हुई थी। यह स्थिति पिछले साल थी लेकिन हमने उस समय इसको नहीं समझा। इस वजह से अब यह ढांचागत सुस्ती में तब्दील हो गई है।

 

इस सुस्ती की क्या वजहें हैं, इस गिरावट में नोटबंदी और जीएसटी की कितनी भूमिका है?

मोहन गुरुस्वामी

नोटबंदी से असंगठित क्षेत्र की इकोनॉमी पूरी तरह बर्बाद हो गई। करीब 20 फीसदी लोग बेरोजगार हो गए हैं। इस वजह से यह संकट और बड़ा हो गया है। जीएसटी की दर अब भी स्थिर हो रही है। उसमें बड़े पैमाने पर बदलाव होने से छोटे कारोबारियों पर मार पड़ी है। इसके अलावा लोगों की आमदनी घटने से मांग घट गई है।

डॉ. टी. हक

सुस्ती की प्रमुख वजह घरेलू और वैश्विक स्तर पर मांग का गिरना है। मांग गिरने का कारण लोगों की आमदनी नहीं बढ़ना, कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम होना और छोटे-मझोले उपक्रमों और असंगठित क्षेत्र की सुस्ती है। ज्यादातर सेक्टर में उत्पादन काफी गिर गया है। निर्यात क्षेत्र भी वैश्विक स्तर पर सुस्ती का सामना कर रहा है। हमारे उत्पादों की लागत ज्यादा होने से भी निर्यातक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं। निवेश के मामले में बिजनेस सेंटीमेंट काफी कमजोर है। इसलिए कंपनियां निवेश नहीं कर रही हैं। एनपीए और प्रबंधन की समस्याओं से कर्ज उठान की गति धीमी हो गई है। ये सब इकोनॉमी में सुस्ती के कारण हैं।

डी.के. जोशी

जब चक्रीय आर्थिक सुस्ती आती है, तो उसका असर निवेश, राजस्व संग्रह आदि पर पड़ता है। इस समय नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ रेट (ग्रोथ रेट में महंगाई दर जोड़ने के बाद) आठ फीसदी है। यह 2011-12 के बाद सबसे निचले स्तर पर है। जीएसटी की दर भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुई है, इसमें समय लगेगा।

एन.आर. भानुमूर्ति

असल में हम जिस तरह वित्तीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) कानून पर अमल कर रहे हैं, वह खुद ढांचागत आर्थिक सुस्ती लाने में अहम भूमिका निभा रहा है। इसी तरह लगातार मांग का गिरना भी ढांचागत समस्या पैदा कर रहा है। बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र में लंबे समय से समस्याएं बनी हुई हैं। नोटबंदी और जीएसटी को जिस तरह लागू किया गया, उससे भी समस्याएं बड़ी हो गई हैं। जीएसटी को पूरी तरह से स्थिर होने में और दो-तीन साल लगेंगे। इन्सॉल्वेंसी बैंकिंग कोड (आइबीसी) का भी असर हुआ है। जहां तक चक्रीय आर्थिक सुस्ती की बात है तो यह प्रमुख रूप से ग्लोबल फैक्टर की वजह से आई है, जो धीरे-धीरे सुधर जाएगी।

 

बेरोजगारी सबसे बड़ी चुनौती है। सरकार नए रोजगार सृजन में क्यों नाकाम रही?

 मोहन गुरुस्वामी

निवेश में भारी कमी आई है। ऐसे में रोजगार के अवसर कहां से पैदा होंगे? असंगठित क्षेत्र में भी निवेश गिर गया है। इसकी वजह से रोजगार की समस्या खड़ी हो गई है।

डॉ.टी. हक

रोजगार-विहीन वृद्धि दर (जॉबलेस ग्रोथ) की समस्या इस सरकार को यूपीए सरकार से सौगात में मिली है। बेरोजगारी बढ़ने का नकारात्मक असर यह होता है कि इकोनॉमी में मांग गिरने लगती है। इससे मंदी का खतरा बढ़ता है। डिसरप्टिव टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से एक तरफ जहां ग्रोथ रेट बढ़ती है, वहीं अस्थायी रूप से बेरोजगारी में भी इजाफा होता है। लेकिन इस अस्थायी समस्या को अगर समय रहते हल नहीं किया गया तो ग्रोथ रेट के रास्ते में बेरोजगारी ही रोड़ा बन जाती है। इसलिए सरकार का पहला फोकस यही होना चाहिए कि देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को रोजगार का मौका मिले। छोटे और मझोले उद्योग, कंस्ट्रक्शन, शिक्षा और स्वास्थ्य ऐसे क्षेत्र हैं जहां अब भी रोजगार के बहुत अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

डी.के. जोशी

आर्थिक सुस्ती की वजह से नौकरियों के अवसर में कमी आएगी। इसके अलावा भारतीय इकोनॉमी में ऑटोमेशन भी बढ़ा है। इस कारण भी नौकरियों में कमी आई है। जहां तक असंगठित क्षेत्र की बात है तो इकोनॉमी में उसका हिस्सा बहुत बड़ा है। वहां रोजगार का क्या स्तर है, उसके बारे में कहना मुश्किल है।

एन.आर. भानुमूर्ति

बढ़ती बेरोजगारी की दो प्रमुख वजहें हैं। नोटबंदी और जीएसटी को लागू करने में जो द‌िक्कतें आई हैं, उसकी वजह से बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ी है। इसके अलावा यह भी समझना जरूरी है क‌ि जब इकोनॉमी बेहतर प्रदर्शन नहीं करेगी तो बेरोजगारी बढ़ेगी। अभी ऐसा ही हो रहा है। अब सरकार को क्या करना चाह‌िए, यह एक बड़ा सवाल है। उसे न‌िवेश बढ़ाने, न‌िर्यात क्षेत्र को मदद करने से लेकर बैंक‌िंग सेक्टर के ल‌िए काम करना चाह‌िए।

 

कॉरपोरेट सेक्टर निवेश के लिए आगे क्यों नहीं आ रहा है? क्या टैक्स टेररिज्म भी रुकावट है?

मोहन गुरुस्वामी

कॉरपोरेट को अगर बिजनेस में फायदा दिखेगा तभी वह निवेश करेगा। इसके अलावा बैंकों की तरफ से कर्ज देने में भी सख्ती हुई है, जिसका असर निवेश पर दिख रहा है। जहां टैक्स टेररिज्म की बात है, तो ऐसा कहना सही नहीं है। अब भी देश में बड़े पैमाने पर टैक्स की चोरी की जाती है। लोगों में टैक्स नहीं देने की प्रवृत्ति है, जो गलत है।

डॉ. टी. हक

कॉरपोरेट सेक्टर को अगर यह लगेगा कि निवेश से उसे अच्छा रिटर्न मिलेगा और बिजनेस करना उनके लिए फायदेमंद है, तो वह निश्चित तौर पर निवेश करेगा। जहां तक टैक्स टेररिज्म की बात है, तो यह कहना गलत है कि इसके कारण निवेश घट गया है। उल्टे भारत अब भी उन देशों में है, जहां टैक्स चोरी ज्यादा होती है।

एन.आर. भानुमूर्ति

इकोनॉमी सुस्ती की चपेट में है। इसके लिए ढांचागत और चक्रीय समस्याएं जिम्मेदार हैं। इनका असर कॉरपोरेट सेक्टर की बैलेंसशीट पर हुआ है। मांग में भी लगातार गिरावट का रुख बना हुआ है। इन सब फैक्टर का असर कॉरपोरेट सेक्टर के निवेश पर दिख रहा है।

 

सरकार ने इकोनॉमी को रफ्तार देने के लिए जो कदम उठाए हैं, क्या वे कारगर हैं?

 

मोहन गुरुस्वामी

अब तक जो कदम उठाए गए हैं, उन्हें पर्याप्त नहीं कह सकते हैं। सरकार अभी सतही कदम उठाकर अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार की उम्मीद कर रही है। छह लाख करोड़ रुपये के मामले टैक्स विवाद में फंसे हुए हैं। बैंक छोटे और मझोले कारोबारियों को पैसा देने में कोताही बरत रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह मुद्रा लोन में डिफॉल्ट का बढ़ना है। बैंकों ने छोटे कारोबारियों को कर्ज देने से एक तरह से हाथ खींच लिया है।

डॉ. टी. हक

सरकार ने अभी तक जो कदम उठाए हैं, उनसे मौजूदा आर्थिक संकट के मूल कारण दूर नहीं होंगे। इन कदमों से सिर्फ मौजूदा परिस्थितियों को और बिगड़ने से बचाने में मदद मिल सकती है। इन कदमों के जरिए एनबीएफसी और बैंकों के पास नकदी बढ़ेगी। इसका फायदा यह होगा कि ब्याज दरों में गिरावट होगी। साथ ही कृषि, छोटे और मझोले उद्योगों और कंस्ट्रक्शन सेक्टर को कर्ज मिलना आसान होगा। इसके अलावा अहम बात यह है कि मौद्रिक नीति और राजकोषीय प्रबंधन संबंधी नीतियों में पहले से ज्यादा समन्वय हो सकेगा। यह इकोनॉमी के लिए काफी फायदेमंद होगा।

डी.के. जोशी

सरकार के इन कदमों से सेंटीमेंट पर असर होगा। लेकिन इसका असर तुरंत नहीं दिखेगा। नतीजे धीरे-धीरे सामने आएंगे। अच्छी बात यह है कि इस साल मानसून की स्थिति अच्छी है। कुल मिलाकर तीसरी और चौथी तिमाही में इन सबका असर दिखेगा।

एन.आर. भानुमूर्ति

हाल में उठाए गए कदमों से अच्छी बात यह हुई है कि अब सरकार मान रही है कि इकोनॉमी में आर्थिक सुस्ती आ गई है। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि वह आने वाले दिनों में रिवाइवल के लिए कदम उठाती रहेगी। सरकार ने जो कदम उठाए हैं, उससे सेंटीमेंट में सुधार होगा।

 

सरकार को और क्या करना चाहिए जिससे इकोनॉमी पटरी पर आए?

 मोहन गुरुस्वामी

इकोनॉमी को रिवाइव करने के लिए सरकार को पूंजी निर्माण पर खर्च करना चाहिए। घाटे वाली सरकारी कंपनियों का विनिवेश करने से सरकार के पास पैसा आएगा। इसके अलावा असंगठित क्षेत्र की स्थिति सुधारने पर फोकस करना बेहद जरूरी है, ताकि वहां नए रोजगार पैदा हो सकें। हमारे देश की 90 फीसदी इकोनॉमी असंगठित क्षेत्र के ही भरोसे है।

डॉ. टी. हक

मांग बढ़ाने के लिए सबसे पहले सरकारी खर्च बढ़ाना होगा। इसके अलावा घाटे में चल रही कंपनियों के राहत पैकेज में कमी लानी चाहिए। सरकार का पूरा फोकस उत्पादकता और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर होना चाहिए। कृषि से संबंधित उद्योगों और एमएसएमई सेक्टर में ढांचागत सुधार करने की जरूरत है। भूमि सुधारों की दिशा में तुरंत कदम उठाना चाहिए। पट्टे पर जमीन देने, जमीन के कंसॉलिडेशन आदि की दिशा में कदम उठाना सबसे अहम है।

डी.के. जोशी

जब इकोनॉमी में सुस्ती आती है, वह समय सरकार के लिए कड़े फैसले लेने वाला होता है। सरकार को निजीकरण पर जोर देना चाहिए और एस्‍सेट मोनेटाइजेशन बढ़ाना चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि सरकार निजीकरण और एस्‍सेट मोनेटाइजेशन से मिले पैसे को निवेश बढ़ाने पर खर्च करे। उसे खपत के लिए नहीं इस्तेमाल करना चाहिए।

एन.आर. भानुमूर्ति

इस समय इकोनॉमी में ऐसे कदम की जरूरत है जिससे लोगों की बचत बढ़े। एक रास्ता तो यह है कि लोगों की इनकम बढ़ाई जाए। इसके अलावा इन्फ्रास्ट्रक्चर बांड जैसे बचत के विकल्प उपलब्ध कराए जाएं। निर्यात क्षेत्र को बूस्टर की जरूरत है। यह क्षेत्र अमेरिका और चीन के ट्रेड वॉर में फंस गया है। इससे बचने के लिए हम उन्हीं की तरह इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने जैसे कदम उठा रहे हैं। हमें इससे बचना चाहिए, ताकि घरेलू इंडस्ट्री को फायदा मिले। एफआरबीएम एक्ट के प्रावधानों को बेहतर तरीके से लागू करना चाहिए।

 

आरबीआइ सरकार को कैश सरप्लस के रूप में 1.76 लाख करोड़ रुपये देगा। इस कदम को कितना सही मानते हैं?

 मोहन गुरुस्वामी

आरबीआइ से सरकार ने जो पैसा लिया है, उससे बहुत कुछ नहीं होने वाला है। इसी रकम से बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपये दिए जाएंगे, जिसका ऐलान वित्त मंत्री ने राहत पैकेज के रूप में किया है। कुल मिलाकर सरकार के पास इस पैसे से बहुत कुछ करने को नहीं है।

डॉ. टी. हक

आरबीआइ के कैश सरप्लस से 1.76 लाख करोड़ रुपये लेना सही दिशा में उठाया गया कदम है। यह सरकार और आरबीआइ के बीच बेहतर समन्वय को दिखाता है। इस राशि का इस्तेमाल इकोनॉमी को रफ्तार देने में होगा। सरकार को राजकोषीय घाटा लक्ष्य के भीतर रखने में भी मदद मिलेगी। यह बात भी है कि राजकोषीय प्रबंधन के लिए हम कुछ ज्यादा ही जुनूनी बने रहते हैं।

डी.के. जोशी

इसे हमें वन टाइम एडजस्टमेंट के रूप में देखना चाहिए। सरकार को इससे पैसा मिलेगा। ऐसा नहीं है कि हर बार सरकार ऐसा कर सकेगी।

एन.आर. भानुमूर्ति

इस फैसले का मिश्रित असर होगा। हो सकता है कि इसके जरिए सरकार को राजकोषीय स्तर पर ऐसा मौका मिल जाए कि वह राहत पैकेज से संबंधित बड़े फैसले तेजी से लागू कर सके। इसके अलावा यह भी हो सकता है कि फाइनेंशियल मार्केट में नकदी की कमी हो जाए, जिसका असर निजी क्षेत्र पर दिखे।

विशेषज्ञ राय संकलनः प्रशांत श्रीवास्तव

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