अगर न्याय में देरी, न्याय से वंचित होने के बराबर है, तो लाखों लोगों के लिए यह कहावत नहीं, रोजमर्रा की हकीकत है। देश की जेलें ऐसे विचाराधीन कैदियों से भरी पड़ी हैं, जिन्हें अब तक किसी अपराध में दोषी ही नहीं ठहराया गया है, उनके मुकदमों की सुनवाई पूरी नहीं हो पाई है। फिर भी वे वर्षों से सलाखों के पीछे हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, देश की जेलों में करीब तीन-चौथाई कैदी विचाराधीन हैं। इनमें लगभग 5.3 लाख कैदियों में से करीब 3.9 लाख ऐसे हैं, जिनके मामलों का फैसला आना बाकी है। बीते पच्चीस वर्षों में यह आंकड़ा कभी भी 65 प्रतिशत से नीचे नहीं गया। यह स्थिति किसी एक दौर की नहीं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है।
न्याय में देरी की बड़ी कीमत वही व्यक्ति चुकाता है, जिसे दोषी साबित नहीं किया गया है। वह जीवन के कई कीमती वर्ष जेल में गुजार देता है। कई मामलों में अंततः अदालतें मान लेती हैं कि आरोप साबित नहीं हो पाए और आरोपी बाइज्जत बरी कर दिया जाता है। तब तक देर हो चुकी होती है। बीता हुआ समय, टूटा हुआ परिवार और बिखरी हुई जिंदगी वापस नहीं आती। वर्ष 2023 में जेलों में 150 विचाराधीन कैदियों की मौत हो गई, जिनमें से अधिकांश आत्महत्या के मामले थे।
इस स्थिति का बड़ा कारण अदालतों में लंबित मामलों का भारी बोझ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, केवल जिला अदालतों में ही 3.6 करोड़ से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। उच्च न्यायालयों में 17.5 लाख से ज्यादा मुकदमे अटके पड़े हैं और सर्वोच्च न्यायालय में भी लगभग 15,000 मामलों का निपटारा होना बाकी है। सभी न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन सुनवाई की तारीखें बढ़ती जाती हैं।
संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रति दस लाख आबादी पर केवल 21 न्यायाधीश हैं। यह संख्या विधि आयोग द्वारा दशकों पहले सुझाए गए मानक से आधी है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद कम। पश्चिमी देशों में प्रति व्यक्ति न्यायाधीशों की संख्या भारत से तीन से चार गुना अधिक है, जिससे वहां मामलों का निपटारा अपेक्षाकृत तेजी से हो पाता है। जाहिर है कि जब अदालतों पर हजारों मुकदमों का बोझ हो, तो समयबद्ध न्याय की उम्मीद मुश्किल है। नतीजतन विचाराधीन कैदी इंतजार करते रहते हैं। कई बार यह इंतजार उसकी उस अधिकतम सजा से लंबा हो जाता है, जो दोष सिद्ध होने पर मिल सकती थी।
न्याय में देरी का सबसे ज्यादा खामियाजा आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को उठाना पड़ता है। यह कड़वी सच्चाई है कि बड़े और चर्चित मामलों के आरोपी अक्सर लंबा समय जेल में नहीं बिताते। उनके पास अच्छे वकील होते हैं, सो उन्हें जमानत जल्दी मिल जाती है। इसके विपरीत, अधिकांश विचाराधीन कैदी हाशिए पर रहने वाले या कानूनी प्रक्रियाओं से अनजान लोग होते हैं। वे न तो महंगे वकील की सेवाएं ले सकते हैं, न ही उन्हें यह पता होता है कि कानून उन्हें जमानत या समय से पहले रिहाई का अधिकार देता है। यही वजह है कि जेलों में कैदियों की संख्या घटने का नाम नहीं ले रही।
इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, न्यायाधीशों के खाली पदों को आबादी के अनुपात में हिसाब से भरना होगा। इसके साथ ही जमानत को वास्तव में रूल (नियम) और जेल को एक्सेप्शन (अपवाद) बनाना होगा, खासकर छोटे और गैर-हिंसक अपराधों के मामलों में। सिद्धांत रूप में अदालतें इस बात को मानती हैं, लेकिन व्यवहार में इसका पालन समान रूप से नहीं हो पाता। जल्द सुनवाई, स्पष्ट दिशा-निर्देश और जमानत के निजी मुचलके का अधिक इस्तेमाल हजारों लोगों को बेवजह जेल जाने से बचा सकता है।
मुफ्त कानूनी सहायता व्यवस्था मजबूत करना होगी, ताकि गरीब से गरीब तक मदद पहुंचे। संसाधनों की कमी आजीवन सजा न बने, यह राज्य की जिम्मेदारी है। ई-कोर्ट और डिजिटल फाइलिंग के जरिए मामलों की सुनवाई में तेजी लाई जा सकती है। यह भी तय किया जा सके कि कौन जमानत या रिहाई का हकदार है। इस अंक में चर्चित मामलों के ऐसे लोगों के जेल और जेल के बाहर के जीवन की आपबीती है। उनमें से कई पर आरोप तो लगे लेकिन सिद्ध नहीं हुए और कुछ मामले विचाराधीन हैं। ऐसे अनगिनत गुमनाम कैदी हैं जिनकी आपबीती हम तक नहीं पहुंचती। जल्दबाजी में किसी को दोषी या दोषमुक्त घोषित नहीं किया जा सकता, लेकिन समयबद्ध न्याय प्रक्रिया के हर संभव प्रयास होना चाहिए।
देश् का संविधान हर नागरिक को स्वतंत्रता, गरिमा और समानता का भरोसा देता है। जब हजारों विचाराधीन कैदी बिना दोष साबित हुए वर्षों जेल में पड़े रहते हैं, तो भरोसा कमजोर पड़ता है। न्याय हर उस गुमनाम कैदी तक भी पहुंचाना होगा, जो काल कोठरी में चुपचाप इंसाफ का इंतजार कर रहा है।