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16 फरवरी 2026 · FEB 16 , 2026

प्रथम दृष्टि: खबरों की विश्वसनीयता

सही और सटीक खबरों का प्रतीक समझे जाने वाले मशहूर पत्रकार मार्क टली का निधन हमें उस ओर देखने का मौका प्रदान करता है कि कैसे झूठी और भ्रामक खबरों पर रोक लगाई जाए
मार्क टली

पत्रकारों के लिए निष्पक्ष होना उतना ही आवश्यक है, जितना लोगों तक सही और प्रामाणिक खबरें पहुंचाना। पत्रकारिता धर्म निभाने वालों के डीएनए में ये दो गुण तो निश्चित रूप से मिलने चाहिए। हर मीडियाकर्मी से उम्मीद की जाती है कि खबरों के संकलन से लेकर उन्हें लिखने और प्रकाशित करने की प्रक्रिया में वे किसी तरह के पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हों। न ही किसी दवाब में काम करें, न ही किसी भय या प्रलोभन से प्रभावित हों। दरअसल निष्पक्ष पत्रकार ही पाठकों या दर्शकों की नजर में विश्वसनीय होता है।

किसी रिपोर्टर की भाषा उसे दूसरों से बेहतर बना सकती है, किसी की ख्‍ाबर प्रस्तुत करने की कला निराली हो सकती है। किसी का न्यूज सेंस उसे उच्च कोटि का पत्रकार बना सकता है तो किसी का खबरों की तह तक जाकर अनुसंधान करने का जुनून खोजी पत्रकारिता में नए अध्याय जोड़ सकता है। लेकिन, इन तमाम गुणों से इतर, किसी पत्रकार को अपने पूरे करियर में निष्पक्ष रहना ही विशेष बनाती है।

अक्सर देखा गया है कि कई प्रतिभाशाली पत्रकार अपने पूर्वाग्रहों, किसी खास विचारधारा के प्रति व्यक्तिगत प्रतिबद्धता या अन्य पेशेगत मजबूरियों की वजह से पत्रकारिता की कसौटियों पर खरे नहीं उतर पाते हैं। जाहिर है, विश्वसनीयता के बगैर किसी मीडियाकर्मी का कोई वजूद नहीं है। निष्पक्षता और विश्वसनीयता की अहमियत मार्क टली के उदाहरण से भी समझी जा सकती है।

मशहूर पत्रकार मार्क टली का पिछले दिनों 90 वर्ष की उम्र में दिल्ली में देहांत हो गया। वे ब्रिटिश  ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन (बीबीसी) के भारत में दशकों तक प्रमुख संवाददाता रहे, लेकिन उन्होंने अपनी खबरों की विश्वसनीयता के बदौलत तमाम विदेशी संवाददाताओं के बीच अपनी विशिष्ट जगह बनाई।

भारत में बीबीसी के प्रमुख संवाददाता के रूप में उन्हें सही और सटीक खबरों का प्रतीक समझा जाने लगा। सत्तर के दशक की शुरुआत से नब्बे के दशक तक भारत के महानगरों से लेकर सुदूर गांवों तक रेडियो पर उनके श्रोताओं को यह यकीन रहता था कि उनकी खबर है तो वह सही भी होगी और प्रामाणिक भी। ऐसी विश्वसनीयता या प्रतिष्ठा अपने करियर में कम पत्रकारों को ही मिलती है।

मार्क टली बीबीसी के लिए दक्षिण एशियाई संवाददाता के रूप में भी काम करते रहे, जिस दौरान उन्होंने न सिर्फ भारत, बल्कि पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी मुल्कों की अनेक ऐसी घटनाओं को कवर किया जो इतिहास बदलने वाली साबित हुईं, चाहे 1975 में इमरजेंसी हो, 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद हुए सिखों के खिलाफ दंगे और ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी घटनाएं हों।

वे भोपाल गैस लीक त्रासदी से लेकर बाबरी मस्जिद को ढहाने जैसी खबरों के लिए ग्राउंड जीरो पर सबसे पहले पहुंचने वाले संवाददाताओं में एक होते थे। भारत की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक स्थितियों की जैसी समझ उनमें थी, उनके समकालीन रिपोर्टरों में कम ही देखा गया।

यही कारण है कि मार्क टली के निधन को भारत में पत्रकारिता के एक अध्याय के अंत के रूप में देखा जा रहा है। अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक वे उत्कृष्ट पत्रकारिता के प्रतीक बने रहे। उनकी रिपोर्टिंग ने निस्संदेह कई पीढ़ियों के पत्रकारों को प्रेरित किया। पत्रकारों की आने वाली हर पीढ़ी के लिए वे मिसाल बने रहेंगे।

मार्क टली के योगदान को आज के दौर में और भी समझने की जरूरत है, खासकर जब सही, सटीक और प्रमाणिक खबरों की जगह फेक न्यूज ने ले ली है। आज खबरों को प्रसारित करने की होड़ में तथ्यों की जांच करने की प्रक्रिया को अनावश्यक समझा जा रहा है। आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस और डीप फेक जैसी तकनीक ने खबरों की विश्वसनीयता पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

आज यह समझना मुश्किल हो गया है कि कौन-सी खबर सही है और कौन सी नहीं। खबरों की दुनिया ‘ब्रेकिंग न्यूज' के दौर को बहुत पीछे छोड़ चुकी है। डिजिटल दौर की गलाकाट पत्रकारिता में अधिक महत्वपूर्ण यह हो गया है कि कौन-सी खबर कितने अधिक लोगों तक कितनी जल्दी पहुंचेंगी।

 

अधिक से अधिक सब्सक्राइबर और उनके लाइक्स पाने की चाह के कारण अक्सर भ्रामक और झूठी खबरों को यूट्यूब, इन्स्टा रील या सोशल मीडिया के अन्य डिजिटल माध्यमों से परोसा जाता है, जिनके व्यूज कुछ ही समय से लाखों तक पहुंच जाते हैं। यह पत्रकारिता के आधुनिक दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी झूठी और भ्रामक खबरों पर कैसे रोक लगाई जाए, इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। अगर ऐसा ही दौर चलता रहा तो पत्रकारिता का भविष्य क्या होगा और क्या कोई मार्क टली जैसा पत्रकार सामने आएगा, जिसकी खबरों को लोग आंख मूंद कर विश्वास कर लेंगे।

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