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प्रथम दृष्टि: प्रकृति का ऋण

जब-जब किसी राष्ट्र के निजी हित का सवाल आया, सबसे पहला समझौता पर्यावरण से किया गया। शायद ही कभी किसी मुल्क की अवाम ने पर्यावरण की अनदेखी के कारण हुक्मरानों को सत्ताच्युत किया हो।
पर्यावरण की परवाह कर प्रकृति का ऋण चुका रहे लोगों से थोड़ा भी सबक हम ले सकें तो इसकी  रक्षा हो सकती है

“हर कोई पृथ्वी को बचाना चाहता है; अपनी मां के साथ बर्तन मांजने में कोई हाथ बंटाना नहीं चाहता।”

प्रसिद्ध अमेरिकी राजनीतिक व्यंग्यकार पी.जे. ओ'रूर्के ने पर्यावरण को बचाने के लिए चल रही मुहिमों के प्रचलन पर यह तंज कसा था। जाहिर है, उन्हें लगता होगा कि अधिकतर लोग व्यक्तिगत, सामाजिक या राजनैतिक स्तर पर इस विकराल समस्या का ठोस समाधान ढूंढने के बजाय सिर्फ अपने आप को जागरूक दिखाने की होड़ में ऐसा करते हैं। उन्होंने यह बात व्यंग्य में कही हो या संजीदगी से, यह सच है कि वैश्विक समुदाय आज भी इस मसले पर एकजुट नहीं है। तो, क्या निरंतर बढ़ते प्रदूषण के कारण पर्यावरण पर मंडराते खतरे से निपटने की अधिकतर पहल आज भी औपचारिकता मात्र है?

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्घ में जब ग्लेशियर पिघलने लगे, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने लगी, जंगलों को काटकर बेतरतीब बस्तियां बसाई जाने लगीं, तब खतरे की घंटी बजी। यह आशंका घर कर गई कि समुद्री जलस्तर आने वाले वर्षों में इतना बढ़ जाएगा कि कई महानगर सदा के लिए उसकी गोद में समा जाएंगे। ऐसा लगा मानो मानव जाति के लिए अपनी गलतियों का अंजाम भुगतने का समय आ गया है। तब पहली बार व्यापक आवश्यकता महसूस की गई कि दुनिया भर की महाशक्तियों सहित सभी नीति-निर्धारक एकजुट होकर ऐसे कदम उठाएं जिससे वक्त रहते लोगों को सचेत किया जा सके, लेकिन कई दशक बाद भी ऐसा न हो सका।

इसमें दो मत नहीं कि संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर होने वाले तमाम सम्मेलनों से लेकर छोटे कस्बों में स्थानीय निकाय स्तर तक पर्यावरण बचाने के नाम पर अनगिनत प्रयास किए गए। पेड़-पौधे लगाने से लेकर पर्यावरण के लिए अनुकूल ईंधन के उपयोग तक कई सकारात्मक कदम भी उठाए गए। चाहे इसका कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव हो या आमजन की उदासीनता, इन सबका नतीजा सिफर नहीं तो आशा के अनुरूप भी नहीं रहा। औद्योगीकीकरण की अंधी दौड़ की बदौलत विकसित हुए देश पिछड़े और विकासशील देशों पर प्रदूषण फैलाने का ठीकरा फोड़कर अपनी जवाबदेही से मुकरते रहे तो तीसरी दुनिया के मुल्कों में रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरतें पूरी न होने के कारण पर्यावरण कभी बुनियादी मुद्दा बन ही नहीं सका।

जब-जब किसी राष्ट्र के निजी हित का सवाल आया, सबसे पहला समझौता पर्यावरण से किया गया। शायद ही कभी किसी मुल्क की अवाम ने पर्यावरण की अनदेखी के कारण हुक्मरानों को सत्ताच्युत किया हो। हवाई अड्डे, एक्सप्रेस-वे, पुल-पुलिया के निर्माण के लिए हजारों आम, नीम, बरगद और पीपल उखाड़े गए, पर इसके विरोध में इतने स्वर शायद ही कभी उठे कि सरकारों को अविलम्ब संज्ञान लेने को विवश कर सकें।

दरअसल, आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस होने की कीमत हमने नहीं, प्रकृति ने चुकाई है। इसका ठीकरा हम अकसर सत्ताधीशों के मत्थे फोड़ते हैं, और कुछ हद तक यह अनुचित भी नहीं। आखिरकार वे ही तो हमें बताते हैं कि सड़कों को चौड़ा करने के लिए कुछ अमलतास और गुलमोहर के हसीन पेड़ों को जमींदोज किया जाना सामाजिक हित में किया गया कार्य समझा जाएगा। अगर कोई औद्योगिक क्षेत्र बनाने के लिए घने जंगल को उजाड़ दिया जाए तो वहां रह रहे तेंदुओं और लकड़बग्घों से निजात ही मिलेगी। वे ही तो बताते हैं कि कविमन कुछ भी कहे, यथार्थवादी दुनिया में गेहूं ही परिवारों का पोषक है; गुलाब सिर्फ शेरवानियों की शोभा बढ़ा सकता है। इसके बावजूद सिर्फ शासकों और प्रशासकों को पर्यावरण के दूषित होने के लिए जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। आम नागरिक भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं।

शुक्र है, सब ऐसे नहीं हैं। हमारे बीच कई ऐसे निःस्वार्थ लोग हैं जो जल, जंगल और जमीन बचाने की कवायद में ताउम्र लगे रहते हैं। उन्हें न तो किसी सरकारी मदद या तमगे की ख्वाहिश है, न ही किसी विदेशी संस्थान से भारी-भरकम राशि की उम्मीद। उन्हें तो बस प्रकृति से जुनून की हद तक प्रेम है और जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखना उनके जीवन का एकमात्र मकसद है। अगर ऐसा न होता तो कहीं कोई पर्यावरण योद्धा मगरमच्छों को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी क्यों लगा रहा होता? क्यों कोई युवा दंपती विदेश में लाखों की नौकरी छोड़ कर अपने वतन के किसी सुदूर कोने में सुकून का जंगल बसा रहा होता? क्यों कोई जुनूनी सौ बीघा जमीन पर 1.20 लाख पौधे लहलहा रहा होता? और पांच साल में 800 टन कचरा साफ कर पहाड़ों की खूबसूरती को अक्षुण्ण रखने की जद्दोजहद में कोई क्यों जुटा होता?

इस अंक में आप ऐसी ही चुनिंदा शख्सियतों से मिलेंगे जिन्हें यह परवाह नहीं कि उनके मुहिम को अखबारों व टीवी चैनलों में या इतिहास के पन्नों में जगह मिलेगी या नहीं। ये वे बेपरवाह लोग हैं जो सिर्फ पर्यावरण की परवाह कर प्रकृति का ऋण चुका रहे हैं। वे दरिया में अपनी नेकी डालते हैं, कचरा नहीं।

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