प्रथम दृष्टि: खूबसूरती का अधिकार

गिरिधर झा
बरसों से स्थापित सुंदरता के मानक अब अप्रासंगिक हो गए हैं
बरसों से स्थापित सुंदरता के मानक अब अप्रासंगिक हो गए हैं

गिरिधर झा
भारत जैसे विकाशसील देशों की कई युवतियों ने ‘ब्यूटी विथ ब्रेन्स’ के रूप में अपना सिक्का जमाया है

दुनिया में बुद्धिजीवियों की बड़ी जमात और नारीवादी आंदोलनों के प्रणेता सौंदर्य प्रतियोगिताओं को हिकारत भरी नजरों से देखते हैं। उनका मानना है कि मिस यूनिवर्स, मिस वर्ल्ड या मिस इंडिया जैसे आयोजन महिलाओं के लिए अपमानजनक हैं क्योंकि वहां विजेताओं का चयन मूल रूप से उनके शारीरिक सौष्ठव के आधार पर किया जाता है, न कि अन्य गुणों के कारण। इसमें दो मत नहीं कि शुरुआती वर्षों में प्रतिभागियों के चयन के लिए ऐसे मानक होते थे, जिन्हें उस पितृसत्तात्मक समाज ने बनाया था, जहां स्त्रियों को दोयम दर्जा हासिल था। एक स्त्री कितनी सुंदर है, इसका निर्धारण इस बात पर होता था कि वह उन मानकों पर कितनी खरी उतरती है। मसलन, उसकी सूरत कैसी है, उसके नाक-नक्श कैसे हैं, उसका रंग क्या है, उसकी मुस्कान कैसी है, उसकी लंबाई कितनी है और जब वह रैंप पर चलती है तो कितनी आकर्षक दिखती है? कुल मिलाकर सारा जोर दैहिक सुंदरता पर रहता था। जाहिर है, ऐसी प्रतियोगिताओं को आधुनिक समाज में ऐसे मंच की तरह देखा गया, जहां महिलाओं को महज एक नुमाइश की वस्तु के रूप में पेश किया जाता है। ऐसी प्रतियोगिताओं को ऐसा प्रतिगामी कदम माना गया, जो स्त्री सशक्तीकरण की विश्वव्यापी मुहिम के मूल्यों के विरुद्ध था। इसके बावजूद, ऐसी प्रतियोगिता के पैरोकारों की भी कमी नहीं थी।

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में पूंजीवाद और बाजारवाद ने अधिकतर धनाढ्य देशों में अपनी जड़ें जमा ली थीं। कार से लेकर साबुन और यहां तक कि पुरुषों की शेविंग क्रीम तक के विज्ञापनों में स्त्रियों की ग्लैमरस छवि को भुनाया गया। सिनेमा और टेलीविजन की बढ़ती लोकप्रियता ने इस चलन को और बढ़ाया। महिलाओं की सौंदर्य प्रतियोगिताएं धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय होने लगीं और बड़े-बड़े प्रायोजक सामने आने लगे। रंगीन टीवी के प्रादुर्भाव होने तक तो यह अरबों डॉलर की इंडस्ट्री बन गई। इन मंचों पर विजेता घोषित की गई नवयुवतियां रातोरात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेलेब्रिटी के रूप में उभर कर आईं। ग्लैमर के दम पर मिली सफलता ने उन्हें शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचाया। उनमें कोई मशहूर अभिनेत्री बन गई तो कोई सुपरमॉडल। लेकिन इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा। उनकी सफलता का सारा श्रेय उनकी शारीरिक खूबसूरती को दिया गया, न कि अन्य गुणों को। विश्व सुंदरी का खिताब जीतने के बावजूद उन्हें मंदबुद्धि समझा गया और आम धारणा बन गई कि उनमें कोई अन्य विशिष्टता हो ही नहीं सकती। यह नि:संदेह स्त्री-विरोधी सोच का परिणाम था, क्योंकि उनमें से कई बेहद प्रतिभाशाली युवतियां थीं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी काबिलियत को सिद्ध किया था। उनमें से कई डॉक्टर बनीं तो किसी ने उच्च शिक्षा ग्रहण कर उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में अपना लोहा मनवाया।

आज के दौर में ऐसी प्रतियोगिताओं में शामिल होने वाली अधिकतर प्रतिभागी महज ग्लैमर के चकाचौंध से प्रभावित होने वाली युवतियां नहीं होती हैं। उनके लिए यह उनकी नुमाइश का प्लेटफॉर्म मात्र नहीं होता, बल्कि उन्हें अपने आप को साबित करने का वैसा ही प्रभावशाली मंच होता है, जैसा किसी अन्य क्षेत्र में किसी महत्वाकांक्षी युवती को अपना करियर बनाने के दौरान मिलता है। सौंदर्य प्रतियोगिताओं में मिलने वाली सफलता फिल्म या मॉडलिंग की दुनिया में प्रवेश करने के लिए मार्ग प्रशस्त करने का माकूल जरिया भी है। इसलिए तमाम आलोचनाओं के बावजूद, इन प्रतियोगिताओं में प्रवेश करने वाली युवतियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। भारत जैसे विकासशील देशों में ये हजारों ख्वाबों को साकार करने का माध्यम हैं। पिछले वर्ष मुंबई में रह रहे उत्तर प्रदेश के एक छोटे कस्बे से आए एक टैक्सी चालक की बेटी का मिस इंडिया प्रतियोगिता में प्रथम रनर-अप बनना अपने आप में इस बात की मिसाल है कि ये महज शारीरिक सौष्ठव के आधार पर सुंदरियों के चयन के मंच नहीं हैं बल्कि यह छोटे-छोटे शहरों से आने वाली प्रतिभागियों के लिए बड़े-बड़े सपने साकार करने का भी जरिया है।

सौंदर्य प्रतियोगिताओं का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में बदला है। हालांकि आज भी इन पर लग रहे रंग, नस्ल और क्षेत्रवाद जैसे आरोप पूरी तरह से खारिज नहीं किए जा सकते, लेकिन बरसों से स्थापित सुंदरता के मानक अब अप्रासंगिक हो गए हैं। वैश्विक प्रतियोगिताओं में पाश्चात्य देशों का आधिपत्य समाप्त हो चुका है। भारत जैसे विकाशसील देशों की कई युवतियों ने ‘ब्यूटी विथ ब्रेन्स’ के रूप में अपना सिक्का जमाया है। सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय से लेकर मानुषी छिल्लर और हरनाज कौर संधू तक कई विश्व सुंदरियों ने सिद्ध किया है कि उनमें वे तमाम गुण हैं जो किसी भी आधुनिक, प्रगतिशील महिला में होने चाहिए। इसलिए ऐसी सौंदर्य प्रतियोगितयों को नए नजरिए से देखने की जरूरत है। हर प्रतिभागी को बीसवीं सदी के चश्मे से देखना पुराने पूर्वाग्रहों को रेखांकित करने जैसा होगा। आज जब हर किसी को अपना करियर चुनने की मौलिक स्वतंत्रता है, किसी का उनके प्रति ‘जजमेंटल’ होना नई सहस्राब्दी के स्थापित उसूलों के खिलाफ होगा।

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