प्रथम दृष्टि : बिहार होने का दंश

गिरिधर झा
फोटो- ब्लूमबर्ग
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गिरिधर झा
नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट में विकास मानकों पर बिहार फिर फिसड्डी निकला। नए आंकड़ों के बाद इस दिशा में कुछ तो पहल हो, वरना बिहार बीमारू ही बना रहेगा और वही घिसी-पिटी कहानी दुहराई जाती रहेगी

हाल में जारी नीति आयोग के ‘सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) भारत सूचकांक 2020-21’ में बिहार सबसे निचले पायदान पर है। यह सूचकांक आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा और अन्य मानकों पर विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की प्रगति का मूल्यांकन करता है। ताजा रैंकिंग में केरल 75 अंकों के साथ प्रथम स्थान पर है, 74 अंकों के साथ हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु संयुक्त रूप से दूसरे स्थान पर हैं। बिहार 52 और झारखंड 56 अंकों के साथ अंतिम दो स्थानों पर हैं। 15 नवंबर 2000 तक झारखंड अविभाजित बिहार का ही अंग था। बिहार तब भी विकास के पैमानों पर फिसड्डी राज्यों के सूची में पहले स्थान पर था, और अगर नीति आयोग की नई रिपोर्ट को आधार मानें तो बीस वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी राज्य की स्थिति जस की तस है।

दरअसल, पिछले कई दशकों से बिहार की गिनती बीमारू प्रदेश के रूप में होती रही है। इसका स्थान किसी भी विकास सूचकांक में हमेशा वैसा ही रहा जैसा भारत का स्थान ओलंपिक की पदक तालिका में अमूमन रहता है। ओलंपिक में तो कभी-कभार हॉकी, टेनिस या कुश्ती में पदक लेकर भारत एक छलांग लगा भी लेता है, लेकिन बिहार का अंतिम पायदान पर रहना मानो उसकी नियति बन गई है। शायद यही कारण है कि नीति आयोग की नई रिपोर्ट ने न किसी को चौंकाया, न ही प्रदेश के बाहर किसी ने इस पर कोई सवाल उठाया। बिहार का पिछड़े प्रदेशों की श्रेणी में अव्वल आना उतना ही सामान्य लगता है, जितना रॉजर फेडरर का विंबलडन और राफेल नडाल का फ्रेंच ओपन जीतना। यह इतना सामान्य हो गया है कि मीडिया में भी इसके प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। इसके लिए उसकी आलोचना भी नहीं की जा सकती। नीति आयोग की रिपोर्ट में कोई नयापन तो है नहीं। खबर तो तब बनती है जब बिहार अग्रणी और विकसित प्रदेशों में शुमार हो जाए। फिसड्डी बिहार पर बनी सुर्खियों में किसकी दिलचस्पी हो सकती है! उसकी हालत उस कमजोर विद्यार्थी जैसी हो गई है, जिसे हर परीक्षा में अनुतीर्ण होकर एक ही कक्षा में साल दर साल टिके रहना है। 

आखिर ऐसी स्थिति क्यों आई? आजादी के बाद बिहार की गिनती देश के सबसे बेहतर प्रशासित राज्य के रूप में होती थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, यह विकास के सभी मानकों पर देश के बाकी राज्यों से पीछे छूटता चला गया। कभी इसका कारण सामंतवाद बताया गया, कभी भूमि सुधार कानून का लागू न होना, कभी व्यवस्था में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार, कभी जातिवाद, कभी लचर कानून-व्यवस्था, कभी बिजली-सड़क का न होना और कभी बाढ़-सुखाड़। इसमें दो मत नहीं कि बिहार वर्षों तक इन समस्याओं से जूझता रहा, लेकिन ऐसा करने वाला वह इकलौता राज्य नहीं था। ऐसी ही समस्याओं से लड़ते हुए कई ‘बीमारू’ राज्य प्रगति के पथ पर बिहार से मीलों आगे निकल गए।

बिहार के पिछड़ापन के मूल कारण राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव और बदलती सरकारों की अदूरदर्शी नीतियां रही हैं। कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि आजादी के बाद केंद्र सरकार की रेल भाड़ा समानीकरण नीति के कारण राज्य में प्रचुर मात्रा में खनिज उपलब्ध होने के बावजूद यहां उद्योग-धंधे स्थापित नहीं हो पाए। उन दिनों उद्योगपतियों को देश भर में एक ही दर पर कहीं भी कच्चे माल को ढोने की सुविधा उपलब्ध थी, उन्होंने बिहार जैसे ‘लैंड लॉक्ड’ राज्य की बजाय ऐसे बड़े शहरों में अपने कल-कारखाने स्थापित किये जहां बंदरगाह सहित अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध थीं। इस नीति का ध्येय हालांकि देश को समान रूप से विकसित करना था, लेकिन हुआ इसका उलटा। इसके कारण देश की विकास यात्रा में ऐसा प्रादेशिक असंतुलन हुआ जिससे विकसित राज्य और विकसित होते चले गए और पिछड़े राज्य और पिछड़े। इन्हीं सब कारणों से नीतीश कुमार सरकार ने 2006 में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग विधानसभा और विधान परिषद से पारित करवा कर केंद्र को भेजी, लेकिन वह दर्जा राज्य को विभिन्न मानकों का हवाला देकर नहीं दिया गया, जिससे वह अपने यहां टैक्स की छूट जैसी सुविधाएं देकर निवेश के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार कर सकता। 

नीति आयोग की रिपोर्ट से बिहार में फिर से विशेष राज्य का दर्जा की मांग तूल पकड़ गई है। इसकी वजह चाहे सियासी हो या कुछ और, नीति निर्धारकों को यह सोचना ही पड़ेगा कि बिहार को आगे बढ़ाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा सकते हैं? क्या कारण है कि जिस राज्य ने पिछले कुछ वर्षों में लगातार दस प्रतिशत से अधिक की विकास दर हासिल की, वह अब भी सबसे पिछड़ा है? जिस प्रदेश में देश की नौ-दस प्रतिशत आबादी रहती है, उसे उसके हाल पर और नहीं छोड़ा जा सकता। जब तक राजनीति से इतर, बिहार जैसे राज्यों को विकसित करने के लिए केंद्र और प्रदेश सरकारें मिलकर गंभीर प्रयास नहीं करेंगी, देश के सर्वांगीण विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। नए आंकड़ों के आने के बाद इस दिशा में कुछ तो पहल हो, वरना विकास सूचकांक की वही घिसी-पिटी कहानी दुहराई जाती रहेगी और बिहार को बीमारू ही बनकर रहना पड़ेगा।

 

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