प्रथम दृष्टि: हम शर्मिंदा हैं!

गिरिधर झा
गिरिधर झा
गिरिधर झा

गिरिधर झा
क्या हम इस अदृश्य खतरे के प्रति लापरवाह हो गए थे या हमारे पास इससे निपटने के पर्याप्त साधन नहीं थे? इन बातों का निष्पक्ष मूल्यांकन तब होगा जब हम इस महामारी से उबर चुके होंगे। फिलहाल हमें एकजुट होकर इससे लड़ना और जीतना है। हम जीतेंगे

महामारी कोरोना की कुछ तस्वीरें लंबे समय तक विचलित करने वाली हैं। हम उन्हें तकनीक की मदद से धुंधला नहीं कर सकते। करना भी नहीं चाहिए। ये हमारे-आपके जीवन से जुड़े इस दौर के वैसे चित्र हैं, जो हजार शब्दों की खबरों से कहीं ज्यादा बता जाते हैं। श्मशान में धधकती चिताओं की शृंखला, बाहर परिजनों के निष्प्राण शरीर लिए बेबस लोगों की लंबी कतार, हर पल गुजरती एंबुलेंस का दिल दहलाने वाला सायरन, अस्पतालों में उमड़ी भीड़, इस उम्मीद में कि सांस टूटने के पहले उनके प्रियजन को एक बेड मिल जाए, कैसे भी कोई वेंटिलेटर का इंतजाम कर दे, या एक ऑक्सीजन सिलिंडर ही दिला दे, ताकि जान बच सके। कहीं भी इलाज हो सके, घर में या बाहर, कार में, ठेले पर, चलती मोटरसाइकिल पर, फुटपाथ किनारे। कहीं एक बदहवास महिला ऑटोरिक्शा में अपने बेसुध पड़े पति को बचाने के लिए मुंह से मुंह में सांस देती हुई। कहीं एक मां के सामने उसका अबोध पुत्र अचेत गिरा हुआ।

ये दृश्य हमें भले ही ताउम्र विचलित करें, इन्हें अपनी स्मृतियों से हमें तब तक ओझल नहीं होने देना चाहिए, जब तक हमें इस बात का एहसास न हो जाए कि कथित प्रगति के पथ पर निर्बाध गति से बढ़ते हुए हमारे जीवन की प्राथमिकताएं पीछे क्यों रह गईं? कोरोनावायरस की वैश्विक महामारी को हम आज नहीं, तो कल परास्त कर देंगे, लेकिन ये तस्वीरें हमें स्मरण कराएंगी कि कैसे चंद निहित स्वार्थी तत्वों ने हर सांस की कीमत तय की, कैसे पल्स ऑक्सीमीटर और ऑक्सीजन सिलिंडर से लेकर प्राणरक्षक दवाओं की कालाबाजारी हुई, कुछ किलोमीटर के लिए एंबुलेंस का भाड़ा हजारों में वसूला गया और निजी अस्पतालों में वेंटिलेटर पर इलाज का खर्च लाखों में पहुंच गया। यहीं नहीं, पार्थिव शरीर के एंबुलेंस में रखने से लेकर शवदाह गृह में उतारने तक की कीमत मांगी गई। न सिर्फ अंतिम यात्रा में कंधा देने के लिए, बल्कि परिजनों को प्लास्टिक में लिपटे मृतक के अंतिम दर्शन कराने के एवज में पैसे वसूले गए। मानो कुछ लोगों के लिए मौत का तांडव भी मुनाफे का धंधा बन गया हो।

लेकिन क्या इस त्रासदी का यही एक मंजर है, जो हमें हर ओर दिख रहा है? क्या मानवीय संवेदनाएं इतनी मृत हो गई हैं कि हमें हताशा और निराशा की लंबी, अंधेरी सुरंग में उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती है? शुक्र है, इस परीक्षा की घड़ी में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जिन्होंने मानवता की नि:स्वार्थ सेवा के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया। किसी गुरुद्वारे ने ऑक्सीजन लंगर की व्यवस्था कर दी ताकि लोगों को अस्पताल में बेड मिलने तक उनकी सांसें महफूज रहें। कहीं कोई अपनी कार को एंबुलेंस बनाकर मरीजों को अस्पताल पहुंचाता रहा तो कोई अपने ऑटोरिक्शा को। किसी ने अनजान लोगों की जान बचाने के लिए अपनी महंगी गाड़ी बेचकर ऑक्सीजन सिलिंडर खरीदा तो कोई अपने बचपन के दोस्त को मौत के मुंह से बाहर लाने के लिए 1300 किलोमीटर की यात्रा कर सिलिंडर साथ लेकर पहुंचा।

देश में ऐसे नेकदिल इनसानों की संख्या वैसे तत्वों से कहीं ज्यादा है, जो इस कठिन दौर में निजी स्वार्थ के लिए आपदा को 'अवसर' में बदलते रहे। वैसे लोग जो मरीजों और उनके परिवार के अन्य सदस्यों के लिए सुबह-शाम खाने-पीने और दवाइयों की व्यवस्था करते रहे। सोशल मीडिया पर प्लाज्मा के लिए एक मदद की गुहार सुनते हजारों मदद के हाथ खड़े हुए। कोरोनो संक्रमित एक गर्भवती महिला, जिसके ट्विटर पर मात्र दस-पंद्रह फोलोवर थे, की सहायता के लिए हजारों लोग आगे आए। ऐसे लोगों के साथ देश भर के लाखों चिकित्सक और अन्य स्वास्थ्यकर्मी घड़ी की सुइयों को देखे बगैर मरीजों की सेवा में दिन-रात जुटे रहे। ये सब ऐसे महामानव साबित हुए, जिन्होंने मानवता में हमारा विश्वास बढ़ाया और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हमें भरोसा दिलाया कि हम इस मुश्किल दौर से जल्द निकलेंगे।

हमें उन जियालों को भी याद रखना होगा जिनके कोविड-19 से लड़ते हुए हौसले बुलंद रहे। उखड़ती सांसों के बावजूद उन्होंने उम्मीद और आत्मविश्वास नहीं खोया और आश्वस्त किया कि हर रात की सुबह होती है। अस्पताल के बिस्तर पर इलाजरत एक युवक का प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करना हमें ऐसी सैकड़ों चुनौतियों को दिलेरी के साथ सामना करने का संबल दे गया।

यह सच है कि आपदा कहकर नहीं आती। कोविड-19 ने पिछले वर्ष अचानक धावा बोला, और कुछ ही दिनों में विकसित देशों की स्वास्थ्य व्यवस्था को भी लचर बना दिया। इस बार कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन ज्यादा खतरनाक रूप में सामने आए और देखते ही देखते महामारी विकराल त्रासदी बन गई। अभी यह सोचने का वक्त नहीं है कि यह सब कैसे हुआ? क्या हम इस अदृश्य खतरे के प्रति लापरवाह हो गए या हमारे पास इससे निपटने के पर्याप्त साधन नहीं थे? इन बातों का निष्पक्ष मूल्यांकन तब होगा जब हम इस महामारी से उबर चुके होंगे। फिलहाल हमें एकजुट होकर इससे लड़ना और जीतना है। हम जीतेंगे।

 

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