प्रथम दृष्टि: कोई चुनाव छोटा नहीं

गिरिधर झा
हैदराबाद में एक चुनावी रैली में अमित शाह
हैदराबाद में एक चुनावी रैली में अमित शाह

गिरिधर झा
चुनाव में जीत- हार तो लोकतंत्र का एक पहलू है

कोई भी चुनावी जंग छोटी या बड़ी नहीं होती है। इतिहास में ऐसे दृष्टांतों की कमी नहीं जब छोटी समझी जानी वाली लड़ाइयों के दूरगामी राजनैतिक और भौगोलिक परिणाम हुए। सियासत में भी अक्सर ऐसा होता है। एक सक्रिय दल को किसी चुनाव की अहमियत को बिना किसी पूर्व आकलन के गंभीरता से न लेने के कारण बाद में बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। हाल ही में संपन्न हुए हैदराबाद नगर निगम के चुनावों को अधिकतर पार्टियों ने महज स्थानीय निकाय स्तर का समझा, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इसे उसी गंभीरता से लिया जितनी संजीदगी से वह आम चुनावों को लेती है। अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित इसके कई शीर्ष नेता चुनाव प्रचार में शामिल हुए। नतीजा चार वर्ष पूर्व जो पार्टी मात्र चार सीट जीत पाई थी, उसने 48 सीटों पर अपना परचम लहराया है। हैदराबाद में यह आसान न था, जहां तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), कांग्रेस, तेलुगू देशम पार्टी और एआइएमआइएम जैसी पार्टियां वर्षों से जड़ जमाए हुए हैं।

आखिर इस चुनाव में क्या था, जिसके कारण भाजपा ने अपना पूरा दमखम लगाया। दरअसल, हैदराबाद के स्थानीय चुनाव पार्टी के लिए दक्षिण भारत में व्यापक स्तर पर अपनी पैठ बनाने का एक छोटा सा अवसर था, जिसे बड़ा बनाने में वह कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती थी। अपनी स्थापना के चार दशक बीतने के बाद भी भाजपा कर्नाटक को छोड़ दक्षिण के प्रांतों में अपने कदम नहीं जमा पाई है। नगर निगम ही सही, तेलंगाना के चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन भाजपा का दक्षिण भारत की राजनीति में अपना वजूद स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम लगता है। तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश को भाजपा के लिए ‘लास्ट फ्रंटियर’ समझा जाता रहा है, जिसे उसके लिए जीतना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन समझा जाता था। आम तौर पर वहां पार्टी की हिंदुत्व विचारधारा अब तक कारगार नहीं हो पाई है। हालांकि कुछ महीनों पूर्व तक कुछ ऐसा ही पश्चिम बंगाल के बारे में भी समझा जाता था, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने इस अभेद्य समझे जाने वाले किले में नई जगह बनाई। वहां पार्टी के अभूतपूर्व प्रदर्शन के बाद यह साबित हो गया कि निरंतर मिलती विफलता के बावजूद अपने लक्ष्य के प्राप्ति के लिए सजग रहना सियासत में आगे बढ़ने की पहली शर्त है। भले ही यह आसान न हो, एक राष्ट्रीय दल के रूप में भाजपा के लिए अब यह आवश्यक है कि वह दक्षिण भारतीय प्रदेशों में भी उपस्थिति दर्ज कराए। यह तभी संभव है जब स्थानीय स्तर पर इसका संगठन उतना ही मज़बूत हो, जितना यह हिंदीभाषी प्रदेशों में है।  

विपक्ष के ध्रुवीकरण की राजनीति के आरोपों से इतर अगर देखा जाए तो वहां भाजपा का संगठन कांग्रेस और अन्य दलों से मजबूत दिखता है। बूथ स्तर पर इसके जमीनी कार्यकर्ता काम करते दिखते हैं। हाल ही हुए बिहार विधानसभा चुनाव के पूर्व एक आतंरिक सर्वे के दौरान पार्टी को पता चल गया था कि इस बार नीतीश कुमार सरकार के खिलाफ ‘एंटी-इन्कम्बेंसी’ है। इसके बाद उम्मीदवारों के चयन से लेकर बाकी सारी रणनीति इसी आधार पर तय की गई। इतना ही नहीं, आम कार्यकर्ता से लेकर प्रधानमंत्री सहित पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने चुनावी रण में पसीने बहाने से गुरेज नहीं किया।

दूसरी ओर, कांग्रेस जैसी दूसरी राष्ट्रीय पार्टियों में कई खामियां दिखती हैं। लोकसभा चुनाव को छोड़ दें तो अब भी उनके शीर्ष नेता चुनावों में पूरी शक्ति झोंकने से परहेज करते दिखते हैं। बिहार चुनावों में राहुल गांधी ने सिर्फ छह सभाएं कीं, जबकि प्रियंका गांधी ने एक भी नहीं। पार्टी के 243 में 70 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद महागठबंधन के प्रचार का पूरा दारोमदार राष्ट्रीय जनता दल के युवा नेता तेजस्वी प्रसाद यादव के कंधों पर ही रहा। कांटे की टक्कर के बाद जब चुनाव परिणाम अंततः एनडीए के पक्ष में आए तो कुछ राजद नेताओं ने राहुल गांधी पर उदासीनता और अपेक्षित मेहनत न करने का आरोप लगाया। लेकिन इस हार से भी शायद कोई सबक नहीं लिया गया। पिछले महीने हुए कई राज्यों में उपचुनावों में भी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने शिरकत नहीं की। उनमें मध्य प्रदेश भी शामिल था जहां 28 विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर थी, क्योंकि उसके कई विधायक दलबदल कर भाजपा में आ गए थे।      

इसके विपरीत, भाजपा ने प्रधानमंत्री को छोड़ अपने कई बड़े नेताओं को हैदराबाद नगर निगम के चुनाव अभियान में उतारा। इसके लिए पार्टी को विरोधियों के व्यंग-बाण भी झेलने पड़े, खासकर उनसे जिनके लिए बड़े नेताओं का तथाकथित छोटे चुनावों में प्रचार करना प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं माना जाता। चुनाव जीतना और हारना तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक पहलू है और हर दल को अपनी जीवंतता बनाए रखने के लिए पूरे दमखम से इसमें शामिल होना जरूरी है, चाहे वह संसदीय चुनाव हो या स्थानीय निकाय का। हैदराबाद से आए इसी संदेश को विपक्ष को समझने की आवश्यकता है।

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