सवालों के बिना लोकतंत्र

राजेंद्र धोड़पकर
सवालों के बगैर लोकतंत्र
सवालों के बगैर लोकतंत्र

राजेंद्र धोड़पकर
अब अपने देश में होता यह है कि सरकार किसी बात का जवाब नहीं देती और जनता किसी बात पर सवाल नहीं उठाती

यह देश गजब हो गया है। हम लोग बहुत पहले से मानते थे कि लोकतंत्र में जनता का कर्तव्य होता है कि वह सरकार से सवाल करे और सरकार का कर्तव्य होता है, वह जनता को जवाब दे। जिन देशों में यह सवाल-जवाब की प्रक्रिया नहीं होती वहां तानाशाही होती है। अपने देश में भी यह सवाल-जवाब का कार्यक्रम बदस्तूर चलता रहा। हम जैसे लोगों को इसमें कुछ ज्यादा रुचि थी, सो हम पत्रकार हो गए। अब सोच रहे हैं कि यह क्या कर लिया।

अब अपने देश में होता यह है कि सरकार किसी बात का जवाब नहीं देती और जनता किसी बात पर सवाल नहीं उठाती। पहले पेट्रोल और डीजल महंगे होते थे तो लोग हाहाकार मचा देते थे। अब पेट्रोल और डीजल महंगे होते चले जाते हैं तो जनता खुद ही बताती है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बढ़ गए हैं इसलिए ऐसा हो रहा है। अब सरकार बेचारी क्या कर सकती है। अगर कोई सवाल पूछता भी है तो सरकार जवाब नहीं देती। अचानक भीड़ चिल्ला उठती है, “देखो यह देशद्रोही, सवाल पूछता है।” अगर यह नुस्खा स्कूलों-कॉलेजों में लागू हो जाए तो शिक्षा की बची-खुची मिट्टी भी पलीद हो जाए। वहां अगर शिक्षक सवाल पूछें तो छात्र उन्हें देशद्रोही करार दे डालें और छात्र सवाल पूछें तो शिक्षक उन्हें। हो सकता है भविष्य में परीक्षा के प्रश्नपत्र बनाने को ही देशद्रोह मान लिया जाए।

देश में वाहनों की बिक्री कम हो रही है और किसी से इस विषय पर बात नहीं कर सकते। किसी से बात करो तो हो सकता है वह बताए कि आयुष्मान भारत योजना से लोग इतने स्वस्थ और शक्तिशाली हो गए हैं कि खुद ही सौ किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ कर एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाते हैं, तो फिर कारों की जरूरत ही क्या है? जब बेरोजगारी की बात हुई तो एक अर्थशास्‍त्री ने बताया कि यह तरक्की का लक्षण है। बेरोजगारी बढ़ने का मतलब है कि लोग रोजगार खोज रहे हैं ताकि उनका जीवन-स्तर बेहतर हो सके। पहले लोग रोजगार खोजते ही नहीं थे इसलिए बेरोजगारी कम दिखती थी।

इस तरह के जवाब भी सरकार नहीं देती, सवाल पूछने वाले जो थोड़े से लोग हैं उनसे जनता ही निपट लेती है। किसी बेरोजगार नौजवान से रोगजार की लेकर बात करो तो वह कहता है, “धारा 370।” किसी छात्र के सामने शिक्षा की बदहाली पर चिंता व्यक्त करो तो वह कहता है, “पाकिस्तान।” किसी व्यापारी से आर्थिक मंदी की बात करो तो वह कहता है, “ट्रिपल तलाक।” बाढ़ में गले तक डूबे किसी आदमी से बाढ़ राहत की बात करो तो वह कहता है, “गोरक्षा।” किसी से राजनीति के गिरते स्तर की बात करो तो कहता है, “पाकिस्तान जाओ।”

ज्यादातर वे लोग इस दुनिया से जा चुके हैं जिन्होंने अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ी थी ताकि हम अपने लोगों के लिए एक ऐसी व्यवस्था बना सकें जिसमें सरकार जनता के प्रति जवाबदेह हो, जनता को सवाल पूछने का हक हो और सरकार के लिए जवाब देना जरूरी हो। उन्हें क्या पता था कि आजादी के सत्तर साल बाद एक ऐसी व्यवस्था होगी जहां सरकार से सवाल पूछना अपराध माना जाएगा।

लेकिन यह जान लेना चाहिए कि जिस लोकतंत्र में सवाल नहीं पूछे जाते वहां एक सवाल हवा में लगातार मंडराता रहता है, वह अंधेरा गड्ढा कहां है जिसमें आखिरकार जाकर गिरना है?

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