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दिल्ली यूनिवर्सिटीः परमानेंट नहीं, गेस्ट टीचर लाओ

यूनिवर्सिटी की रैंकिंग घटी लेकिन प्राथमिकता यह है कि जहां परमानेंट पोस्ट खाली हैं, वहां गेस्ट फैकल्टी से काम चलाया जाए
दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी

टाइम्स हायर एजुकेशन ने 11 सितंबर को जो वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2020 जारी की, उसमें देश की एक भी यूनिवर्सिटी दुनिया के शीर्ष 300 विश्वविद्यालयों की सूची में जगह नहीं बना पाई। हमारे विश्वविद्यालयों की रैंकिंग हाल के वर्षों किस कदर फिसल रही है, इसकी एक मिसाल है देश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी में से एक दिल्ली यूनिवर्सिटी। नेशनल इंस्टीट्यूट रैंकिंग फ्रेमवर्क की 2018 की रैंकिंग में 7वें स्थान पर रहने वाली दिल्ली यूनिवर्सिटी 2019 में फिसलकर 13वें पायदान पर आ गई। इसकी रैंकिंग और शैक्षणिक गुणवत्ता में गिरावट की तो कई व्याख्याएं हो सकती हैं, लेकिन सबसे बड़ी हकीकत यह है कि यहां परमानेंट फैकल्टी की संख्या लगातार घटती जा रही है। नई भर्तियां बंद हैं और जो भी भर्तियां हो रही हैं, वह सिर्फ गेस्ट फैकल्टी की हैं। आलम यह है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में कई विभाग गेस्ट फैकल्टी के भरोसे ही चल रहे हैं। यूनिवर्सिटी की अकादमिक काउंसिल के पूर्व सदस्य समरेंद्र कुमार बताते हैं, “विवेकानंद कॉलेज के कंप्यूटर साइंस विभाग में कोई परमानेंट टीचर ही नहीं है।”

दिल्ली यूनिवर्सिटी के सारे कॉलेजों में लगभग 10,500 फैकल्टी का प्रावधान है। इनमें आज की तारीख में स्थायी फैकल्टी की संख्या 50 फीसदी से भी कम है। दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डुटा) के अध्यक्ष राजीब रे का कहना है विश्वविद्यालय के कुल फैकल्टी में लगभग 3900 एड-हॉक टीचर हैं, जबकि गेस्ट टीचर्स की संख्या 1500 के आसपास है। एक आंकड़े के मुताबिक, दिल्ली यूनिवर्सिटी में परमानेंट फैकल्टी की लगभग 4000 जगह खाली है। समरेंद्र कुमार बताते हैं, “आखिरी बार परमानेंट नियुक्ति 2014-15 में हुई थी। डिमार्टमेंट स्तर पर बात करें, तो 2018 में लॉ फैकल्टी में कुछ नियुक्तियां हुईं। दौलतराम कॉलेज में एक विभाग में 2018 में नियुक्त हुई थी।”

जनवरी 2019 में अकादमिक काउंसिल की बैठक में एक ऑर्डिनेंस पास किया गया, जिसमें परमानेंट की जगह कॉन्ट्रैक्ट टीचर्स की नियुक्ति पर जोर दिया गया है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में तीन तरह के फैकल्टी हैं- परमानेंट, टेंपोरेरी और एड-हॉक। गेस्ट टीचर की नियुक्ति उन मामलों में होती थी, जब तत्काल और कम अवधि जैसे 15 दिन या 30 दिन के लिए या फिर स्पेशलाइज्ड फैकल्टी की जरूरत होती थी। इसके लिए प्रावधान यह है कि अगर चार महीने से ज्यादा के लिए नियुक्ति की जाती है, तो वह परमानेंट या टेंपोरेरी होगी।

यूनिवर्सिटी की एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य राजेश झा का कहना है कि एडहॉकिज्म को बढ़ावा देने के लिए जानबूझ कर परमानेंट नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं। वे कहते हैं, “प्राइवेट यूनिवर्सिटी को बढ़ावा दिया जा रहा है। उसके लिए नीतियां बनाई जा रही हैं, जबकि दूसरी तरफ हमारी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के लिए ऐसा किया जा रहा है कि यहां न सिलेबस ढंग से बन पाया है, गुणवत्ता गिर रही है, न दाखिला ठीक से होता है। अब तो एडहॉक की जगह गेस्ट टीचर्स की नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया गया।” यूनिवर्सिटी के मुताबिक, वे परमानेंट फैकल्टी की नियुक्ति नहीं कर सकते, क्योंकि यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में शिक्षकों में आरक्षण की गणना संबंधी मामले को लेकर नियुक्तियों पर रोक लगा दी थी। विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “पिछले साल की शुरुआत में लॉ फैकल्टी और डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन में 145 टीचरों की नियुक्तियां की गई थीं।” 28 अगस्त 2019 को एक लेटर जारी कर सभी कॉलेजों और विभागों को गेस्ट टीचर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया, जिसके बाद यह प्रक्रिया शुरू भी हो गई, लेकिन एकेडमिक्स फॉर एक्शन ऐंड डेवलपमेंट (एएडी) ने इस पर विरोध जताया।

यूनिवर्सिटी की नीतियों के खिलाफ आंदोलित शिक्षक

गेस्ट फैकल्टी की बदहाल स्थिति

दिल्ली विश्वविद्यालय के श्यामलाल कॉलेज में एड-हॉक (अस्थायी) टीचर अवनीश मिश्र बताते हैं कि उन्होंने लगभग छह साल पहले बतौर एडहॉक करिअर शुरू किया था। आज भी उनकी हालत छह साल पहले जैसी है। न तो कोई इंक्रीमेंट और न ही परमानेंट का आश्वासन।

वे बताते हैं, “हमें तो पता भी नहीं रहता कि अगले सत्र में हमारा कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू होगा भी या नहीं। सरकार को कम पैसे में शिक्षक मिल जा रहे हैं, तो फिर वह स्थायी शिक्षकों की नियुक्तियां क्यों करेगी?” वे बताते हैं कि एक स्थायी शिक्षक की सैलरी तीन गेस्ट टीचर्स के बराबर है और ऊपर से स्थायी शिक्षकों को मिलने वाली तमाम सुविधाएं और भत्ते भी गेस्ट टीचर्स को नहीं देने पड़ते हैं। इसके अलावा परमानेंट टीचर्स को ईएल, फिक्स सैलरी, एलटीसी और छुट्टी का मानदेय मिलता है, जबकि गेस्ट टीचर एक दिहाड़ी मजदूर की तरह काम करता है, उसे ये तमाम सुविधाएं नहीं मिलती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में ही असिस्टेंट प्रोफेसर उमाशंकर चौधरी कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सबसे पहला अंतर यह पड़ता है कि परमानेंट फैकल्टी के पास एक जिम्मेदारी होती है। गेस्ट फैकल्टी की नियुक्ति एक तय सेमेस्टर के लिए होती है। उसके खत्म होने के बाद वे चले जाते हैं। इससे सत्र के अंत में हमें इंटरनल असेसमेंट तैयार करना पड़ता है। ऐसे में किसी भी बात के लिए उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। दूसरे, बात सिर्फ पढ़ाई की नहीं है। इसके अलावा भी कॉलेजों में शैक्षणिक गतिविधियां होती हैं, जिससे सीधा संपर्क गेस्ट फैकल्टी का नहीं होता है। उमाशंकर चौधरी बताते हैं, “कुछ बातें गोपनीय भी होती हैं, जिसे हम एड-हॉक से साझा नहीं कर पाते हैं। यह बड़ी दिक्कत होती है। ऐसे देखने से तो लगता है कि पर्याप्त फैकल्टी हैं, लेकिन शैक्षणिक स्तर पर यह महज दिखावा ही होता है।”

परमानेंट नियुक्ति खत्म !

इसी साल जनवरी में यूजीसी ने गेस्ट फैकल्टी की नियुक्ति के लिए चयन समिति बनाने के लिए गाइडलाइन जारी की। इसका डुटा की तरफ से काफी विरोध किया गया। इस बाबत डुटा ने जुलाई में यूजीसी चेयरमैन डी.पी. सिंह को पत्र भी लिखा। उनका तर्क है कि नई गाइडलाइन से तो ऐसा लगता है कि परमानेंट पोस्ट को पूरी तरह खत्म करने की तैयारी है। उन्होंने अप्रैल में दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर योगेश त्यागी को भी पत्र लिखा। जब इस बाबत आउटलुक ने वीसी ऑफिस से संपर्क किया, तो वहां से इस मामले को रजिस्ट्रार ऑफिस भेज दिया गया। हमने रजिस्ट्रार ऑफिस में संपर्क किया, लेकिन उनकी तरफ से टालमटोल का रवैया अपनाया गया और हमें कोई जवाब नहीं मिला।

दांव पर अकादमिक करिअर

एडहॉक या गेस्ट टीचर का पे-स्केल काफी कम होता है। श्यामलाल कॉलेज में एडहॉक फैकल्टी अवनीश मिश्र का कहना है कि चार महीने की नियुक्ति के दौरान किसी भी महीने 50 हजार से अधिक का बिल नहीं बनाया जाता है। उन्हें न तो मेडिकल सुविधाएं मिलती हैं और न ही छुट्टियों वगैरह के पैसे मिलते हैं। एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य राजेश झा का कहना है कि अगर आप टीचर को कम पैसे देंगे, तो इस प्रोफेशन के प्रति कौन आकर्षित होगा। पहले ही टीचिंग में टैलेंट को आकर्षित करना मुश्किल हो गया था। अब और मुश्किल हो जाएगा।

समरेंद्र कुमार कहते हैं कि परमानेंट टीचर अकादमिक रूप से कॉलेज में केंद्रित होता है। जॉब सिक्योरिटी होने पर वह बच्चों को अधिक समय देता है। साथ में अकादमिक काम जैसे पढ़ने-लिखने और शोध वगैरह कर सकता है। गेस्ट टीचर को लगता है कि उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है। उसे कभी भी हटाया जा सकता है। इस कारण वह अपने भविष्य के बारे में तय नहीं कर पाता। वे कहते हैं, “सरकार की जो नीति है, वह निजीकरण की ओर जा रही है। नई शिक्षा नीति में टेन्योरशिप की बात की जा रही है यानी नियुक्ति खास समय के लिए होगी। यूनिवर्सिटी की तरफ से सभी कॉलेजों के प्रिंसिपल और डिपार्टमेंट प्रमुख को नोटिस भेजा गया है कि जहां परमानेंट पोस्ट खाली हैं, वहां गेस्ट टीचर की नियुक्ति की जाए। इसका मतलब है अभी तक जो एडहॉक काम कर रहे थे, उन्हें भी खत्म कर गेस्ट टीचर ला रहे हैं। आशंका है कि आगे चलकर सभी पोस्ट कॉन्ट्रैक्चुअल में बदल दी जाएगी।” 

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