उजाड़ो, किताबें जाम लगाती हैं!

निशांत सिंह
यादेः  दरियागंज में लगता था पुरानी किताबों का दिल्ली का सबसे बड़ा बाजार
यादेः दरियागंज में लगता था पुरानी किताबों का दिल्ली का सबसे बड़ा बाजार
संजय रावत

निशांत सिंह
50 साल से अधिक समय से हर इतवार लगने वाले पुरानी किताबों के हेरिटेज बाजार को हटाने से लेखकों, छात्रों का यहां से गहरा रिश्ता टूटा

किताबें करती हैं बातें

बीते जमानों की

दुनिया की, इंसानों की

आज की, कल की

एक-एक पल की

सफदर हाशमी

पुरानी दिल्ली का दरियागंज इलाका। यहां नेताजी सुभाष मार्ग पर गोलचा सिनेमा से डिलाइट सिनेमा के बीच हर रविवार को वर्षों से पुरानी-नई किताबों की खुशबू तैरती थी। इसे संडे बुक मार्केट या किताब बाजार कहा जाता था। दिल्ली हाइकोर्ट के एक आदेश की गाज 50 साल से ज्यादा पुराने इस बाजार पर गिरी और सड़क के किनारे पटरी पर किताबें लगाने वाले विक्रेता सड़क पर आ गए। दरअसल, जनवरी 2018 में गणतंत्र दिवस और आसियान-भारत शिखर सम्मेलन के चलते पांच सप्ताह के लिए इस बाजार को बंद कर दिया गया था। इस बंदी के खिलाफ दरियागंज पटरी संडे बुक बाजार वेलफेयर एसोसिएशन ने दिल्ली हाइकोर्ट में अपील की।

वहीं, मामले में उत्तर दिल्ली नगर निगम की तरफ से बताया गया कि इसकी वजह से सड़क पर जाम लगता है। जुलाई 2019 में दिल्ली हाइकोर्ट ने उत्तर दिल्ली नगर निगम को निर्देश दिया कि यह साप्ताहिक बाजार यहां से हटाकर कहीं और शिफ्ट किया जाए। लेकिन बाजार बंद होने के बाद यहां के विक्रेताओं पर रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

कई विक्रेता पीढ़ियों से इस काम से जुड़े हुए हैं। यहां आने वाले लेखकों-कलाकारों, छात्रों, सामान्य पाठकों का यहां से गहरा रिश्ता रहा है, जो अब टूट गया है। शहर का कोई पुराना हिस्सा मरता है तो शहर भी थोड़ा उदास हो जाता होगा। पटरी पर किताबों की दुकान लगाने वाले सुमित वर्मा ने आउटलुक को बताया, “मेरे पिता 35-40 वर्ष से यहां दुकान लगाते थे। मैं 2001 से लगा रहा हूं। बाजार हटाने को लेकर कानून का पालन नहीं किया गया है। हमें लिखित नोटिस नहीं दिया गया है। ये लोगों पर दबाव बनाकर, उन्हें मारकर भगाना चाह रहे हैं। बहुत से लोग कहते हैं कि हम यहां से किताबें पढ़कर आइएएस-पीसीएस बन गए, लेकिन जब यही लोग अधिकारी बन जाते हैं तो गरीबों पर ऐसे ही प्रयोग करते हैं। यह आदेश गलत है।”

पुस्तक विक्रेताओं का मानना है कि यह स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट, 2014 का उल्लंघन है, जिसके तहत उनके अधिकार सुरक्षित किए गए थे। इससे जुड़ा बिल 6 सितंबर, 2012 को लोकसभा में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा ने पेश किया था। लोकसभा में पास होने के बाद 19 फरवरी, 2014 को यह राज्यसभा से पास हुआ। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद 1 मई, 2014 से यह कानून लागू हो गया। इसके मुताबिक, हर पांच साल में टाउन वेंडिंग कमेटी वेंडर्स का सर्वे करेगी। किसी भी विक्रेता को अगर सर्टिफिकेट मिला हुआ है तो बगैर सर्वे के उसे नहीं हटाया जा सकता। ऐसे विक्रेताओं को एक खास वेंडिंग जोन मुहैया कराया जाएगा। नो वेंडिंग जोन में ऐसी कोई भी बिक्री नहीं की जा सकेगी। अगर किसी स्थान को नो वेंडिंग जोन घोषित किया जाता है तो वेंडर्स को दूसरी जगह मुहैया कराई जाएगी। साथ ही ऐसा करने के लिए वेंडर्स को 30 दिन पहले लिखित नोटिस देना जरूरी है।

यहीं मामला फंस रहा है। यह बाजार जहां लगता रहा है, उसे नो हॉकिंग एरिया कहा जा रहा है लेकिन विक्रेताओं का दावा है कि उन्हें जगह खाली करने के लिए लिखित नोटिस नहीं दिया गया। नगर निगम ने पुस्तक विक्रेताओं को दुकान लगाने के लिए कई जगहों के विकल्प दिए हैं, लेकिन विक्रेताओं ने उन्हें खारिज कर दिया है।

दरियागंज पटरी संडे बुक बाजार वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष कमर सईद ने आउटलुक को बताया कि एमसीडी की तरफ से हमें चार जगहें दिखाई गईं। रामलीला मैदान, चांदनी चौक कच्चा बाग मेट्रो स्टेशन के पास, माता सुंदरी रोड पर हनुमान मंदिर के पास और यमुना बाजार पार्क, लेकिन इन जगहों पर कई समस्याएं हैं। इन जगहों पर कौन खरीदार आएगा? हमें 21 जुलाई को एमसीडी की तरफ से कहा गया कि अरुणा आसफ अली मार्ग पर शिफ्ट हो जाएं, लेकिन इसके लिए 15,000 रुपये महीने की लीज की बात कही गई। हमारी आमदनी कम है। महीने के चार रविवार का 15,000 रुपये हम कैसे दे सकते हैं? हमारा माल रुका पड़ा है। बहुत से लोग थोक में किताबें भी ले जाते हैं। बच्चों की पढ़ाई, बिल जैसे तमाम खर्चे हैं। मैं 1975 से यहां दुकान लगा रहा हूं। दिल्ली से बाहर के बहुत से छात्र ट्रेन से यहां आते हैं। अब वे यहां आते हैं तो पता चलता है कि मार्केट तो उजड़ गया। आजकल विरोध प्रदर्शन से भी किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कोर्ट के मामले में नेता भी दामन छुड़ा लेते हैं।

उनका यह भी कहना है कि पास में लगने वाले कबाड़ी बाजार की आड़ में किताब बाजार को निशाना बनाया गया है।

1990 के दशक में भी बंद हुआ था बाजार

1960 के बाद से यह बाजार नेताजी सुभाष मार्ग की पटरी पर लगने वाले दूसरे बाजारों के साथ तेजी से फैला। 1990 के दशक की शुरुआत में एक बार इस बाजार को बंद कर दिया गया था। तब बुद्धिजीवियों, पाठकों और विक्रेताओं ने इसके खिलाफ अभियान चलाया था। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इसके समर्थन में आर्टिकल लिखा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और प्रशासन को बाजार फिर से चालू करने का निर्देश दिया था। पता नहीं वर्तमान प्रधानमंत्री को इसकी कितनी फिक्र होगी। हालांकि वह ‘बुके’ की जगह ‘बुक’ की बात करते रहे हैं। फरवरी 2018 में इस बाजार को 500 मीटर के दायरे में सीमित कर दिया गया। इसके बाद लगातार इस पर संकट के बादल छाए रहे। इस बार भी लोग ऑनलाइन याचिका के जरिए इस बाजार को दोबारा शुरू करने की मांग कर रहे हैं। ‘चेंज डॉट ओआरजी’ पर ‘ब्रिंग बैक दरियागंज किताब बाजार’ की प‌िटीशन पर 24 अगस्त, 2019 तक करीब 2,000 लोग दस्तखत कर चुके हैं।

एसोसिएशन के उपाध्यक्ष अशर्फी लाल ने बताया, “एमसीडी वाले आते हैं, सामान उठा ले जाते हैं। यहां 276 बुकसेलर हैं, जिनके भूखे मरने की नौबत आ गई है। 2004 में पॉलिसी बनाई गई थी। 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह हेरिटेज मार्केट है। इसे बनाए रखा जाए।”

उत्तर दिल्ली नगर निगम के कॅमर्शियल अधिकारी एस.के. भारद्वाज का कहना है कि पुस्तक विक्रेता अपने प्रतिनिधि के साथ आए थे। टाउन वेंडिंग कमेटी सर्वे करेगी। हम इसे लेकर कानूनी राय भी ले रहे हैं। डिप्टी कमिश्नर वेदिका रेड्डी का कहना है कि किताब बाजार के महत्व को देखते हुए एमसीडी ने वैकल्पिक जगहें दी हैं, लेकिन विक्रेता किसी एक पर एकमत नहीं हो सके।

साहित्य, अकादमिक जगत की यादें

सिविल सर्विसेज समेत तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले, अकादमिक जगत में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू), दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू), अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र-छात्राएं, साहित्य से जुड़े लोग अक्सर यहां मिल जाते थे। डीयू की छात्रा हेमा बताती हैं, “यहां किताबों की बड़ी दुकानें भी हैं लेकिन पहचान इन छोटे दुकानदारों से ही है। मेरे प्रोफेसर और सीनियर्स ने इस जगह के बारे में मुझे बताया था। यह दिल्ली की बौद्धिक संपदा पर हमला करने जैसा है। मुझे किताबें पढ़ना पसंद है। मैं थोड़े समय के लिए ही यहां आई हूं, लेकिन मुझे यहां बहुत कुछ मिला है।”

साहित्य से जुड़े तमाम लोगों के लिए यह बाजार पुरानी यादों में खो जाने जैसा है। ‘पालतू बोहेमियन’ और ‘कोठागोई’ किताबों के लेखक प्रभात रंजन ने आउटलुक को बताया, “हम जब हिंदू कॉलेज में पढ़ते थे तो पैसे बहुत कम होते थे। विश्व साहित्य के आधुनिक लेखकों, जैसे मिलन कुंदरा और मारकेज से परिचय इसी बाजार की वजह से हुआ। मैंने पहली बार निर्मल वर्मा को यहां से किताब खरीदते देखा था। अंग्रेजी के बड़े कश्मीरी-अमेरिकन कवि आगा शाहिद अली यहां पर आया करते थे। इससे हम लोगों में भी रोमांच आता था।”

वे कहते हैं, “पढ़ने-लिखने के जितने भी केंद्र हैं उन्हें वर्तमान सरकार बर्बाद कर रही है। वे पढ़े-लिखे लोगों को एक खास विचारधारा से जोड़कर देखते हैं। आज बुक कल्चर को बचाए रखने की जरूरत है। अब इस तरह से सुलभ किताबों का दूसरा कोई केंद्र दिल्ली में नहीं रहा।”

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