राज्यों का संकट ज्यादा गहरा

राज्यों को चाहिए मददः मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बैठक करते प्रधानमंत्री
राज्यों को चाहिए मददः मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बैठक करते प्रधानमंत्री

चंडीगढ़ से हरीश मानव, लखनऊ से कुमार भवेश चंद्र, रायपुर से रवि भोई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 अप्रैल को राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की, तो उसमें तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी ने दिसंबर और जनवरी का जीएसटी बकाये का मुद्दा उठा दिया। उसी दिन पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने केंद्र को चिट्ठी लिखकर जीएसटी का 4,386 करोड़ रुपये का बकाया देने की मांग कर डाली। दरअसल, लॉकडाउन के चलते कुछ जरूरी वस्तुओं का उत्पादन और सेवाओं को छोड़कर करीब 70 फीसदी उद्योग धंधे और सेवाएं ठप हैं। आर्थिक गतिविधियां सीमित होने से राज्यों के संसाधन सूखने लगे हैं। पेट्रोलियम उत्पादों पर वैट, प्रॉपर्टी की स्टांप ड्यूटी, वाहन रजिस्ट्रेशन और शराब पर आबकारी शुल्क संसाधन जुटाने के लिए राज्यों के अपने स्रोत हैं, लेकिन पेट्रोल-डीजल की बिक्री 30 से 40 फीसदी रह गई है, शराब की बिक्री बंद है और प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री भी नाममात्र की हो रही है। खजाने में पैसे नहीं होने के कारण राज्य सरकारें अपने कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं दे पा रही हैं। कुछ राज्यों ने तो कर्मचारियों को मिलने वाले कई भत्तों पर भी रोक लगा दी है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले दिनों कहा, “कोनो अर्निंग नेइ, शुधु बर्निंग (कोई कमाई नहीं है, सिर्फ खर्च हो रहा है)।” राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कहना है कि केंद्र की तरफ से बड़े पैकेज के बिना लॉकडाउन के बाद राज्य कैसे सामान्य स्थिति में लौटेंगे।

खाने-पीने की जिन जरूरी वस्तुओं और दवाओं का उत्पादन और बिक्री जारी है, उनमें 70 फीसदी से अधिक वस्तुएं या तो जीएसटी मुक्त हैं या उन पर सिर्फ पांच फीसदी जीएसटी लगता है। जीएसटी का 80 फीसदी गैर-जरूरी वस्तुओं और सेवाओं से आता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यों का दिसंबर 2019 और जनवरी 2020 का जीएसटी कंपेंसेशन 30 से 34 हजार करोड़ रुपये बकाया है। क्रिसिल का अनुमान है कि 40 दिन के लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था को 10 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा। एसबीआइ के मुख्य अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष के अनुसार अगर राज्य 2018-19 के जीएसडीपी का एक फीसदी भी कोविड से निपटने में खर्च करते हैं, तो यह रकम 1.6 लाख करोड़ रुपये बैठेगी। फिस्कल रेस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (एफआरबीएम) एक्ट के अनुसार राज्यों का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के तीन फीसदी तक हो सकता है। राज्य इसे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। अप्रैल के पहले हफ्ते में ही प्रधानमंत्री के साथ बैठक में कई राज्यों ने इसे पांच फीसदी करने की मांग की थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने 17 अप्रैल को राज्य सरकारों के लिए वेज एंड मींस एडवांस की सीमा 2019-20 की तुलना में 60 फीसदी बढ़ा दी। इस व्यवस्था के तहत राज्य आरबीआइ से 90 दिनों के लिए रेपो रेट पर कर्ज ले सकते हैं। हालांकि इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च का कहना है कि इस एडवांस से राज्यों को 19,335 करोड़ रुपये की ही अतिरिक्त नकदी मिलेगी।

सूखते संसाधनों का असर साफ दिखने लगा है। पंजाब और हरियाणा के 50 फीसदी से अधिक कर्मचारियों को मार्च का वेतन 20 अप्रैल के बाद जारी हुआ। पंजाब में 25 अप्रैल तक एक लाख से अधिक मुलाजिमों का वेतन बाकी था। मार्च में जीएसटी संग्रह तो गिरा ही, तालाबंदी के कारण अप्रैल का जीएसटी संग्रह भी 50 फीसदी रहने के आसार हैं। आरबीआइ के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब को केंद्र से जीएसटी में हिस्सेदारी के तौर 43 फीसदी राजस्व हासिल होता है। बाकी 57 फीसदी राजस्व पेट्रोल-डीजल व अन्य पेट्रोलियम उत्पादों पर वैट, शराब पर एक्साइज, इलेक्ट्रिसिटी डयूटी, प्रॉपर्टी पर स्टांप डयूटी और रजिस्ट्रेशन फीस, व्हीकल टैक्स, खनन रॉयल्टी आदि से हासिल होता है। लॉकडाउन के चलते पेट्रोलियम उत्पादों से राजस्व 30 फीसदी और बिजली से 40 फीसदी रह गया है। राजस्व के बाकी स्रोत लगभग शून्य हैं। यदि लॉकडाउन 3 मई तक ही रहता है तो पंजाब को चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में 10,309 करोड़ रुपये कम राजस्व मिलने की आशंका है। इसलिए राज्य सरकार ने अपने प्रशासनिक खर्चों में 30 फीसदी कटौती कर दी है।

पंजाब को केंद्र से लॉकडाउन में शराब बिक्री की अनुमति नहीं मिली तो राज्य सरकार ने लॉकडाउन के बीच खनन की अनुमति दे दी। हरियाणा ने भी प्रॉपट्री की रजिस्ट्री शुरू कर दी। हरियाणा के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (राजस्व) धनपत सिंह ने आउटलुक को बताया कि 20 अप्रैल से रजिस्ट्री खोलने के पांच दिन में सरकार को स्टांप डयूटी और रजिस्ट्रेशन फीस से 5.10 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ।

पंजाब के 7.5 लाख मुलाजिमों और पेंशनभोगियों में शिक्षा विभाग और बोर्ड-कॉरपोरेशन के करीब एक लाख मुलाजिमों को मार्च का वेतन नहीं मिल पाया है। अब अप्रैल का 3,500 करोड़ रुपये का वेतन और पेंशन सिर पर है। गैर-सहायता प्राप्त प्राइवेट कॉलेजों के एक लाख से अधिक कर्मचारियों का वेतन तो जनवरी से बकाया है। पंजाब अनएडेड टेक्निकल इंस्टीट्यूशंस एसोसिएशन के महासचिव डॉ. अंशु कटारिया ने बताया कि सरकार से पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप का 1,850 करोड़ बकाया जारी न होने से 1,650 कॉलेजों के एक लाख से अधिक कर्मचारियों को चार महीने से वेतन नहीं किया जा सका है।

आउटलुक से बातचीत में पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने बताया, “अप्रैल में वेतन, पेंशन, कोविड-19 राहत कार्य और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 7,301 करोड़ रुपये का खर्च बैठता है। केंद्र से 3,000 करोड़ रुपये अंतरिम मुआवजे के अलावा दिसंबर 2019 से मार्च 2020 तक जीएसटी के 4,400 करोड़ रुपये बकाये की मांग की है।” उन्होंने बताया कि केंद्र से मार्च में जीएसटी के 1,136 करोड़, कोविड-राहत फंड में 225 करोड़ और वित्त आयोग से 625 करोड़ मिले हैं। लॉकडाउन के एक महीने में वैट, एक्साइज, स्टांप ड्यूटी और मोटर व्हीकल टैक्स से रेवेन्यू घटकर सिर्फ 30 फीसदी रह गया है। बादल के अनुसार, 2020-21 के बजट में अप्रैल में 3,360 करोड़ रुपये की राजस्व प्राप्तियों का अनुमान था। इसमें जीएसटी से 1,322 करोड़, पेट्रोलियम उत्पादों पर वैट से 465 करोड़, स्टेट एक्साइज से 521 करोड़, मोटर व्हीकल टैक्स से 198 करोड़, इलेक्ट्रिसिटी डयूटी से 243 करोड़, स्टांप डयूटी से 219 करोड़ और 392 करोड़ रुपये नॉन टैक्स रेवन्यू मद में प्राप्त होने थे।

केंद्र की ओर से राहत पैकेज और जीएसटी का बकाया जारी न किए जाने की सूरत में बादल ने फिस्कल रेस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (एफआरबीएम) एक्ट में मंजूर सीमा से अधिक कर्ज दिलाने की गुहार केंद्र से लगाई है। उन्होंने ने बताया कि आरबीआइ ने हाल ही राज्यों को वेज एंड मींस एडवांस की जो सीमा बढ़ाई है, उससे 500 करोड़ रुपये अधिक एडवांस मिलने से कुछ राहत मिलेगी।

खस्ता वित्तीय हालात पर पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार को घेरते हुए शिरोमणि अकाली दल के महासचिव और पूर्व राजस्व मंत्री बिक्रम मजीठिया ने आउटलुक से कहा, “राजस्व प्रबंधन में सरकार की नाकामी से राज्य के कर्मचारी परेशान हैं। 2018 से कर्मचारियों के डीए का 5000 करोड़ रुपये बकाया है।” भाजपा के पंजाब प्रदेश अध्यक्ष अश्वनी शर्मा ने कहा कि आपदा प्रबंधन फंड में पंजाब को मार्च में 247.5 करोड़ और 2020-21 के लिए 15वें वित्तीय आयोग ने राजस्व घाटा ग्रांट के रूप में 638.25 करोड़ रुपये जारी किए हैं। इसके बावजूद सरकार जनता से झूठ बोल रही है कि केंद्र उसे संकट में राहत के लिए मदद नहीं कर रहा है।

उत्तर प्रदेश की स्थिति भी कुछ अलग नहीं। खर्च बचाने के लिए राज्य सरकार ने मंत्रियों और विधायकों के वेतन में पूरे एक साल तक 30 फीसदी कटौती के साथ ही विधायक निधि को भी एक साल के लिए निलंबित रखने का फैसला किया है। यह रकम मुख्यमंत्री कोविड केयर फंड में जाएगी। आपदा निधि 1951 में बदलाव कर इसमें 600 करोड़ की राशि को बढ़ाकर 1,200 करोड़ रुपये किया गया है। प्रदेश सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों का डीए एक साल के लिए स्थगित करने के साथ छह तरह के भत्ते भी समाप्त कर दिए गए हैं। नगर भत्ता, सचिवालय भत्ता, रिसर्च भत्ता और विशेष भत्ता पर एक साल के लिए रोक लगा दी गई। अपर मुख्य सचिव (वित्त) संजीव मित्तल के इस आदेश पर कर्मचारी संगठनों में तीखी प्रतिक्रिया है। वे इसे अमानवीय बताते हुए हालात सामान्य होते ही आंदोलन की धमकी दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष सतीश कुमार पांडेय कहते हैं, “भत्तों में कटौती का फैसला अदूरदर्शी है। कर्मचारी स्वेच्छा से एक या दो दिन का वेतन हर महीने देने को तैयार हैं।” विपक्षी दलों के नेता भी भत्ते में कटौती का विरोध करने लगे हैं। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा खुलकर कर्मचारियों का समर्थन कर रही हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती जरूर फिलहाल इस मामले पर चुप हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले से 25 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक की बचत होगी। कर्मचारियों और पेंशनरों के डीए फ्रीज करने से 16 हजार करोड़ रुपये बचेंगे। इसके अलावा 9 हजार करोड़ की बचत छह तरह के भत्तों पर रोक से होगी। लॉकडाउन के बाद प्रदेश में शराब की दुकानें पूरी तरह बंद हैं। पान मसाला और गुटखा बेचने पर भी पाबंदी है। शुरुआत में प्रॉपर्टी रजिस्ट्री से होने वाली आय भी शून्य हो गई थी, लेकिन बाद में ऑनलाइन रजिस्ट्री की शुरुआत कर दी गई, पर यह इतनी धीमा है कि इससे ज्यादा राजस्व की उम्मीद फिलहाल बेकार है।

चार्टर्ड एकाउंटेंट अनुराग मिश्र कहते हैं, “शुरुआत में लगभग सभी कारोबार ठप हो गए थे। अब जो थोड़ी गतिविधियां शुरू हुई हैं, उनसे बड़ी उम्मीद बेमानी है। जीएसटी रिटर्न फाइल करने के लिए भी कारोबारियों को 24 मई से 6 जुलाई तक की छूट मिली हुई है। जाहिर है सरकारी खजाने को इससे होने वाली आय के लिए इंतजार तो करना ही होगा।”

लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. अरविंद मोहन कहते हैं, “राजस्व प्राप्ति के मोर्चे पर कड़ा संघर्ष साफ दिख रहा है। इन हालात में कोविड-19 जैसी आपदा का सामना करने के लिए सरकार के पास विकल्प बेहद सीमित हैं। अनावश्यक खर्चों में कटौती ही ऐसा विकल्प है जिससे सरकार प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में खर्च कर पाएगी।” मौजूदा परिस्थिति में विधायकों के वेतन और कर्मचारियों के भत्तों में कटौती को डॉ. मोहन उचित फैसला बताते हैं। उनका सुझाव है कि बड़े अफसरों के पेट्रोल खर्च और मनोरंजन भत्तों पर रोक जैसे कड़वे फैसले भी करने चाहिए। इसके अलावा सरकारी स्कीमों की समीक्षा करके वह राशि स्वास्थ्य क्षेत्र और लघु उद्योगों के लिए खर्च करने पर विचार करना चाहिए। इसके अलावा कृषि क्षेत्र पर भी अधिक फोकस करने की जरूरत है। यहां से सरकार को अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए जरूरी ताकत मिल सकती है।

छत्तीसगढ़ को लॉकडाउन के कारण करीब 11 हजार करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का अंदेशा है। राज्य का आर्थिक आधार खेती के साथ लोहा, सीमेंट और  कोयला आधारित उद्योग हैं। बिजली बेचकर भी राज्य अच्छा खासा मुनाफा कमाता है। स्टील इंड्रस्ट्री से राज्य को 26 फीसदी राजस्व मिलता है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के उपाध्यक्ष अमर पारवानी का कहना है कि लॉकडाउन से राज्य में रोजाना औसतन 1,200 करोड़ का व्यापार प्रभावित हो रहा है। इसकी भरपाई अब संभव नहीं है। छत्तीसगढ़ चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष जितेंद्र बरलोटा के अनुसार शादी के सीजन को देखते हुए व्यापारियों ने एडवांस माल मंगवा लिया था। कुछ सामान आ गया, कुछ अटक गया। लॉकडाउन खुलने के बाद बड़ी दिक्कतें आने वाली हैं। कुछ उद्योग संगठनों ने राज्य सरकार से विशेष पैकेज की भी मांग की है। लेकिन राज्य सरकार की अपनी समस्या है, वह कोरोना संक्रमण से निपटने के साथ-साथ लॉकडाउन खुलने के बाद आर्थिक गतिविधियों के सुचार रूप से संचालन और अपने खर्च के लिए केंद्र सरकार की तरफ ताक रही है। व्यापार और उद्योग ठप होने से उससे मिलने वाला राजस्व तो कम हुआ ही है, शराब से होने वाली आय भी बंद हो गई है। एक महीने में शराब के मद में उसे 400 करोड़ का नुकसान होने का अंदेशा है। पेट्रोल-डीजल की खपत कम होने से वैट संग्रह भी कम हो गया है। खनिज रायल्टी भी प्रभावित हुई है। राज्य सरकार को अब तक जीएसटी के हिस्से के 1,500 करोड़ रुपये मिले हैं, बाकी 500 करोड़ का इंतजार है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल केंद्र से राज्यों को आर्थिक पैकेज देने की मांग कर रहे हैं। हालांकि रायपुर सांसद सुनील सोनी का कहना है कि मुख्यमंत्री केंद्र से पैकेज मांगने के बजाय निर्माण मजदूर कल्याण निधि के अंतर्गत 18 लाख निर्माण श्रमिकों के लिए राज्य के खाते में जमा 350 करोड़ रुपये से भुगतान करे। 18 लाख निर्माण श्रमिकों को 1,000 रुपये देने पर भी सिर्फ 180 करोड़ ही खर्च होंगे। इस संबंध में केंद्र की एडवायजरी का पालन करना अनिवार्य है। ऐसा न करके केंद्र से 30,000 करोड़ का पैकेज मांगकर मुख्यमंत्री सिर्फ राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण मंडल में भी 350 करोड़ से अधिक राशि जमा है।

एक लाख दो हजार 907 करोड़ रुपये सालाना बजट वाले छत्तीसगढ़ पर 57,848 करोड़ का कर्ज है। सरकार की चिंता किसानों को धान का बोनस देने की भी है, जिसके लिए बजट में 5,100 करोड़ का प्रावधान किया गया था, लेकिन कोरोना संकट के बाद इस पर भी संशय के बादल मंडराने लगे हैं।

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 पंजाब ने मोंटेक की अध्यक्षता में 20 विशेषज्ञों की टॉस्कफोर्स बनाया

 पंजाब सरकार ने कोविड-19 के असर से अर्थव्यवस्था को अगले एक साल के भीतर बहाल करने के लिए योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया की अगुवाई में 20 अर्थशास्त्रियों और उद्योगपतियों की टॉस्क फोर्स गठित की है। टॉस्क फोर्स को अपनी पहली रिपोर्ट 31 जुलाई, दूसरी 30 सितंबर और आखिरी रिपोर्ट 31 दिसंबर 2020 तक सरकार को सौंपनी है। आहलूवालिया के अलावा टॉस्क फोर्स के अन्य सदस्यों में एम. गोविंद राव, रथीन रॉय, अशोक गुलाटी, देवेश कपूर, टी. नंदकुमार, अजयपाल सिंह बंगा और एसपी ओसवाल प्रमुख हैं।

 

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