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12 करोड़ लोगों के रोजगार पर सीधी मार

कोविड-19 की वजह से बड़े पैमाने पर नौकरियां जाने का खतरा, सरकार को त्वरित कदम उठाने की जरूरत
प्रवासियों में फैला डरः उद्योग जगत की चिंता काम पर आसानी से नहीं लौटेंगे श्रमिक

अजीब स्थिति है, एक बड़े निजी बैंक में नौकरी मिलने के बाद भी ऐसा होगा, सोचा नहीं था।” उत्तर प्रदेश के देवरिया के रहने वाले यतीश श्रीवास्तव यह कहते हुए काफी परेशान दिखते हैं। वह कहते हैं, अलीगढ़ में बैंक ज्वाइन करना है लेकिन लॉकडाउन की वजह से दिल्ली में फंस गया हूं। अब तो यह डर है कि कहीं ज्वाइनिंग में कोई बखेड़ा न हो जाए? सैलरी कैसे मिलेगी? लोग कह रहे हैं, कटौती भी हो सकती है। कुछ पता नहीं है, यह सब डर मुझे सताए जा रहा है। लॉकडाउन में यतीश जैसी स्थिति इस समय करोड़ों लोगों की है। कर्मचारी से लेकर कंपनियों के सीईओ तक बढ़ते संकट से परेशान हैं। उद्योग जगत के संगठन सीआइआइ (कॉन्फिडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री) के सर्वे के अनुसार देश के 52 फीसदी सीईओ का मानना है कि लॉकडाउन के बाद 15-30 फीसदी नौकरियों में कटौती हो सकती है। हालात इतने खराब हो गए हैं, नौकरियों की स्थिति पर सर्वे करने वाली कंपनी सेंटर फॉर मॉ‌िनटरिंग ऐंड इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के अनुसार, “लॉकडाउन के 15 दिनों में बेरोजगारी दर 7-8 फीसदी से बढ़कर 23 फीसदी पर पहुंच गई है।” सीधा सा मतलब है कि इसके जरिए करीब 11-12 करोड़ लोगों की नौकरियों पर संकट एक झटके में आ गया है। ऐसी ही डरावनी स्थिति अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) की रिपोर्ट बयां करती है। उसके अनुसार, लॉकडाउन की वजह से असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली करीब 40 करोड़ आबादी गरीबी के कुचक्र में फंस सकती है।

असल में सीएमआइई की रिपोर्ट लॉकडाउन में बेरोजगारी की भयावह स्थिति बताती है। सीएमआइई के सीईओ महेश व्यास का कहना है, “24 फरवरी की आधी रात से लॉकडाउन के ऐलान के बाद केवल 15 दिनों में बेरोजगारी दर में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। यह आठ फीसदी से बढ़कर 23 फीसदी के स्तर पर आ गई है। चिंता की बात यह है कि इस दौरान श्रमिक भागीदारी रेट 42-43 फीसदी के स्तर से गिरकर 36 फीसदी पर आ गई है। यानी 6-7 फीसदी लोगों ने रोजगार का मैदान ही छोड़ दिया है। यह बुहत बुरी स्थिति है।”

सीएमआइई सर्वे का विश्लेषण करते हुए स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव कहते हैं, “आंकड़े बहुत भयावह स्थिति पेश कर रहे हैं। श्रम भागीदारी दर 36 फीसदी और बेरोजगारी की दर 23 फीसदी पर पहुंच गई है। इसका सीधा मतलब है 11.9 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए हैं। इसमें अगर लॉकडाउन से पहले के 3.4 करोड़ बेरोजगार लोगों को शामिल कर लिया जाए, तो इस समय देश में 15 करोड़ लोग बेरोजगार हो चुके हैं। एक बात और समझनी होगी कि देश में 11 करोड़ लोग ऐसे हैं जो कृषि क्षेत्र के अलावा दूसरे क्षेत्रों में काम कर जीविका चला रहे हैं। इसके अलावा छह करोड़ लोग स्वरोजगार से जुड़े हुए हैं, जबकि 2.5 करोड़ लोग ऐसे हैं जो वेतनभोगी हैं, लेकिन उनकी नौकरी स्थायी नहीं है। लॉकडाउन से इन्हीं 19.5 करोड़ लोगों पर असर पड़ा है। सरकार को इनके लिए जल्द कदम उठाने होंगे, नहीं तो बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। श्रम भागीदारी दर घटने और बेरोजगारी दर बढ़ने से दोहरी मार पड़ी है। दुनिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि एक झटके में 12 करोड़ लोगों पर रोजगार का संकट आ गया है, यह एक ऐतिहासिक दुर्घटना है।”

जैसी चिंता योगेंद्र यादव कर रहे हैं, कुछ उसी तरह की आशंकाएं उद्योग जगत से जुड़े लोगों की भी हैं। चाहे ऑटो कंपनियां हों या फिर 4-5 करोड़ लोगों को नौकरियां देने वाले रिटेलर हों, सभी गहराते संकट से परेशान हैं। रिटेलर्स एसोसिएशन इंडिया द्वारा कोविड-19 के असर पर किए गए सर्वे के अनुसार, रिटेल क्षेत्र में 20 फीसदी नौकरियों पर संकट है। उसके अनुसार छोटे रिटेलर 30 फीसदी, मझोले रिटेलर 12 फीसदी और बड़े रिटेलर पांच फीसदी तक नौकरियों में कटौती कर सकते हैं।

सब कुछ ठप: लॉकडाउन के दौरान औद्योगिक क्षेत्र में बंद पड़ी एक फैक्ट्री

सर्वे एक और गंभीर स्थिति बताता है, उसके अनुसार करीब 95 फीसदी रिटेल शॉप जो गैर खाद्य पदार्थों का कारोबार करते हैं, उनकी कमाई अगले छह महीने में 60 फीसदी तक गिर सकती है। यानी पिछले साल के मुकाबले वह केवल 40 फीसदी ही कमाई कर सकेंगे। इसी तरह खाद्य पदार्थों की बिक्री करने वाले रिटेलर की कमाई भी 44 फीसदी तक घटने का अनुमान है। कमाई घटने का सीधा असर नौकरियों पर दिखने की आशंका है।

ऐसी ही आशंका ऑटोमोबाइल डीलर्स भी जता रहे हैं। उनका कहना है कि लॉकडाउन की वजह से शोरूम बंद है। गाड़ियों की बिक्री ठप हो गई है। इसे देखते हुए बड़ा संकट खड़ा हो गया है। इस संबंध में फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (फाडा) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर राहत पैकेज की मांग की है। फाडा के अनुसार, पिछले 15 महीने से ऑटो इंडस्ट्री पर संकट छाया हुआ है, इसकी वजह से 275 डीलरशिप बंद हो गई हैं। ऐसे में अगर राहत पैकेज नहीं मिला तो बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म हो सकती हैं।

लॉकडाउन ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी पूरी तरह से ठप कर दिया है। इस कारण निर्यात पूरी तरह से बंद है। इसका असर टेक्सटाइल, चमड़ा उद्योग, जेम्स ऐंड ज्वेलरी, अपैरल हैंडीक्रॉफ्ट सहित रोजगार देने वाले प्रमुख सेक्टर में 1.5 करोड़ लोगों की नौकरियां खत्म हो सकती हैं। निर्यातकों के संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (फिओ) के सीईओ एस.के. श्रॉफ का कहना है कि कोविड-19 की वजह से 50-75 फीसदी निर्यात के ऑर्डर निरस्त हो गए हैं। बढ़ते संकट को देखते हुए फिओ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राहत पैकेज देने के लिए पत्र भी लिख दिया है। उसके अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह अभी तक का सबसे बड़ा आर्थिक संकट है। इसे देखते हुए अमेरिका, यूके, जापान यहां तक कि बांग्लादेश ने भी निर्यातकों के लिए राहत पैकेज का ऐलान किया है। ऐसे में, हमें अभी तक के ऐलान के अलावा दूसरे कदमों की जरूरत है। तभी जाकर निर्यातक संभल पाएंगे।

यह संकट केवल मौजूदा नौकरियों पर ही नहीं है, बल्कि उन युवाओं पर भी है, जिन्हें इस साल पहली नौकरी मिलने वाली है। यानी कैंपस सेलेक्शन के बाद वह नौकरी ज्वाइन करने का इंतजार कर रहे हैं। लखनऊ के शेरवुड कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट की ट्रेनिंग और प्लेसमेंट हेड डॉ. मीनाक्षी जायसवाल का कहना है, “अभी बहुत अस्पष्टता है। तीन-चार कंपनिया प्लेसमेंट के लिए कॉलेज आ चुकी हैं, उन्होंने सेलेक्शन भी कर लिया है लेकिन दूसरी कंपनियां जो आने वाली थीं, उनको लेकर अभी कुछ स्पष्ट नहीं है। सबकुछ लॉकडाउन के बाद ही पता चलेगा। इस वजह से छात्र-छात्राओं में भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।”

भविष्य को लेकर जारी अनिश्चितता का असर यह हुआ है कि अब लोग अवसाद में भी जा रहे हैं। मेडिटेशन एक्सपर्ट और कॉरपोरेट ट्रेनर लक्ष्मी नारायण कहते हैं, “लोगों के बीच अवसाद बढ़ रहा है। ज्यादातर लोग आर्थिक परेशानियों को लेकर सवाल पूछ रहे हैं। उन्हें इस बात की चिंता है कि नौकरी उनकी बचेगी या नहीं, सैलरी कम हो गई तो खर्च कैसे चलेगा। ऐसे सैकड़ों सवाल उनके मन में घर कर गए हैं। इस वजह से फिलहाल मैं सोशल मीडिया और व्यक्तिगत स्तर पर सहयोग देने की कोशिश कर रहा हूं। यह ऐसा संकट है जिसका सामना अभी तक इस पीढ़ी ने नहीं किया था। यह पूरी तरह से अलग है, ऐसे  दौर में व्यक्तिगत स्तर से लेकर कॉरपोरेट स्तर पर लोग मदद ले रहे हैं।”

गहराते संकट पर भारत सरकार के पूर्व चीफ स्टैटेशियन प्रणब सेन का कहना है, “लॉकडाउन में जब सब कुछ बंद है तो जाहिर है कि नौकरियों का संकट रहेगा। चिंता दूसरी है, जब लॉकडाउन खत्म होगा, तब इस संकट से उबरने का क्या प्लान है? उसके बाद कितनी जल्दी 23 फीसदी बेरोजगारी दर घटकर आठ फीसदी पर वापस आएगी। अभी तो कुछ नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि कोविड-19 का खतरा काफी बड़ा है। सरकार को सबसे ज्यादा चिंता असंगठित क्षेत्र की करनी पड़ेगी। उसके सामने भूख और रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। उन्हें किस तरह इन परिस्थितियों में राहत दी जाए, वह सरकार का एजेंडा होना चाहिए। चिंता की बात यह है कि सरकार के पास असंगठित क्षेत्र के लोगों को सीधे तौर पर राहत पहुंचाने के लिए कोई साधन नहीं है। ऐसे में, कोशिश यह होनी चाहिए कि चीजें जल्द से जल्द वापस पटरी पर लौटें। इस बीच लॉकडाउन में कृषि क्षेत्र को सहयोग देने की सबसे ज्यादा जरूरत है। क्योंकि वह कायम रहेगा तो धीरे-धीरे संगठित क्षेत्र पटरी पर लौट आएगा। लेकिन सरकार के ऐलान के बाद भी शिकायतें मिल रही हैं। क्योंकि पूरी सप्लाई चेन रुक गई है। ट्रांसपोर्ट सेक्टर में भी 90 फीसदी ट्रक खड़े हुए हैं। सरकार को ऐसे एक्शन करने होंगे जिससे जमीन पर कृषि क्षेत्र को बरकार रखा जा सके। रबी की फसलों की खरीद और भंडारण की व्यवस्था सुचारु रूप से हो जाए। अगर ऐसा कर पाए तो बहुत कुछ संभाला जा सकता है।

प्रणब सेन की तरह योगेंद्र यादव का भी कहना है कि सरकार को एक बड़ा पैकेज बनाना होगा, जिसमें शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्र के लोगों का ध्यान रखा जाए। सबसे पहले उसे मनरेगा के तहत लोगों के बैंक खातों में सीधे पैसा ट्रांसफर करना चाहिए।

इसके अलावा देश के हर नागरिक को 100 दिन के रोजगार की गारंटी का आश्वासन देना चाहिए। जो भी रोजगार मांगे, उसे हर हाल में 100 दिन का रोजगार मिले। तभी असंगठित क्षेत्र को संभाला जा सकता है।

साफ है कि कोविड-19 का संकट बहुत बड़ा है। ऐसी स्थिति का अनुभव इस पीढ़ी ने कभी नहीं किया है। दुनिया भर के लिए यह बड़ी चुनौती है। जहां सरकारों को लोगों की जान भी बचानी है, वहीं उन्हें भुखमरी से भी बचाना है। क्योंकि यह संकट अमीर-गरीब का नहीं रह गया है। इसकी वजह से हर तबका प्रभावित हो रहा है। ऐसे में, सबकी आस अब सरकार पर ही टिकी हुई है। लेकिन जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन 3 मई तक बढ़ाने के ऐलान के वक्त कहा कि मुझे सबसे ज्यादा चिंता उस तबके की है, जो रोज कमाता और खाता है। विशेषज्ञ भी यही बात दोहरा रहे हैं कि कैसे उस वर्ग को भुखमरी से बचाया जाए। साथ में मिडिल क्लास और उच्च वर्ग को भी संभालना बेहद जरूरी है, क्योंकि जब तक तीनों पटरी पर नहीं आएंगे, स्थिति सामान्य नहीं होने वाली है।

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बड़ी मार

लॉकडाउन के 15 दिनों में बेरोजगारी दर 8 फीसदी से बढ़कर 23 फीसदी पहुंची

12 करोड़ लोगों पर एक झटके में रोजगार का संकट

40 करोड़ लोग गरीबी के कुचक्र में  फंस सकते हैं

बाजार में श्रमिक बल की संख्या में 6 फीसदी की गिरावट

शहरी इलाकों में 31 फीसदी पहुंची बेरोजगारी दर, ग्रामीण इलाकों में 20 फीसदी के स्तर पर

निर्यात क्षेत्र में 1.5 करोड़ लोगों की नौकरियों पर संकट

कई सेक्टर में 10-30 फीसदी तक वेतन में कटौती की आशंका

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सरकार के पास असंगठित क्षेत्र को सीधे राहत देने का साधन नहीं है

प्रणब सेन

पूर्व चीफ स्टैटेशियन

 भारत सरकार

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