जेएनयू हिंसा से हैरान देश गुस्से में

हरिमोहन मिश्र और प्रशांत श्रीवास्तव
हिंसा का तांडवः जेएनयू के गेट पर प्रदर्शन करते छात्र
हिंसा का तांडवः जेएनयू के गेट पर प्रदर्शन करते छात्र

हरिमोहन मिश्र और प्रशांत श्रीवास्तव
नकाबपोश हिंसा से देश भर के परिसरों में नौजवानों और समाज का धैर्य टूटा, लंबे अरसे से घुमड़ रहे असंतोष के फूट पड़ने से सरकार के सामने चुनौतियां दरपेश, क्या इससे नई राह निकलेगी?

कल्पना कीजिए, आने वाली पीढ़ियां 5 जनवरी 2020 की तारीख को कैसे याद करेंगी! यकीनन, यह इसी से तय होगा कि आज की पीढ़ी इससे क्या सबक लेती है। वैसे, उस शाम अंधेरा घिरते ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली में सबसे प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में तकरीबन तीन-चार घंटे तक, बाहर खड़ी पुलिस और अंदर सुरक्षा गार्डों के रहते, जो नकाबपोश तांडव हुआ, उस पर सहसा यकीन करना मुश्किल था। तभी तो देश के हर कोने से उठा युवा आक्रोश सड़कों पर उतर आया। पश्चिम में मुंबई से लेकर अहमदाबाद, दक्षिण में बेंगलूरू, हैदराबाद, चेन्नै, कोच्चि, तिरुअनंतपुरम और उत्तर में चंडीगढ़, अमृतसर से लेकर लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, पटना, कोलकाता, गुवाहाटी, भुवनेश्वर, देश का शायद ही कोई कोना बचा, जहां हर परिसर के छात्र और नौजवान दिन ही नहीं, रात में सड़कों पर ठिठुरती सर्दी को मात देते रहे। अब सवाल है कि यह प्रतिरोध क्या कुछ समय बाद ठंडा पड़ जाएगा और नौजवान फिर किसी और ऐसी ही चिंगारी को शोला बनने का इंतजार करने लगेंगे? या फिर वह देश के मौजूदा सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक हालात से निकलने की कोई राह तलाशने तक नहीं थमेगा। इसकी शंकाएं मौजूदा उथल-पुथल की कोई ठोस सांगठनिक स्वरूप न होने से पैदा हो सकती हैं। बेशक, इस युवा आक्रोश के बैठ जाने की उम्मीद शायद मौजूदा सियासी हुक्मरानों को हो सकती है।

यह भी सही है कि युवाओं और देश के एक बड़े वर्ग में असंतोष कई वजहों से घुमड़ रहा था। केंद्र में बड़े बहुमत से आई एनडीए की दूसरी सरकार के दूसरे कार्यकाल में आर्थिक स्थितियां लगातार गोता लगाती जा रही हैं और बेरोजगारी लंबी छलांग लगाती जा रही है। फिर, सरकार और सत्ताधारी पार्टी नागरिकता संशोधन कानून के साथ नागरिकता रजिस्टर को जोड़ने के कुछ घोषित और कुछ अघोषित ऐलान करती रही तो मानो इंतहा हो गई। उधर, विश्वविद्यालय परिसर भी फीस वृद्घि वगैरह से गरमा रहे थे। जेएनयू के मौजूदा विवाद की जड़ तो इसी में निहित है, जिसे छात्र शिक्षा के निजीकरण की ओर बढ़ते कदम की तरह मानते हैं। ये सभी मुद्दे लगातार आग सुलगा रहे थे, जो हिंसा की बर्बर घटनाओं से धू-धूकर जल उठी। ये घटनाएं ऐसी हैं कि विपक्ष ही नहीं, एनडीए की सहयोगी पार्टियां भी अपनी आवाज रोक नहीं पाईं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, शिवसेना प्रमुख उद्घव ठाकरे तो यहां तक कह गए कि "जेएनयू की घटना तो 26/11 के मुंबई आतंकी हमले जैसी है।”

हम भी साथः जेएनयू के हमले का विरोध करने के लिए मुंबई में प्रदर्शन में शामिल बॉलीवुड कलाकार

यह भी अपशकुनी संयोग जैसा है कि महज 20 दिनों के भीतर ही देश के तीन विश्वविद्यालयों में हिंसा का जैसा तांडव हुआ है, उसकी कोई मिसाल इसके पहले बमुश्किल ही ढूंढ़े मिलेगी। 15 दिसंबर की शाम जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ पुलिस की ज्यादती पर सवाल उठे, तो देश के हर परिसर से आवाज उठी और विशाल प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया। इस दौरान खासकर उत्तर प्रदेश में पुलिस और आदित्यनाथ सरकार की “बदले” और “चुप कराने” की कार्रवाइयों के घाव अभी हरे ही हैं। लेकिन पांच जनवरी की शाम अंधेरा घिरते ही नकाबपोश गुंडों ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में जो तांडव मचाया, उससे तो सब हिल उठे।

घायल छात्र संघ अध्यक्ष ओइशी घोष

उस शाम जेएनयू के साबरमती हॉस्टल, पेरियार हॉस्टल में तकरीबन 40-50 की तादाद में लाठी, स्टील के रॉड, ईंट-पत्थर लेकर घुसे नकाबपोश गुडाें ने न केवल चुन-चुनकर छात्र-छात्राओं को बेरहमी से पीटा, बल्कि रास्ते में जो कुछ मिला, उसे तोड़-फोड़ दिया। उन पर दरिंदगी इस कदर सवार थी कि उन्होंने छात्र-छात्रओं को कमरों से निकालकर पीटा, कमरों का सबकुछ चूर-चूर कर दिया। नकाबपोशों के निशाने पर सबसे अधिक जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष ओइशी घोष, वे छात्र-छात्राएं और शिक्षक थे, जिन्हें वे अपनी विचारधारा के प्रतिकूल मानते थे। खून से लथ-पथ फटे सिर को पकड़े ओइशी को टीवी स्क्रीन पर कहते सुना गया, “नकाबपोशों ने बड़ी बर्बरता से पीटा है, मैं इस समय कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं हूं।” एम्स में कुर्सी पर बैठी दर्द से कराहती प्रोफेसर सुचरिता सेन ने कहा, “मुझे हॉकी स्टिक से मारा गया, मैंने अपने जीवन में इतना डर इससे पहले कभी महसूस नहीं किया है।” इस पूरे हमले में कम से कम 36 लोग घायल हुए।

डर का सायाः जेएनयूएसयू अध्यक्ष ओइशी घोष प्रेस से मुखातिब

जेएनयू कैंपस में तांडव चलता रहा और पुलिस बाहर जेएनयू के उत्तरी मुख्य द्वार पर लगभग हाथ बांधे खड़ी रही। करीब साढ़े पांच-छह बजे पुलिस को कई छात्रों और शिक्षकों ने फोन से सूचना दी। पुलिस पहुंची भी लेकिन वह यह कहकर कैंपस में नहीं घुसी कि उसे विश्वविद्यालय प्रशासन से इजाजत नहीं मिली है। करीब सात बजे के बाद जेएनयू प्रशासन से पुलिस को कहा गया तो पुलिस कैंपस में गई और करीब साढ़े आठ बजे स्थानीय डीसीपी ने मुख्य गेट पर आकर कहा कि सब शांत हो गया है। इस बीच नकाबपोश परिसर से गायब हो चुके थे या गायब कर दिए गए थे। पहले भी उन्हें लाठी-डंडों के साथ परिसर में बेरोकटोक जाते देखा गया, जबकि इस विश्वविद्यालय में आने-जाने वालों की शिनाख्त देखी जाती है। ऐसे में हैरानी यह कि दो दिन बाद भी पुलिस के हत्थे एक भी हमलावर नहीं चढ़ पाया।

बिखरा हुआ हॉस्टल का कमरा

जब भारी तादाद में पुलिस की मौजूदगी में डीसीपी ने सब शांत होने का ऐलान किया, तब जेएनयू के गेट पर भी भारी हुजूम जमा था। आउटलुक का रिपोर्टर जेएनयू गेट पर पहुंचा तो वहां स्ट्रीट लाइटें बंद कर दी गई थीं। गेट पर नारे लग रहे थे, “देशद्रोही यहां से जाओ, भारत माता की जय, वंदेमातरम...।” यहां तक कि रिपोर्टर का फोन भी छीन लिया गया। खबर सुनकर जेएनयू के पूर्व छात्र, स्वराज इंडिया अभियान के प्रमुख योगेंद्र यादव वहां पहुंचे थे तो मीडिया और पुलिस के सामने उन्हें गिरा दिया गया, जिससे उन्हें कमर और चेहरे पर चोट आई। एक लड़की को उपद्रिवयों ने पास में स्थित मुनिरका कॉलोनी तक दौड़ा लिया।

एफआइआर की कॉपी

घायल छात्रों को एम्स ले जा रही एंबुलेस को रोका गया। बड़ी मुश्किल से पुलिस उसे बाहर निकाल पाई। लेकिन हैरान यह भी कि पुलिस उन्हें वहां से हटा नहीं रही थी। उपद्रवियों ने जिस तरह से जेएनयू और वहां के करीब स्थित मुनरिका तक आतंक मचाया, उसे रात 10 बजे भी महसूस किया जा सकता था। मुनरिका में बहुत छात्र-छात्राएं रहते हैं, जो इतना डरे-सहमे हुए थे कि कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। लेकिन कुछ देर बाद जेएनयू गेट पर छात्रों के समर्थन में ढेरों लोग पहुंचने लगे, तो उपद्रवियों का दल छंट गया। यूनिवर्सिटी कैंपस से भी तमाम छात्र और शिक्षक बाहर निकल आए और रात भर जमे रहे। हालांकि कुलपति एम. जगदीश कुमार दो दिन बाद एक बयान के साथ नमूदार हुए कि “हिंसा की घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं छात्रों से कहना चाहता हूं कि पुरानी बातें भूल जानी चाहिए और कैंपस पूरी तरह सुरक्षित है।”

जेएनएसयू अध्यक्ष ओइशी घोष ने 6 जनवरी को माथे पर पट्टी बांधे प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और संघ परिवार के गुंडों ने हिंसा की लेकिन हम इससे डरने वाले नहीं हैं। उन्होंने यूनिव‌र्सिटी के कुलपति एम. जगदीश कुमार की मिलीभगत का भी आरोप लगाया और कहा कि उन्हें फौरन इस्तीफा देना चाहिए। बाद में जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन ने भी कुलपति के फौरन इस्तीफे की मांग की।

हालांकि जेएनयू में एबीवीपी के अध्यक्ष दुर्गेश कुमार ने कहा, “हम पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वह सरासर बेबुनियाद है। उस दिन जो हमला हुआ वह नक्सली विचारधारा के लोगों ने किया। सारे नकाबपोश वाले जो हमला कर रहे थे वे वामपंथी थे। उनका केवल एक ही मकसद है कि विश्वविद्यालय को बंधक बना लिया जाए, पढ़ाई-लिखाई से उनका मतलब नहीं है।”

जेएनयू में पांच जनवरी के इस कांड की पटकथा दो महीने पहले विश्वविद्यालय प्रशासन के फीस वृद्धि के फैसले से शुरू होती है, जिसका जेएनयू स्टूडेंट यूनियन लगातार विरोध कर रहा है। असल में पांच जनवरी से शीतकालीन सत्र के रजिस्ट्रेशन शुरू होने वाले थे। फीस बढ़ोतरी का विरोध करने वाले छात्र नहीं चाह रहे थे कि रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शुरू हो। जेएनयू प्रशासन का आरोप है कि तीन जनवरी को कुछ छात्रों ने रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को रोकने के लिए सर्वर रूम पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद चार जनवरी को दोपहर में सर्वर रूम में तोड़-फोड़ की गई। उसके बाद विश्वविद्यालय के दो लेफ्ट विंग और एबीवीपी के छात्रों में मारपीट भी हुई।

ऐसे में जब पांच जनवरी को रजिस्ट्रेशन प्रोसेस शुरू हुआ तो रजिस्ट्रेशन कराने आए छात्रों को रोका भी गया। हालांकि सात जनवरी को दिल्ली पुलिस ने हमले में घायल ओइशी घोष सहित 20 लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की है। पुलिस के मुताबिक, “उन पर जेएनयू प्रशासन ने सर्वर रूम में तोड़-फोड़ और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में बाधा डालने की शिकायत दर्ज कराई है।” उसी शाम चार बजे जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन ने शांति मार्च निकालने का फैसला किया था। इसके लिए साबरमती हॉस्टल के टी-प्वाइंट से जब टीचर मार्च निकालने पहुंचे, उसी वक्त करीब 3 बजकर 45 मिनट पर नकाबपोश वहां आ गए और उन्होंने ताबड़तोड़ हमला शुरू कर दिया। उस हमले में घायल दृष्टिहीन छात्र सूर्य प्रकाश ने बताया, “जब गुंडों ने हमला किया तब वह साबरमती हॉस्टल में थे और पढ़ाई कर रहे थे। भीड़ की आवाज सुनकर उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया मगर हमलावर दरवाजा तोड़कर उनके कमरे में दाखिल हो गए, मैंने उनसे मिन्नत की मुझे छोड़ दो मुझे दिखाई नहीं देता। वे कह रहे थे कि तुम झूठ बोल रहे हो और मेरी पीठ और बाहों को सरिया से वे पीटते रहे...अब मुझे धमकी आ रही है कि तुम कुछ मत बोलो तुम्हें गलती से मारा गया है। मुझे बार-बार फोन आ रहे हैं, मैं बहुत दहशत में हूं।”

विरोधः जेएनयू पहुंचकर अभिनेत्री दी‌पिका पादुकोण ने छात्रों के साथ हमदर्दी जताई

स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस में एमए की छात्रा सांभवी बताती हैं, “साबरमती टी प्वाइंट पर हम शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे। अचानक वहां पत्थरबाजी होने लगी। हम लोग वहां से भागे। फिर कुछ देर तक शांति रही लेकिन जैसे अंधेरा हुआ तो लगभग पौने सात बजे के आसपास रॉड, लाठी और कई हथियार से नकाबपोशों ने हमला कर दिया। हम अपने हॉस्टल के तरफ भागे लेकिन हमलावर वहां पहुंच गए थे, जान बचाने के लिए हम फिर ताप्ती हॉस्टल की ओर भागे। उस दौरान साबरमती से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आती रहीं। ये सब एबीवीपी के गुंडों ने किया।”

वहीं जेएनयूएसयू के ज्वाइंट सेक्रेटरी मोहम्मद दानिश का कहना है, “फीस बढ़ोतरी के खिलाफ ज्यादातर छात्रों में नाराजगी थी। एबीवीपी के छात्र जबरदस्ती लोगों से रजिस्ट्रेशन करा रहे थे। इस वजह से विवाद शुरू हुआ। लेकिन हमें इस बात की आशंका नहीं थी कि ये लोग इस तरह से हिंसक हो जाएंगे और छात्र-छात्राओं और यहां तक कि टीचर्स को बुरी तरह मारेंगे।”

मूक दर्शक पुलिसः जेएनयू के मुख्य गेट पर पहुंचे योगेंद्र यादव से हुई धक्का-मुक्की

इस बीच सोशल मीडिया पर लेफ्ट विंग और एबीवीपी के समर्थन में कई वाट्सऐप ग्रुप भी वायरल हुए, जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि कैसे नकाबपोशों ने हमले की तैयार की थी। हालांकि आउटलुक इन वाट्सएप ग्रुप और उनमें मौजूद नंबरों की पुष्टि नहीं करता है।

पुलिस की भूमिका पर सवाल

पूरे घटनाक्रम पर पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं कि पुलिस उपद्रवियों को क्यों नहीं रोक पाई? अगर बाहर से लाठी-डंडों के साथ सैकड़ों लोग कैंपस में घुस रहे हैं, तो पुलिस क्या कर रही थी? तीन-चार घंटे नकाबपोश कैंपस में हिंसा और तोड़फोड़ करते रहे, तो पुलिस रोक क्यों नहीं पाई? इसके साथ ही अभी तक दिल्ली पुलिस किसी हुड़दंगी को गिरफ्तार क्यों नहीं कर पाई, जबकि हमले में घायल जेएनयूएसयू अध्यक्ष ओइशी घोष के खिलाफ ही एफआइआर दर्ज कर ली गई?

पुलिस की एफआइआर में कहा गया है कि पांच जनवरी को दोपहर तीन बजकर 45 मिनट में उसे सूचना मिली कि कुछ छात्र पेरियार हॉस्टल के पास तोड़-फोड़ कर रहे हैं, वहां पुलिस मौके पर पहुंची, नकाबपोश पुलिस को देखकर भाग गए। इसके बाद शाम सात बजे फिर से सूचना मिली कि हुड़दंगी साबरमती हॉस्टल में घुस आए हैं और मारपीट कर रहे हैं। चेतावनी के बाद भी तोड़-फोड़ होती रही और कुछ समय बाद हुड़दंगी वहां से भाग गए। उस वक्त हमलावरों से घिरी सांभवी का कहना है, “जब शाम को घटना हुई तब पेरियार हॉस्टल के पास पुलिस खड़ी थी। लेकिन वह कुछ नहीं कर रही थी। वो गुंडों को शह दे रही थी।”

इन आरोपों पर दिल्ली पुलिस के पीआरओ मनदीप सिंह रंधावा ने आउटलुक को बताया, “जो भी आरोप लगाए जा रहे हैं, वे पूरी तरह गलत हैं। वहां की सुरक्षा की जिम्मेदारी वहां के गार्ड पर है। प्रोटोकाल के तहत हम तभी अंदर जा सकते हैं, जब हमें विश्वविद्यालय प्रशासन ऐसा करने को कहता है। जब कहा गया तो पुलिस अंदर गई। अभी हम सबूत इकट्ठा कर रहे हैं। उचित समय पर कार्रवाई की जाएगी।” वैसे, गौरतलब यह भी है कि दिल्ली पुलिस 2016 से उन नकाबपोशों को अभी ढूंढ़ ही रही है, जिन पर राष्ट्रविरोधी नारे लगाने के आरोप लगे थे।

मोदी और छात्र आंदोलन

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में सीएए और एनआरसी के विरोध से उपजा ही छात्र आंदोलन उन्हें चुनौती दे रहा है। छात्रों की नाराजगी मोदी सरकार के सत्ता में आने के कुछ दिनों बाद ही शुरू हो गई थी। 2015 में पुणे के फिल्म टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के छात्रों ने गजेंद्र चौहान को चेयरमैन बनाए जाने पर विरोध शुरू किया था। उस वक्त छात्रों का विरोध प्रदर्शन करीब साढ़े चार महीने चला था। उसके बाद हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला सुर्खियों में रहा। रोहित ने विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिए जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी। रोहित के समर्थन में तब देश के प्रमुख कैंपसों में विरोध प्रदर्शन हुए थे। फिर फरवरी 2016 में जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगने का मामला सामने आया।

इन आंदोलनों की खास बात यह रही कि छात्र अपने मुद्दों को लेकर ही एकजुट हुए। लेकिन अब यह दृश्य बदल रहा है। देश भर के छात्र राष्ट्रीय मुद्दों पर आगे आ रहे हैं। नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ विश्वविद्यालय से शुरू हुआ आंदोलन काशी हिंदू विश्वविद्यालय, नदवा कॉलेज लखनऊ, पंजाब विश्वविद्यालय, आइआइएम अहमदाबाद, आइआइटी मुंबई, आइआइटी चेन्नै, जादवपुर यूनिवर्सिटी, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, जीवाजी विश्वविद्यालय, पांडिचेरी विश्वविद्यालय से लेकर सहित देश के 20 राज्यों में फैल गया है। दरअसल छात्र और युवाओं की नाराजगी का एक आयाम देश में सांस्‍थानिक स्वायत्तता भी है। विश्वविद्यालयों की ही अभी कुछ हद तक स्वायत्त हैं। दूसरा पहलू यह भी है कि छात्र अब भारत-विचार के प्रमुख संरक्षक की भूमिका में दिख रहे हैं। लेकिन सवाल यही है कि यह कितनी दूर तक जाता है? फिलहाल तो यह आवाज जरूर उठ रही है कि हम एक हैं.. और हम भी देखेंगे।

(साथ में इनपुट अक्षय दुबे)

 वह इमरजेंसी का छात्र आंदोलन

 रामदत्त त्रिपाठी

 1971 में बांग्लादेश विजय के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकप्रियता चरम पर थी। लेकिन जमीनी सच्चाई यह थी कि महंगाई लगातार बढ़ रही थी। बेरोजगारी की समस्या के साथ भ्रष्टाचार से आम लोगों में निराशा बढ़ रही थी। उस वक्त सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण यानी जेपी ने कहा था कि मुझे 1942 जैसे क्रांति के आसार दिख रहे हैं। जेपी ने पवनार आश्रम में विनोबा भावे से मुलाकात की और दिसंबर 1973 में यूथ फॉर डेमोक्रेसी बनाकर उन्होंने छात्रों और नौजवानों से आगे आने की अपील की। 1974 आते आते लोगों का असंतोष आसमान छूने लगा। गुजरात में चिमनभाई पटेल की सरकार थी। वहां एक इंजीनियरिंग कालेज में हास्टल फीस बढ़ाने का मसला तूल पकड़ने लगा। वहां के छात्र नेता मनीष जानी ने नवनिर्माण समिति बनाकर इसका विरोध करना शुरू कर दिया। नवनिर्माण समिति को जेपी का  समर्थन मिला। गुजरात में यह सब चल रहा था तो पटना में इसी तरह का छात्र आंदोलन शुरू हुआ। लालू यादव, सुशील मोदी और उस समय के छात्र नेताओं ने उस आंदोलन के नेतृत्व के लिए जेपी का समर्थन हासिल किया। इसी बीच इलाहाबाद में 22 और 23 जून 1994 को अखिल भारतीय छात्र युवा सम्मेलन की ओर से जेपी को बुलाया गया।

देश भर में छात्र असंतोष और केंद्र के दमन के बीच इलाहाबाद हाइकोर्ट से इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द करने का फैसला आ गया। इंदिरा गांधी के इस्तीफे के लिए दबाव बढ़ने लगा। इंदिरा गांधी ने जेपी को चुनौती दी कि चुनाव के जरिए तय कर लें कि देश क्या चाहता है। टकराव बढ़ने लगा और फिर सरकार ने इमरजेंसी लगा दी और प्रेस पर सेंसरशिप बैठा दिया। केंद्रीय सत्ता के उस खतरनाक दौर से गुजरते हुए 1977 के चुनाव के बाद देश में लोकतंत्र की वापसी हो सकी। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह लेख कुमार भवेश चंद्र से बातचीत पर आधारित)

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प्रकाश जावड़ेकर

केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री

कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और वाम दलों के कुछ तत्व जान-बूझकर हिंसा का वातावरण बना रहे हैं

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सोनिया गांधी

अध्यक्ष, कांग्रेस

छात्रों और शिक्षकों पर हुआ हमला याद दिलाता है कि यह सरकार विरोध की हर आवाज को दबाने के लिए किस हद तक जा सकती है

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सीताराम येचुरी

महासचिव, माकपा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी बहुत कुछ कहती है। उनके चुप रहने से लगता है कि वे इसमें शामिल हैं या फिर अयोग्य हैं

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एम. जगदीश कुमार

वाइस चांसलर, जेएनयू

हिंसा की घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं छात्रों से कहना चाहता हूं कि पुरानी बातें भूल जानी चाहिए और कैंपस पूरी तरह सुरक्षित है

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अनुराग कश्यप

फिल्म निर्माता

भगवान का शुक्रगुजार होना चाहिए कि महाराष्ट्र में भाजपा सत्ता में नहीं है। अगर वह होती तो हम शायद सुरक्षित नहीं होते

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आलिया भट्ट

बॉलीवुड कलाकार

जब छात्र, अध्यापक और नागरिकों पर हमले होने लगें तो यह दिखाने की कोशिश बंद करनी चाहिए कि सब कुछ ठीक है

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