युवा बोले हम देखेंगे

विरोध का जज्बाः 6 जनवरी को जेएनयू के मुख्य गेट पर रविवार की हिंसा के खिलाफ छात्र प्रदर्शन
विरोध का जज्बाः 6 जनवरी को जेएनयू के मुख्य गेट पर रविवार की हिंसा के खिलाफ छात्र प्रदर्शन

नाराज नारों से सारा आकाश तड़-तड़ाने लगे, तो धरती भी धड़-धड़ धड़कने लगती है। देश का कोई भी कोना इन आवाजों से दूर शायद ही ढूंढ़ा जा सके-दिल्ली, मुंबई, बेगलूरू, चेन्नै, चंडीगढ़, अमृतसर, जयपुर, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना, कोलकाता, गुवाहाटी...उंगलियों पर गिनती थम सकती है मगर इस फेहरिस्त का सिलसिला नहीं टूटता, न ही विश्वविद्यालयों और आला शिक्षा संस्‍थानों की सूची रुकती है। युवाओं का गुस्सा ऐसे फूट पड़ा है, जैसे उनके वजूद को चुनौती मिल गई है। यह कोई कोरी कल्पना भी नहीं, बल्कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंसक घटनाक्रम तो जैसे इसकी गवाही दे रहे हैं।

ऐसे नजारे देश ही नहीं, कई ताकतवर देशों में भी इतिहास बना चुके हैं। सत्तर के दशक के कई महादेशों में फैले छात्र आंदोलनों को ही नहीं, अपने देश में गुजरात के नव-निर्माण आंदोलन की रोशनी में शुरू हुए बिहार छात्र आंदोलन और फिर जेपी आंदोलन की यादें बरबस ताजा हो उठती हैं। फर्क सिर्फ यह है कि उस वक्त चिंगारी फीस और मेस शुल्क हुई वृद्घि ने भड़की थी, इस समय इसके अलावा 'भारत के बुनियादी विचार' और संविधान बचाने की टेक भी इससे जुड़ गई है। जाहिर है, इसकी भी वजहें बेबुनियाद नहीं हैं।

इसमें नया तत्व तो सिर्फ नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के मुद्दों ने जोड़ा है। शिक्षा संस्‍थानों में तो मौजूदा सरकार के पिछले कार्यकाल से ही शोले भड़कने शुरू हो गए थे। जेएनयू में मौजूदा दौर में ही नकाबपोश नहीं उतरे, 2016 में भी नकाबपोशों की वजह से "टुकड़े-टुकड़े गैंग" और "राष्ट्रविरोध" का विमर्श खड़ा हो गया था, मगर नकाबपोशों को आज तक दिल्ली पुलिस नहीं ढूंढ़ पाई। हैदराबाद में रोहित वेमुला की खुदकशी भी याद आ जाती है। यही नहीं, फीस वृद्घि और अनाम-कुलशील लोगों की नियुक्तियों से  आइआइटी, आइआइएम वगैरह भी तड़-तड़ाहटों के गवाह बने। शिक्षा के बजट भी सिकोड़े जाते रहे, छात्रवृत्तियां घटाई जाती रहीं। फिर बढ़ती आर्थिक बदहाली और बेरोजगारी ने इस आग में घी का काम किया।

यकीनन, यह गुस्सा लंबे समय से घुमड़ने लगा था, जो अब सीधे असर वाले कानूनों और हिंसक घटनाक्रमों से फूट पड़ा है। इसके नतीजे क्या होंगे, यह तो गर्भ में है लेकिन फिलहाल तो छात्र और नौजवान मौजूदा हुक्मरानों के सामने मानो ताकतवर विपक्ष की भूमिका अदा करने लगे हैं।

 

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