मेरे पिता वरवर राव को 2018 में भीमा कोरेगांव मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था। तब उनकी उम्र 78 वर्ष थी। अगस्त 2022 में उन्हें मेडिकल जमानत पर रिहा किया गया, लेकिन जमानत की कड़ी शर्तों के चलते उन्हें मुंबई में ही रहना पड़ा, मानो वे निर्वासन का जीवन जी रहे हों। उन्हें अपने सह-आरोपियों से मिलने की अनुमति नहीं है। वहां उनसे तेलुगु में बात करने वाला कोई नहीं है, उन्हें इलाज के लिए हैदराबाद जाने की इजाजत नहीं है। उनकी साहित्यिक गतिविधियों पर रोक है और वे तेलंगाना में अपने प्रियजनों से भी नहीं मिल पा रहे हैं।
यह उनकी पहली गिरफ्तारी नहीं थी। इससे पहले भी कई बार उन्हें गिरफ्तार किया जा चुका है। उनकी राजनैतिक सक्रियता के कारण उन्हें 1973 में इमरजेंसी से पहले भी गिरफ्तार किया जा चुका था। जब मेरे पिता को गिरफ्तार किया गया था, तब मैं शिशु थी (मुश्किल से एक महीने की)। बचपन से ही मैंने उन्हें राजनैतिक बंदी के रूप में बार-बार गिरफ्तार होते देखा है। मेरी मां हेमलता उनसे जेल में मिलने जाया करती थीं।
अधिकतर वे आंध्र प्रदेश की जेलों में बंद रहे। वहां राजनैतिक बंदियों के लिए ‘क्लास-बी’ श्रेणी होती थी, जिसके तहत जेल के भीतर उन्हें खाट, मेज और कुर्सी जैसी सुविधाएं दी जाती थीं। महाराष्ट्र में कैद के दौरान पहली बार उन्हें इन सुविधाओं से वंचित किया गया। हमें अदालत में याचिकाएं दायर करनी पड़ीं, ताकि उन्हें बुनियादी जरूरत की चीजें मिल सकें। हर याचिका लंबी कानूनी लड़ाई में बदल जाती थी।
जब किसी व्यक्ति को घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर कैद किया जाता है, तो पत्र लिखना ही संवाद का एकमात्र साधन रह जाता है। जेल प्रशासन उन्हें तेलुगु में पत्र लिखने की अनुमति नहीं देता था। वे जोर देते थे कि पत्र हिंदी या अंग्रेजी में लिखे जाएं, ताकि वे उन्हें पढ़ सकें। मेरे पिता तेलुगु के लेखक और कवि हैं। जिस भाषा से वे गहराई से प्रेम करते हैं, उसी में लिखने से उन्हें वंचित करना बेहद पीड़ादायक था।
मुझे याद है, जब वे पुणे की यरवदा जेल में थे, तब उन्हें एक कंबल दिलवाना भी बड़ी चुनौती थी। इसके लिए भी हमें अदालत में आवेदन देना पड़ा और अनुमति का इंतजार करना पड़ा। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय तेलंगाना जैसे प्रदेश में बिताया था, जहां ठंड ज्यादा नहीं होती। पुणे की ठंड उनके लिए बेहद कठोर थी। जेल में उनका स्वास्थ्य बिगड़ता गया। महामारी बुरा सपना साबित हुई। उन्हें तीन बार कोविड का संक्रमण हुआ।
अपने अंतिम कोविड उपचार के बाद उन्हें नवी मुंबई की तलोजा जेल में स्थानांतरित किया गया। मेरी मां और मैं उनसे मिलने अस्पताल गए। उनकी हालत ने हमें तोड़ दिया। ऐसा लगा मानो हम उन्हें आखिरी बार जीवित देख रहे हों और वे बच नहीं पाएंगे। लेकिन वे योद्धा हैं। उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और लोगों के प्रेम और दुआओं ने उन्हें बचा लिया। धीरे-धीरे वे स्वस्थ हुए।
मेरे पिता साधारण परिवार से आते हैं। उनका जन्म 1940 में वर्तमान तेलंगाना के वारंगल जिले के चिन्ना पेंड्याला गांव में हुआ था। राजनैतिक रूप से जागरूक परिवार में पालन-पोषण ने उनके बौद्धिक और वैचारिक विकास में अहम भूमिका निभाई। पुस्तकों, बहसों और प्रगतिशील साहित्य से उनका प्रारंभिक परिचय उन्हें कवि, प्रोफेसर और राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में गढ़ने में सहायक रहा।
मेरे बड़े चाचाओं को भी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गिरफ्तार किया गया था। राजनैतिक सक्रियता की यह परंपरा उनके परिवार में रही है। मानवाधिकारों और गरीबों के लिए संघर्ष उनकी अपनी गरीबी के अनुभवों से उपजा था। कई बार उन्हें कॉलेज जाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
मेरे पिता अत्यंत सक्रिय कवि और लेखक रहे हैं। उन्होंने ‘सृजना’ नाम से पत्रिका शुरू की और तेलुगु में क्रांतिकारी लेखकों का एक समूह ‘विरसम’ (क्रांतिकारी लेखक संघ) बनाया। यह तेलुगु भाषा में उग्र और प्रगतिशील साहित्यिक गतिविधियों का गौरवशाली समकालीन इतिहास रहा है।
हम तीन बहनें ऐसे माहौल में पली-बढ़ीं, जहां हमारे घर पर पत्रिका की बैठकों का आयोजन होता था। राजनैतिक चर्चाएं होती थीं और कविता हमारे बचपन का अभिन्न हिस्सा थीं। उन्होंने कभी अपने मूल्यों को हम पर थोपा नहीं, लेकिन उनके प्रभाव से बच पाना मुश्किल था। हम तीनों ने उन मूल्यों को अपनाया, जिनके लिए वे हमेशा खड़े रहे। सादा जीवन और राजनैतिक प्रतिबद्धता हम सबके जीवन का अभिन्न अंग बन गई।
मेरे पिता ने बहुत काम किया, पत्रिकाओं का संपादन किया और साहित्यिक और राजनैतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई, जिनमें अलग तेलंगाना आंदोलन भी शामिल था। अपने अकादमिक जीवन के साथ-साथ वे आधुनिक और क्रांतिकारी तेलुगु साहित्य के प्रमुख स्तंभ बनकर उभरे। 1966 से 1992 तक उन्होंने ‘सृजना’ पत्रिका की स्थापना और संपादन किया, जो प्रगतिशील और उग्र लेखकों का एक महत्वपूर्ण मंच बनी। उन्होंने क्रांतिकारी लेखक संघ (विरसम) की स्थापना में भी अग्रणी भूमिका निभाई और कई अन्य सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक संगठनों से जुड़े रहे। उनकी कैद के दौरान मेरी मां हेमलता ‘सृजना’ पत्रिका की संपादक थीं।
लेकिन यह सब उनके जीवन में निरंतर भय और गिरफ्तारियों की कीमत पर हुआ। हमारी पत्रिका पर दो बार प्रतिबंध लगाया गया। पत्रिका के मामले में मेरी मां को दो साल की सश्रम सजा सुनाई गई और उन्हें दोषी के रूप में जेल भेजा गया, लेकिन हाइकोर्ट में अपील के बाद आठ दिन में जमानत मिल गई और अंततः वे बरी हो गईं। पुलिस कभी भी मेरे पिता को ढूंढते हुए हमारे दरवाजे पर दस्तक दे देती थी। यह इतना सामान्य हो गया था कि कई बार रात को वे घर पर होते, लेकिन सुबह नहीं मिलते। जब मैं पूछती, तो बताया जाता कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर ले गई है। मैं यह जानकर फिर सो जाती।
वारंगल में हमारे पड़ोस के लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। वे जानते थे कि अगर उन्हें गिरफ्तार किया गया है, तो जरूर उन्होंने गरीबों के लिए कोई अच्छा काम किया होगा। लेकिन महाराष्ट्र में राजनैतिक बंदी को अलग नजर से देखा जाता था और उसके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था।
जेलों या अदालतों में उनसे मिलने का मतलब था हैदराबाद से पुणे और बाद में मुंबई तक की यात्राएं करना और भारी खर्च उठाना। आज भी, वे जमानत पर हैं लेकिन शर्तों के कारण मुंबई में ही रहने को विवश हैं। मेरी मां हेमलता के लिए उनके साथ रहना बेहद मुश्किल है, खासकर ऐसे शहर में, जहां उन्हें किराए का मकान लेने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा।
1970 के दशक की शुरुआत से ही, चाहे जिस पार्टी का शासन रहा हो, मेरे पिता को लगातार राज्य दमन का सामना करना पड़ा। 45 वर्षों की अवधि में उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और देशद्रोह जैसे गंभीर आरोपों में कई बार उन्हें फंसाया गया। किसी भी मामले में उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सका, लेकिन वे वर्षों तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहे। जेल में बिताया गया यह समय उनके लेखन और अनुवाद के सबसे सृजनात्मक दौर से भी जुड़ा रहा।
मैं गर्व के साथ उनकी विरासत आगे बढ़ा रही हूं। मुझे एक घटना याद है, जब उन्होंने मुझे एक लेक्चरार के रूप में छात्रों के सामने सादगी से रहने की सीख दी। वे कहते थे, “तुम अपने पहनावे या रूप-रंग में कोई भी शैली विकसित कर सकती हो, लेकिन सादगी बनाए रखो। जिस दिन छात्र तुम्हारे कपड़ों या शैली पर ज्यादा ध्यान देने लगें, उस दिन उनकी पढ़ाई भटक सकती है। एक अच्छे शिक्षक को यह निश्चित करना चाहिए कि छात्र इस बात पर ध्यान दें कि वह क्या पढ़ा रहा है, न कि किसी और बात पर।” यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा पाठ है, जिसका मैं पालन करती हूं।
सत्य के प्रति उनकी अडिगता भी मेरे लिए एक बड़ा सबक है। वे कहते हैं, ‘‘हर काम दृढ़ विश्वास और सच्चाई के साथ करो, परिणामों से डरकर सच छिपाने की जरूरत नहीं।’’ हमें कुछ भी उपदेश के रूप में नहीं दिया गया। ये रोजमर्रा के सहज अनुभव थे। मेरे पिता अपनी राजनैतिक पहचान से कभी नहीं डरे, चाहे कुछ भी हो जाए। उन्हें पता था कि असहमति को दबाने वाला सत्ता-तंत्र अंततः उन्हें जेल तक पहुंचा देगा, लेकिन इससे वे कभी विचलित नहीं हुए।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मई 2024 में उन्हें जमानत मिली और मुकदमे के पूरा होने तक मुंबई से दिल्ली स्थित अपने घर जाने की अनुमति दी गई।
राजनैतिक बंदी के रूप में बार-बार जेल जाने और राज्य दमन का सामना करने के बावजूद, वे आज भी धूप की तरह उजली मुस्कान बिखेरते हैं, उन मूल्यों के कारण, जिन पर वे और हम विश्वास करते हैं। उनका अडिग सामाजिक-राजनैतिक रुख और कार्य सैकड़ों युवा लोगों के लिए प्रेरणा बना। जेलें इंसान को शारीरिक रूप से तोड़ सकती हैं, जिसका असर शरीर और मन दोनों पर पड़ता है और जेल के भीतर की दमनकारी वास्तविकताएं इसका एक कारण हैं लेकिन वे आत्मा, सत्य और मूल्यों के लिए संघर्ष की भावना को कैद नहीं कर सकतीं। दुनिया की कोई भी जेल मेरे पिता के उस सपने को कैद नहीं कर सकती, जो समानता पर आधारित एक समाज का सपना है।
(भीमा कोरेगांव में भड़की जातिगत हिंसा के सिलसिले में कवि और कार्यकर्ता वरवर राव को जेल भेजा गया था। उस समय उनकी उम्र 78 वर्ष थी। 2022 में चिकित्सा कारणों से उन्हें रिहा कर दिया गया जमानत की कड़ी शर्तों के कारण वे अब भी मुंबई में ही रहने को मजबूर हैं। उन्हें अपने इलाज के लिए हैदराबाद जाने की अनुमति नहीं है, उनकी साहित्यिक गतिविधियों पर रोक है और वे तेलंगाना में अपने परिवार से भी नहीं मिल पा रहे हैं। यूएपीए के तहत बंदी बनाए जाने के कारण उन्हें मुंबई में किराए पर मकान मिलने में भी बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। इसी वजह से उनकी पत्नी भी उनके साथ शहर में नहीं रह पा रही हैं।)