जब कैदी अस्थायी क्वारंटाइन जेल से मथुरा जेल ले जाने के लिए वैन की ओर भागे, तो मुझे अचानक वह कहानी याद आई जो मैंने कभी नाजी जर्मनी के कंसंट्रेशन कैंप के बारे में पढ़ी थी। जब यहूदियों को कैंपों में ले जाया जाता था, तो कई लोग किनारे की सीट पाने के लिए दौड़ते थे, सिर्फ बाहर की दुनिया की आखिरी बेरोकटोक झलक पाने के लिए। मेरे मन में एक अजीब कठोरता आ गई। मन उदास, खामोश था जैसे दिमाग एकदम सुन्न हो गया हो। उस वक्त तक मैंने मथुरा के फूलकटोरी स्कूल में बनी अस्थायी जेल में 21 दिन पूरे कर लिए थे। मुझे हाथरस जाते समय समय गिरफ्तार किया गया था, जहां एक दलित लड़की के साथ बर्बर बलात्कार के बाद बेरहमी से उसकी हत्या कर दी गई थी। मेरी गिरफ्तारी के 24 घंटे से ज्यादा समय तक मुझे अंधेरे में रखा गया। मुझे पता नहीं था कि आगे क्या होने वाला है। आखिरकार, मुझे कोर्ट में पेश किया गया और रिमांड पर भेज दिया गया।
जब कोर्ट ले जाया जा रहा था, तो ऐसा लग रहा था कि सफर कभी खत्म नहीं होगा। गाड़ी अनजान सड़कों पर तेजी से दौड़ रही थी, हवा में अजीब बेचैनी थी। पुलिस अधिकारी बेफिक्र थे, जैसे मशीन हों। हमारे चारों ओर हथियारबंद सिपाही चुपचाप बैठे थे। यह नजारा एनकाउंटर की याद दिला रहा था, जो अब देश के कई हिस्सों में आम बात हो गई है। एक पल मुझे लगा कि यह मेरी आखिरी यात्रा है। मैंने सोचा गाड़ी किसी सुनसान जगह पर रुकेगी और गोलियां अचानक कहानी खत्म कर देंगी। मैंने प्रार्थना की। अपनी बूढ़ी मां, पत्नी और बच्चों के बारे में सोचा। बाद में मुझे समझ आया कि वह एनकाउंटर का मामला नहीं सुनियोजित और लंबी योजना का हिस्सा था। मुझे धीरे-धीरे तोड़ने के लिए। योजना मुझ पर आतंकवादी का लेबल लगाने और हर दिन थोड़ी-थोड़ी कर मेरी इज्जत उतारने की थी।
पुलिस और खुफिया अधिकारियों ने सबसे पहले यह जानना चाहा कि किस माकपा सांसद ने मुझे हाथरस जाने के लिए कहा था। यह सवाल बार-बार पूछा गया, जैसे कि यही एकमात्र जवाब वे सुनने को तैयार थे। मुझे बहुत पहले से लग रहा था कि मेरी गिरफ्तारी इसलिए नहीं थी कि मैंने क्या किया, बल्कि इसलिए थी कि मैं कौन हूं। मेरी पहचान, मेरा जन्मस्थान जैसी बातें किसी भी सच से ज्यादा मायने रखती थीं। इस एहसास में एक अनकहा सच छिपा था, मेरी हिरासत और लंबी कैद अचानक नहीं थी यह पूर्वाग्रह से पहले से तय था। महीनों बाद मुझे अपने ऊपर लगे आरोपों के बारे में पता चला। यह देरी अपने आप में न्याय व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ कहती थी। फिर भी, जिस दिन मुझे कोर्ट में पेश किया गया, एक पुलिसवाले ने चुपके से दिल्ली के एक पत्रकार का मैसेज दिया, सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की गई थी। अनिश्चितता के पल में, यह खबर उम्मीद रोशनी जैसी लगी।
मथुरा की अस्थायी जेल में जिंदगी मुश्किल थी। एक स्कूल की इमारत, जिसे हड़बड़ी में क्वारंटाइन जेल में बदल दिया गया था। हम फर्श पर बिछी बोरियों पर सोते थे, मच्छर लगातार भिनभिनाते रहते थे, पूरी रात सेल में तब्दील हो गए क्लासरूमों में बेचैनी से करवट बदलते हुए कटती थी। इसलिए मेरे सहित कई लोग मथुरा जेल में शिफ्ट होने की ख्वाहिश रखते थे। हमें नहीं पता था कि वहां क्या हमारा इंतजार कर रहा है। हम बस इतना जानते थे कि नींद बड़ी जरूरत बन गई थी। कुछ कैदियों ने नींद की गोलियां लेने की कोशिश की, ताकि वे कुछ घंटों के लिए आंखें बंद कर सकें। त्वचा की बीमारियां तेजी से फैल रही थी। हमें जो बोरियों की चादरें दी थीं, उनमें कीड़े रेंगते थे। इससे चकत्ते, घाव और इन्फेक्शन हो गया। हिरासत में रहने के दौरान मैं तीन हफ्ते तक नहा नहीं पाया। मुझे आज भी एक खास दिन याद है। जेल का एक कर्मचारी उस क्लासरूम में आया और उसने एक इंग्लिश चैनल पर न्यूज क्लिप चलाई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी केरल में मेरे परिवार से मिलते हुए दिख रहे थे। अनिश्चितता और अकेलेपन के बीच, उस नजारे से मुझे राहत मिली। मुझे लगा कि मेरा परिवार अकेला नहीं है, राजनैतिक समाज उनकी खोज-खबर ले रहा है।
डिमेंशिया से पीड़ित मेरी मां से मिलने के लिए जब मुझे अंतरिम जमानत मिली, तो मन हो गया। उन्होंने मुझे पहचाना नहीं। मैंने याद की निशानी ढूंढने की कोशिश की, जो नहीं मिली। उस पल मुझे लगा कि मुश्किल हालात में, हम चाहते हैं कि हमारे प्रियजनों को सच्चाई की पूरी मार न झेलनी पड़े। अगर वे मुझे पहचान लेतीं, तो मैं उन्हें जेल के बारे में कैसे समझाता? वे कैसे बर्दाश्त करतीं कि बेटे पर आरोप हैं कि वह आतंकी नेटवर्क का हिस्सा है? सुनने में भले यह क्रूर लगे, लेकिन उस दिन उनकी भूलने की बीमारी वरदान लगी। भगवान ने अपने तरीके से हम दोनों पर दया की। वे मुझे पहचान नहीं पाईं इसलिए मेरा दुख समझ नहीं पाईं।
मेरी गिरफ्तारी में किसी दिशा-निर्देश का पालन नहीं किया गया। मेरी पत्नी को भी गिरफ्तारी के बारे में टीवी से पता चला। केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की। आम तौर पर, हेबियस कॉर्पस याचिकाओं का निपटारा सात दिनों में हो जाता है लेकिन मेरे मामले में, सुप्रीम कोर्ट को याचिका पर सुनवाई करने में सात महीने लग गए, जिसने मुझे जमानत के लिए निचली फिर से अदालत में जाने का निर्देश दिया। मेरा मामला पहले अपराध शाखा बाद में विशेष कार्यबल (एसटीएफ) को सौंप दिया गया। उस समय, मुझे इसके बारे में कुछ नहीं पता था। जानकारी मुझ तक टुकड़ों में पहुंचती थी। अमूमन जेल कर्मचारियों के जरिए, कभी अखबार की कतरनों से, जो मेरे हाथों में आ जाती थी।
जब मुझे जेल से एसटीएफ ऑफिस ले जाया गया, तब वहां टेलीविजन कैमरे और यूट्यूबर इंतजार कर रहे थे। कुछ चीख-चीखकर सवाल कर रहे थे, कुछ अपने दर्शक वर्ग को ध्यान में रख गुस्सा जाहिर कर रहे थे, कुछ जोश में मुझे और दूसरों को आतंकवादी बता रहे थे। मैंने दूर से यह सब देखा, जैसे यह किसी और के साथ हो रहा हो। मुझे याद है, एक कैदी ने मुझे एसटीएफ और गिरफ्तार किए गए लोगों के साथ उसके बर्ताव के बारे में बताया था। मैंने सुना, कुछ कहा नहीं और प्रार्थना की। तब तक, प्रार्थना आस्था से ज्यादा एक आदत बन गई थी।
जेल और आरोपियों के साथ किया जाने वाला बर्ताव ऐसा लगता था जैसे यह किसी दूसरे जमाने का हो, ऐसा जमाना जिसमें कानून का राज नहीं चलता था। हमें वही खाने के लिए मजबूर किया जाता था जो हमें परोसा जाता था, भले ही खाना खराब हो, भले ही उसमें कीड़े रेंग रहे हों। शिकायतों पर सुधार नहीं, बल्कि सजा मिलती थी।
मुझे कोरोनावायरस का संक्रमण लग गया। मुझे पास के एक मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। वहां का माहौल जेल से भी ज्यादा बदतर था। जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था, उनके साथ खुलेआम, बेरोक-टोक भेदभाव हो रहा था। मैंने उसे उनकी नजरों में, उनकी आवाज में, उनकी अनदेखी में महसूस किया। मैं बस प्रार्थना कर सकता था, दुख सहने की ताकत के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत में अपने विश्वास को बनाए रखने के लिए भी।
मुझे 5 अक्टूबर, 2020 को गिरफ्तार किया गया था और 2 फरवरी, 2023 को जमानत पर रिहा किया गया। किसी को नहीं पता कि मुकदमा कब शुरू होगा या कब खत्म होगा। जेल में वे 28 महीने ऐसे सिस्टम में बीते, जहां सत्ता में बैठे लोगों की मनमानी चलती है। कानून का राज नहीं है, इंसानियत तो बिल्कुल भी नहीं है।
जब मुझे जमानत पर रिहा किया गया, तो जेल से बाहर पत्रकारों की भीड़ इंतजार कर रही थी, जबकि उस दिन बजट का दिन था। मैंने लखनऊ जेल में 14 महीने बिताए थे। जमानत की शर्तों के तहत, मुझे 45 दिनों तक दिल्ली में रहना था और हर सोमवार को निजामुद्दीन पुलिस थाने में रिपोर्ट करना था।
शुरू में रहने की जगह मिलना मुश्किल थी; कोई भी मकान मालिक यूएपीए के तहत आरोपी व्यक्ति को कमरा किराए पर देने को तैयार नहीं था। आखिरकार, पत्रकार दोस्तों और अलग-अलग सिविल सोसाइटी ग्रुप की मदद से, मुझे रहने की जगह मिल गई। वे 45 दिन हाउस अरेस्ट जैसे लगे। मुझे पुलिस थाने के अधिकार क्षेत्र की सीमा से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। निर्धारित समय पूरा होने के बाद मैं केरल लौट आया। हालांकि मुझे लोगों के खुलकर विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन कुछ यूट्यूबर और नफरत फैलाने वाले लोग मेरा पीछा करते रहते हैं और मुझे आतंकवादी के तौर पर बदनाम करने की कोशिश करते हैं। वे गिनती में थोड़े हैं। कुल मिलाकर, कुछ भले लोग और नेता मेरे प्रति सहानुभूति रखते हैं। इसके बावजूद, जेल से छूटने के बाद से मुझे नियमित नौकरी नहीं मिल पाई है। कुछ नेक दिल एडिटरों की मदद से मैं फ्रीलांसिंग कर रहा हूं और अपना गुजारा कर रहा हूं।
अभी भी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो मानते हैं कि बिना आग के धुआं नहीं उठता और वे मुझ पर आरोप लगाते रहते हैं। मैंने उस शक के साथ जीना सीख लिया है। फिर भी, जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो अपमान और दुख के अलावा, दो पल ऐसे हैं जो आज भी याद हैं।
एक पड़ोसी, जिसने मेरी पत्नी से दस रुपये मांगे थे। उसने कहा कि वह केरल के पास के एक मंदिर में उन्हें चढ़ाना चाहती है और मेरी सुरक्षा के लिए प्रार्थना करना चाहती है। एक और पड़ोसी थी जो मेरी अंतरिम जमानत पर कुछ समय के लिए घर लौटने पर हमारे घर आई और अपने साथ सूखे मेवों का एक बैग लाई थी। उसे विश्वास था कि ये सूखे मेवे तब तक चलेंगे जब तक मैं आखिरकार रिहा होकर हमेशा के लिए घर नहीं आ जाता।
ऐसी ही छोटी-छोटी, बिना रिकॉर्ड की गई सहानुभूति से मैं जिंदा रहा। उस दुर्भाग्यपूर्ण गिरफ्तारी, लंबी कैद और धीरे-धीरे खत्म होती इज्जत के बीच, इन बातों ने मुझे हिम्मत दी। अंधेरे और अमानवीयता से भरे वर्षों में, ये सहानुभूति के पल थे, जाने-पहचाने चेहरों और दुनिया भर के अजनबियों से, जिन्होंने मेरी आत्मा को रोशन किया और इंसानियत में मेरा विश्वास पक्का किया।