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2 मार्च 2026 · MAR 02 , 2026

आवरण कथा/जेल डायरीः ‘‘सवाल उठाएं या चुप्पी साध लें’’

राकेश रोशन किरो को जेल की सलाखें भी चुप नहीं करा पाईं
राकेश रोशन किरो

मुझे आज भी 28 जुलाई 2018 की तारीख याद है। किसी भी सामान्य दिन की तरह मैं सुबह उठा और अपने रोजमर्रा के कामों में लग गया। उस दिन मैं दफ्तर नहीं गया था। अखबार पढ़ना खत्म करके मैं आंगन में टहल रहा था, तभी एक दोस्त का फोन आया। उसका पहला सवाल था, “आज का अखबार पढ़ा?” मैंने सहजता से जवाब दिया, “हां, पढ़ा।” उसने फिर पूछा, “तो इतने सामान्य कैसे लग रहे हो? कुछ जरूरी खबर छूट गई क्या?” मेरे अनभिज्ञता जाहिर करने पर उसने बताया कि दैनिक भास्कर की सुर्खियों में मेरा नाम छपा है। मेरे समेत 20 लोगों के खिलाफ पत्थलगड़ी मामले में केस दर्ज किया गया है। सुनते ही मेरी धड़कन तेज हो गई और मैंने तुरंत फोन काट दिया। जैसे-जैसे मैं रिपोर्ट पढ़ता गया, मेरी बेचैनी बढ़ती गई। रिपोर्ट में लिखा था, 26 जुलाई 2018 को खूंटी थाना प्रभारी ने मेरे सहित 20 लोगों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया है। आरोप है कि हमने फेसबुक पर खूंटी में चल रहे पत्थलगड़ी आंदोलन के समर्थन में पोस्ट लिखी थी। पूरी खबर पढ़ने के बाद मैं सुन्न हो गया। फिर किसी तरह खुद को संभाला और पहला फैसला लिया कि किसी भी कीमत पर मेरे परिवार को इस बारे में पता नहीं चलना चाहिए।

कुछ देर बाद परिचितों के फोन आने लगे। कुछ ने सहानुभूति जताई, तो कुछ ने सलाह दी कि मैं अपना फोन बंद कर दूं और सोशल मीडिया से दूर रहूं। किसी ने रांची छोड़ देने को कहा, ने राजनीति में आने तक की सलाह तक दे डाली। लेकिन मेरा फैसला साफ था, न मैं भागूंगा, न ही छिपूंगा। मैं यहीं रहूंगा और यहीं से यह लड़ाई लड़ूंगा।

इस पूरे परिदृश्य को समझने के लिए पृष्ठभूमि जानना जरूरी है। लगभग 2017 के आसपास खूंटी और आसपास के इलाकों में स्वायत्तता और स्वशासन की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ। यह पांचवीं अनुसूची का क्षेत्र है, इसलिए यहां पेसा जैसे विशेष कानून लागू होने चाहिए थे। लेकिन आजादी के दशकों बाद भी प्रशासन मुख्यतः सामान्य कानूनों के तहत ही काम करता रहा। नतीजतन, आदिवासी इलाकों में बाहरी दखल और जमीन की लूट बढ़ती गई, जिससे मुंडा समुदाय में गहरा असंतोष पैदा हुआ। इसके प्रतिरोध में उन्होंने अपनी पारंपरिक प्रथा, पत्थलगड़ी को संघर्ष के औजार के रूप में अपनाया।

संविधान के उन अनुच्छेदों को, जो आदिवासी अधिकारों और स्वशासन का समर्थन करते हैं, पत्थरों पर उकेरकर स्थापित किया जाने लगा। विवाद तब और बढ़ गया जब अनुच्छेद 19(5) की व्याख्या करते हुए पत्थलगड़ी की लिखावटों में बाहरी लोगों के बसने और कारोबार करने पर पाबंदियों की बात कही गई। इसी दौरान सतीपति समूह के आने से स्थिति और जटिल हो गई, उन्होंने सरकारी सेवाओं के बहिष्कार और सरकारी दस्तावेज जलाने तक का आह्वान कर दिया।

खूंटी में जब आदिवासियों पर दमन बढ़ा, तो हमारे जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने सोशल मीडिया पर उनके अधिकारों के समर्थन में लगातार लिखना शुरू किया। हमारा समर्थन संवैधानिक अधिकारों के लिए था न कि सरकारी सेवाओं के बहिष्कार के लिए। 26 जून 2018 को घाघरा गांव में पुलिस और ग्रामीणों के बीच झड़प हुई। फायरिंग में एक ग्रामीण की मौत हो गई। इसके बाद भीड़ ने एक पूर्व सांसद के सुरक्षा गार्डों का अपहरण कर लिया।

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर लिखने वाले लोग प्रशासन की निगाह में आ गए। उसी शाम मैंने फेसबुक पर एक लंबी पोस्ट लिखी, जिसका सार यह था कि सरकार को अपनी जिद छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। मैंने एक पंक्ति और जोड़ी, “अनुच्छेद 21 की सही व्याख्या की गई है।” बस इतना ही। इन्हीं दो पोस्ट के आधार पर मेरे खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज कर दिया गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए, सीपीआइ (एमएल) के सहयोग से हमने 30 जुलाई 2018 को रांची में एक बैठक की। वकीलों ने हमें बताया कि मामला आइटी एक्ट की धारा 66(ए) के तहत दर्ज किया गया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका है। हमने हाइकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें फादर स्टेन स्वामी, विनोद कुमार, आलोक और मैं इस प्रक्रिया का नेतृत्व करने के लिए आगे आए। हमने पहचान के लिए अपने आधार कार्ड की प्रतियां भी जमा कीं, जिसका सीधा मतलब यह था कि अब पुलिस का दबाव सीधे हम पर पड़ेगा। विडंबना थी कि जिस धारा को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था, उसी के आधार पर हाइकोर्ट ने हमारी याचिका खारिज कर दी।

लगभग छह महीनों तक स्थिति शांत रही। लेकिन जनवरी 2019 के अंत तक खूंटी के पुलिस अधीक्षक ने हम चारों के खिलाफ गिरफ्तारी और संपत्ति कुर्की के आदेश जारी कर दिए। इसी दौरान ठेठईटांगर थाना की पुलिस मेरे घर पहुंची। उन्होंने मेरे परिवार के सदस्यों से पूछताछ की। जब परिवार ने मुझसे सवाल किए, तो मेरे पास उन्हें पूरी सच्चाई बताने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

20 अक्टूबर को पुलिस ने फादर स्टैन स्वामी के घर कुर्की की कार्रवाई की। उसके बाद थाना प्रभारी ने फोन पर मुझसे बात की और स्वीकार किया कि उन पर ऊपर से भारी दबाव था। सौभाग्य से उस समय मैं रांची में था।

दिसंबर 2019 में झारखंड में सरकार बदली और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने। अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में उन्होंने पत्थलगड़ी मामले में दर्ज सभी राजद्रोह के मुकदमों को वापस लेने की घोषणा की। यह हमारे लिए बड़ी राहत थी। हालांकि न्यायिक प्रक्रिया खिंचती रही और अंततः फरवरी 2023 में अदालत ने हमारे खिलाफ दर्ज राजद्रोह का मामला औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया।

इन पांच वर्षों के संघर्ष ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। मैंने नजदीक से देखा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ इस बात पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है कि आप आम नागरिक हैं या कोई ताकतवर व्यक्ति। इस दौरान मेरे करीबी लोग भी मुझसे दूरी बनाने लगे। अब जब मामला अंततः समाप्त हो गया है, तो जिंदगी धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। लेकिन एक बात तय है, संवैधानिक अधिकारों और न्याय के लिए संघर्ष हमेशा जारी रहेगा।

राजद्रोह का मामला 2018 में दर्ज हुआ था और 2023 में जाकर समाप्त हुआ। इस बीच की यात्रा में बहुत कुछ घटित हुआ और मुझे कई अनुभवों को देखने-समझने का अवसर मिला। इसे आप किस्मत कहें या बदकिस्मती।

पहले दो साल सबसे ज्यादा डरावने थे। दिसंबर 2019 तक शायद ही ऐसा कोई दिन बीता हो, जब मुझे गिरफ्तारी का डर न रहा हो। सरकार बदलने के बाद जरूर कुछ राहत मिली। मेरी निजी जिंदगी में एक बड़ा बदलाव यह आया कि चाहे हम सरकार की नजर में रहें या न रहें, अब हम अपने परिवार की नजर में जरूर रहते हैं। मेरा परिवार मेरी हर फेसबुक पोस्ट पर नजर रखता है, इस चिंता में कि कहीं मैं फिर से कुछ बहुत तीखा या सख्त न लिख दूं। अब मेरे काम करने का तरीका भी बदल गया है। पहले मैं अपनी हर गतिविधि और हर कदम की जानकारी फेसबुक और सोशल मीडिया पर डालता था। अब ऐसा नहीं करता। मैं आज भी सरकार से सवाल करता हूं, लेकिन अब ज्यादा व्यंग्यात्मक अंदाज में।

फिलहाल, राजद्रोह के मामले से बरी होने के बाद हम शांति के साथ जी रहे हैं। लेकिन कहीं न कहीं यह डर सबके मन में है कि अगले चुनाव में झारखंड में भाजपा/एनडीए की सरकार लौटी, हमें फिर से सोचना पड़ेगा कि जब राज्य जनविरोधी नीतियां बनाए, तो सवाल उठाएं चुप्पी साध लें।

आखिरकार, सब कुछ एक ही बात पर आकर टिकता है, संविधान का पालन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

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