बदलाव, जो सकारात्मक हों

हरवीर सिंह
नागरिकता संशोधन विधेयक
नागरिकता संशोधन विधेयक

हरवीर सिंह
नागरिकता कानून पर बहस और विरोध आगे भी जारी रहेगा, सुप्रीम कोर्ट भी इसकी वैधानिकता को परखेगा, इसलिए यह मुद्दा 2020 में भी बना रहेगा

साल 2019 कई अहम पड़ाव लेकर आया जो इसे दशक के बाकी सालों से अलग करते हैं। चंद दिनों बाद शुरू होने वाला वर्ष 2020 देश-दुनिया के लिए काफी अहम साबित होने वाला है। यह कई ऐसे घटनाक्रमों का साक्षी रहेगा जिनसे अगले दशक की दशा-दिशा तय होगी। बात 2019 की, जो हमें नए संकट और उम्मीद दोनों देकर जाने वाला है। आउटलुक के इस अंक के लिए जब हम साल के मुद्दे का चयन कर रहे थे, तो हाल के घटनाक्रम ने काम आसान कर दिया। 1990 के बाद देश में पहली बार किसी मुद्दे पर आंदोलन का सूत्रपात विश्वविद्यालयों में हुआ। बिना चमत्कारिक नेतृत्व के युवा छात्रों ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) 2019 का विरोध बड़े पैमाने पर किया। वे विश्वविद्यालयों तक सीमित न रहकर सड़कों पर आ गए। उनका विरोध संशोधित कानून में धर्म के आधार पर नागरिकता प्रदान करने वाले प्रावधान को लेकर है। उनका कहना है कि इससे संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार का हनन होता है। सरकार कहती है कि यह कानून किसी की नागरिकता छीनने के लिए नहीं, धर्म के नाम पर प्रताड़ित शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए है। बात यहीं नहीं रुकती, कानून का विरोध करने वाले इसे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) से जोड़ रहे हैं। असम में एनआरसी का प्रयोग विवादास्पद रहा और वहां की सरकार इसके नतीजे स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

तीखी बहसों और भारी विरोध के बावजूद सरकार द्वारा संसद में इस कानून को पारित करा लेने के बाद से देश में उथल-पुथल मची है। इस मुद्दे पर बड़ा विभाजन भी देखा जा रहा है जो किसी राष्ट्र के लिए हितकर नहीं हो सकता। विदेशी घुसपैठियों को लेकर कई दशकों से बेचैनी, विवाद और आंदोलन का केंद्र रहे असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में विरोध की लपटें पहले उठीं। जब यह दिल्ली और देश भर के विश्वविद्यालयों, आइआइटी, आइआइएम और दूसरे शिक्षण संस्थानों में पहुंची तो स्थिति गंभीर हो गई। आम आदमी भी विरोध कर रहे हैं, लेकिन कई जगह इसे समुदाय विशेष के विरोध के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया और एएमयू में पुलिस ज्यादती की खबरें सामने आईं। विरोध प्रदर्शन लोगों का हक है, पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ भी केस कर्ज करने की खबरें चिंता पैदा करती हैं। इन प्रदर्शनों में डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोगों की जान गई है। अकेले उत्तर प्रदेश में 16 लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश की मौत गोली लगने से हुई। सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की वसूली पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त बयान की भी आलोचना हो रही है। सुप्रीम कोर्ट में अनेक याचिकाएं दायर हुई हैं, जिनमें कानून को संविधान-विरोधी बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है।

लोगों में डर फैल रहा है कि एनआरसी लागू होगा तो दस्तावेजों की उपलब्धता और जांच प्रक्रिया की खामियों के चलते करोड़ों लोगों की नागरिकता छिन सकती है। सरकार इस डर को बेवजह बता रही है। खुद प्रधानमंत्री ने कहा है कि देश भर में एनआरसी नहीं लाया जा रहा है, लेकिन उनकी सरकार की सूचनाओं और गृह मंत्री अमित शाह के बयानों ने भ्रम पैदा किया है। डर तब और बढ़ा जब राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए कैबिनेट ने संसाधन मुहैया कराने का फैसला ले लिया। विरोधी इसे एनआरसी से पहले का चरण बता रहे हैं, जबकि गृह मंत्री दोनों के बीच कोई संबंध नहीं होने की सफाई दे रहे हैं। अब यह बहस तेज हो गई है कि हमारा संविधान जिस धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, वह खतरे में तो नहीं? क्या सरकार हिंदुत्व का एजेंडा आगे बढ़ा रही है? विदेशी मंचों और मीडिया में भी इस मसले को काफी जगह मिल रही है। अतः कूटनीतिक मोर्चे पर सरकार को सावधानी बरतनी होगी क्योंकि दुनिया में भारत की छवि उदार लोकतांत्रिक देश की है। यही वे पहलू हैं जिनके चलते आउटलुक ने नागरिकता के प्रश्न को 2019 का मुद्दा बनाया है। हमने संविधान विशेषज्ञों, सामाजशास्त्रियों, राजनीतिशास्त्रियों, शिक्षाविदों और राजनेताओं के आलेख और राय को पाठकों के सामने रखने का प्रयास इस विशेषांक में किया है। राजनीतिक मोर्चे पर भी 2019 की अहमियत रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारी बहुमत से एनडीए की सरकार दोबारा बनी है। लेकिन लोकसभा चुनावों के बाद राज्यों में भाजपा को लगातार नुकसान हो रहा है। साल की समाप्ति से पहले झारखंड में हार उसे नई रणनीति अपनाने के लिए मजबूर करेगी। इस रणनीति में जीवन से जुड़े मुद्दे केंद्र में हों, क्योंकि 2020 में दिल्ली और बिहार के चुनाव आगे राजनीति की दिशा तय करेंगे।

हमें 2020 को उम्मीद के साल के रूप में भी देखना चाहिए। आशा करनी चाहिए कि भावनात्मक मुद्दों के बजाय जीवन बेहतर बनाने वाले आर्थिक मुद्दों पर सरकार का फोकस बढ़ेगा, क्योंकि अर्थव्यवस्था दो दशक में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है।

आउटलुक के पाठकों को नववर्ष 2020 की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।   

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