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फैसलों की वजह ढूंढ़ते सवाल

नागरिकता संशोधन विधेयक जल्दबाजी में लाकर सरकार कहीं आर्थिक मोर्चे पर तमाम तरह की चुनौतियों से लोगों का ध्यान बंटाने की कोशिश तो नहीं कर रही है?
नागरिकता संशोधन विधेयक

पिछले कुछ महीने से देश की राजधानी सहित कई हिस्सों में प्रदर्शनों और विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं। पूर्वोत्तर के लगभग सभी राज्यों में तो जैसे विरोध की आग धधक रही है। कुछ-कुछ वही नजारा है, जो कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार के अंतिम दौर में दिखा था। गौरतलब है कि इन सभी आंदोलनों, धरने-प्रदर्शनों के पीछे सरकार के फैसले और एक साथ कई मोर्चों पर बढ़ती नाकामी है। भारी बहुमत से सत्ता में लौटी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की दूसरी सरकार साल भर से भी पहले इस तरह के विरोध और आंदोलनों का सामना करेगी, इसकी संभावना चुनाव नतीजों के बाद बहुत अधिक नहीं थी। लेकिन सरकार ने एक के बाद एक ताबड़तोड़ फैसले लेने की जो रणनीति अपनाई, उससे स्थिरता को चुनौती मिल रही है। लगभग दो महीने से जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के छात्र आंदोलन कर रहे हैं क्योंकि सरकार ने वहां तमाम तरह के शुल्क और फीस कई गुना बढ़ा दी है। सरकार लगातार बैकफुट पर है लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकला है।

अर्थव्यवस्था नीचे की ओर गोता लगा रही है और थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद नए आंकड़े उसकी बदहाली की तसवीर पेश कर रहे हैं। लेकिन सरकार है कि उसके पास इस संकट से निपटने की कोई पुख्ता नीति नहीं दिखती है। चालू साल के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बजट पिछले कई दशकों का सबसे नाकाम बजट साबित होने जा रहा है। एक तो, वित्त मंत्री और देश का शीर्ष नेतृत्व अर्थव्यवस्था में कमजोरी को स्वीकार ही नहीं कर रहा था। दूसरे, गिरती विकास दर के बीच पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने का जुमला गढ़ा जा रहा था। फिर, मौजूदा हालात सरकार की नीति-निर्माण क्षमता पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं। जो कदम उठाए गए, वे या तो नाकाफी हैं या फिर उनके पीछे कोई पुख्ता सोच नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था जब आम लोगों की घटती आमदनी के चलते मांग में गिरावट की समस्या से जूझ रही है, वित्त मंत्री ने कॉरपोरेट कर में कटौती का तोहफा कंपनियों को दिया। इसका कोई फायदा होने वाला नहीं है क्योंकि मांग घटने से अधिकांश कंपनियों के मुनाफे घट रहे हैं। नौकरी के बड़े मौके देने वाले टेलीकॉम, रियल एस्टेट और वित्तीय क्षेत्र खुद वजूद बचाने के लिए जूझ रहे हैं और इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नौकरियां जा रही हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था दशकों के सबसे बदतर दौर से गुजर रही है। ऐसे में जिस डेमोग्राफिक डिविडेंड को लेकर बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे थे, वह बढ़ती बेरोजगारी के चलते डेमोग्राफिक डिजास्टर की ओर जाता दिख रहा है।

इसी के साथ पिछले दिनों महिलाओं से जुड़े अपराधों में जैसी वीभत्सता देखी गई, उसके चलते देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं। हैदराबाद में एक महिला पशुचिकित्सक की बलात्कार के बाद नृशंस हत्या के सिलसिले में पकड़े गए चार आरोपियों को पुलिस ने कथित तौर पर एन्काउंटर में मार गिराया। इसको लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आईं, वह चिंताजनक और कानून-व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होने का संकेत हैं। ये सारे मसले लोगों की बेचैनी बढ़ा रहे हैं और लोगों को आंदोलन के लिए सड़कों पर ला सकते हैं। दुनिया के कई देशों में हाल ही में ऐसा हो चुका है।

हाल के सबसे विवादास्पद नागरिकता कानून में संशोधन के फैसले ने तो विरोध प्रदर्शनों को तेज ही किया है। इसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से दिसंबर 2014 तक आए धार्मिक प्रताड़ना के शिकार हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है, लेकिन मुस्लिमों को इससे बाहर रखा गया है। ऐसे में सरकार के इस कदम को धर्म के आधार पर भेदभाव के रूप में देखा जा रहा है। यह तीखी बहस का मुद्दा बन गया है। खासकर पूर्वोत्तर में तो सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद बड़े विरोध प्रर्दशनों का सिलसिला जारी है, क्योंकि यह कानून वहां के जनजातीय लोगों को अपने हितों पर आघात करता दिख रहा है। इससे देश के संघीय ढांचे पर भी नए सवाल खड़े हो सकते हैं। तमाम कानूनविद इस कानून को भारतीय संविधान की भावना और प्रावधानों के खिलाफ बता रहे हैं, इसलिए यह मसला सुप्रीम कोर्ट में जरूर पहुंचेगा। यानी इस कानून को न्यायिक समीक्षा का सामना करना होगा।

सवाल यह भी है कि अचानक देश में बाहरी लोगों या शरणार्थियों की कोई बाढ़ नहीं आई है, तो सरकार को इतनी जल्दबाजी क्यों है? कहीं ऐसा तो नहीं कि आर्थिक मोर्चे पर तमाम तरह की चुनौतियों से जूझती सरकार लोगों का ध्यान बंटाना चाहती है। लेकिन वजह जो भी हो, इस कदम को सामान्य नहीं कहा जा सकता है और आने वाले दिनों में भी यह मुद्दा शांत होने वाला नहीं है। इसलिए सरकार के लिए एक के बाद एक चुनौतियां खड़ी होती जा रही हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ने में सरकार को जल्दबाजी नहीं, धैर्य से काम लेना चाहिए और हर कदम सोच-विचार कर उठाना चाहिए।    

 @harvirpanwar

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