जन आंदोलन का रूप लेता विरोध

एस.के. सिंह
हम साथ हैंः जामिया और एएमयू में पुलिस कार्रवाई का विरोध करते मुंबई के छात्र
हम साथ हैंः जामिया और एएमयू में पुलिस कार्रवाई का विरोध करते मुंबई के छात्र

एस.के. सिंह
युवाओं के हाथ में कमान, लेकिन हर वर्ग के लोगों का मिल रहा है समर्थन; भाजपा के ज्यादातर सहयोगी दलों ने भी सीएए से किनारा किया

देश में इन दिनों जन्म प्रमाणपत्र बनवाने वालों की कतार लगने लगी है, खास कर बुजुर्गों की। उन्हें डर है कि अगर उन्होंने यह प्रमाणपत्र नहीं दिया, तो उनके परिवार को अवैध नागरिक घोषित कर दिया जाएगा। उनका यह डर नागरिकता संशोधन कानून 2019 (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) से उपजा है। यह डर बेबुनियाद भी नहीं। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता तक, सबने इस बारे में संसद के भीतर और बाहर विरोधाभासी बयान दिए हैं। यही कारण है कि सीएए, एनआरसी और एनपीआर का विरोध धीरे-धीरे जन आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। सरकार की तरफ से बार-बार सफाई दी जा रही है कि सीएए नागरिकता छीनने के लिए नहीं, देने के लिए है और एनआरसी का अभी कोई प्रस्ताव नहीं है। लेकिन खासकर गृहमंत्री के बयान को देखते हुए लोग मान रहे हैं कि देर-सबेर एनआरसी लागू होगा ही। अमित शाह ने संसद में कहा था कि 2024 से पहले पूरे देश में एनआरसी लागू किया जाएगा। भाजपा लोगों को समझाने के लिए जो बुकलेट बांट रही है, उसमें भी कहा गया है कि सीएए के बाद एनआरसी आएगा। इसी विरोधाभास का नतीजा है कि विरोध थम नहीं रहा है। अहम बात यह है कि इस विरोध की अगुवाई करने वाला कोई बड़ा चेहरा नहीं है। लोग खुद आगे आ रहे हैं। एएमयू छात्र संगठन के मानद सचिव हुजैफा आमिर कहते हैं, “आम लोग अगुआई कर रहे हैं, इसलिए यह आंदोलन इतना बड़ा हो सका है।” हुजैफा के अनुसार 15 दिसंबर 2019 की रात एएमयू के 100 साल के इतिहास की सबसे काली रात थी। पुलिस ने छात्रों के साथ आतंकवादियों की तरह सलूक किया। यूनिवर्सिटी बंद होने के कारण बाहरी छात्र तो घर चले गए, लेकिन स्थानीय छात्र रोजाना प्रदर्शन कर रहे हैं। जब तक नागरिकता कानून वापस नहीं होगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

सीएए का विरोध किस तरह जन आंदोलन का रूप ले रहा है, इसकी बानगी कोलकाता के आबिर सरकार ने दी। इन्कलाबी स्टूडेंट्स यूनिटी नामक छात्र संगठन के कन्वीनर आबिर ने बताया कि शहर में प्रदर्शन का आह्वान चाहे जो करे, हर वर्ग के लोग उसमें हिस्सा लेने पहुंच जाते हैं। कोलकाता की प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी के छात्र देबायुध सान्याल का मानना है कि एनआरसी से गरीब ज्यादा प्रभावित होंगे। वे कहते हैं, “कहा जा रहा है कि नागरिकता के लिए जन्म प्रमाणपत्र देना पड़ेगा। भारत में करोड़ों लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है। वे क्या करेंगे? विरोध कब तक चलेगा, इस पर देबायुध कहते हैं कि अगर शाहीन बाग में महिलाएं और बच्चे दिन-रात प्रदर्शन कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं। सरकार की तरफ से अभी तक प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ बातचीत की कोई पहल नहीं दिखी है। मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस) के रिसर्च स्कॉलर और छात्र संगठन के पूर्व महासचिव फहद अहमद कहते हैं, “अंग्रेज भी गोलमेज सम्मेलन करते थे, लेकिन यह सरकार बात नहीं कर रही है। अगर हम हार गए तो 15 साल पीछे चले जाएंगे।”

अपने भी नाराज

सीएए को लेकर आरएसएस और भाजपा के नेता भी नाखुश हैं। संघ के एक बड़े नेता सीएए में कई त्रुटियां गिनाते हैं। उनके मुताबिक एक तो फैसला जल्दबाजी में लिया गया, और दूसरा, इसकी ड्राफ्टिंग में गड़बड़ी है। ऐसा लगता है कि देश के पूरे 20 करोड़ मुसलमानों की बात हो रही है। बिल लाने के पहले जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए था, ताकि कोई भ्रम न रहे। तब मुस्लिम समुदाय ही सरकार का समर्थन करता। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “सीएए और एनआरसी पर जिस तरह से देशभर में प्रतिक्रिया हुई है, उसकी हमें उम्मीद नहीं थी। हमें लगता था कि जैसे अनुच्छेद 370 और अयोध्या फैसले पर सब कुछ नियंत्रण में था, वैसा ही इस बार भी होगा। विपक्ष भी लोगों को यह समझाने में सफल रहा कि एनआरसी और सीएए अल्पसंख्यकों के खिलाफ है।” डैमेज कंट्रोल करने के लिए भाजपा ने लोगों को सीएए-एनआरसी के बारे में बताने का अभियान शुरू किया है, लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि यह काम कानून लाने से पहले किया जाना चाहिए था। भाजपा के कई सहयोगी दलों के सुर भी उससे अलग हैं। एनडीए में शामिल भाजपा के 10 सहयोगी दलों ने देशव्यापी एनआरसी का विरोध किया है। संसद में नागरिकता बिल का समर्थन करने वाली असम गण परिषद (अगप) ने तो बाद में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। सीएए के खिलाफ करीब 60 याचिकाएं दायर हुई हैं, जिन पर 22 जनवरी 2020 को पहली सुनवाई होगी। एनडीए से बाहर देखें, तो ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी की वाइएसआर कांग्रेस ने संसद में नागरिकता कानून का समर्थन किया था, लेकिन अब उनके सुर भी बदल गए हैं। गैर-भाजपा शासित राज्यों में पश्चिम बंगाल, पंजाब, केरल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने कहा है कि वे अपने यहां नागरिकता कानून लागू नहीं करेंगे। केरल विधानसभा ने तो एक प्रस्ताव भी पारित किया जिसमें नागरिकता कानून को रद्द करने की मांग की गई है। केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने 11 गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा है कि वे भी अपने यहां सीएए के खिलाफ प्रस्ताव लेकर आएं।

 

एनपीआर पर ऊहापोह

एनपीआर पर 1 अप्रैल 2020 से काम शुरू होगा और 30 सितंबर तक चलेगा। इसमें किन कागजात की जरूरत होगी, इसे लेकर ऊहापोह है। गृह मंत्रालय ने सफाई दी है कि एनपीआर के लिए होने वाले सर्वे में कोई कागजात नहीं देना पड़ेगा। लोग जो जानकारी देंगे, वही रिकॉर्ड के तौर पर स्वीकार किया जाएगा। लेकिन एनपीआर मैनुअल में ही साफ लिखा है कि डाटाबेस अपडेट करने के लिए लोगों द्वारा दी गई जानकारियां सत्यापित की जाएंगी। सत्यापन मूल दस्तावेजों के बिना कैसे होगा?

 

पश्चिम बंगाल पर नजर

सीएए को विधानसभा चुनावों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। अगले महीने दिल्ली, साल के अंत में बिहार और अगले साल शुरू में पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल बड़ा राजनीतिक लक्ष्य है। राज्य में 2016 के विधानसभा चुनाव से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव तक भाजपा काफी मजबूत हुई है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार इस दौरान भाजपा का वोट शेयर 10.16% से बढ़कर 40.64% हो गया, जबकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर 44.91% से घटकर 43.69% पर आ गया। लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट शेयर तृणमूल से सिर्फ तीन फीसदी कम था। वोट संख्या के लिहाज से अंतर सिर्फ 17.28 लाख का रह गया, जो 2016 में 1.9 करोड़ का था। पश्चिम बंगाल की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 27% और वोटरों में 31% है। राज्य की 294 विधानसभा सीटों में से करीब 90 सीटों के नतीजे उन पर निर्भर करते हैं। 2016 में ये सीटें तृणमूल के खाते में गई थीं। लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की एआइएमआइएम 2021 के चुनाव में उतरेगी। इससे मुस्लिम वोट बंट सकते हैं, जिसका तृणमूल को नुकसान और भाजपा को फायदा होगा। भाजपा नागरिकता कानून के जरिए हिंदू शरणार्थियों के वोट भी अपने पाले में करना चाहती है। लोकसभा चुनाव में ध्रुवीकरण साफ दिखा जब नागरिकता का मुद्दा उठाने के कारण मतुआ (वैष्णव) समुदाय ने भाजपा के पक्ष में वोट दिया था। पहले यह तृणमूल के साथ था। इस समुदाय का जन्म बांग्लादेश (तब अविभाजित) में हुआ था। अनुमान है कि 70 लाख शरणार्थी मतुआ समुदाय के हैं। जब भाजपा और तृणमूल में वोटों का अंतर ही 17 लाख का है, तो 70 लाख मतदाताओं का महत्व समझा जा सकता है।

 

क्या है असमियों के डर की वजह

सीएए के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत असम में हुई थी। वहां ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) की अगुवाई में रोजाना रैलियां हो रही हैं। 2 जनवरी 2020 को मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के गृह नगर चाबुआ में विशाल रैली हुई, जिसमें 30 संगठनों ने हिस्सा लिया। दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ भाजपा की तरफ से भी शांति मार्च निकाला जा रहा है। आसू के महासचिव लुरिनज्योति गोगोई का कहना है कि असम एक भी अवैध बांग्लादेशी का बोझ नहीं सहेगा, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान। दरअसल, असम का विरोध बाकी देश से अलग है। असमियों के लिए यह मुद्दा क्यों अहम है, यह गुवाहाटी से प्रकाशित एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक के वरिष्ठ पत्रकार की बातों से साफ हो जाती है। उन्होंने बताया, “15 अगस्त 1985 के असम समझौते का क्लॉज 5 कहता है कि 24 मार्च 1971 के बाद आने वाले हर अवैध शरणार्थी की पहचान की जाएगी और उसे निकाला जाएगा। लेकिन सीएए में यह तारीख बदलकर 31 दिसंबर 2014 कर दी गई। असम की संस्कृति को बरकरार रखने के लिए सरकार क्लॉज 6 लागू करने की बात कहती है, लेकिन लोगों की मांग है कि पहले क्लॉज 5 पर बात हो।” उन्होंने बताया कि राज्य में करीब पांच लाख हिंदू बंगाली शरणार्थी हैं। इन्हें मतदान का अधिकार नहीं है, लेकिन नागरिकता कानून के बाद ये वोटर बन जाएंगे। 1960 में भी भाषा को लेकर असमी-बंगाली झगड़ा हुआ था, जिसमें अनेक लोग मारे गए थे। असमियों को डर है कि नए कानून से बंगाली उन पर हावी हो जाएंगे। 2011 की जनगणना में असमी बोलने वालों का प्रतिशत कम हुआ था और बांग्लाभाषियों का बढ़ गया था। अगर पांच लाख बांग्लाभाषी जुड़े तो धीरे-धीरे हमारी भाषा के लिए खतरा हो जाएगा।

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जज्बाः कड़ाके की सर्दी में भी बच्चों के साथ प्रदर्शन

शाहीनबाग सबसे अनूठा विरोध

अक्षय दुबे

“हमारे बाप-दादा समेत हमारी कई पुश्तें यहां दफन हो गईं। जब भारत का बंटवारा हुआ तब जिनको जहां जाना था, वे चले गए। हम यहां रह गए। लेकिन आज हमारी नागरिकता पर सवाल उठा रहे हैं। हम कहां जाएंगे?” एक सांस में इतना बोलने के बाद 90 साल की असमा खातून कहती हैं, “हम कहीं नहीं जाएंगे और ना ही हम कागजात दिखाएंगे। हिंदुस्तान हमारा है।” 90 साल की असमा खातून, 82 साल की बिलकीस, 75 साल की सरवरी और 70 साल की नोन निसा समेत सैकड़ों औरतें छोटे-छोटे बच्चों के साथ दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में बीच सड़क पर अस्थायी तंबू के नीचे डटी हैं। उनकी मांग है कि नागरिकता संशोधन कानून और एनपीआर को मोदी सरकार वापस ले।

असमा खातून का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया। उन्हें तो अपनी मां की उम्र की महिलाओं की सेवा करनी चाहिए। नोन निसा कहती हैं, “हमें ठंड से नहीं, एनआरसी और सीएए से डर लग रहा है। इस उम्र में हम कहां जाएंगे? जब तक यह वापस नहीं होगा, हम उठने वाले नहीं हैं।” सरवरी कहती हैं, “हमें नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज दिखाने को कह रहे हैं। इस देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास कोई कागज नहीं हैं। कई लोगों के दस्तावेज बाढ़-बारिश में बह गए। वे कहां से लाएंगे कागज?” नोन निसा और बिलकिस कहती हैं, “हम कागज नहीं दिखाएंगे। असम में तो लोगों ने कागज दिखाए थे, उनका क्या हुआ?” 31 दिसंबर से अनशन पर बैठी 50 साल की मेहरुन्निसा कहती हैं, “सरकार का कोई नुमाइंदा अब तक यहां नहीं आया। जब तक यह कानून वापस नहीं होगा, अनशन जारी रहेगा।” शाहीनबाग में रहने वाली सायमा के बच्चे बीमार हैं, बावजूद इसके वे ज्यादातर समय प्रदर्शन स्थल पर ही बिताती हैं। वह कहती हैं, “यह हक की लड़ाई है। जो सर्दी हमें घर में रहने नहीं दे रही है, वैसे में हम खुले आसमान के नीचे बैठे हैं। कोई तो वजह होगी? प्रधानमंत्री से अपील है कि वे इतने बेरहम न बनें।”

समाजसेवी मोहम्मद अयूम भी इस प्रदर्शन में शामिल हैं, लेकिन एनआरसी पर उनके विचार अलग हैं। वे कहते हैं, “मैं एनआरसी का समर्थन करता हूं, लेकिन अभी हम इससे सौ साल दूर हैं। सरकार को पहले लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी करनी होंगी। फिर लोग खुद इसकी मांग करेंगे।” मंच से कुछ दूर खड़े कल्बे आलम कहते हैं, "पुलिस ने दिल्ली से लेकर यूपी तक, हर जगह प्रदर्शन कर रहे लोगों पर ज्यादती की है। सरकार का मकसद किसी को देश में बसाना नहीं, बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़ाना है।”

क्यों खास है शाहीनबाग का प्रदर्शन

शाहीन बाग में विरोध-प्रदर्शन की अगुआई महिलाएं कर रही हैं। 15 दिसंबर से कड़ाके की ठंड के बावजूद उनका प्रदर्शन जारी है। आइआइटी दिल्ली से पीएचडी कर रहे आसिफ मुस्तफा बताते हैं कि यहां का प्रदर्शन कई मायनों में अलग है। यह बेहद शांतिपूर्ण है। यहां पुरुष और महिलाएं दोनों साथ-साथ प्रदर्शन कर रही हैं। जो महिलाएं कभी घर से बाहर नहीं निकलीं वे भी आज यहां खुले आसमान के नीचे बैठी हैं। यहां के प्रदर्शन से दूसरे लोग सीख ले रहे हैं।

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