नेटवर्क गायब होने की ढलान

प्रशांत श्रीवास्तव
बीएसएनएल
बीएसएनएल

प्रशांत श्रीवास्तव
स्टाफ में भारी कटौती से सेवाएं प्रभावित, वेतन और वेंडर पेमेंट में देरी

सरकारी टेलीकॉम कंपनी भारतीय संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) का संकट खत्म होता नहीं दिख रहा है। उम्मीद थी कि रिवाइवल पैकेज के बाद कंपनी की दिक्कतें कम होंगी, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। कंपनी कई स्तरों पर दिक्कतों का सामना कर रही है। एक तरफ जहां वह अपने ग्राहकों को सुचारु रूप से सेवाएं नहीं दे पा रही है, वहीं कंपनी के वेंडर्स का भी भुगतान अटक  गया है। इन समस्याओं के बीच कर्मचारियों को वेतन भी देरी से मिल पा रहा है। परेशानी का आलम यह है कि केंद्र सरकार का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट भारतनेट भी तय समय से एक साल लेट हो गया है। स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि इन गंभीर मुद्दों को लेकर टेलीकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद भी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक करके चर्चा कर चुके हैं।

करीब 20 साल पहले 2000 में बनी बीएसएनएल के पास एक समय 37 हजार करोड़ रुपये का कैश रिजर्व हुआ करता था। लेकिन 2009-10 में कंपनी की बर्बादी की कहानी शुरू हुई। बीएसएनएल को उस साल 1840.7 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। उसके बाद से यह सिलसिला कभी नहीं रुका और 2018-19 में कंपनी घाटा 14 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया। हालत यह हो गई कि पहली बार जून 2019 में कंपनी अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पाई। कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, उस समय से शुरू हुआ यह सिलसिला अभी तक सुधर नहीं पाया है। 50 फीसदी कर्मचारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले चुके हैं, फिर भी बचे कर्मचारियों को समय पर वेतन का भुगतान नहीं हो पा रहा है। कर्मचारियों को अप्रैल के अंत तक मार्च का वेतन नहीं मिल पाया था।

 

सेवाएं देने में दिक्कत

बीएसएनएल में रिवाइवल पैकेज के तहत करीब 80 हजार कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दी जा चुकी है। इसकी वजह से अब 80 हजार कर्मचारी रह गए हैं। इससे कंपनी का मासिक सेलरी बिल 900 करोड़ रुपये से घटकर 450 करोड़ रुपये रह गया है। लेकिन स्टाफ कम होने से दिक्कतें आ रही हैं। कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, कंपनी इस समय कर्मचारियों की भारी कमी का सामना कर रही है। इसकी वजह से ग्राउंड लेवल स्टॉफ की ज्यादा किल्लत हो गई है। इसका प्रतिकूल असर यह हुआ है कि कंपनी को अपनी सेवाएं सामान्य रूप से देने में दिक्कत आ रही है। अधिकारी के अनुसार, एक समय कंपनी के 335 सेंकेंड्री स्विचिंग एरिया (एसएसए) हुआ करते थे, उनकी संख्या घटकर अब केवल 200 रह गई है। इसी तरह कंपनी के कुल 22 हजार एक्सचेंज हैं। लेकिन उनको चलाने के लिए पर्याप्त स्टॉफ नहीं है। इसके कारण उपभोक्ताओं की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं।

बढ़ती दिक्कतों का आलम यह है कि कंपनी के वेंडर्स को महीनों से भुगतान नहीं मिल पाया है। बढ़ते बकाए को देखते हुए पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स की टेलीकॉम कमेटी ने भी टेलीकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद को अप्रैल में एक पत्र लिखा। इसके अनुसार, बीएसएनएल के ऊपर वेंडर का करीब 20 हजार करोड़ रुपये बकाया है। इसी तरह टॉवर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स एसोसिएशन (टीएआइपीए) ने भी बढ़ते बकाए को देखते हुए बीएसएनएल के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (सीएमडी) प्रवीन कुमार पुरवार को एक पत्र लिखा है। अप्रैल में लिखे पत्र की पुष्टि बीएसएनएल के एक अधिकारी ने आउटलुक से की है। एसोसिएशन के डायरेक्टर जनरल टी.आर.दुआ के पत्र के अनुसार, बीएसएनएल के ऊपर 1500 करोड़ रुपये का बकाया है। इसकी वजह से वेंडर्स को बीएसएनएल के टॉवर जिन इमारतों पर लगे हुए हैं, उनके मालिकों को किराया देने में दिक्कत आ रही है। इसी तरह बिजली बिल के भुगतान में भी देरी हो रही है। साथ ही बैटरी और डीजल खरीद भी प्रभावित हो रही है। इन सबका असर सेवाओं पर सीधे तौर पर पड़ रहा है।

कंपनी जिन इमारतों में अपने एक्सचेंज चला रही है, उनके भी किराए के भुगतान में दिक्कतें बढ़ गई है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में भीरा कस्बे के रहने वाले अजीत सिंह बताते हैं, “उनकी बिल्डिंग में करीब 25 साल से बीएसएनएल का एक्सचेंज चल रहा है, लेकिन पिछले दो साल से कंपनी समय पर किराया नहीं दे रही है। बड़ी मुश्किल से कुछ दिन पहले पुराना भुगतान मिला है। किराया भी नहीं बढ़ रहा है। कंपनी को बिल्डिंग छोड़ने को कहते हैं तो उसके लिए भी वह तैयार नहीं है।”

ऐसा नहीं है, इन दिक्कतों का सामना केवल कंपनी के कर्मचारी और वेंडर ही कर रहे हैं, अब इसकी आंच भारत सरकार के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट भारतनेट-2 पर भी आ रही है। प्रोजेक्ट चलाने वाली कंपनी भारत ब्रॉडबैंड नेटवर्क लिमिटेड (बीबीएनएल) के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, मार्च 2020 तक इसे पूरा किया जाना था, लेकिन अब यह प्रोजेक्ट 2021 में ही पूरा हो पाएगा। इसकी एक बड़ी वजह प्रोजेक्ट में शामिल कंपनियां और राज्य सरकारें हैं, जो अपने लक्ष्य के अनुसार काम नहीं कर रही हैं। बीएसएनएल के पास भी प्रोजेक्ट के तहत कई राज्यों के काम हैं। लेकिन अधिकतर राज्यों में काम डेडलाइन से काफी पीछे चल रहा है। बीबीएनएल की एक आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार, बीएसएनएल के पास सीपीएसयू मॉडल (इसमें बीएसएनएल, रेलटेल और पॉवर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड कंपनियां शामिल हैं) के तहत उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, जम्मू और कश्मीर की 25,157 ग्राम पंचायतों का काम है। लेकिन अभी तक 524 ग्राम पंचायतें ही जुड़ पाई हैं। अधिकारी के अनुसार, प्रोजेक्ट में देरी की एक बड़ी वजह बीएसएनएल की खराब वित्तीय स्थिति है।

4जी टेंडर पर भी सवाल

इन समस्याओं के बीच कंपनी के सामने एक और परेशानी है। असल में 70 हजार करोड़ रुपये के रिवाइवल पैकेज के तहत केंद्र सरकार ने यह ऐलान किया था कि बीएसएनएल 4जी सेवाएं शुरू करेगी। इसके लिए कंपनी ने 11 हजार करोड़ रुपये का टेंडर निकाला है। टेंडर 9 मई 2020 को खुलने वाला था। लेकिन उसके पहले टेलीकॉम इक्विपमेंट एंड सर्विसेज एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ने टेंडर पर सवाल खड़े कर दिए। सूत्रों के अनुसार, कॉमर्स मिनिस्ट्री को लिखे गए पत्र में कहा गया कि बीएसएनएल ने टेंडर जारी करते समय मेक इन इंडिया के नियमों की अनदेखी की है। शिकायत की पुष्टि आउटलुक से बीएसएनएल के एक अधिकारी ने भी की है। ऐसी आशंका है कि लॉकडाउन खुलने के बाद टेंडर में देरी हो सकती है। अगर ऐसा होता है, तो इसका भी असर कंपनी के भविष्य की योजनाओं पर पड़ेगा। कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों की शुरू से यह शिकायत रही है कि सरकार की देरी के कारण वह प्राइवेट कंपनियों से मुकाबला नहीं कर पा रही है। इसके कारण ही उसके ग्राहकों की संख्या घटती जा रही है। जब कंपनियां 5जी लाने की तैयारी कर रही हैं, उस समय बीएसएनएल 2जी और 3जी सेवाएं ही अपने ग्राहकों को दे रही है। तकनीक में पिछड़ने का असर कंपनी की बाजार हिस्सेदारी में साफतौर पर दिखता है। इंडियन ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन के अनुसार, मोबाइल सेवा में कंपनी की बाजार हिस्सेदारी मार्च 2005 में 17 फीसदी से घटकर अब 10 फीसदी पर आ गई है, जो न्यूनतम हिस्सेदारियों में एक है। तकरीबन 90 फीसदी बाजार पर निजी क्षेत्र की कंपनियों का कब्जा हो चुका है।

जाहिर है, रिवाइवल पैकेज मिलने के बाद भी कभी टेलीकॉम सेक्टर की दिग्गज खिलाड़ी रही इस कंपनी की वित्तीय स्थिति सुधर नहीं रही है। ऐसे में अगर कुछ ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जैसा कि कंपनी के एक पूर्व सीएमडी आशंका जताते हैं कि पहले से ही प्राइवेट कंपनियों के मुकाबले में काफी पिछड़ चुकी बीएसएनएल कहीं उन्हीं के हवाले न हो जाए। अब यह तो सरकार और कंपनी के प्रबंधन को ही तय करना है।

 

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बीएसएनएल पर कर्मचारियों का बोझ शुरू से था, नए दौर में उसे प्रोफेशनल तरीके से काम करना होगा तभी वह प्राइवेट सेक्टर से मुकाबला कर पाएगी

 

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