भूला-बिसरा कलमकार

विमल कुमार
बनारसी प्रसाद भोजपुरी रचनावली
बनारसी प्रसाद भोजपुरी रचनावली

विमल कुमार
कहानीकार अरविंद कुमार ने भोजपुरी जी की रचनावली निकाल कर नई पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व और योगदान से परिचित कराया है

अंतिम संस्कार के बाद जब मुंशी प्रेमचंद का पार्थिव शरीर चिता की आग में धू-धू कर जल गया और उनकी खोपड़ी बची रह गई तो महाकवि जयशंकर प्रसाद ने सम्मान भाव से उनके घरेलू नौकर को कहा था, “उठाओ बांस और खोपड़ी चूर कर दो। इस खोपड़ी ने समाज में तहलका मचा दिया था।” यह संस्मरण हिंदी के स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और लेखक बनारसी प्रसाद भोजपुरी का है, जिनकी तीन खंडों में रचनावली हाल ही में प्रकाशित हुई है।

कहानीकार अरविंद कुमार ने भोजपुरी जी की रचनावली निकाल कर नई पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व और योगदान से परिचित कराया है। भोजपुरी जी, जैनेन्द्र, यशपाल और भगवतीचरण वर्मा के समकालीन रहे। प्रेमचंद की शवयात्रा में भोजपुरी भी शामिल हुए थे और उन्होंने प्रेमचंद पर अपने संस्मरण में प्रसाद का जिक्र किया है। राष्ट्रीय आंदोलन में जेल जाने वाले भोजपुरी जी ने प्रूफरीडर की नौकरी से पत्रकारीय जीवन शुरू किया। 

हिंदी के अन्य लेखकों की तरह उन्होंने भी साहित्य की सभी विधाओं में लेखनी चलाई लेकिन उनकी छवि बिहार तक सिमट कर रह गई। हिंदी के अन्य लेखकों की तरह उन्हें भी आजादी रास नहीं आई और वे शोषण तथा अन्याय के खिलाफ लिखते रहे। उन्होंने सत्ता का दामन नहीं थामा। 1952 में उन्होंने अपने चर्चित उपन्यास गरीब की आह की भूमिका में लिखा, “समाज में जाति, धर्म और वर्ण का निर्माण हमने किया है। ईश्वर का इसमें जरा भी हाथ नहीं... जिस समाज में ऐसी विषमता और असामनता मौजूद हो, उसे संगठित और शक्तिशाली बनाने की कल्पना करना क्या हास्यास्पद नहीं...।” भोजपुरी जी ने प्रेमचंद की परंपरा आगे बढ़ाते हुए यह उपन्यास लिखा था। उन दिनों नागार्जुन भी बलचनमा और रतिनाथ की चाची लिख रहे थे। 1952 में ही भोजपुरी जी का उपन्यास हलवाहे का बेटा भी आया था।

उन्होंने अपने उपन्यासों में सामाजिक समस्याओं और विषयों को ही उठाया जबकि उन दिनों हिंदी में आधुनिकता का प्रवेश हो चुका था और अज्ञेय का बोलबाला था। भोजपुरी जी ने जेल के साथी नामक पुस्तक में पत्र शैली में सामाजिक समस्याओं पर विचार व्यक्त करने की एक शृंखला चलाई जो पाठकों में लोकप्रिय हुई। उनकी दृष्टि साफ थी। वे सांप्रदायिकता और पूंजीवाद दोनों के तीखे आलोचक थे। उन्होंने संपादक के नाम पत्र शैली में व्यंग्य लेखन भी किया और 22 पत्रों में उन्होंने समाज के ज्वलंत प्रश्नों पर कटाक्ष भी किया। लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण उनके लेखकों पर लिखे संस्मरण हैं। मालवीय जी पर एक संस्मरण में उन्होंने एक पंक्ति लिखी है, “महामना को कतिपय राजनैतिक नेता सांप्रदायिक मानते थे पर वास्तव में वे सांप्रदायिक नहीं थे।” आज जिस तरह वर्तमान सत्ता ने मालवीय जी के प्रतीक को हड़प लिया है, उसे देखते हुए भोजपुरी जी की यह पंक्ति हमें कुछ सोचने पर मजबूर करती है।

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