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पुस्तक समीक्षा: चलते-रुकते बिहार के किस्से

बिहार पर आईं दो किताबें गंभीरता से यहां के समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति की जांच-पड़ताल करती हैं।
बिहार पर दो रचनाएं

बिहार पर आईं दो किताबें गंभीरता से यहां के समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति की जांच-पड़ताल करती हैं। रुकतापुर: बिहार जहां थम जाता है पहिया बदलाव की हर गाड़ी का प्रकाशित हो जाने के बाद पुष्यमित्र ने खुद फेसबुक के माध्यम से सूचना दी थी कि वरिष्ठ पत्रकार विकास कुमार झा ने बताया कि अब मुक्तापुर नाम का जो रेलवे स्टेशन बन गया है, उसे कभी रुकतापुर कहा जाता था क्योंकि हर गाड़ी को गांववाले अनिवार्यत: वहां रोकते ही थे। असल में यह किसी एक लाइन पर किसी एक जगह गाड़ी रोकने का चलन मात्र नहीं है। यह बिहार में हर तरह के विकास की गाड़ी को तरह-तरह से रोकने या रुकने का किस्सा है, जिसे सजग पत्रकार पुष्यमित्र ने डायरी शैली में लिखा है। इसमें से कुछ प्रकाशित रपटों का संशोधित रूप है, तो कुछ नए लेख इसमें लिए गए हैं। इस किताब में बिहार की बदहाली का कोई चेहरा न तो छुपता है, न कमजोर दिखता है। जबकि बिहार के पिछड़ेपन और बदहाली की चर्चा पढ़कर ऊब पैदा करती है, तब यह किताब इसे ढंग से दिखाती है। पुस्तक में रोजगार, पलायन, पिछड़ापन, बाढ़, साफ पेयजल की कमी (खासकर दलित और कमजोरों की बस्तियों में), कुपोषण, अकाल मृत्यु, स्वास्थ सेवाओं की बदहाली, लड़कियों की मुश्किलें बदहाल खेती, उद्योग-धंधे, भूमिहीनता, बदहाल शिक्षा, कोचिंग/कंपीटिशन का धंधे की पड़ताल की गई है। रोजगार के लिए पलायन की कहानियां पढ़ते हुए आप मायूस होते हैं और नीति-निर्माताओं और शासन के रवैये पर हैरान होते हैं।

फिर भी यह किताब की खूबी है कि आप एक उम्मीद लेकर इसे पढ़ते जाते हैं। कोसी अंचल में सबसे सड़ी रेल पटरी, सबसे पुराने और घिसे पुल, सबसे खराब रेल कोच, जगह-जगह रुकती रेल के बीच पुष्यमित्र सहरसा से रेलवे को सबसे ज्यादा राजस्व की खबर ले आते हैं। पुष्यमित्र लगभग अपने हर विषय में इस तरह के नए पक्ष लाकर उसे एकदम नया रूप देते हैं। भूमि सुधार, भूदान वगैरह पर सवाल उठाने की जगह जमीन पर कब्जा लेने के चक्कर में मारे गए दलित परिवार के किस्से से लेकर सरकारी खरीद बंद कर पैक्स का नाटक चलाने और खेती पर लागत से दो गुना कीमत के दावे की पोल खोलते हैं। औरतों की बदहाली की जगह पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत में लड़कियों की शादी के नाम पर होने वाली बिक्री के रैकेट को कुछेक सच्ची कथाओं से खोलकर पूरे प्रदेश की असलियत सामने कर देते हैं। शेरशाहवादी लड़कियों के अविवाहित रह जाने की कहानी भी बिहारी समाज की एक सच्चाई है। बटन उद्योग के लिए विख्यात मेहसी और बिहार के औद्योगिक केंद्र रहे डालमियानगर की यात्रा भी काफी कुछ कह देती है।

अनुरंजन ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के प्रयोग के बाद रामलीला मैदान नाम से कुछ आंखों देखी और कुछ रिसर्च से निकाले तथ्यों के आधार पर इस राजनैतिक रामलीला की नए तरह की सच्चाई सामने लाई थी। बिहार चुनाव से पहले लगातार तीस साल के पिछड़ा शासन की भी सच्चाई गांधी मैदान; ब्लफ ऑफ सोशल जस्टिस के माध्यम से लाने की उन्होंने ऐसी ही कोशिश की है, जो पहले पंद्रह साल में एक रूप में चला और उसके बाद थोड़ा रूप बदलकर जारी है। पर यह बात पहले बतानी जरूरी है कि पहली किताब में आंखों देखी चीजों की बहुलता उसे ज्यादा रोचक बना रही थीं, तो दूसरी किताब विश्लेषण और रिसर्च पर ज्यादा जोर के चलते पहली की तुलना में भारी है। लेकिन सामाजिक न्याय के नाम पर जितना नाटक चला है, प्रशासनिक जिम्मेवारियों में लापरवाही हुई है, उसका हिसाब तो होना चाहिए। इतना लंबा पिछड़ा शासन कहीं नहीं चला, जबकि बिहार में जातीय उत्पीड़न का कोई वैसा रिकार्ड नहीं रहा है, जैसा दक्षिण या मध्य भारत में सुनाई देता है। और अब यह बात अगड़े-पिछड़े सबको समझ आ गया है कि यह सत्ता का खेल ज्यादा था, सामाजिक न्याय का कम। अगर बिहार में तीस साल बाद पलायन जारी ही नहीं बल्कि बढ़ा है, शिक्षा चौपट है, स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है, खेती किसानी सबसे खराब हालत में है, उद्योग धंधे इन तीस वर्षों में खत्म हुए हैं, तो सबसे बुरी मार तो पिछडों और दलितों पर ही पड़ रही है। जो अगड़े और संपन्न हैं वे, तो किसी तरह जीवन मैनेज कर लेते हैं, कमजोर जमात पलायन से लेकर बीमारियों की मार और लड़की बेचने जैसी मजबूरियों को झेल रहा है। अनुरंजन ने चारा घोटाला से लेकर शेल्टर होम तक के मामले और मुख्यमंत्री बनने के लालू यादव के दांवपेच से लेकर नीतीश कुमार की चालाकियों तक का विस्तार से जिक्र किया है। इन तीस साल का लेखा-जोखा लेने के साथ उन्होंने सामाजिक न्याय के नाम पर चले नाटक का भी विस्तार से पर्दाफाश किया है।

यह पूरा लेखन एक कड़वाहट भरा है, जिसे कोई बिहार की बदहाली से जुड़ा मान सकता है और कोई लेखक के अगड़ा होने से भी। पुष्यमित्र की किताब भी कुल मिलाकर एक दर्द के साथ ‘निगेटिविटी’ पर ही फोकस करती है। सामाजिक न्याय के नाटक में भी सकारात्मक बातें निकली हैं और रुकतापुर होने के बावजूद बिहार चलता भी है और चलता रहा है।

 

रुकतापुर

पुष्यमित्र

प्रकाशक | राजकमल

पृष्ठः 240 | मूल्यः 250 रुपये

 

गांधी मैदान

अनुरंजन झा

प्रकाशक | हिन्द युग्म

पृष्ठः 220 | मूल्यः 175 रुपये

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