हॉकी के आदिवासी नुमाइंदे

सुरेश चंद्र सिन्हा
हॉकी है जिंदगी
हॉकी है जिंदगी

सुरेश चंद्र सिन्हा
यह पुस्तक ओडिशा के गांवों में हॉकी के पनपने और वहां इस खेल के लिए मौजूद जुनून को बताती है

दशकों पहले एक वक्त था जब हॉकी लोगों को चमत्कृत किया करती थी। राष्ट्रीय खेलों में इसे शुमार किया गया। अब एक वक्त है, जब यह सिमटकर रह गई है, वह भी आदिवासी अंचलों में। खासकर ओडिशा में। खेल और खिलाड़ियों की दुनिया के परिचित पत्रकार सत्येन्द्र पाल सिंह की यह पुस्तक हॉकी की अलग कहानी कहती है। सुंदरगढ़, संबलपुर और देवगढ़ ओडिशा के ऐसे आदिवासी अंचल हैं, जहां लगभग हर कोई हॉकी खेलता है। आदिवासी हॉकी खिलाड़ियों के आदर्श दिलीप तिर्की कहते हैं, “ओडिशा में हॉकी की दीवानगी का आलम यह है कि आप गांव में बस यह बता दें कि हॉकी मैच है, तो हर कोई मैच देखने या खेलने मैदान पर आएगा जरूर।” सही मायने में इन आदिवासी अंचलों के लड़के-लड़कियों के लिए हॉकी रोजी-रोटी कमाने का एक माध्यम भर है। वे हॉकी सिर्फ इसलिए खेलते हैं ‌ताकि इसके जरिए उन्हें नौकरी मिल सके। आधुनिक दौर के कामयाब गोलरक्षक पूर्व ओलंपियन आशीष विप्लव कहते हैं, “ओडिशा में रहनेवाले सभी आदिवासी खिलाड़ियों के लिए सबसे बड़ा द्वंद्व अपनी माटी का मोह न छोड़ पाना है। हॉकी के जरिए नौकरी पाने के बाद भी वे घर या आसपास रहना ज्यादा मुफीद समझते हैं।”

वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र पाल सिंह ने हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के सुपुत्र और पिता की तरह ही हॉकी के हीरो रहे अशोक कुमार सिंह को कोट करते हुए कहा है, “कमजोर पृष्ठभूमि से आने के कारण पढ़ाई-लिखाई इनके लिए हमेशा दिक्कत रही। इस कारण ये लोग दूर तक नहीं सोचते।” अशोक बताते हैं, “ओडिशा में हॉकी के लिए लगभग डेढ़ हजार क्लब हैं। इन क्लबों के बावजूद गरीबी में जिंदगी काटने वाले समुदायों से देश में विभिन्न आयुवर्ग की टीमों में चाहे लड़का हो या लड़की, बेहतरीन प्रतिभाएं आ रही हैं।”

यह पुस्तक ओडिशा के गांवों में हॉकी के पनपने और वहां इस खेल के लिए मौजूद जुनून को बताती है। इन आदिवासी इलाकों में शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां के बच्चे हॉकी न खेलते हों। यह किताब उन महिला खिलाड़ियों पर भी रोशनी डालती है, जिन्होंने आदिवासी इलाकों से निकल कर देश में नाम कमाया। नमिता टोपो, लिलिमा मिंज ऐसी ही खिलाड़ी हैं। लिलिमा की कहानी तो किसी परिकथा से कम नहीं है। अब मांग उठने लगी है कि ओडिशा में एक स्पोर्ट्स हॉस्टल बनाया जाए, ताकि वहां के खिलाड़ियों को समुचित प्रशिक्षण और मार्गदर्शन मिल सके। यह किताब आदिवासी हॉकी खिलाड़ियों और इन्हीं के बीच नायक की तरह उभरे दिलीप तिर्की और जयपाल सिंह मुंडा की कहानी कहती है। पुस्तक में ओडिशा का हॉकी इतिहास और देश का नाम रोशन करने वाले नामी और गुमनामी में चले गए हॉकी खिलाड़ियों का भी विस्तार से विवरण है।

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