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क्या ‘चांद’ ने स्त्रियों को रोशनी दी थी

राष्ट्रीय आंदोलन में कई पत्रिकाओं ने हिंदी नवजागरण की चेतना को फैलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी
चांद: स्त्रीं-शिक्षा विधवा प्रश्न तथा बाल विवाह संकलन

राष्ट्रीय आंदोलन में कई पत्रिकाओं ने हिंदी नवजागरण की चेतना को फैलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन पत्रिकाओं में दो प्रमुख पत्रिकाएं ‘स्‍त्री दर्पण’ (1909) और ‘चांद’ (1922) भी थीं, जो खासकर स्‍त्री विषयों पर केंद्रित थीं और दोनों इलाहाबाद से निकलती थीं। अब तक हिंदी नवजागरण का विमर्श राष्ट्र, भाषा, धर्म वगैरह पर अधिक केंद्रित था, लेकिन अब कुछ वर्षों से अकादमिक जगत में उस दौर के स्‍त्री-प्रश्नों को लेकर जबसे विमर्श तेज हुआ है, तबसे इन पत्रिकाओं की चर्चा और उनके योगदान का विशेष जिक्र होने लगा है। वीर भारत तलवार, वसुधा डालमिया, चारु गुप्ता, गरिमा श्रीवास्तव, रूपा गुप्ता, सुधा सिंह, प्रज्ञा पाठक, सुनंदा पराशर और किंगसन पटेल जैसी विदुषियों ने इस विमर्श को आगे बढ़ाने का काम किया है और ‘चांद’ तथा ‘स्‍त्री दर्पण’ की ऐतिहासिक भूमिका को फिर से रेखांकित करने की कोशिश की है।

पिछले दिनों हिंदी के चर्चित कथाकार प्रियंवद ने भी ‘चांद’ पत्रिका को कई खंड़ों में प्रकाशित करवाया था। अब सेंटर फॉर वूमेन स्टडीज ने इस ऐतिहासिक पत्रिका के स्‍त्री संबंधी लेखों का एक संचयन दो खंड़ों में प्रकाशित किया है, जिससे उस दौर में स्‍त्री-प्रश्नों को लेकर भारतीय समाज में चल रहे विमर्श की एक झलक दिखाई पड़ती है और यह भी पता चलता है कि भारत का पितृसत्तात्मक समाज किस तरह स्‍त्री को शिक्षा और आजादी न देने के पक्ष में था। हालांकि कुछ लोग स्‍त्री को सीमित अर्थों में मुक्त करने और उसके अधिकारों को दिलाने का अपनी ओर से प्रयास भी कर रहे थे। विजय झा द्वारा संपादित इन दो खंडों में ‘स्‍त्री शिक्षा’ और ‘विधवा प्रश्न तथा बाल विवाह’ से संबंधित लेखों को शामिल किया गया है। ये लेख 1922 से लेकर 1931 के बीच के हैं, जब इस पत्रिका के संपादक रामरख सिंह सहगल थे और इसकी संचालिका विद्यावती देवी थीं, जो महादेवी वर्मा की शिक्षिका थीं। गौरतलब है कि सहगल जी और नवजादिक लाल श्रीवास्तव के बाद महादेवी इसकी संपादक बनीं।

‘चांद’ पत्रिका की ऐतिहासिक भूमिका यह थी कि उस दौर में उसके 29 विशेषांक निकले। इतने विशेषांक तो आज तक किसी पत्रिका ने नहीं निकाले। स्‍त्री शिक्षा और विधवा प्रश्न पर तो आज भी पत्रिकाएं अपने को केंद्रित नहीं करतीं। इस लिहाज से ‘चांद’ ने सराहनीय भूमिका निभाई है। पहले खंड़ में स्‍त्री शिक्षा पर 56 लेख हैं, जिनमें सहगल जी के सात संपादकीय भी हैं। इसके अलावा सुशीला देवी सुधालता, सरला देवी, पद्मावती देवी, तुलसा देवी जैसी महिलाओं के लेख भी हैं जो आज विस्मृत हो चुकी हैं। जहूर बख्श ने लिखा, ‘‘आजकल हमारे देश में स्‍त्री समाज की दशा बहुत खराब है। पुरुषों ने उन्हें बिल्कुल ही अवनति के अंधकार में ढकेल दिया है। समाज में ऐसे पुरुष बहुत ही कम निकलेंगे, जिन्हें स्त्रियों की दुर्दशा से कुछ सहानुभूति हो अथवा जो उनकी उन्नति के पक्षपाती हों। स्त्रियों को शायद ही शिक्षा दी जाती है। ऐसे पुरुषों की कमी नहीं जो स्त्री शिक्षा का विरोध करने में जरा भी संकोच नहीं करते। कई आदमी तो ऐसे भी देखे जाते हैं जो स्त्री शिक्षा का नाम सुनते ही कानों पर हाथ रख लेते हैं। वह एकदम नि:संकोच होकर कह देते हैं भाई यह पागलपन मत करो। स्त्रियों को शिक्षा देकर उन्हें बर्बाद करोगे। शिक्षा पाकर वे पुरुषों की अवज्ञा करेंगी, स्वाधीन बन जाएंगी। घरेलू कामकाज की ओर ठीकठाक ध्यान न देंगी और सबसे बड़ी बुराई यह होगी कि वे व्यभिचारिणी बन जाएंगी। स्त्री शिक्षा के संबंध में ऐसी दलीलें साधारण लोग ही नहीं देते, बड़े-बड़े समझदार और विद्वान होने का दावा रखने वाले महाशय भी कर बैठते हैं। क्या ही अजीब बात है। पुरुष शिक्षा पाकर देवता बन जाते हैं और स्त्रियां वही शिक्षा पाकर सती न होकर पिशाचिनी बन जाएंगी।’’

1922 में देश की आबादी सैंतीस करोड़ थी जिनमें दस करोड़ महिलाएं थीं। इनमें 17,96,341 साक्षर थीं। यानी महिला साक्षरता केवल दस प्रतिशत थी। लेकिन पुरुष समाज आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने वाली स्त्रियों को फैशन की पुतलियां कहता था। सहगल जी ने भी इस शीर्षक से एक लेख लिखा था पर महिलाएं आधुनिक शिक्षा की हिमायती थीं। उन्होंने अपने लेखों में पुरुष मानसिकता पर प्रहार किया है।

इस टिप्पणी से पता चलता है कि स्त्रियों को शिक्षा देने के मामले में समाज का रवैया क्या था। हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका चंद्रकिरण सोनेरक्सा को स्कूल से नाम कटवा कर घर बैठकर पढ़ने के लिए मजबूर किया गया। उसी सोनरेक्सा ने बाद में तीन सौ से अधिक कहानियां लिखी थीं।

दूसरे खंड में विधवा प्रश्न और बाल विवाह से संबंधित 64 लेख शामिल हैं। इनमें सहगल जी के तीसेक लेख और संपादकीय शामिल हैं। भगवती देवी और हुकमा देवी के भी लेख हैं। उस जमाने में दो करोड़ हिंदू विधवाएं थीं। इनमें अधिकतर बाल विधवाएं थीं, जो विवाह नहीं कर पाती थीं और नारकीय जीवन व्यतीत करती थीं। सहगल जी बाल विवाह को ही इसकी जड़ मानते थे। लेकिन इन विधवाओं के बारे में ब्रिटेन के एक सांसद और स्टेट्समैन के पत्रकार ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में कहा था, ‘‘हिंदू विधवाएं घर में कुतियां हैं और बाहर वेश्याएं।’’ सहगल जी ने इसके खिलाफ तीखा लेख लिखा था। उस जमाने में बाल विधवाओं की अक्षत योनि या क्षत योनि की भी बहस चली थी और सहगल जी ने इसका भी विरोध किया था। कानपुर के एक रईस ने अक्षत योनि बाल विधवा से शादी की तो हिंदू समाज ने उसका बहिष्कार किया। ‘चांद’ ने विधवाओं के उद्धार के लिए अभियान भी चलाया था। सहगल जी ने एक लेख में लिखा था कि बारह वर्ष तक की लड़कियों के दैहिक संबंध को अपराधिक बनाने के लिए कानून बनाने में 35 वर्ष तक लड़ाई लड़नी पड़ी थी। इससे पता चलता है कि भारतीय हिंदू समाज कितना स्त्री विरोधी था। ‘चांद’ पत्रिका के लेखों ने भारतीय पितृसत्तात्मक समाज को तार-तार कर दिया है।

चांद: स्‍त्री-शिक्षा विधवा प्रश्न तथा बाल विवाह संकलन

संपादकः विजय झा

प्रकाशक: नई किताब, दिल्ली

मूल्य: पहला खंड 300 रु.

दूसरा खंड 375 रु.

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