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पुस्तक समीक्षा/ सवा सौ साल पुरानी पत्रकारी नजीर

आज का दौर देख कई बार पत्रकार होने और पत्रकारिता से तौबा कह देने का विचार प्रबल हो जाता है
पुस्तक समीक्षा

आज का दौर देख कई बार पत्रकार होने और पत्रकारिता से तौबा कह देने का विचार प्रबल हो जाता है। क्या ऐसी ही पत्रकारिता उस देश की नियति है, जहां आधुनिक पत्रकारिता का इतिहास सवा सौ साल से अधिक पुराना है? क्या इतने पुराने इतिहास ने हमें कुछ नहीं सिखाया? लेकिन पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप शिद्दत से यह एहसास जगाती है कि शुरुआती दौर से ही इस देश में ऐसे दिग्गज पत्रकार हो चुके हैं, जो न सिर्फ स्थितियों को बयान करने में निडर थे, बल्कि बारीक जानकारियों पर निगााह के साथ शैली और शिल्प की खूबसूरती और संप्रेषण कला में माहिर थे। रिपोर्ताज, समीक्षा, रिपोर्ट, संस्मरण, देश के तब के एक कोने से दूसरे कोने और संस्कृतियों के विस्तृत वर्णन का यह संकलन नगेंद्रनाथ गुप्त का है, जो 1890 के दशक में महान राष्ट्रवादी (आज के अर्थों से उलट) सरदार दयाल सिंह मजीठिया के अखबार ‘ट्रिब्यून’ के संपादक थे। उसके बाद वे उस जमाने के मशहूर पत्र-पत्रिकाओं ‘लीडर’, ‘हिंदुस्तान’ के भी संपादक रहे और ‘मॉडर्न रिव्यू’ जैसे अनेक स्वनामधन्य प्रकाशनों से जुड़े रहे। वे 1940 में मृत्यु तक लगातार सक्रिय रहे और 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से लेकर तब तक के दौर की बारीक और अनकही जानकारियों से चौंका जाते हैं। पुस्तक का पहला अंग्रेजी संस्करण 1947 में छपा था। उस संस्करण में संविधान सभा के पहले अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा अपनी टिप्पणी में लिखते हैं, ‘‘मेरा देश के सभी बड़े पत्रकारों से वास्ता रहा, लेकिन अंग्रेजी भाषा और विविध विषयों पर लेखन में श्री गुप्त जैसा कोई नहीं मिला।’’ लेकिन मौजूदा और पहले हिंदी संस्करण के संपादन और अंग्रेजी से अनुवाद के लिए वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन को इसलिए भी साधुवाद देना चाहिए कि ऐसी दुर्लभ किताब को उन्होंने ढूंढा और बड़े जतन से हमारे लिए उपलब्ध कराया। अनुवाद सुंदर है और उसमें लेखक की शैली का ध्यान रखा गया है। विषयों के संयोजन-संपादन में भी यह ध्यान रखा गया है कि हर कालखंड का एहसास दिला जाए। अरविन्द मोहन भूमिका में इस किताब की ओर आकृष्ट होने का ब्योरा कुछ इस तरह देते हैं, ‘‘इतिहास की काफी सारी चीजों का आंखों देखा ब्योरा और वह भी तब के एक शीर्षस्थ पत्रकार का, हमने नहीं देखा-सुना था।  इसमें 1857 की क्रांति के किस्से, खासकर कुंवर सिंह और उनके भाई अमर सिंह के हैं, नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता में नजरबंदी के समय देखने का विवरण और उसके बाद की तो लगभग सारी बड़ी घटनाओं का विवरण कुछ अलग अंदाज और दिलचस्प शैली में मिलता है।  रामकृष्ण परमहंस, ब्रह्म समाज के केशव चंद्र सेन, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती के भाषणों और चमत्कारिक व्यक्तित्वों तथा घटनाओं का आंखों देखा ब्योरा है। ब्रितानी किंग और प्रिंस के दरबारों और कांग्रेस के गठन से लेकर लगातार उसके अधिवेशनों में भागीदारी और हर बारीक वर्णन ऐसे मिलता है, मानो अरविन्द मोहन के शब्दों में, ‘‘जैसे लेखक पत्रकार न होकर महाभारत का संजय हो।’’

नगेंद्रनाथ गुप्त का जन्म तो बिहार के पुराने मोतिहारी में हुआ, जो 1934 के भूकंप में एकदम बर्बाद हो गया और अब नया शहर उसके बगल बसा है, लेकिन वे मूल निवासी बंगाल में कोलकाता के एक उपनगर नैहाटी के पास एक गांव के थे। उनके वर्णन से यह भी पता चलता है कि नैहाटी उनके देखते ही देखते कैसे बदल गया और लगभग बहुत हद तक बिहारियों की बस्ती में तब्दील हो गया। यह बताता है कि शहरीकरण कैसे स्थानीयता पर हावी हो जाता है और उसकी संस्कृति की सुंदरता और विशेषता को नष्ट कर डालता है। इसमें गंगा के बीच नाव में रामकृष्ण परमहंस की समाधि लग जाने का भी विवरण है। उस दौर की शायद ही कोई बड़ी शख्सियत हो, जिससे नगेंद्रनाथ गुप्त न मिले हों और उनके बारे में न लिखा हो। रवींद्रनाथ ठाकुर, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय जो भी नाम आपकी जेहन में आए सबके बारे में उनकी अनोखी टिप्पणियां मिलती हैं। वे लाहौर से लेकर देश के हर कोने तक की यात्रा कर चुके थे।

यकीनन यह किताब एक थाती की तरह है, जो हमें काफी समृद्ध कर जाती है। आज के दौर में तो यह बड़ी जरूरी किताब है। कहीं-कहीं प्रूफ की त्रुटियां जरूर खटकती हैं मगर साज-सज्जा आकर्षक है। इसे आज हर किसी को पढ़ना चाहिए।

पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप

नगेन्द्रनाथ गुप्त    

संपादन व अंग्रेजी से अनुवाद: अरविन्द मोहन

प्रकाशक | सेतु प्रकाशन

मूल्यः 235 रु.  | पृष्ठः 240

 

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