मौजूदा नीतियां जारी रहीं तो रोजगार दूर का सपना

हरवीर सिंह
बीएमएस के अध्यक्ष साजी नारायणन
बीएमएस के अध्यक्ष साजी नारायणन
संजय रावत

हरवीर सिंह
मौजूदा दौर में देश के सबसे बड़े मजदूर संगठन, आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने आर्थिक स्थिति, ऋण संकट, ऑटोमोबाइल क्षेत्र में गिरावट के लिए सरकार की गलत नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। बीएमएस एनडीए की पहली वाजपेयी सरकार का भी कटु आलोचक रहा है। बीएमएस के अध्यक्ष साजी नारायणन ने अर्थव्यवस्था, मंदी, श्रम कानूनों जैसे मुद्दों पर हरवीर सिंह के साथ अपनी राय साझा की। मुख्य अंशः

सरकार अब अर्थव्यवस्था में मंदी की बात कबूल रही है, तो आप इसे कैसे देखते हैं?

शुरुआत में सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल क्षेत्र में मंदी का खंडन किया। भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने हाल ही में केंद्रीय कार्यकारी समिति की बैठक में पारित अपने प्रस्ताव में मंदी, ऋण संकट, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल क्षेत्र में मांग की कमी के बारे में चेतावनी दी। उसके बाद नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने हमारी चिंताओं को स्वीकार किया। सरकार ने भी माना और कुछ उपाय भी घोषित किए।

बीएमएस ने आर्थिक सुस्ती के लिए मोदी सरकार की गलत नीतियों को जिम्मेदार ठहराया?

बीएमएस ने मौजूदा हालात के लिए 28 वर्षों से विभिन्न सरकारों द्वारा अपनाए जाने वाले एलपीजी (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) मॉडल को जिम्मेदार ठहराया है। राजीव कुमार ने संकट की बात मानते हुए कहा कि यह पिछले 70 वर्षों में अभूतपूर्व है। यह सही नहीं है। डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के अंत में 2012-13 की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में आजादी के बाद अभूतपूर्व आर्थिक संकट की ओर इशारा किया गया। ध्यान देने वाली बात है कि तब से आज तक हम मुसीबत से बाहर नहीं निकल पाए हैं। इसकी वजह दोषपूर्ण नीतियां हैं। सरकार एलपीजी सुधारों के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों पर श्वेतपत्र लाए। इसे भारत केंद्रित, जन-केंद्रित और मानव-केंद्रित मॉडल में बदले। हमारी समस्याओं का समाधान बाहरी विशेषज्ञ, हार्वर्ड या कोलंबिया विश्वविद्यालय को क्यों करना चाहिए?

रोजगार सृजन सरकार की मुख्य चुनौती है?

जब तक बेरोजगारी को लेकर मौजूदा नीतियां जारी रहेंगी, तब तक रोजगार सृजन दूर का सपना बना रहेगा। डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991 में जब देश में एलपीजी सुधारों की शुरुआत की, तो पहला वादा यह किया गया कि इससे रोजगार का सृजन होगा। लेकिन 10 वर्षों के भीतर ही हमारी वृद्धि को बेरोजगारी केंद्रित वृद्धि के रूप में पहचाना गया। ऐसी स्थिति आज भी जारी है। बेरोजगारी संबंधी नीतियों का नाता हायर ऐंड फायर की नीति, श्रम लागत में कटौती, छंटनी और बंदी, श्रम की जगह टेक्नोलॉजी, विनिवेश, भर्ती पर रोक, पदों और कर्मचारियों वगैरह को खत्म करने जैसे श्रमिक सुधारों से है। कृषि, एमएसएमई, टेक्सटाइल जैसे रोजगारपरक क्षेत्र संकट में हैं। सरकार को भारत केंद्रित मॉडल अपनाना होगा।

क्या नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से एमएसएमई क्षेत्र को नुकसान पहुंचा?

नोटबंदी और जीएसटी का असर शुरुआती दिनों में दिखा। बाद में हम इसके अनुकूल ढलने में सक्षम थे। उनका मुख्य मकसद समानांतर चल रही ब्लैकमनी इकोनॉमी पर प्रहार करना था। नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने मौजूदा संकट के लिए नोटबंदी, जीएसटी और आइबीसी की ओर संकेत किया है। यह चीजों को गलत दिशा में ले जा रहा है। यह सोचना कि केवल काला धन आधारित अर्थव्यवस्था ही निजी क्षेत्र का विकास कर सकती है, तो यह एक खराब अर्थव्यवस्था है। अगर ऐसा है तो फिर नोटबंदी और जीएसटी से पहले 2012 में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को संकटों का सामना क्यों करना पड़ा?

सरकार का जोर सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश पर है। क्या यह अच्छी नीति है?

सार्वजनिक क्षेत्र का मकसद सरकार को लाभ पहुंचाना नहीं है। हमें उन लोगों का नजरिया समझना होगा, जिन्होंने आजादी मिलने के बाद भविष्य के भारत के बारे में सोचा था। पीएसयू की भूमिका मुख्य रूप से कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लोगों की सेवा के लिए बनाई गई थी। वे सेवा से प्रेरित थे, न कि केवल लाभ से। रोजगार के व्यापक क्षेत्र के रूप में, सार्वजनिक क्षेत्र में 1.76 करोड़ लोग कार्यरत हैं, जबकि निजी क्षेत्र केवल 1.19 करोड़ लोगों को ही रोजगार देता है। इसलिए हमारे नीति-निर्धारकों द्वारा लाभ कमाने और हानि में चलने वाले सार्वजनिक उपक्रमों के बीच विभाजन करने से सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र की भूमिका के बारे में उनकी अज्ञानता का पता चलता है। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के विनिवेश, निजीकरण और रणनीतिक बिक्री का मुख्य उद्देश्य राजस्व पैदा करना है। राजस्व के लिए पैतृक संपत्ति की बिक्री करना एक खराब अर्थव्यवस्था का उदाहरण है। इसलिए बीएमएस ने कड़ी आपत्ति जताई है।

क्या आपको लगता है कि टैक्स टेररिज्म भी निजी निवेश में बड़ी बाधा है?

जिन लोगों की आय बहुत अधिक है, उन्हें कर के जरिए अपनी आय का कुछ प्रतिशत सरकारी राजस्व को देना चाहिए। कई अन्य देशों में भारत की तुलना में कर का ढांचा बहुत बड़ा है। करों में अप्रत्यक्ष कर का हिस्सा सबसे बड़ा है। पिछली कई सरकारों ने कॉरपोरेट और बड़े उद्योगों को विभिन्न बजटों में कई रियायतें दीं। इसका मतलब है कि यह बीपीएल और निम्न मध्यम वर्ग ही है, जिनकी बदलौत कॉरपोरेट और बड़े उद्योग फलते-फूलते हैं। उद्योग को उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि हर बार सरकार और लोगों के कर का पैसा उनकी मदद के लिए दिया जाएगा। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि फोर्ब्स पत्रिका के कई नायक सबसे बड़े कर्जदार हो सकते हैं।

एक तर्क यह भी है कि कड़े श्रम कानूनों की वजह से कई छोटे उद्यम बढ़ नहीं पा रहे हैं?

यह एक गलत धारणा है। अब उद्योग जगत के कई लोग धीरे-धीरे इस सच्चाई को महसूस कर रहे हैं कि श्रम कानूनों का औद्योगिक विकास से कोई लेना-देना नहीं है। भारत में कुल आबादी का केवल 7 फीसदी ही किसी श्रम कानून के दायरे में आता है। इसके बावजूद, आइएलओ (अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन) में भारत श्रम कानूनों को खराब तरीके से लागू करने के लिए बदनाम है। इतनी बड़ी आबादी को देखते हुए हमारे पास श्रम कानूनों को लागू करने की मशीनरी कमजोर है। इसलिए उद्योगों को श्रमिकों और श्रम कानूनों पर दोष मढ़ने की जगह मंदी के वास्तविक कारणों का पता लगाना होगा।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए?

ऑटोमोबाइल क्षेत्र को पटरी पर लाने के लिए सस्ता और अधिक कर्ज देने, जीएसटी कम करने, इलेक्ट्रिक वाहनों पर अनिश्चितता को दूर करने जैसे कदम उठाने की जरूरत है। नए श्रम कानून कोड ऑन वेजेज-2019 के तहत आम मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी को सख्ती से लागू करना चाहिए। इससे आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ेगी, जिससे मांग,  उत्पादन, रोजगार, बाजार की गतिविधियों और नियोक्ताओं की भुगतान क्षमता में बढ़ोतरी होगी। यह फिर से एक चक्र के रूप में काम करेगा और इसे वेज-लीडेड ग्रोथ के रूप में जाना जाएगा। सभी रोजगार सृजन कार्यक्रमों को नौकरी के व्यापक क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सरकार को आयातित तकनीकों की भूमिका देखने के लिए एक तकनीकी आयोग का गठन करना चाहिए, जो नौकरियों की जगह लेने वाली तकनीक की भूमिका की जांच करेगा। नीति आयोग का पुनर्गठन किया जाए, ताकि प्रमुख सामाजिक संगठनों और ट्रेड यूनियनों के प्रति उसकी उदासीनता को दूर किया जा सके। किसी भी सुधार को शुरू करने से पहले सामाजिक क्षेत्र के संगठनों जैसे कि ट्रेड यूनियनों, किसान संगठनों, छोटे उद्योग संगठनों वगैरह से सलाह के लिए हर मंत्रालय के तहत एक तंत्र होना चाहिए।

सरकार लेबर कोड लागू कर रही है। क्या यह श्रमिकों के लिए अच्छा  है?

काफी अरसे से श्रम कानूनों का वर्गीकरण और सरलीकरण ट्रेड यूनियनों की मांग रही है। चार श्रम कानूनों में एक ‘कोड ऑन वेज-2019’ का बीएमएस ने स्वागत किया, क्योंकि इससे हर कर्मचारी को न्यूनतम मजदूरी प्रावधानों का लाभ मिलेगा। मौजूदा समय में सिर्फ 7-10 फीसदी ही न्यूनतम मजदूरी कानून के दायरे में आते हैं। न्यूनतम मजदूरी कानून समाज के श्रमिक वर्ग में क्रांति लाएगा। इसी तरह, सामाजिक सुरक्षा कानून भी देश के सभी श्रमिकों को लगभग 14 लाभ मुहैया कराएगा। लेकिन दुर्भाग्य से इन अच्छे कानूनों में मजदूर विरोधी गंभीर प्रावधानों को भी शामिल किया गया है, जिसका बीएमएस विरोध करता है। बीएमएस ने कोड ऑन इंडस्ट्रियल रिलेशंस का विरोध किया है, क्योंकि इसमें शुरू से अंत तक मजदूर विरोधी प्रावधान हैं। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति कानून में एकरूपता नहीं है। मौजूदा अनुबंध श्रम कानून से ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के प्रावधान को हटा दिया गया है। बाकी के तीन कानून में कई श्रमिक विरोधी प्रावधान हैं, इसलिए हमने विरोध किया है। उन सभी मजदूर विरोधी प्रावधानों को हटाया जाना जरूरी है।

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से