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जनादेश’21/उत्तर प्रदेश : पंचायतों में भगवा पेच ढीला

ग्राम पंचायत और जिला परिषद चुनावों में भाजपा के लिए खतरे की घंटी, विपक्षी दलों को मिली संजीवनी
पंचायत और जिला परिषद चुनाव

अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव भाजपा की राज्य सत्ता के लिए ही नहीं, बल्कि केंद्रीय सत्ता के लिए भी बेहद अहम हैं। पार्टी को इसका एहसास खासकर बढ़ती महंगाई और राज्य में फैलते किसान आंदोलन की वजह से इस कदर था कि प्रतिकूल हवाओं का रुख मोड़ने के लिए उसने पंचायत और जिला परिषद चुनाव कराने और प्रचार की लंबी-चौड़ी रणनीति बनाने में कोविड की दूसरी लहर की चेतावनियों की भी परवाह नहीं की। लेकिन नतीजे पार्टी के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं। पार्टी के खुद के दावे के अनुसार 3050 जिला परिषद सीटों में उसे सिर्फ 954 सीटें मिली हैं। उससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि पार्टी को बनारस, अयोध्या, मथुरा, काशी और गोरखपुर में बड़ा झटका लगा है।

बनारस और गोरखपुर तो क्रमश: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्वाचन क्षेत्र हैं। बनारस की 40 सीटों में से भाजपा का दावा 7 और सपा का 12 सीटों का है। गोरखपुर के 68 जिला पंचायत सदस्यों में उसके केवल 19 जीते, जबकि सपा को 19 सीटें मिली हैं। निर्दलीयों ने सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं। अयोध्या में सपा को 17 और भाजपा को केवल 8 सीटें मिली हैं। मथुरा में बसपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। वहां 33 में से 13 पर बसपा और 8 पर भाजपा का कब्जा रहा है। राष्ट्रीय लोक दल ने भी 8 सीटें जीती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश की 870 से ज्यादा जिला पंचायत सीटों में सपा ने करीब 200 जीती हैं। भाजपा 140 के करीब सीट जीत पाई है। पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियों के उम्मीदवार बड़ी संख्या में जीते हैं।

सो, मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी को इन नतीजों से खुश होने की वाजिब वजह मिली है। सपा का दावा है कि उसे 1000 से ज्यादा सीटें मिली हैं। राष्ट्रीय प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, “अयोध्या, काशी, मथुरा के परिणामों से साफ है कि जनता भाजपा के झांसे में अब नहीं आने वाली है। भाजपा ने अपनी पूरी सूची जारी की थी, जबकि सपा ने पूरे उम्मीदवार नहीं लड़ाए थे। उसके बावजूद हमें भाजपा से करीब दोगुनी सीटें मिली हैं।” सपा का गणित है कि जो पिछड़ी और दलित जातियां 2014 के बाद भाजपा की ओर चली गई थीं, उनका मोहभंग हो रहा है। ऐसे में मायावती की बसपा की निष्क्रियता का उसे लाभ मिलेगा। वैसे, पंचायत चुनावों में बसपा ने 300 और कांग्रेस ने 270 सीटें जीतने का दावा किया है। अब खासकर भाजपा की नजर 856 ब्लॉक प्रमुख और 75 जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव पर है, जहां नए निर्वाचित निर्दलीय जिला पंचायत सदस्य अहम भूमिका निभाने वाले हैं।

योगी के गोरखपुर में 68 जिला पंचायत सदस्यों में से भाजपा के केवल 19 जीत सके

प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष तथा पंचायत चुनावों के प्रभारी विजय बहादुर पाठक कहते हैं, ‘‘इन चुनावों का उद्देश्य ग्रामीण स्तर पर नेता तैयार करना था, क्योंकि इसके पहले पार्टी प्रमख रूप से शहरी निकाय चुनाव तक सीमित रहती थी। प्रदेश के सभी 826 ब्लॉक पर एक वरिष्ठ कार्यकर्ता को जिम्मेदारी सौंपी गई।’’

हालांकि गोरखपुर में वरिष्ठ पत्रकार मनीष सामंत का कहना है, ‘‘लोग महंगाई से त्रस्त हैं, खाने-पीने की चीजें महंगी हैं, एलपीजी सब्सिडी घटते-घटते 59 रुपये पर आ गई है। कोविड-19 महामारी में सरकारी अव्यवस्था अराजक हो गई है। इससे बड़े पैमाने पर मोहभंग हो रहा है।’’ यही वजह है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के खिलाफ भाजपा के अंदर से आवाजें भी उठने लगी हैं।

हालांकि किसान आंदोलन के गढ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जैसी नाराजगी भाजपा के खिलाफ दिख रही थी, वह परिणामों में नहीं दिखी है। इस क्षेत्र की 522 जिला पंचायत सदस्य सीटों में 110 के करीब जीतने का दावा भाजपा कर रही है। यहां सपा ने 80 और बसपा ने 80 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा किया है। राष्ट्रीय लोक दल को 50 से ज्यादा सीटें मिली हैं।

कांग्रेस का प्रदर्शन प्रभावी नहीं, लेकिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू कहते हैं, ‘‘कांग्रेस के 270 जिला पंचायत सदस्य जीते हैं और पार्टी 570 जगहों पर दूसरे और 711 पर तीसरे नंबर पर है। लोगों का कांग्रेस में भरोसा और वोट प्रतिशत बढ़ा है। हमारे आकलन के अनुसार भाजपा और सपा को केवल 400-400 सीटें ही मिली हैं।’’ ये नतीजे अगले साल चुनावों के लिए दिलचस्प संकेत हैं।

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