सरकार मिली जनादेश नहीं

योगेन्द्र यादव
असली मुद्देः चुनाव में लोगों ने ही निभाई विपक्ष की भूमिका
असली मुद्देः चुनाव में लोगों ने ही निभाई विपक्ष की भूमिका
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योगेन्द्र यादव
भाजपा को समझ में आ गया होगा कि हमेशा भावनात्मक मुद्दे काम नहीं आते, लेकिन विपक्ष का मुगालते में रहना चिंताजनक

हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे से दो स्पष्ट संदेश निकलकर आए हैं। पहला संदेश, जिसमें यह समझना होगा कि जनादेश क्या है? दूसरा संदेश, परिणाम क्या आए हैं? सबसे पहले जनादेश की बात करते हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों के जनादेश के निहितार्थ यह हैं कि जनता में सरकार के खिलाफ असंतोष है। उस असंतोष और परेशानी में जनता को जब विपक्ष का साथ नहीं मिला, तो वह खुद विपक्ष की भूमिका में आ गई। इसके लिए उसने कुछ पार्टियों को अपना असंतोष व्यक्त करने के लिए चुन लिया। ऐसा नहीं है कि जमीनी स्तर पर यह असंतोष महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में ही दिखा है। मैं जनता के इस असंतोष को गुजरात विधानसभा चुनाव के समय से देख रहा हूं। उसके बाद यही असंतोष कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में दिखा। इन सब में एक परिस्थिति दिखी, वह थी जमीन पर भारी नाराजगी, जो ग्रामीण इलाकों में कहीं ज्यादा थी। उसमें भी किसान बहुत ज्यादा असंतुष्ट थे। इन विधानसभा चुनावों में क्या हुआ, जहां बेहतर विकल्प था वहां दूसरी पार्टी की सरकार बन गई। लेकिन जहां विकल्प मौजूद नहीं था, वहां भाजपा को झटका लगा। महाराष्ट्र और हरियाणा चुनावों के जनादेश को मैं इसी कड़ी में देखता हूं। पिछले दो-तीन साल में केवल लोकसभा चुनाव के जनादेश और परिणाम अपवाद थे। लोकसभा में ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह केंद्र सरकार, राष्ट्रीयता और नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व पर लड़ा गया, जिसके चलते चुनावी लड़ाई एक अलग स्तर पर पहुंच गई। इन चुनावों में राजनीति, अर्थशास्‍त्र के मुद्दे गौण हो गए। लेकिन जब राज्य स्तर पर सामान्य चुनाव की बात आई तो फिर से जमीनी असंतोष व्यक्त हुआ।

महाराष्ट्र और हरियाणा में दो तरह की सरकारें थीं। महाराष्ट्र में जहां औसत दर्जे की सरकार थी, वहीं हरियाणा में बेहद निकम्मी सरकार थी। औसत सरकार एक कामचलाऊ बहुमत लेकर वापस आ गई और निकम्मी सरकार बहुमत से भी नीचे आ गई। असंतोष के बावजूद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दोनों ही जगह विपक्ष ने जनता का विश्वास जीतने लायक कोई काम नहीं किया। महाराष्ट्र में शरद पवार ने आखिरी दिनों में काफी जोर लगाया। उन्होंने यह जोर व्यक्तिगत अपमान का बदला लेने के लिए ही दिखाया। जबकि हरियाणा में दुष्यंत चौटाला ने अपने पारिवारिक वर्चस्व को हासिल करने के लिए काफी ऊर्जा लगाई। ऐसे में असंतोष होने के बावजूद जनता के पास साफ और अलग तरह का विकल्प मौजूद नहीं था, जिसके चलते महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों जगह ले-देकर भाजपा और उसका गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में आ गया। लेकिन सरकार बनने के बावजूद इसे भाजपा के पक्ष में जनादेश नहीं कहा जाएगा। यानी सरकार तो मिल गई लेकिन जनादेश नहीं मिल पाया।

अब बात परिणाम की करते हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र के परिणाम से साफ हो गया कि भारतीय जनता पार्टी की अजेयता का जो दंभ और मिथक था, वह अब टूटता हुआ दिख रहा है। लोकसभा चुनाव के परिणाम से यह लगता था कि उसने एक नई लकीर खींच दी है। सबकुछ भाजपा के हिसाब से चलेगा। लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव के परिणाम से ऐसा होता नहीं दिख रहा है। इन चुनावों से देश को नई राह मिलती तो नहीं दिख रही है लेकिन कुछ समय के लिए राहत जरूर मिली है। राहत यह है कि मोदी सरकार का जो वर्चस्व या दबदबा है, जिसमें आपको सांस लेने तक की गुंजाइश नहीं है। वहां इन परिणामों के बाद एक छोटा-सा रोशनदान खुल गया है, जिसमें रोशनी भी आती है और थोड़ी हवा भी आती है। लेकिन इसे विपक्ष की जीत के रूप में देखना एकदम गलत होगा। मैं तो इसे विपक्ष की कमजोरी के रूप में देखता हूं, जिसने हरियाणा में एक निकम्मी सरकार को दोबारा सरकार बनाने का मौका दे दिया। वह जीत कर नहीं आ सकी।

मेरा मानना है कि भाजपा इन परिणामों से एक अलग तरह का सबक लेगी। वह सरकार बनाने के बावजूद इसे हार के रूप में स्वीकार करेगी। जबकि कांग्रेस हार कर भी इसे जीत मानेगी और एक आत्ममोह में बैठी रहेगी। वह कुछ नहीं करेगी। ऐसी पूरी संभावना मुझे दिखती है। इसे आप देख भी सकते हैं। हरियाणा में तो कांग्रेस के नेता जीत का जश्न मना रहे हैं। यही विडंबना है कि सरकार में बैठी पार्टी हार मानकर सुधार करेगी। जबकि विपक्ष में बैठी पार्टी जीत के मुगालते में रहेगी। इसे पहले के कदमों से भी समझा जा सकता है। जैसे राजस्थान में कांग्रेस बमुश्किल बहुमत की सरकार बना पाई। पार्टी के नेतृत्व को अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए थी, और राज्य इकाई से पूछना चाहिए था कि 150 सीटें क्यों नहीं आईं? उसी तरह का माहौल अभी भी है। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि विपक्ष कोई सकारात्मक सक्रियता दिखाएगा। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि राहत तो मिली है लेकिन राह नहीं दिखती। इन्हीं परिस्थितियों में झारखंड, दिल्ली, बिहार के विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। लेकिन चुनाव से पहले जैसी महाराष्ट्र और हरियाणा में स्थिति थी, वैसा इन चुनावों में नहीं होगा। महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव से पहले स्पष्ट था कि विपक्ष रेस में नहीं है। अब ऐसा नहीं होगा। भाजपा को बेहद तैयारी के साथ चुनाव लड़ना होगा। उसे एक-एक सीट के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। ऐसे में लोकसभा चुनाव के बाद वाली स्थिति नहीं रहेगी। जैसा कि उस समय हो गया था कि भाजपा घोड़े, गधे, जिसे चाहे खड़ा कर दे वह चुनाव जीत जाएगा। ऐसा अब नहीं होने वाला है। यह बहुत राहत की बात है।

इन चुनावों से भाजपा को निश्चित तौर पर यह सबक मिल गया होगा कि आप राज्यों में एक निकम्मी सरकार चलाकर केवल राष्ट्रवाद के नाम और भाषणों  के जरिए चुनाव नहीं जीत सकते हैं। ऐसा नहीं है कि भाजपा को इसका अंदाजा नही है। लेकिन उसकी हमेशा से यह रणनीति रही है कि स्थानीय मुद्दों से भटकाकर लोगों को ऐसे मुद्दों में उलझा दिया जाए, जो पहचान की बात करते हैं। भाजपा भी समझ गई है कि इन मुद्दों से कुछ नहीं होगा। लेकिन भाजपा इस रणनीति को बदल देगी, ऐसा नहीं होगा, क्योंकि इस तरह की रणनीति उसकी पहचान है। लगातार राज्य विधानसभा चुनावों  के परिणामों से यह भी साफ हो गया कि भाजपा राज्य स्तर पर चुनावों में बेहतर तरीके से नहीं लड़ पाती है। इन चुनावों से एक बात और साफ हो गई है कि ग्रामीण इलाकों  में भाजपा के खिलाफ काफी असंतोष है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लाख दावों के बावजूद कृषि संकट बरकरार है। चिंता की बात यह है कि स्थिति पहले से खराब हो रही है। एक बात और समझनी होगी, जब भाजपा की सरकार बनती है तो वह समस्याओं को सुलझाती नहीं है। वह जनता का ध्यान उनकी समस्याओं से भटकाने की कोशिश करती है। इसीलिए भाजपा जब भी चुनाव जीतती है तो जमीन पर काम करके नहीं जीतती। वह लोगों को भटकाकर चुनाव जीतती है। इसीलिए जब अनुच्छेद 370 का मुद्दा नहीं चला, तो वह दूसरे मुद्दे तलाशेगी। जैसे वह राम जन्मभूमि मुद्दे को उठाएगी। वोट बांटने वाली उसकी राजनीति बनी रहेगी। अगर वह इसे बदलती है तो वह जड़ से हिल जाएगी। ऐसे में उसके लिए मुद्दे बदलना संभव नही है।

इन चुनावों में एक अहम भूमिका मीडिया की भी रही है। वह एक तरह से सरकार के प्रचार का औजार बन गया। इसे आप विभिन्न मीडिया संस्थानों द्वारा चलाए गए ओपिनियन पोल से भी समझ सकते हैं। उनका विश्लेषण करें तो आप उसे पूरी तरह से एकतरफा पाएंगे। अगर चुनाव के दो महीने पहले से एकतरफा ओपिनियन पोल दिखाए जाएंगे तो निश्चित तौर पर वह मतदाताओं को प्रभावित करेगा। हरियाणा और महाराष्ट्र में अगर ओपिनियन पोल एकतरफा नहीं दिखाए गए होते तो निश्चित तौर पर परिणाम कुछ और होते। हरियाणा में शायद भाजपा को 40 सीटें भी नहीं मिलतीं। हरियाणा की बात करें तो मीडिया एकतरफा तरीके से भाजपा का गुणगान कर रहा था। अखबारों में सरकार के गुणगान छप रहे थे। बदले में सरकार के बड़े-बड़े विज्ञापन भी छप रहे थे। आचार संहिता के बाद भाजपा के विज्ञापन छप रहे थे। मीडिया सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत दिखाता और सरकार के झूठे दावों की पोल खोलता, तो शायद स्थिति कुछ और होती। असल में मीडिया मैनेजमेंट तो भाजपा के चुनाव प्रचार की रणनीति का हिस्सा है। अब मीडिया चुनाव के वक्त लोकतंत्र का कोई स्वतंत्र स्तंभ नहीं है। वह सरकार के अलग-अलग औजारों में से एक हो गया है। जैसे, हर औजार की एक कीमत होती है, वैसे ही मीडिया की भी एक कीमत हो गई है। कुल मिलाकर लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर यह है कि अनुच्छेद 370 का मुद्दा नहीं चला।

(लेखक स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। यह लेख प्रशांत श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित है)

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