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गुल खिलाएगा पीके का टारगेट-10

प्रशांत किशोर चाहे अपनी अलग पार्टी बनाएं या कांग्रेस के साथ जाएं, मगर देंगे महागठबंधन का साथ
रणनीति पर नजरः जदयू नेता संजय सिंह और राजीव रंजन के साथ प्रशांत किशोर (बीच में)

कहते हैं कि आदमी जिसका विरोध कर रहा होता है, दरअसल वह उसे ही पाना चाहता है। बिहार में जदयू से निकाले गए प्रशांत किशोर पांडेय उर्फ पीके इसी दर्शन के उदाहरण लग रहे हैं। उनकी कंपनी आई-पैक के टी-10 यानी दस साल के टारगेट का लक्ष्य ही मुख्यमंत्री का पद है। इन दस वर्षों में वे सारे प्रयास ऐसे करने हैं जो 2030 तक पीके को मुख्यमंत्री का पद दिला दें। बढ़ती उम्र के कारण जदयू नेता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद और तमाम दलों के पुरानी पीढ़ी के नेताओं का युग तब तक समाप्त हो चुका होगा। किसी भी दल में दूसरी पंक्ति का कद्दावर नेता नहीं है, इसलिए स्थितियां उनके अनुकूल हो भी सकती हैं।

यूं तो अपने भावी राजनैतिक कदम की बात पीके खुद दिल्ली चुनाव के परिणाम वाले दिन यानी 11 फरवरी को सार्वजनिक करेंगे, लेकिन साल भर से राजनैतिक बिसात पर चली जा रही उनकी चालों से काफी कुछ अनुमान लग चुका है। आउटलुक ने तो दो अंक पहले ही यह संकेत दे दिया था कि प्रशांत किशोर की राह जदयू-भाजपा गठबंधन से अलग होने वाली है। टीम प्रशांत के सूत्रों के मुताबिक, अब अलग होकर वह जो कुछ करने वाले हैं, उससे बिहार में जदयू-भाजपा गठबंधन की नींद उड़ सकती है।

सूत्रों के मुताबिक, इस समय दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) के लिए काम कर रहे प्रशांत किशोर को अरविंद केजरीवाल से काफी कुछ समझाइश मिली है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत का श्रेय प्रशांत किशोर को भी जाएगा। ऐसे में या तो वे आम आदमी पार्टी को अपने नेतृत्व में बिहार ले जा सकते हैं या केजरीवाल की तर्ज पर ही अपनी अलग पार्टी बनाकर मैदान में कूद सकते हैं। हालात काफी कुछ मिलते-जुलते हैं। केजरीवाल को अन्ना आंदोलन का लाभ मिला था, तो इस समय बिहार में बड़े पैमाने पर चल रहा नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का विरोध पीके को फायदा पहुंचा सकता है। वैसे तो लालू के बड़े पुत्र और राजद नेता तेजप्रताप उन्हें सार्वजनिक रूप से न्योता दे चुके हैं, लेकिन वहां वह जाएंगे नहीं। वहां तेजस्वी यादव पहले से सीएम कैंडिडेट घोषित हैं। वहां टीम पीके के टारगेट-10 के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। ऐसे में, इस टारगेट-10 को जमीन देने के लिए कांग्रेस का मैदान पूरा खाली है। प्रशांत किशोर ने सीएए और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का विरोध करने पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सराहना की थी।

आज की तारीख में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू से पवन वर्मा के साथ निकाले गए पीके की छवि 18 फीसदी वोट रखने वाले मुस्लिमों में सियासी शहीद की हो गई है। इसके कारण बिहार में वे मुसलमानों के बड़े रहनुमा बनकर उभरे हैं। जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे, वामपंथी नेता कन्हैया कुमार इस मामले में अब दूसरे नंबर पर चले गए हैं। लेकिन पायदान का यह फर्क उन्हें एक मंच पर आने से नहीं रोकेगा। कांग्रेस की सुलगाई आंच पर पक रही महत्वपूर्ण सियासी खिचड़ी में छौंक एआइएमआइएम नेता असदुद्दीन ओवैशी डालेंगे। अंत में घी डालने का काम लालू यादव की पार्टी राजद के जिम्मे होगा। इस नए रंग-रूप वाले महागठबंधन में शामिल दलों ने अगर अपने-अपने वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर करा दिए, तो इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में इनकी आंधी चल सकती है। 18 फीसदी वोट वाला मुस्लिम समाज जदयू-भाजपा से एकदम कट चुका है। वह अब सत्तारूढ़ गठबंधन को हराने के लिए ही वोट करेगा। ऐसे में, राजद के 18 फीसदी और कांग्रेस के लगभग आठ फीसदी वोट के साथ करीब पांच फीसदी वोटवाले वामपंथी एकजुट हो गए तो आंधी के वेग का अनुमान सहज ही लग सकता है।

अब पीके आप के हों या स्वतंत्र पार्टी बनाएं या कांग्रेसी ही हो जाएं, लेकिन महागठबंधन के साथ तालमेल जरूर बनाए रखेंगे। गौरतलब है कि 2015 में भाजपा को हराने के लिए राजद के साथ जदयू का गठबंधन प्रशांत किशोर की वजह से ही मुमकिन हुआ था। भाजपा को ‘सबक’ सिखाने के लिए टीम प्रशांत का संकल्प देखिए कि उसने पिछले साल अगस्त-सितंबर में ही जदयू के कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए सर्वे तक करा लिया था। लेकिन उसका परिणाम नकारात्मक आ गया। इसके बाद पहले से खार खाए आरसीपी सिंह और राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने जदयू में पीके के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। भनक लगते ही सक्रिय हुए भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह ने गठबंधन को बचा लिया। पीके की कंपनी आई-पैक के सूत्र बताते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी उन्हें ढीला-ढीला काम करने को कहा गया था। टीम को समझाया गया था कि जदयू को आठ-दस से अधिक सीटें नहीं मिलने वाली। ऐसे में केंद्र में पार्टी को एक-दो मंत्री पद मिल जाएगा। इससे अधिक नहीं। लेकिन मोदी लहर ने पीके के गणित को गड़बड़ा दिया।

टीम प्रशांत के सूत्रों के मुताबिक, इस बार सारे गुणा-भाग कर लिए गए हैं। दूसरे, नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के समय राजद सुप्रीमो की मौजूदगी भी संभव है। झारखंड में सरकार बदल जाने के बाद लालू प्रसाद को जमानत मिलने के आसार हैं। खुद लालू भले चुनाव न लड़ पाएं, लेकिन महागठबंधन के वोट को बिखरने नहीं देंगे। हाल के वर्षों में राजद का ‘माय’ समीकरण भले कमजोर पड़ गया हो, लेकिन पीके के जरिए मुस्लिम समाज इस बार महागठबंधन के साथ एकमुश्त जाएगा। इसमें राष्ट्रीय नागरिकता कानून का विरोध यकीनन भाग्य से छींका टूटने से कम नहीं है।

ऐसे में वह जो भी फैसला करेंगे, उसमें साथ देने के लिए जदयू में रहते हुए उनका तैयार किया हुआ लाव-लश्कर भी आ सकता है। यानी पिछले कुछ वर्षों में अन्य दलों से जदयू में शामिल कराए गए वैसे लगभग दर्जन भर बड़े नेता, जिनके साथ हजारों समर्थक भी आए थे, वे सब प्रशांत किशोर के माध्यम से जदयू में शामिल हुए थे। पंचायती राज संस्थाओं से जुड़े पदाधिकारी यानी जितने भी मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति के सदस्य, जिला पार्षद, ब्‍लॉक प्रमुख, जिला प्रमुख, जिला परिषद के प्रमुख हैं, उन सबसे गत वर्षों में सीधा संबध बनाया गया था। बिहार में ऐसे पदों की संख्या 8,400 है। बताया जाता है कि इनमें से लगभग तीन हजार पदाधिकारी ऐसे हैं, जिन्हें प्रशांत किशोर ने जदयू में शामिल कराया था।

यहां पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में जदयू-भाजपा वाले गठबंधन यानी एनडीए की एकतरफा जीत की बात आ सकती है। लेकिन तब यह भी जेहन में रखना होगा कि भाजपा की अगुआई वाले एनडीए को 2014 के लोकसभा चुनाव में भी एकतरफा ही जीत मिली थी, लेकिन जब अगले ही साल विधानसभा चुनाव हुए तो मोदी लहर नहीं चल पाई थी। इस बार तो सत्तारूढ़ एनडीए के खिलाफ जहां विरोध बढ़ता ही जा रहा है, वहीं भाजपा-जदयू के बीच भी अंदरूनी तौर पर सब ठीक नहीं चल रहा है। हालिया उपचुनाव के परिणाम बताते हैं कि जमीनी स्तर पर भाजपा और जदयू के मतदाताओं में दूरी बढ़ गई है। खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जल-जीवन-हरियाली यात्रा से भाजपा को दूर रखा गया। इसी तरह सीएए के समर्थन में जब भाजपा की रैली होती है, तो उसमें जदयू की भागीदारी नहीं होती। जनता में कई मुद्दों पर राज्य सरकार के प्रति असंतोष बढ़ रहा है। हर साल की बाढ़ और सूखे से परेशान किसानों की समस्याएं जस की तस हैं। जहां तक कानून-व्यवस्था की बात है तो लूट, हत्या और बलात्कार की घटनाएं फिर खूब होने लगी हैं। शराबबंदी कानून के बावजूद शराब का धंधा बखूबी फल-फूल रहा है।

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आज की तारीख में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू से पवन वर्मा के साथ निकाले गए पीके की छवि 18 फीसदी वोट रखने वाले मुस्लिमों में सियासी शहीद की हो गई है

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