आखिरकार अरावली पर्वतमाला को अंधाधुंध औद्योगिक-व्यावसायिक दोहन के लिए खोल देने के खिलाफ उठती आवाजें और पर्यावरणीय चिंताएं रंग लाईं और फिलहाल रोक लग गई। ये चिंताएं सर्वोच्च अदालत के दरवाजे भी पहुंचीं। स्वतः संज्ञान लेकर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जे.के माहेश्वरी और अगस्टीन जॉर्ज मसीह की तीन सदस्यीय पीठ ने 29 दिसंबर को उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसे पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई, के. विनोदचंद्रन और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने 20 नवंबर को दिया था। पहले आदेश में 100 मीटर की ऊंचाई वाली अरावली पहाड़ियों को सुरक्षित मानने की पर्यावरण मंत्रालय की समिति की परिभाषा को स्वीकार कर लिया गया था। अब नई पीठ ने सभी महत्वपूर्ण मुद्दों की समीक्षा के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों वाली एक नई उच्च स्तरीय समिति गठित करने का निर्णय लिया है और तब तक पुराने आदेश पर रोक लगा दी है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “हम जरूरी समझते हैं कि (पिछली) समिति की सिफारिशों और इस अदालत के निर्देशों को (नई) समिति के गठन तक स्थगित रखा जाए।’’ अगली सुनवाई 21 जनवरी को होगी।
पांच राज्यों में लगभग 700 किमी तक फैली अरावली पहाड़ियां देश की सबसे पुरानी पर्वत शृंखला हैं। जलवायु के लिए ढाल की तरह काम करती ये पहाड़ियां उत्तर भारत की हरियाली के लिए फेफड़ों का काम करती हैं। आल्प्स, एंडीज, हिमालय पर्वतमालाओं से पुरानी पर्वत शृंखला 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के एक सरकारी कमेटी की सिफारिशों को स्वीकार कर लेने से बहस के केंद्र में आ गई। पर्यावरण मंत्रालय की समिति ने 100 मीटर ऊंची पहाड़ियों को ही सुरक्षित माना और बाकी को औद्योगिक-व्यावसायिक दोहन के लिए खोलने की सिफारिश की। इस नई परिभाषा से अरावली शृंखला का मात्र 8.7 फीसदी हिस्सा ही सुरक्षित दायरे में आएगा। बाकी हिस्से को खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए खोल दिया गया है। इससे पारिस्थितिक यानी पर्यावरण और जलवायु संबंधी भारी नुकसान होना तय माना जा रहा है, जिसकी कोई भरपाई नहीं। भौगोलिक बनावट बदलने, इंसानी बस्तियों और वन्यजीवों के रहवास का खतरा तो अलग है।

अजमेर में अरावली शृंखला
अरावली छोटी और मध्यम ऊंचाई वाली पहाड़ियों की लंबी शृंखला है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है। यह शृंखला उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण जलवायु तंत्र का निर्माण करती है, जिसमें थार रेगिस्तान से पूरब की ओर धूल के बहाव को रोकना, प्राकृतिक जल भंडारण, विविध वन्यजीवों के लिए जगह बनाए रखना और मिट्टी के कटाव को रोकना शामिल है।
समिति की सिफारिश के मुताबिक, कोई भी जंगल, जमीन ‘अरावली पहाड़ी’ तभी मानी जाएगी जब वह अपने आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊंची हो। 500 मीटर के दायरे में पहाड़ियों के समूह को ‘अरावली रेंज’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार राजस्थान, जहां अरावली का दायरा सबसे ज्यादा है, वहां मापी गईं 12,081 पहाड़ियों में सिर्फ 1,048 पहाड़ियां या कहें अरावली का 8.7 फीसदी हिस्सा ही नए कानूनी दायरे में है। इससे प्राचीन शृंखला का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाता है, जिससे यह खनन और व्यावसायिक-दोहन के लिए खुल जाता है। दशकों से, अरावली के लंबे हिस्से बड़े पैमाने पर व्यावसायिक गतिविधियों से कानूनी ढाल से सुरक्षित रहे हैं।
कथित तौर पर विभिन्न राज्यों की मांग पर मई 2024 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अरावली पहाड़ियों और पर्वत शृंखलाओं की एक समान परिभाषा बनाने के लिए एक समिति बनाई। पैनल ने अक्टूबर 2025 में अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी। उसकी सिफारिश को नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया।
अरावली शृंखला में लिथियम, टंगस्टन, सोना और सीसा सहित कई खनिज पाए जाते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने तर्क दिया है कि कीमती और रणनीतिक खनिजों की मौजूदगी से ‘‘भविष्य के लिए काफी संभावनाएं’’ बनती हैं। यह भी कहा जाता है कि इस रेंज में ग्रेफाइट और रेयर अर्थ जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के खनन की ‘‘काफी संभावना’’ है। ये ऐसे संसाधन हैं, जिन्हें ऊर्जा, हाई-टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरिंग और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी माना जाता है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ओर से दायर एक हलफनामे में कहा गया है, ‘‘यह भी जरूरी है कि ऐसा ढांचा विकसित किया जाए, जो इस क्षेत्र में मौजूद महत्वपूर्ण, रणनीतिक और परमाणु खनिजों का व्यवस्थित, वैज्ञानिक और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ तरीके से इस्तेमाल करने में सक्षम हो।’’
लेकिन पर्यावरणविदों और संरक्षणवादियों का तर्क है कि अरावली शृंखला के 90 फीसदी से ज्यादा हिस्से को खनन वगैरह के लिए खोलने से सारा पर्यावरण तंत्र गड़बड़ा जाएगा और जलवायु संकट जानलेवा हो जाएगा। इस हिस्से में कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां, टीले और चट्टानी इलाके शामिल हैं। उनमें ढेरों की ऊंचाई 100-मीटर से नीचे है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव
अरावली की संरचना बारिश के पानी को भूमिगत जलाशयों में गहराई तक रिसने देती है। कांग्रेस सांसद अजय माकन ने संसद में कहा कि यह रेंज सालाना प्रति हेक्टेयर लगभग 20 लाख लीटर भूजल रिचार्ज को संभव बनाती है। इसे नष्ट किया गया, तो गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों में तेजी से भूजल में गिरावट आएगी। ये क्षेत्र बहुत हद तक अरावली पर निर्भर हैं। इससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पानी की कमी की समस्या और भी बदतर हो सकती है। उत्तरी भारत पहले से ही दुनिया के सबसे तेज घटते भूजल क्षेत्रों में एक है।
अरावली रेंज की बर्बादी से सिर्फ भूजल का संकट ही नहीं गहराएगा, बल्कि थार रेगिस्तान से आने वाली गर्म, धूल भरी हवाओं का संकट भी खड़ा हो जाएगा। ये पहाड़ प्राकृतिक ढाल का काम करते हैं। इनकी वजह से ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और गंगा के मैदानों में गर्म और धूल भरी हवा रुक जाती है। अगर यह ढाल टूटती है, तो आस-पास के राज्यों और दिल्ली के वायु प्रदूषण में पीएम10 सहित तमाम छोटे कणों का स्तर बढ़ने की पूरी संभावना है।
संसदीय बहस में कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन ने उत्तराखंड में भूस्खलन और हिमालय में चार धाम सड़क प्रोजेक्ट के दौरान पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई से इसकी तुलना की। आलोचकों का तर्क है कि आर्थिक विकास के लिए इकोलॉजिकल सिस्टम का अंधाधुंध दोहन नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्राकृतिक व्यवस्थाएं खत्म होने के बाद दोबारा नहीं बनाई जा सकतीं।