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जम्मू-कश्मीरः बाहरी बनेंगे वोटर

कारोबार, पढ़ाई या मजदूरी करने जम्मू और कश्मीर आने वाला हर कोई मतदाता बन सकता है, मुख्य चुनाव अधिकारी के इस नए फरमान पर उठा सियासी तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा है
जम्मू-कश्मीर में बाहरियों को मतदान का अधिकार दिए जाने के विरोध में 22 अगस्त को हुई सर्वदलीय बैठक

जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा हर महीने कोई न कोई विवादास्पद आदेश जारी किया जाना और उस पर सियासी तूफान का उठना अब सामान्य बात हो चली है। सरकार हर बार राजनीतिक विरोध को दरकिनार करते हुए एक नया आदेश जारी कर देती है। फिर बहस दूसरी दिशा में मुड़ जाती है। इस बार हालांकि चर्चा एक घोषणा पर अटक गई है। बीते 17 अगस्त को जम्मू-कश्मीर के मुख्य चुनाव अधिकारी हर्ष कुमार ने बयान दिया कि देश का हर वह नागरिक जो शिक्षा, कारोबार या श्रमकार्य के चलते सामान्य रूप से जम्मू-कश्मीर मं  रह रहा है, वह यहां मतदाता के रूप में अपना पंजीकरण करवा सकता है और अगले विधानसभा चुनाव में वोट डाल सकता है। कुमार को उम्मीद है कि मतदाता सूची में संशोधन के बाद मतदाताओं की संख्या 20 से 25 लाख तक बढ़ जाएगी। इसकी अंतिम घोषणा 25 नवंबर, 2022 को की जानी है। इस घोषणा ने राजनीतिक विवाद पैदा कर दिया है। इस बीच सरकार ने वक्फ की संपत्तियों का किराया बढ़ाने जैसे कई आदेश जारी किए और पुलिस ने कई जगह छापेमारी भी की पर 25 लाख वोटर बढ़ने संबंधी सीईओ के बयान पर बहस अब भी जारी है।

तय समय-सीमा के मुताबिक 15 सितंबर 2022 तक एकीकृत मतदाता सूची का मसौदा सभी निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों द्वारा प्रकाशित कर दिया जाएगा। इसके बाद 15 अक्टूबर तक महीने भर का समय दावों और आपत्तियों को दर्ज कराने के लिए रखा गया है जिनका निपटारा 10 नवंबर 2022 तक होना है। फिर स्वास्थ्य मानकों की जांच, आयोग से अंतिम अनुमति, डेटाबेस को अद्यतन करने तथा पूरक सूचियों के मुद्रण की अंतिम तारीख 19 नवंबर तय है। घोषणा से यह स्पष्ट हो चुका है कि अब डोमिसाइल यानी अधिवास प्रमाण पत्र यहां अप्रासंगिक हो जाएगा। कुमार के मुताबिक यह निर्णय 1951 के जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अंतर्गत लिया गया है जो संसद और राज्यों के विधायी सदन/सदनों के लिए चुनावी संहिता तय करता है। सभी स्थानीय राजनीतिक दलों ने इसे ‘खतरनाक’बताया है। इनमें भारतीय जनता पार्टी के करीबी माने जाने वाले दल भी शामिल हैं।

जम्मू-कश्मीर में बाहरियों को मतदान का अधिकार दिए जाने के विरोध में 22 अगस्त को हुई एक सर्वदलीय बैठक की डॉ. फारुख अब्दुल्ला ने अध्यक्षता की। सज्जाद लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और अल्ताफ बुखारी की अपनी पार्टी इस बैठक से दूर रही। कांग्रेस, माकपा, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, शिवसेना की उपस्थिति में संपन्न हुई इस बैठक के बाद डॉ. अब्दुल्ला ने कहा कि यह नया कदम यहां तमाम लोगों को खतरे में डाल देगा।

डॉ. अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘हमने हाल में हुई हत्याओं पर अपनी चिंता जाहिर की है, फिर चाहे वह कश्मीरी पंडितों की हत्या रही हो, बाहर के मजदूरों की, कश्मीरी मुसलमानों की या पुलिसवालों और सैन्यबलों की। हमें डर है कि उन पर (बाहरियों पर) हमला होगा। इसलिए उन्हें सोच-समझ कर फैसले लेने चाहिए। मैंने लेफ्टिनेंट गवर्नर (मनोज सिन्हा) से कुछ दिन पहले एक सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी। इससे पहले उन्होंने अमरनाथ यात्रा के संदर्भ में एक बैठक बुलाई थी और हम सब वहां गए थे। इस बार मैंने उनसे गुजारिश की थी कि वे सभी दलों को बुलाएं पर कोई जवाब नहीं आया है।’’

डॉ. अब्दुल्ला ने बताया कि जम्मू में भी वे एक सर्वदलीय बैठक करेंगे। उन्होंने कहा, ‘‘हम लोगों को बताएंगे कि सरकार क्या करने जा रही है। हम लोग अदालत भी जाएंगे। हर विकल्प पर हम विचार कर रहे हैं।’शिवसेना के नेता मनीष साहनी ने कहा कि उनकी पार्टी भी जम्मू-कश्मीर के दूसरे दलों की तरह बाहरियों को मताधिकार देने के विरोध में हैं। उन्होंने कहा, ‘‘जम्मू-कश्मीर के लोगों पर लगातार पीछे से वार किया जा रहा है। पहले सरकार ने स्थायी निवास प्रमाण पत्र को समाप्त किया और सबसे अधिवास प्रमाण पत्र लेने को कहा। लोग लंबी-लंबी कतारों में खड़े होकर जब अधिवास प्रमाण पत्र ले चुके हैं तब उन्हें बताया जा रहा है कि अब बाहरी भी वोट दे सकेंगे।’’

केंद्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को राज्य में पूरी तरह तालाबंदी और 8000 लोगों को गिरफ्तार करके संविधान के अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 ए को समाप्त कर दिया था। इसके अंतर्गत राज्य को दो केंद्र शासित क्षेत्रों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित किया गया। बीते तीन साल के दौरान केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में राज्य और केंद्र के करीब 800 कानूनों को अपनाया या विस्तारित किया लेकिन लद्दाख में एक भी कानून का विस्तार नहीं किया गया।

इसके बाद 31 मार्च 2020 को सरकार ने स्थायी निवास के प्रावधान को समाप्त करते हुए उसकी जगह अधिवास कानून को लागू कर दिया। इसके अंतर्गत निवासी उसे माना जाएगा जो जम्मू-कश्मीर में 15 वर्ष रहा हो या सात वर्ष तक पढ़ाई की हो और यहां स्थित किसी शिक्षण संस्थान से दसवीं और बारहवीं की परीक्षा दी हो। इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है। 1947 के बाद अगर किसी ने कभी भी दसवीं और बारहवीं का इम्तिहान यहां से दिया हो तो वह अधिवास के योग्य है। सरकार ने इसके तहत तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के हर नागरिक के लिए अधिवास प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य कर दिया है, हालांकि उनके पास राज्य-आश्रित का अनिवार्य प्रमाण पत्र पहले से मौजूद है जिसे नए अधिवास प्रमाण पत्र के बराबर माना जा सकता था।

भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में ‘सामान्य रूप से रहने वाले लोग’ यहां मताधिकार का प्रयोग तब कर सकेंगे जब वे अपने मूल स्थान पर मतदाता सूची से अपना नाम कटवा देंगे। पार्टी का आरोप है कि अन्य स्थानीय दल इस मसले पर राजनीति कर रहे हैं। बाकी दलों को डर है कि 25 लाख बाहरी या जम्मू-कश्मीर में ‘सामान्य  रूप से रहने वाले’ लोग अगर मतदाता सूची में जगह पा गए तो वे हमेशा के लिए इस क्षेत्र में मतदाताओं की गणितीय स्थिति को बदल देंगे। भाजपा का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में ‘सामान्य रूप से रहने वालों’ की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है और बाकी दल इसका मतलब नहीं समझ पा रहे हैं जबकि बाकी दलों को इस बात की आशंका है कि भाजपा की सरकार 25 लाख बाहरी मतदाताओं को जम्मू-कश्मीर की मतदाता सूची में जोड़ पाने में वाकई सक्षम है।

पीडीपी के नेता मोहित भान कहते हैं, ‘‘अगर सामान्य रूप से रहने वाले वोटर का मतलब यह है कि कोई भी 15 दिन के लिए कश्मीर आए और यहां पंजीकरण करवा के वोट डाले और निकल ले, ऐसे में पांच साल के अंतराल पर तो वह अलग-अलग राज्यों में सरकारें चुनता रहेगा। तो क्या आप ऐसे 25 लाख मतदाताओं को तैयार कर रहे हैं जो पूरे भारत में चुनावों को प्रभावित कर सकेंगे?’’

सज्जाद लोन कहते हैं, ‘‘हम 1 अक्टूबर तक इंतजार करेंगे। वह आखिरी इम्तिहान का दिन है। हम इस कानून से नहीं, कानून लागू करने वालों से डरे हुए हैं। अगर उन्होंने वाकई ऐसा ही किया तो हम भारत के सामने भूख हड़ताल पर बैठ जाएंगे।’’

अब यह अलग बात है कि चुनाव आयोग ने 25 लाख अतिरिक्त मतदाताओं को जोड़ ही दिया, तो एक अदद भूख हड़ताल कैसे इतने नाम मतदाता सूची से काटने पर भाजपा को मजबूर कर पाएगी। इस सवाल पर फिलहाल सब मौन हैं। 

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