Advertisement

दवा ही बनी मर्ज

इलाज की दवाओं के नशे के लिए इस्तेमाल में हुई बढोतरी, इस ओर ध्यान देना सबसे जरूरी
दर्दनाशक दवाइयां, कफ सिरप और नशे की लत छुड़ाने वाली दवाइयों का भी नशे के लिए इस्तेमाल किया जाता है

बेंजोडायजीपाइन को बोलने और उसे याद रखने में भले ही मुश्किल आए लेकिन वैलियम, नाइट्रोजन को याद करिए, वह कइयों को काफी जाना पहचाना लगेगा। असल में बेंजोडायजीपाइन ड्रग का इस्तेमाल अवसाद से घिरे व्यक्ति को डॉक्टर इलाज के लिए देते हैं। इस दवा का काम व्यक्ति के दिमाग (तंत्रिका तंत्र) को शिथिल करना है, जिससे उसे मानसिक आराम मिल सके। दिमाग को शिथिल करने वाली इस तरह की दवाओं का इस समय बड़े पैमाने पर नशे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इनका सेवन करने वाले न केवल हर उम्र के लोग हैं, बल्कि पुरुष और महिलाएं दोनों ही धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। ड्रग्स के गैर-कानूनी रूप से इस्तेमाल पर 2019 में आए सर्वेक्षण “मैग्नीट्यूड ऑफ सबस्टेंस अब्यूज इन इंडिया” के अनुसार देश की 1.08 फीसदी (करीब 1.18 करोड़ लोग) आबादी नशीली दवाओं का सेवन कर रही है। सर्वेक्षण के अनुसार, लोग इन दवाओं को किसी डॉक्टर की सलाह या पर्चे के बिना खरीद रहे हैं।

दवाओं को नशे के रूप में लेने में नींद की गोलियां तो बस एक उदाहरण है। दर्दनाशक दवाइयां, कफ सिरप और नशे की लत छुड़ाने वाली दवाइयों का भी बड़े पैमाने पर नशे के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा एकाग्रता में कमी आने पर इलाज के लिए इस्तेमाल होनी वाली एम्फीटामाइंस जैसी दवाइयां भी धड़ल्ले से नशे के लिए लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इन दवाओं की बिक्री पर सख्त नियमन होने के बावजूद ये धड़ल्ले से गैर-कानूनी रूप से बिक रही हैं।

बेंगलूरू स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोसाइंस (निमहांस) के मनोविज्ञान विभाग की प्रमुख डॉ. प्रतिमा मूर्ति का कहना है, “नशे के लिए दवाओं का इस्तेमाल काफी तेजी से बढ़ा है। पिछले कुछ वर्षों में हमने महसूस किया है कि अब सभी वर्ग के लोग इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ समय पहले तक महिलाएं दर्द की दवाइंया लेती थीं, फुटपाथ और सड़कों पर अपनी जिंदगी बिताने वाले अवैध रूप से नशे के लिए दवाओं का इस्तेमाल करते थे। लेकिन अब यह ट्रेंड बहुत तेजी से बदल रहा है। हम यह भी जानते हैं कि डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाओं का वृद्ध लोगों में गलत तरीके से इस्तेमाल का खतरा बढ़ा है। लेकिन यह कितने बड़े पैमाने पर ली जा रही है, इसका अंदाजा हम नहीं लगा सकते हैं।”

मामले की गंभीरता को समझने के लिए 2015 के सर्वेक्षण की बात करते हैं। बेंगलूरू स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एेंड न्यूरोसाइंस ने शहर के शॉपिंग मॉल्स में आने वाले लोगों से बातचीत की। सर्वेक्षण में यह सामने आया कि दर्दनाशक दवाओं को लोग सबसे ज्यादा बिना किसी बीमारी के खरीद रहे थे। यही नहीं, जिन लोगों ने शुरू में इन दवाओं का इस्तेमाल इलाज के लिए किया, वह भी बाद में नशे के लिए इन दवाओं का इस्तेमाल करने लगे। सर्वेक्षण करने वालों को सबसे ज्यादा आश्चर्य यह हुआ कि सर्वेक्षण में भाग लेने वाले 12 फीसदी स्वस्थ युवा इस तरह की दवाओं को लेने की बात स्वीकार कर रहे थे, जबकि 26 फीसदी स्वस्थ लोग दर्दनिवारक दवाओं का उपयोग करना चाहते थे।

मूर्ति ने 2015 में हुए सर्वेक्षण पर आउटलुक से कहा, “नशे के लिए दवाओं का किस तरह इस्तेमाल हो रहा था, इसका खुलासा आंखें खोलने वाला था।” उन्होंने जेल में हुए एक और अध्ययन के बारे में बताया। वहां कैदियों के पेशाब की जांच में ऐसे दवाओं की मात्रा ज्यादा पाई गई, जो नशे के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। मूर्ति के अनुसार इन उदाहरणों से साफ है, “नींद नहीं आने, चिंता होने और घबराहट जैसी सामान्य समस्याओं के लिए दवाओं का इस्तेमाल काफी लापरवाही से किया जा रहा है।”

गाजियाबाद स्थित नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर के अतुल अंबेकर का कहना है, “डॉक्टर द्वारा लिखी गई पर्ची का इस्तेमाल कर नशीली दवाओं का सेवन करना एक नई तरह की समस्या खड़ी कर रहा है। अवैध रूप से ज्यादा बिक्री होने के कारण जिन मरीजों को ऐसी दवाओं की वास्तविक रूप से जरूरत हैं, उन्हें दवाएं ही नहीं मिल पा रही है। ऐसा तब हो रहा है जब भारत विकासशील देशों में दवाओं का सस्ते में उत्पादन करने वाला अग्रणी देश है।” इनकी खुदरा बिक्री को लेकर कई सारी कानूनी चुनौतियां हैं। यह भी समझना होगा कि डॉक्टर की पर्ची के बिना बिकने वाली सभी दवाइयां नशे के लिए इस्तेमाल नहीं होती हैं।

अंबेकर कहते हैं कि हमें इन पहलुओं पर फैसला करते वक्त भारत में मानसिक बीमारियों के लिए मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी गौर करना चाहिए। कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से हो सकता है कि बहुत से मरीज बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हो। ऐसे में वह लोग भी नशा लेने वालों की श्रेणी में शामिल हो जाते हैं।

अंबेकर, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के ड्रग डिपेंडेंस एडवाइजरी पैनल के एक्सपर्ट भी है, उनका कहना है, “इन सब चुनौतियों के बावजूद हम यह कह सकते हैं कि भारत में डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाओं का दुरुपयोग एक बड़ी समस्या है, जो कम होने की जगह बढ़ती जा रही है। साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बिना डॉक्टर की पर्ची के केवल मानसिक बीमारियों वाली दवाएं ही नहीं इस्तेमाल की जा रही है, इसके अलावा लोग नशे के लिए एंटीबॉयटिक्स, स्टेरॉयड का इस्तेमाल बिना किसी डॉक्टर की सलाह के कर रहे हैं। इसकी वजह से उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं भी हो रही हैं।”

“द मैग्नीट्यूड ऑफ सबस्टेंट अब्यूज इन इंडिया 2019” की रिपोर्ट के अनुसार देश की 2.06 फीसदी आबादी इस समय नशे के पदार्थों का इस्तेमाल कर रही है। इसमें करीब 1.14 फीसदी हेरोइन और 0.96 फीसदी दवाओं का इस्तेमाल लोग नशे के लिए कर रहे हैं। ड्रग्स लेने वाले लोगों में करीब 46 फीसदी  हेरोइन का इस्तेमाल कर रहे हैं जबकि इतनी ही आबादी ऐसी है जो नशा से छुटकारा पाने के लिए इस्तेमाल होने वाली बूप्रेनॉर्फीन और सिडेटिव्स के रूप में लिए जाने वाले केटामाइन का इस्तेमाल कर रही है।

एक बात और समझनी होगी कि भारत के उत्तरी और पूर्वोत्तर राज्यों में हेरोइन का इस्तेमाल इसलिए हो रहा है क्योंकि इन क्षेत्रों में सीमा पार से नशीले पदार्थों की काफी तस्करी होती है। दक्षिण भारत के राज्यों में नशीले पदार्थों का सेवन दूसरे क्षेत्रों की तुलना में कम है। हालांकि दक्षिणी क्षेत्र में लोग नशे के लिए दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह पूरे देश में सिक्किम में सबसे ज्यादा दवाओं का इस्तेमाल नशे के लिए किया जा रहा है।

मिजोरम नार्कोटिक्स ऐंड एक्साइज डिपार्टमेंट की रिपोर्ट के अनुसार 1990 से अब तक वहां 1161 लोगों की मौत स्पास्मो प्रॉक्सिवॉन या पारवान स्पास जैसी दर्दनाशक दवाओं को नशे के लिए खाने से हुई है, जो हेरोइन से होने वाले मौतों की तुलना में कहीं ज्यादा है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से हेरोइन से होने वाली मौतों का भी आंकड़ा बढ़ा है।

मानसिक बीमारियों के लिए इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर दवाएं, कंट्रोल्ड यूज कटगरी में आती है। हालांकि बेंगलूरू के सेंट जॉन हॉस्पिटल की मनोचिकित्सक सुनीत सिमॉन का कहना है “गंभीर मानसिक बीमारियों बाइपोलर डिसऑर्डर, सिजोफ्रेनिया, अवसाद के इलाज के लिए दी जाने वाली दवाएं नशे की लत लगाने वाली नहीं होती है। असल में होता यह है कि कई बार अवसाद से ठीक होता मरीज अगर डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं लेना अचानक से बंद कर देता है, तो दो चीजें होती हैं। या तो वह दोबारा से अवसाद में चला जाता है या फिर वह सरेंडर कर देता है। लेकिन ऐसी दवाओं को अगर आप डॉक्टर की सलाह पर योजना के साथ धीरे-धीरे बंद करते हैं, तो कुछ भी नहीं होता है।

2016 में डॉक्टरों लिखी गई दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए बनाई गई गाइडलाइन पर जारी बुकलेट की सह लेखिका निमहांस की प्रतिमा मूर्ति का कहना है, “इसकी रोकथ्‍ााम के लिए नियामक, ड्रग कंट्रोलर, फॉर्मासिस्ट, डॉक्टरों को सतर्क होने की जरूरत है। लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने कोशिश होनी चाहिए। लेकिन इस ओर ध्यान तभी जाता है, जब बड़ा हादसा होता है।” अतुल अंबेकर का कहना है कि हम कई वर्षों से मेंटल रिफॉर्म की बात कर रहे हैं, लेकिन 2001 में इरवाडी हादसे के बाद ही यह  चर्चा का विषय बना। हमें यह समझना होगा कि ड्रग  अलग तरह की समस्या है। हमें यह समझना होगा कि ड्रग जहां इलाज के लिए जरूरी है, वही नशे के लिए इसका इस्तेमाल एक बीमारी भी है।

नशे के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाइयां

 

सेंट्रल नर्वस सिस्टम

बार्बीट्यूरेट्स- मिर्गी, एनेसथेसिया, पीलिया, एनजाइटी आदि बीमारियों के लिए

बेंजोडायजीपाइन-  इनसोमिया, एनजाइटी, मांसपेशियों की अकड़न, शराब छुड़ाने आदि बीमारियों के लिए

एम्‍फीटामीन- नार्कोलेप्सी, एडीएचडी

मिथाइलफेनीडेट- एडीएचडी, नार्कोलेप्सी

डेक्सट्रोमेथॉर्पन- कफ दूर करने के लिए

ओपीऑयड डेरिवेटिव्स

कोडीन- सूखी खांसी

मॉर्फिन- एनलजेसिक, प्री-एनेसथेटिक मेडिकेशन, एनजाइटी, हृदय संबंधी बीमारियों के लिए

मेथाडोन- नशे की लत छुड़ाने के लिए

फेंटानिल- गंभीर दर्द के लिए

बूप्रेनॉर्फीन- नशे की लत छुड़ाने के लिए

ऑक्सीकोडोन एचसीएल- दर्द निवारक

प्रोपॉक्सीफीन- नार्कोटिक दर्द निवारक

स्रोत- डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए बनाई गई गाइडलाइन निमहांस,2016

Advertisement
Advertisement
Advertisement