उलझन जो सुलझे ना

पुनीत निकोलस यादव
सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी के सामने पार्टी को पटरी पर लाने की बड़ी चुनौती
सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी के सामने पार्टी को पटरी पर लाने की बड़ी चुनौती

पुनीत निकोलस यादव
क्या कांग्रेस की वंशवादी नेताओं के बदले जमीनी कार्यकर्ताओं को तरजीह देने की नीति कारगर होगी?

कांग्रेस की नैया खासकर पिछले एक साल से डांवाडोल है, जबसे राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और पिछले 10 अगस्‍त को बतौर अंतरिम अध्यक्ष उनकी मां सोनिया गांधी के हाथ कमान आई है। पार्टी में न केवल मतभेद बढ़े हैं बल्कि कई अहम नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है। नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी की कांग्रेस-विरोधी हवा को शह देने की रणनीति की काट निकालने में पार्टी अपनी नाकाबिलियत का मानो खामियाजा भुगत रही है।  इसके साथ लगातार चुनावी पराजय और हाल के वर्षों में कुछेक जीते राज्यों में अपने घर को एकजुट रखने में नाकामी भी उसकी दुर्दशा बढ़ा रही है। यही नहीं, रह-रहकर उठने वाली महत्वाकांक्षा की हुंकार पुराने दिग्गजों और युवा नेताओं तथा कई बार हमउम्र नेताओं के बीच भी कलह की वजह बन जा रही है।

मार्च से कांग्रेस मध्य प्रदेश में सत्ता गंवा चुकी है, और राजस्थान में भी उसी कगार पर पहुंच गई है, जहां राजनीति के माहिर खिलाड़ी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने 46 साल के राजनैतिक अनुभव के बूते बागी नेता सचिन पायलट और भाजपा की सरकार गिराने की कोशिशों की काट में लगे हैं। दोनों ही राज्यों में पार्टी की सरकार को चुनौती चुनी हुई सरकारों को गिराने में अपनी महारत साबित कर चुकी भाजपा से ही नहीं मिली, बल्कि कमोवेश उतने ही जोरदार ढंग से पार्टी के नेताओं से भी मिली। एक समय ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट कांग्रेस की अगली पीढ़ी के ऐसे नेता माने जाते थे, जिन पर राहुल गांधी पार्टी को मजबूत करने के लिए भरोसा कर सकते थे। लेकिन अब एक तो भाजपा में जा मिले हैं और दूसरे भले फिलहाल भाजपा में न जाएं पर पार्टी से नाता तोड़ने का मन बना चुके हैं।

यही नहीं, पंजाब, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों में भी, जहां पार्टी अपने बूते या गठबंधन में सरकार में है, बगावत या दलबदल की सुगबुगाहटें हैं (खासकर पंजाब में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ)। संगठन के स्तर पर भी पार्टी में विरोध के स्वर लगातार मुखर होते जा रहे हैं, जिसमें वरिष्ठ और युवा नेतृत्व के बीच खींचतान चल रही है। लोकसभा सांसद मनीष तिवारी और शशि थरूर जैसे नेता संगठन में बड़ी जिम्मेदारी चाहते हैं। इसके लिए ये नेता पार्टी अध्यक्ष पद से लेकर कांग्रेस कार्यकारिणी में शामिल होने की खातिर संगठन के स्तर पर चुनाव के लिए भी तैयार हैं।

मनीष तिवारी लगातार यह मांग करते रहे हैं कि भाजपा को कारगर चुनावी टक्कर देने के लिए कांग्रेस को विचारधारा और रणनीति पर स्पष्टता की जरूरत है, साथ ही धर्मनिरपेक्षता पर नए नजरिए की दरकार है। भाजपा का अभी तक का सबसे अहम मुद्दा, राम मंदिर निर्माण अब हकीकत में तब्दील होने जा रहा है। ऐसे में पार्टी इन मुद्दों को चुनावों में भुनाने का शायद ही कोई मौका छोड़ेगी। इसे देखते हुए कांग्रेस के अंदर युवा और कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी को अपनी मुस्लिम परस्त होने की छवि तोड़ने की बेहद जरूरत है, जो भाजपा की हिंदुत्व परस्त राजनीति की वजह से बन गई है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, “हमें लोगों को यह समझाना होगा कि धर्मनिरपेक्ष होने का मतलब हिंदू विरोधी होना नहीं है। साथ ही, जनता को यह भी समझाना होगा कि सनातन धर्म का असली संदेश सर्वधर्म समभाव है, जिसकी राजनीति कांग्रेस पार्टी करती है।”

अंतरिम अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी का एक साल पूरा हो रहा है, तो पार्टी में फिर मांग उठ रही है कि उनके 50 वर्षीय बेटे को फिर से  कमान सौंप देनी चाहिए। ऐसे में यह सवाल वाजिब हो उठता है कि क्या पिछले एक साल में कमान परिवर्तन से पार्टी के कामकाज में कोई वास्‍तविक बदलाव आया है? क्या सोनिया गांधी ने पिछले एक साल में चुपचाप यह को‌िशश की है कि राहुल गांधी के 18 महीने के कार्यकाल में चली पीढ़ी परिवर्तन की मुहिम पलट दी जाए? पार्टी सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वापस लौटना पक्का है, लेकिन सोनिया अभी कुछ महीने कमान नहीं छोड़ने वाली हैं। हालांकि पार्टी में अब सभी नियुक्तियां राहुल गांधी के जरिए ही होती हैं और सोनिया गांधी प्रमुख रूप से संरक्षक की तरह ही हैं। वे अमूमन सहयोगी दलों के साथ सामंजस्य बनाए रखने और वरिष्ठ नेताओं के मन से उनके भविष्य की चिंताओं को दूर करने की भी कोशिश करती हैं। कभी-कभार बहुत जरूरत होने पर असंतुष्ट नेताओं को शांत करने में भूमिका निभाती हैं। उन्होंने देर से ही सही, यह तय किया है कि कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और बाकी नेताओं को कामकाज में ज्यादा स्वायत्तता दी जाए और हर छोटे-बड़े फैसले के लिए उन्हें 10, जनपथ का रुख न करना पड़े। उदाहरण के तौर पर, सोनिया और राहुल ने उत्तर प्रदेश की सारी जिम्मेदारी प्रियंका गांधी वाड्रा पर छोड़ दी है और प्रियंका प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार 'लल्लू' पर कहीं ज्यादा भरोसा करती हैं।

लोकसभा चुनावों में लगातार दूसरी बार जब कांग्रेस की हार हुई तो पार्टी की कमान राहुल गांधी के पास थी। हार की जिम्मेदारी लेते हुए जब राहुल ने अध्यक्ष पद छोड़ने का फैसला किया तो उस समय उनके साथियों ने कांग्रेस कार्यकारिणी के जरिए यह प्रस्ताव पारित कराया कि वे अपने फैसले पर दोबारा विचार करें। यही नहीं, कार्यकारिणी ने राहुल को इस बात की भी जिम्मेदारी दी कि वे पार्टी में आमूल-चूल बदलाव करें। हालांकि राहुल गांधी ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और एक खुला पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर भी सवाल खड़े किए जो चुनावों में मिली बुरी हार के बावजूद अपनी जिम्मेदारी लेने से बच रहे थे।

इसके बाद जब कार्यकारिणी ने सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी दी तो एक प्रस्ताव भी पारित किया गया कि वे संगठन स्तर पर पार्टी में अहम बदलाव करें। हालांकि इस बात को भी एक साल हो चुके हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी के अंदर किसी अहम बदलाव की झलक नहीं दिखी है। इस दौरान जिले और राज्य स्तर पर पार्टी के अंदर कई अहम बदलाव जरूर हुए हैं। हालांकि पार्टी के स्तर पर हुए इन बदलावों पर न तो विरोधी मीडिया की नजर गई है और न ही पार्टी में मौजूद विरोधी तत्वों की नजर गई।

कांग्रेस महासचिव तथा राज्यसभा सांसद के.सी.वेणुगोपाल ने आउटलुक को बताया कि पिछले छह महीने से करीब-करीब हर दूसरे हफ्ते पार्टी में कई अहम बदलाव किए गए हैं। जैसे, कर्नाटक में डी.के. शिवकुमार, उत्तर प्रदेश में अजय कुमार लल्लू, दिल्ली में अनिल चौधरी और गुजरात में हार्दिक पटेल को पार्टी की कमान सौंपी गई है। इसके अलावा सैकड़ों जिले और कई राज्यों में विभिन्न स्तर पर अहम नियुक्तियां की गई हैं, लेकिन इन पर किसी का ध्यान नहीं गया है। वेणुगोपाल का कहना है, इस तरह के अहम बदलाव केंद्रीय स्तर पर इसलिए नहीं दिख रहे हैं क्योंकि ज्यादातर लोगों की नियुक्तियां राहुल गांधी जब पार्टी अध्यक्ष थे, उस दौरान की गई थी। इन लोगों को नई जिम्मेदारी संभाले बमुश्किल दो साल हुए हैं। वे अफसोस जताते हुए कहते हैं कि पार्टी की जो कमियां सामने आती हैं, उन्हें तो प्रचारित किया जाता है लेकिन पार्टी के अंदर जो सकारात्मक पहल की जा रही है, उसे कोई तरजीह नहीं देता। राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले वेणुगोपाल का कहना है, “लोकसभा चुनावों के बाद जब प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में पार्टी की जिला इकाइयों को भंग किया तो उसकी चर्चा तो हर जगह हुई, लेकिन जब पिछले हफ्ते उन्होंने जिला स्तर पर नए अध्यक्ष और दूसरे पदाधिकारी नियुक्त किए तो उसकी कोई चर्चा नहीं दिखी।”

इन बदलावों के जरिए पार्टी की कोशिश है कि अहम पदों पर जमीन से जुड़े नेताओं को जिम्मेदारी मिले। यह लोगों के बीच बन गई उस छवि से एकदम अलग है, जिसमें यह कहा जाता है कि पार्टी केवल वंशवाद को तरजीह देती है। वेणुगोपाल कहते हैं, “पार्टी में आया यह बदलाव राहुल गांधी के शुरू किए गए विजन का ही विस्तार है, जिसमें कोशिश रही है कि संगठन में ज्यादा से ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाए और प्रतिभावान लोगों को तरजीह दी जाए।”

राहुल गांधी के एक अन्य करीबी नेता का कहना है, “अगर आप यूपीए सरकार के दौर को देखें तो उस वक्त जिन युवा नेताओं को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी गई, वे वंशवाद के सहारे आगे आए थे। इस श्रेणी में जितिन प्रसाद, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे लोग शामिल थे। उस दौरान मीनाक्षी नटराजन और मणिक्कम टैगोर जैसे जमीन से जुड़े युवा नेताओं को तरजीह नहीं मिली थी। आज के दौर में भी कांग्रेस के लिए पायलट और देवड़ा जैसे नेता ही चुनौती पेश कर रहे हैं, जबकि टैगोर जैसे नेता उसी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहे हैं। साफ है कि वंशवाद हमेशा विचारधारा के स्तर पर प्रतिबद्धता नहीं दिखाता है। शायद अब इस बात को कांग्रेस खुद भी समझ रही है।”

लॉकडाउन में श्रमिकों और प्रवासियों की मदद के लिए काफी तारीफ पा चुके और अभी बिहार में बाढ़ पीड़ितों के लिए काम कर रहे, अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास बी.वी. ने आउटलुक से बातचीत में कहा, “राजनीति में मेरा कोई गॉडफादर नहीं है। मैं बूथ स्तर पर काम करता था, राहुल ने मुझे वहां से उठाकर भारतीय युवा कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी है। अभी कांग्रेस को छोड़कर वे लोग जा रहे हैं, जिन्हें बिना कोई संघर्ष किए सब कुछ थाली में परोसा हुआ मिल गया था। वे जमीन पर काम करने से कतरा रहे हैं।”

श्रीनिवास और हाल ही में राज्यसभा के लिए चुने गए राजीव सातव जैसे कई युवा नेताओं को राहुल गांधी ने पार्टी में शुरू किए गए “प्रतिभा खोज” कार्यक्रम के तहत 2004 से 2009 के बीच चुना था। लेकिन उस दौरान राहुल गांधी को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का साथ नहीं मिला। इस वजह से पार्टी के अंदर चुनाव की प्रक्रिया थम गई। वेणुगोपाल कहते हैं, “अब समय आ गया है कि युवाओं को नेतृत्व के लिए तैयार किया जाए। सातव, टैगोर, ज्योतिमणि, रम्या हरिदा, हिबी इदेन, जीतू पटवारी और हार्दिक पटेल जैसे नेताओं ने जमीन पर काफी काम किया है। इनमें से कोई भी राजनीति में पैसे या वंशवाद की वजह से नहीं आया है।”

कांग्रेस सचिव चंदन यादव का कहना है, “पार्टी केवल वंशवाद को बढ़ावा देती है, यह नजरिया इसलिए बना है क्योंकि मीडिया में एक ऐसा धड़ा है जो कांग्रेस की ऐसी छवि बनाना पसंद करता है। इसलिए बार-बार यही बातें प्रोजेक्ट की जाती हैं कि कांग्रेस के प्रमुख नेता वंशवाद से निकले हैं, जो अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं और बहुत ही रईसी वाला जीवन जीते हैं, जबकि जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की पार्टी में कोई पूछ नहीं है।” यादव कहते हैं, “टैगोर और हरिदास के अलावा राज्यसभा सांसद फूलो देवी नेताम, झारखंड के मंत्री बादल पत्रलेख और गुजरात में विपक्ष के नेता परेश धनानी जैसे कई कांग्रेस नेता हैं जो बहुत ही साधारण परिवार से आए हैं। इन लोगों ने सड़क पर संघर्ष किया है। इन उदाहरणों के बावजूद मीडिया अपने पक्षपाती नजरिए को छोड़ने को तैयार नहीं है।”

जमीन से जुड़े नेताओं के आगे आने का असर पार्टी के मीडिया और सोशल मीडिया विभागों में भी दिखने लगा है। पार्टी के सूत्रों का कहना है कि जमीन से जुड़े मुद्दों को अब ज्यादा तरजीह मिल रही है, हालांकि अभी काफी कुछ करना बाकी है। पिछले साल सितंबर में कांग्रेस के सोशल मीडिया प्रमुख बने रोहन गुप्ता का कहना है, “पार्टी अपनी सोशल मीडिया रणनीति को नए सिरे से तैयार कर रही है। हम ऐसी रणनीति बना रहे हैं जिसमें पार्टी के कार्यकर्ताओं और आम आदमी से सीधा संवाद हो। हमने इसके अलावा ‘कांग्रेस के साथ’ एक नई पहल की है, जिसके तहत हम ऐसे पेशेवरों को जोड़ रहे हैं जो कांग्रेस के सक्रिय सदस्य नहीं हैं लेकिन कांग्रेस की विचारधारा का समर्थन करते हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार कांग्रेस का सोशल मीडिया एंगेजमेंट भाजपा के मुकाबले करीब 30 फीसदी तक बढ़ गया है।”

पिछले दो महीने में कांग्रेस ने ‘स्पीक अप’ के जरिए कई सारे अभियान चलाए हैं। इसके तहत तेल की बढ़ती कीमतों, छात्रों के मुद्दे, भारत-चीन के बीच लद्दाख को लेकर छिड़े विवाद और हाल ही में कांग्रेस शासित राज्यों में भाजपा के सरकार गिराने के षड्यंत्र वगैरह पर पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बनाए वीडियो को सोशल मीडिया पर जारी किया गया है। गुप्ता का कहना है कि इन सभी वीडियो को बहुत अच्छा समर्थन मिला है। अकेले ट्विटर पर हर एक वीडियो कम से कम तीन लाख बार देखे गए।

जब कोरोना वायरस के बढ़ते को खतरे को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन का ऐलान किया तो उस वक्त सोनिया गांधी ने सरकार द्वारा देरी से उठाए गए फैसले पर सवाल खड़े किए। पार्टी ने 11 सदस्यीय सलाहकार समूह का भी गठन किया, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गांधी को भी शामिल किया गया। इस कदम के जरिए संदेश साफ था कि विभिन्न अहम मुद्दों पर पार्टी मजबूती से अपना पक्ष रखेगी। इससे यह भी साफ हो गया कि राहुल गांधी एक बार फिर से पार्टी की रोजाना गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। समूह के कम से कम पांच सदस्य के.सी. वेणुगोपाल, रणदीप सुरजेवाला, प्रवीण चक्रवर्ती, सुप्रिया श्रीनेत्र और गौरव वल्लभ की नियुक्ति राहुल गांधी की सिफारिश पर की गई है।

 जिस तरह से मोदी सरकार ने कोरोना महामारी से निपटने में शिथिलता दिखाई है, उससे पहले से ही लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और बुरी स्थिति में पहुंच गई है। सलाहकार समूह के एक सदस्य का कहना है कि ये ऐसे मुद्दे हैं जिनके जरिए राहुल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को परेशानी में डाल सकते हैं। पार्टी के मीडिया सेल से साफ तौर पर कहा गया है कि सरकार पर हमला करने में कोई ढिलाई न बरती जाए, लेकिन यह भी संदेश है कि प्रधानमंत्री पर कोई व्यक्तिगत हमला न किया जाए, ताकि भाजपा को अपनी कमियां छुपाने का कोई मौका नहीं मिले। राहुल ने 12 फरवरी को जब सरकार पर कोरोना महामारी से सही से नहीं निपटने का आरोप लगाया तो उन्होंने यही कहा कि वे सकारात्मक आलोचना के जरिए ही आगे बढ़ेंगे।

कांग्रेस के ज्यादातर प्रवक्ताओं के बारे में ऐसी राय है कि वे भाजपा प्रवक्ताओं के तीखे हमले पर रक्षात्मक रवैया अपना लेते हैं, लेकिन उनमें भी अब काफी बदलाव दिख रहा है। लद्दाख में भारत-चीन सीमा विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुरू में संकट पर ज्यादा गंभीर न दिखने वाले बयान ने भी कांग्रेस प्रवक्ताओं को भाजपा पर तीखा हमला करने का मौका दे दिया। मोदी ने 19 जून को यह बयान दिया था कि चीन ने गलवन घाटी में कोई घुसपैठ नहीं की है, जबकि उसके ठीक चार दिन पहले ही 20 भारतीय सैनिक, चीनी सैनिकों के साथ हुई झड़प में मारे गए थे। इस घटना ने पार्टी प्रवक्ताओं को कांग्रेस  पर 1962 में चीन से मिली हार के धब्बे से उबरने का भी मौका दे दिया।

जिस तरह पार्टी की विभिन्न राज्य इकाइयों में जमीन से जुड़े नेताओं की नियुक्ति हुई, उससे पार्टी में किसी रणनीति के लेकर जो एकरूपता में कमी आ रही थी, उसे भी दूर करने में काफी मदद मिली है। पार्टी के अनेक नेताओं का मानना है कि इन कदमों से साफ है कि राहुल गांधी दोबारा अध्यक्ष पद की कमान संभालने वाले हैं। साथ ही उनकी ताजपोशी बिना किसी बड़े उलटफेर के शांति से की जाएगी। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, “भले ही पार्टी में कई अहम बदलाव की शुरुआत हो गई है, लेकिन अब भी चुनाव जीतना हमारे लिए चुनौती है। अगले दो साल में बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसमें बिहार और पश्चिम बंगाल में हम मुख्य विपक्षी दल नहीं हैं जबकि उत्तर प्रदेश में हमें अभी नहीं पता है कि प्रियंका गांधी के प्रयासों का कितना फायदा मिलेगा।”

वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कांग्रेस से राज्यसभा सांसद कुमार केतकर पार्टी की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए कहते हैं, “कांग्रेस पार्टी का मौजूदा संकट केवल नेतृत्व का नहीं है, बल्कि इस समय वह अपनी विचारधारा को लोगों को नहीं समझा पा रही है। भाजपा ने राजनीति को नया रूप दिया है और वह जिस तरह से ध्रुवीकरण, विभाजनकारी और घृणा फैलाने वाली राजनीति कर रही है, उसे चुनौती देने के लिए कांग्रेस को अपनी धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी राजनीति को जमीनी स्तर तक पहुंचाना होगा, जिससे देश में एक जन आंदोलन खड़ा हो सके।” एक अन्य वरिष्ठ नेता ने आउटलुक को बताया कि संगठन में बदलाव करने से कोई इनकार नहीं करता है लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि नई पीढ़ी को तैयार करने के चक्कर में हम कहीं चुनावों में बड़ा नुकसान नहीं उठा लें, क्योंकि अगर आपकी चुनावों में एक बार प्रासंगिकता खत्म हो जाती है तो फिर किसी बात का महत्व नहीं रह जाता है। इस समय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वह सबसे पहले नेताओं के बीच संवाद को बढ़ावा दे, जिसमें वरिष्ठ और कनिष्ठ का भेद न रहे और सार्वजनिक तौर पर पार्टी किसी मुद्दे पर बंटी हुई नजर न आए।

केतकर गांधी परिवार के नेतृत्व पर एक और अहम बात कहते हैं, “मौजूदा परिस्थितियों में नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व में आगे बढ़ना ही सबसे अच्छा दांव है, क्योंकि 1947 के बाद से केवल एक बार, 1991-97 का समय रहा है जब नेहरू-गांधी परिवार का कोई भी व्यक्ति राजनीति में नहीं था। उस समय पार्टी की स्थिति क्या थी, यह जगजाहिर है। आज तो सोनिया-राहुल-प्रियंका तीन लोग इस परिवार से राजनीति में हैं। अब सवाल यही है कि यह तिकड़ी क्या पार्टी को रास्ते पर ला पाएगी। ”

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