गुरुघंटालों के काम-धंधे

सुशील उपाध्याय
राम रहीम का जलवा
राम रहीम का जलवा

सुशील उपाध्याय
अध्यात्म, राजनीति और कारोबार के घालमेल से अकूत सं‌पत्ति बनाने वाले बाबा भयादोहन पर आश्रित

हर साल गुरु पूर्णिमा और वैशाखी पर पांच लाख की आबादी का हरिद्वार 50 लाख लोगों के शहर में बदल जाता है। देशभर के श्रद्धालु अपने गुरुओं का वैभव देखने आते हैं। उनकी यह कामना होती है कि गुरु-दर्शन और मंत्र-दीक्षा के बाद उनके जीवन के दुख दूर हो जाएंगे। न केवल हरिद्वार, बल्कि देश के तमाम धार्मिक-शहरों में गुरुओं के आश्रमों-डेरों में भीड़ साल-दर-साल बढ़ती जाती है और जब इसका पटाक्षेप सिरसा के डेरा सच्चा सौदा जैसा होता है तो विराट शून्य पसर जाता है। इस शून्य को नित्यानंद, भीमानंद, आसाराम, रामपाल और गुरमीत राम रहीम जैसे कथित संतों के कारनामे और बड़ा कर देते हैं।

आश्रमों, डेरों और मठों को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटकर देख सकते हैं। एक, जो सदियों से स्थापित हैं और परंपरागत धार्मिक पद्धतियों का पालन करते हैं। दूसरे, वे हैं जो बीते कुछ दशकों में वजूद में आए और बहुत तेजी से उनका विस्तार हुआ है। पिछले वर्षों में संतों-बाबाओं से जुड़े जो बड़े विवाद सामने आए हैं, वे अधिकतर दूसरी श्रेणी के धार्मिक संगठनों से जुड़े दिखते हैं। जितने भी इस तरह के बाबा, आश्रम और डेरे हैं, वहां जाने वाले लोगों की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि देखिए तो एक बात बहुत आसानी से समझ में आती है कि इन गुरुओं के भक्तों और समर्थकों में उन लोगों की संख्या काफी है जो अपेक्षाकृत निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। जिन्हें समाज के भीतर वह पहचान हासिल नहीं है जो कि उच्च वर्ग को हासिल रही है।

हरिद्वार में बाबाओं की दुनिया को करीब से देख रहे शिक्षाविद प्रो.पी.एस. चौहान कहते हैं, "ऐसे ज्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर नहीं होती। डेरों और आश्रमों में उन्हें स्वास्थ्य और कई बार शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं। जब भक्त और समर्थक अपने गुरुओं के आश्रमों में पहुंचते हैं तो बाहर की तुलना में वहां अधिक सुव्यवस्थित दुनिया पाते हैं। अंदर की तुलना में बाहरी दुनिया बेहद जटिल और परेशान करने वाली होती है। जब भक्तों के समूह बाहर की दुनिया को बताते हैं कि उनके गुरु ने स्वर्ग निर्मित किया है तो दूसरे लोग भी सहज आर्कषण के चलते वहां पहुंचते हैं। हमारा समाज चेतना के स्तर पर और तार्किक तौर पर ऐसा नहीं है कि वह खुद सही-गलत का फैसला कर सके इसलिए गुरुओं के प्रभाव में आने वालों की संख्या बेहद तेजी से बढ़ती जाती है।"

जिन बाहरी आकर्षणों के कारण (स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक बराबरी) आम लोगों की डेरों और आश्रमों में संख्या बढ़ती है, उन सभी के निर्वहन का दायित्व सरकार के पास है। इन तमाम पैमानों पर सरकारें लोगों की अपेक्षा के बरअक्स अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रही हैं इसलिए कथित अवतारों, गुरुओं, सत्पुरुषों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। मनोविश्लेषक डॉ. अजित तोमर का कहते हैं, "आम आदमी अपनी निजी जिंदगी में अनेक चुनौतियों और परेशानियों का सामना कर रहा है, सत्ता और व्यवस्था उन्हें आश्वस्त नहीं कर पा रही है इसलिए वे चमत्कारों की ओर बढ़ जाते हैं। ये चमत्कार बाबाओं और गुरुओं की शरण में संभव दिखने लगते हैं।" वास्तव में, गुरुओं ने आम लोगों की कमजोरियों को अच्छी तरह से समझ लिया है और वे पूरी काबिलियत से उनकी योग्यताओं और क्षमताओं का उपयोग अपने हित में करते हैं। उन्होंने लोगों के भय को अच्छी तरह भुनाया है। ऐसा नहीं है कि गुरुओं की शरण में जाने वालों में सभी अनपढ़, देहाती और कमजोर वर्ग के लोग होते हैं। कुछ गुरुओं, खासतौर से वे जो कारपोरेट को अध्यात्म की खुराक उपलब्ध कराते हैं, उनके यहां ज्यादातर भक्त उच्च शिक्षा प्राप्त और आर्थिक तौर पर संपन्न होते हैं।

कई नामी गुरुओं का हित कारोबार से भी जुड़ा है। धर्म और कारोबार को मिला देने का सबसे प्रबल उदाहरण बाबा रामदेव ने प्रस्तुत किया है। अब श्रीश्री रविशंकर भी उनकी राह पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। कारोबार के लिए डेरा सच्चा सौदा ने भी काफी बड़ी तैयारी की हुई थी। आसाराम पहले से ही भक्तों को सामान बेच रहा था। दक्षिण भारत के ज्यादातर गुरु शिक्षा और चिकित्सा के कारोबार में हैं।

इस वक्त देश में 50 से अधिक विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज धार्मिक संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं। ये संस्थाएं विशुद्ध व्यावसायिक तौर पर चल रही हैं, (इक्का-दुक्का अपवाद संभव हैं)। इनमें शिक्षा और इलाज की दरें कमोबेश वैसी ही हैं, जैसी कि अन्य प्राइवेट संस्थाओं में हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये संस्थाएं पूरे देश में फैली हुई हैं। धर्म के नाम पर इन संस्थाओं और संगठनों को अपनी व्यावसायिक गतिविधियों का आकर्षक लाभ मिल रहा है इसलिए वे तमाम आधुनिक सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं। इसका प्रमाण यह है कि देश के किसी सामान्य आश्रम और डेरे का स्तर किसी भी अच्छे होटल से कमतर नहीं दिखेगा। गुरुओं द्वारा इस्तेमाल की जा रही गाड़ियां आमतौर से लक्जरी श्रेणी की हैं। हमारे आसपास के तमाम नामी गुरु छठे-छमाहे विदेश यात्राओं पर जा रहे हैं। हरिद्वार-ऋषिकेश में एक-दो नहीं, बल्कि 50 से ज्यादा ऐसे आश्रम होंगे, जिनकी तुलना महल और किले से ही की जा सकती है। डेरों का संदर्भ देखें तो पंजाब और हरियाणा में यह आंकड़ा और भी बड़ा है। यानी, खूब पैसा खर्च किया जा रहा है। इन पर सवाल उठता है तो जवाब दिया जाता है कि सारा खर्च भक्तों द्वारा उठाया गया है।

इनका जब सत्ता के साथ परोक्ष या प्रत्यक्ष गठजोड़ होता है तो उसके परिणाम या तो डेरा सच्चा सौदा जैसे होते हैं या फिर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) से श्रीश्री रविशंकर के विवाद जैसे। कभी उन्मादी भीड़ पूरे तंत्र को चौपट कर देती है, कभी धर्मगुरु न्यायतंत्र को ठेंगा दिखाने लगते हैं।

और अब राजनीति के साथ इनके रिश्तों को देखिए तो शर्म से सिर झुक जाएगा। चाहे किसी भी पार्टी के नेता हों उनके फोटो और वीडियो, इन बाबाओं के साथ दिख जाएंगे। न केवल फोटो और वीडियो दिखेंगे, बल्कि वे सार्वजनिक तौर पर ऐसे बाबाओं के चरणों में पड़े दिखाई देंगे जिनका अतीत संदिग्ध है, भले ही वे भगवा चोले में क्यों न हों। हरियाणा के एक मंत्री को गुरमीत राम रहीम के चरणों में दंडवत होते हुए पूरा देश देख चुका है।

गुरुओं और बाबाओं के ब्रांड मैनेजर लगातार नेताओं तक यह संदेश पहुंचाते हैं कि उनके बाबा के आशीर्वाद से राजनैतिक कॅरिअर चमक जाएगा। भाजपा के सत्तारोहण के बाद बाबाओं के राजनैतिक कारोबार में और चमक आई है। उत्तर भारत में, खासतौर से हरियाणा, यूपी, उत्तराखंड और पंजाब में ऐसे अनेक डेरे, अखाड़े और आश्रम हैं, जिनकी राजनीति में सीधी दखल है। कुछ बाबा सीधे राजनीति में आ गए हैं और कुछ परोक्ष तौर पर राजनीति में हैं।

कैसे-कैसे लोग संत का चोला धारण कर रहे हैं, इसका अनुमान इस बात से लगा लीजिए कि हरिद्वार में पिछले कुंभ के दौरान एक ऐसे आदमी को मंडलेश्वर बना दिया गया, जो पूर्व में शराब का धंधा कर रहा था। अब तो यह सवाल उछलता है कि ऐसा कौन-सा गैरकानूनी काम है, जिसमें देश के संत-संन्यासियों के नाम सामने नहीं आए। कुछ के कारनामे कोर्ट में साबित हो गए और कुछ के होने बाकी हैं। अब, गुरमीत राम रहीम सिंह कांड के बाद भक्ति, अध्यात्म और समाजसेवा के नाम पर धंधे पर सवाल उठने शुरू हुए हैं।

इस पूरी चर्चा में एक बड़ा और प्रायः अनुत्तरित प्रश्न यह है कि वे कौन से कारण हैं जो एक अपराधी को करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र, अकूत धन-संपत्ति का स्वामी और राजनैतिक रूप से प्रभावशाली बना देते हैं? अतीत में कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही आश्रमों, डेरों और बाबाओं का समर्थन लेती रही हैं। जाहिर है, समर्थन से सत्ता में पहुंचने वाली पार्टी कृतज्ञ भी होगी ही। यह कृतज्ञता प्रायः चिंताजनक स्थितियों का निर्माण करती है। थोड़ा पीछे जाकर जनरैल सिंह भिंडरावाले के बारे में सोचिए। सत्ता के संरक्षण से इसने अकाल-तख्त को आतंक का केंद्र बना दिया था। यह ठीक है कि सभी डेरे और आश्रम सच्चा सौदा जैसे नहीं हैं, सभी संत भी आसाराम, रामपाल और राम रहीम जैसे नहीं हैं, लेकिन सभी के पास अकूत संपदा है। निर्बाध भौतिक सुविधाएं यह डर तो पैदा करती ही हैं कि भविष्य में फिर कोई बाबा विचलन का शिकार हो जाएगा और एक बार फिर लोगों की श्रद्धा और भरोसे पर निर्मम प्रहार होगा।

 

सत्ता का खिलाड़ी स्वामी

जब भी किसी पावर ब्रोकर तांत्रिक का जिक्र होता है, चंद्रास्वामी की फौरन याद आ जाती है। विवादों के साथ इस तथाकथित ‘गॉडमैन’ का गहरा नाता रहा है। उनका ‘आश्रम’ जंगल में नहीं बल्कि दक्षिणी दिल्ली में गुलाबी ग्रेनाइट के पत्थरों से बना था। चंद्रास्वामी की गुमनाम-सी मौत तो तीन महीने पहले ही हुई, मगर एक समय वह भी था जब सत्ता के गलियारों में उसकी गूंज थी। अपने देश के ही नहीं कई विदेशी नेता, कारोबारी, हथियारों के सौदागर उसके संपर्क में थे। इनमें मारग्रेट थैचर, ब्रुनेई के सुल्तान, बहरीन के शेख के अलावा दो भारतीय प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव और चंद्रशेखर प्रमुख थे। उसने अपनी मित्र एलिजाबेथ टेलर को भी मदद करने का दावा किया।

जब हथियारों की दलाली, पावर ब्रोकिंग और जालसाजी में उसके नाम का खुलासा हुआ तब पता चला कि उसके रिश्ते अंडर वर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम से लेकर हथियारों के दलाल अदनान खशोगी से भी रहे हैं। राजीव गांधी हत्याकांड में भी उसे जांच का सामना करना पड़ा। राजीव गांधी की मौत की जांच करने वाले जैन आयोग की रिपोर्ट में एक चैप्टर चंद्रास्वामी को लेकर है। उसमें तांत्रिक पर हत्या को मूर्त रूप देने के लिए अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों, हथियार और अन्य सौदों के सहारे लिट्टे के लिए धन जुटाने की बात कही गई थी। वह पहली बार 1996 में लोकसभा चुनावों के दौरान तब जेल गया जब नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस फिर से सत्ता में आने के लिए चुनाव लड़ रही थी। उस पर लंदन में रहने वाले भारतीय व्यवसायी लक्खूभाई पाठक के साथ भी धोखाधड़ी करने का आरोप लगा। कोर्ट में सुनवाई के दौरान चंद्रास्वामी ने कहा, “भगवान कृष्ण का जन्म भी जेल में हुआ था। ऐसे में भगवान मुझे जैसे भी रखेंगे मैं खुश रहूंगा।”

पुट्टापर्थी का असहज संत

जून 1993 में सत्य सांई बाबा के पुट्टापर्थी आश्रम में उन पर हमले की साजिश ने बड़ा विवाद पैदा कर दिया था। चार हमलावर उनके शयनकक्ष तक पहुंच गए थे। इस दौरान उन्होंने सांई बाबा के दो सहयोगियों की हत्या कर दी थी। हालांकि बाद में वे पुलिस की कार्रवाई में मारे गए थे। यह आश्रम आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में है।

क्या यह हत्या का प्रयास था या आश्रम में रहने वाले निवासियों का आपसी संघर्ष यह आज भी अनुत्तरित प्रश्न है। सत्य सांई बाबा के दुनिया भर में लाखों भक्त थे, वे इस हमले में बाल-बाल बच गए थे। हमलावर उनके पुराने भक्त थे। हमलावर चाकुओं से लैस होकर सांई बाबा के निजी आवास ‘प्रशांति निलयम’ तक पहुंच गए थे। इन्हें रोकने के प्रयास में ड्राइवर और रसोइए को चाकू मार दिया गया जिससे उनकी मौत हो गई। इसके बाद अलार्म बजा दिया गया और सांई बाबा अपने कमरे से निकल गए। बाद में हमलावरों ने खुद को कमरे में बंद कर लिया। इसके बाद आई पुलिस सीढ़ी से छत पर पहुंची और उन्हें कमरा खोलने के लिए बाध्य किया फिर आत्मरक्षा में उन्हें गोली मार दी।

राम रहीमः सरासर झूठा सौदा 

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम ‘इंसा’ को अभी तो अपने दो पूर्व साध्वियों के साथ बलात्कार के जुर्म में ही सजा सुनाई गई है। दोनों सजा दस-दस साल की है। इसका मतलब उन्हें 20 साल जेल में गुजारने होंगे। लेकिन उनके अपराधों की फेहरिस्त इतनी ही नहीं है। अभी तो एक पत्रकार और अपने एक सहयोगी की हत्या के मामले लंबित ही हैं। आगे और न जाने कैसे-कैसे मामले खुलें। 

बाबा का हरियाणा और पंजाब में ऐसा दबदबा है कि अदालती आदेश के दिन लाखों लोग पंचकुला में जुट आए। दोषी ठहराया गया तो हरियाणा जल उठा। हिंसा में 38 लोग मारे गए और अनेक घायल हुए। सरकार असहाय नजर आई। आखिर डेरा के समर्थन से कई विधायकों के जीतने के कयास जो हैं। लेकिन जिस साध्वी की पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को 2002 में लिखे पत्र से आखिरकार राम रहीम का खेल खत्म हुआ, वह उसकी शैली भी बयां करती है। "बलात्कार बॉलीवुड की बी ग्रेड फिल्मों की तरह था, बेड पर पिस्तौल रखा था और टीवी पर ब्लू फिल्म चल रही थी।"

आसारामः अपराध ही आसरा

आसाराम (असली नामः आसुमल सिरुमलानी) को 2014 में अपनी नाबालिग शिष्या से यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। तब से अभी तक वह जेल में है। उस पर बलात्कार के अलावा गवाहों को धमकाने, जमीन कब्जा करने के भी आरोप हैं। यही नहीं, कई गवाहों की हत्‍या भी हो गई है। मगर एक समय था जब आसाराम के कार्यक्रमों में उसके भक्तों के साथ-साथ नेताओं का तांता लगा रहता था। लोग उसे भगवान की तरह पूजते थे। आसाराम पर अस्पताल में रहने के दौरान नर्स पर अश्लील टिप्पणी करने के भी आरोप हैं।

आसाराम के खिलाफ तो आरोप हैं ही उसका बेटा नारायण सांई भी पीछे नहीं है। उसपर भी कई गंभीर आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे हैं। 2008 में आसाराम के मध्यप्रदेश स्थित आश्रम में दो बच्चों की मौत के बाद विवाद काफी भड़का था। ये दोनों बच्चे आसाराम के आश्रम में पढ़ते थे और यहीं से गायब हो गए थे। बाद में उनकी लाश मिली थी।

आशुतोष महाराजः मुर्दा मायाजाल

आशुतोष महाराज के दिव्य ज्योति जागृति संस्थान का आश्रम पंजाब में जालंधर के निकट नूरमहल में है। यहां बड़ी संख्या में उनके अनुयायी हैं। जिंदा रहते आशुतोष महाराज जितनी चर्चा में नहीं आए, उतनी चर्चा उनकी मौत के बाद हुई। 2014 में हुई उनकी मौत के बाद से उनका शरीर फ्रीजर में रखा हुआ है और उनके अनुयायियों का मानना है कि वे ‘समाधि’ में हैं। 

दूसरी ओर, उनके बेटे दिलीप झा अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए कोर्ट तक का दरवाजा खटखटा चुके हैं। वैसे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट उनकी यह याचिका खारिज कर चुका है।

गणेशानंदः पक्का स्वादू

केरल का स्वामी गणेशाननंद तीर्थपदा उर्फ श्रीहरि या ‘बुलेट स्वामी  लकवा से पीड़ित अपने एक अनुयायी के पास इलाज के बहाने जाता था। यहीं उसने उसकी बेटी से छह साल तक दुष्कर्म किया। 23 साल की यह लड़की कानून की विद्यार्थी है। वह गणेशानंद की हरकतों से इतनी तंग आ गई कि उसने तिरुवनंतपुरम स्थित अपने घर में रहस्यमयी ढंग से चाकू से उसका गुप्तांग काट लिया। स्वामी 19 दिन जेल में रहने के बाद अभी जमानत पर छूटा है। उसके मेगा आश्रम में बिहार के एक युवक को आतंकवादी होने की शक में लगातार पीटा जाता था। इसके तीन माह बाद वह मृत मिला और उसकी खोपड़ी टूटी हुई पाई गई।

नित्यानंदः वासना का आनंद

नित्यानंद दक्षिण भारत के चर्चित धर्मगुरु थे मगर छिपे हुए कैमरे से बने वीडियो ने ‘स्वामीजी’ की वासना को उजागर कर दिया। 2010 में सामने आए इस वीडियो में नित्यानंद एक तमिल अभिनेत्री के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखा गया। इसके बाद नित्यानंद का आभामंडल खत्म हो गया। भक्तों का भरोसा तो टूटा ही वह मारा-मारा फिरने लगा। वह हिमाचल में जा छुपा पर पकड़ा गया। इस मामले में 52 दिन तक जेल में रहने के बाद उसे 11 जून 2010 को जमानत मिली। नित्यानंद की एक अनुयायी ने भी उस पर गुरुसेवा के नाम पर यौन शोषण का आरोप लगाया। यह महिला मैकेनिकल इंजीनियर थी और अमेरिका में काम करती थी। नित्यानंद खुद को शिव और उसे पार्वती बताता था।

राधे मां-कॉस्मेटिक आध्यात्मिकता

लाल साड़ी, गहरा मेकअप और हाथ में त्रिशूल लिए राधे मां का विवादों से गहरा नाता है। उस पर सेक्स रैकेट चलाने से लेकर गवाहों को धमकी देकर पैसे उगाहने के अलावा भी कई आरोप हैं। 2015 में राधे मां पर दहेज उत्पीड़न का केस चला पर प्रारंभिक जांच के बाद इसे खत्म कर दिया गया। बाद में एक अभिनेत्री ने उस पर यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई। पहले वह खुद को देवी का अवतार बताती थी पर अब खुद को भगवान शिव की भक्त बताती है। राधे मां का जन्म पंजाब के गुरदासपुर जिले के दोरांगला में हुआ। उसका असली नाम सुखविंदर कौर है।

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