आउटलुक 22 मई 2017 MAY 08 , 2017 कुलदीप कुमार

जन्म की लॉटरी और जाति का सच

नम‌ित अरोड़ा की पुस्तक द लॉटरी ऑफ बर्थ
कुलदीप कुमार

हालांकि मराठी में दलित साहित्य का सबसे पहले उभार हुआ और उसने एक लंबे समय तक अपनी अस्मिता और गौरव के लिए संघर्ष करने के बाद अपनी स्थाई जगह बनाई लेकिन इसके बावजूद दलितों के महानायक भीमराव आंबेडकर अधिकांशत: राष्ट्रीय स्तर के बौद्धिक एवं राजनीतिक विमर्श के हाशिए पर ही रहे। पिछले चार दशकों के दौरान उत्तर भारत में कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में जहां दलित राजनीति ने अपनी जड़ें जमाईं वहीं हिंदी में दलित लेखन ने भी अपनी आभा से सबका ध्यान आकृष्ट करने में सफलता प्राप्त की। आश्चर्य नहीं कि आज आंबेडकर राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आते जा रहे हैं और हिंदी साहित्य में भी दलित विमर्श को अधिकाधिक महत्व मिल रहा है।

जन्म पर किसी का भी अधिकार नहीं। हमारा जन्म पूर्णत: एक संयोग है लेकिन यह संयोग ही हमारे समूचे जीवन की दिशा और दशा निर्धारित करता है। अगर हमारा जन्म किसी संपन्न उच्च जाति के कुलीन परिवार में हुआ है तो हमारे लिए सारे रास्ते खुले हैं। लेकिन अगर हमारा जन्म किसी दलित परिवार में हुआ है तो हमारे सामने सारे रास्ते बंद हैं। यही नहीं, हमें मनुष्य का दर्जा भी प्राप्त नहीं। लोग अपनी गाय-भैंस और कुत्ते-बिल्ली को छूने से अपवित्र नहीं होते हमें छूने से होते हैं। देश के आजाद होने के बाद स्वीकृत संविधान में छुआछूत को गैरकानूनी करार दे दिया गया लेकिन देश के अधिकांश भागों में वह आज भी सामाजिक व्यवहार का हिस्सा है। इसी तरह यह भी एक संयोग ही है कि हम पुरुष के रूप में जन्म लें या स्त्री के रूप में या न स्त्री न पुरुष यानी हिजड़े के रूप में या समलैंगिक रुझान वाले व्यक्ति के रूप में। दलित विमर्श की तरह ही इस समय स्त्री विमर्श और अन्य यौन रुझानों वाले व्यक्तियों से संबंधित विमर्श भी हिंदी प्रदेश समेत देश के विभिन्न भागों में काफी जोरों के साथ चल रहा है। सामाजिक परिवर्तन इस प्रकार के विमर्शों के परिणामस्वरूप ही होते हैं।

यानी जन्म एक किस्म की लॉटरी ही है। इसलिए जब 'द लॉटरी ऑफ बर्थ : ऑन इनहेरीटेड सोशल इनइक्विलिटी (जन्म की लॉटरी : विरासत में मिली सामाजिक असमानताओं के बारे में) पुस्तक मेरे सामने आई तो मैं उसे तत्काल पढ़ गया। हिंदी के श्रेष्ठ कवि असद जैदी द्वारा संचालित प्रकाशनगृह 'थ्री एसेज कलेक्टिव’ ने इस पुस्तक को इसी माह प्रकाशित किया है और इसके लेखक नमित अरोड़ा हैं। भारतीय जाति व्यवस्था की साहित्यिकी, वैचारिकी, समाजशास्त्र और राजनीति इन सभी पहलुओं से दो-चार होने वाली यह किताब अपने ढंग की अनूठी कृति है क्योंकि यह किसी बंधी-बंधाई रीति का अनुसरण नहीं करती। शुरुआत में ही तीन पुस्तक समीक्षाएं हैं जिनमें से दो हिंदी के चर्चित दलित लेखकों की पुस्तकों की हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ उत्तर भारत के एक गांव में पले-बढ़े दलित की दिल दहला देने वाली कहानी है और हिंदी के आत्मकथा साहित्य में उसने एक नया अध्याय जोड़ा है। इसी तरह पिछले दो दशकों के दौरान अजय नावरिया हिंदी के समर्थ कहानीकार के रूप में उभरे हैं और लॉरा ब्रुएक ने उनकी कहानियों का अंग्रेजी अनुवाद करके एक संग्रह ‘अनक्लेम्ड टेरेन’ शीर्षक से प्रकाशित किया है। नमित अरोड़ा ने इन पुस्तकों के साथ ही ए. रेवती की तमिल में लिखी गई आत्मकथा के अंग्रेजी अनुवाद ‘द ट्रूथ अबाउट मी : ए हिजड़ा लाइफ स्टोरी’ (मेरे बारे में सच : एक हिजड़े की जीवन कथा) की भी समीक्षा की है और हाशिए पर डाल दिए गए लोगों के जीवन का पूरा कैनवास सामने रख दिया है। जिए गए जीवन का सच ऐसी पुस्तकों के माध्यम से ही उजागर होता है। बौद्धिक चर्चा इन जीवन स्थितियों का विश्लेषण तो प्रस्तुत कर सकती है लेकिन उस भोगे हुए सच को हम तक नहीं पहुंचा सकती जो इन जीवन स्थितियों का सार है।

नमित अरोड़ा न केवल ‘भगवद् गीता’  पर तीखी आलोचनात्मक दृष्टि डालते हैं और उसकी नैतिकता पर सवालिया निशान लगाते हैं, बल्कि वह इस प्रश्न पर भी विचार करते हैं कि क्यों एक खासी लंबी अवधि तक भीमराव आंबेडकर को केवल ‘संविधान निर्माता’  के रूप में ही याद किया जाता रहा और जाति व्यवस्था के उद्भव और विकास के बारे में उनके विचार और इस अमानवीय व्यवस्था की समाप्ति के लिए किए गए उनके आह्वान को अधिकतर नजरअंदाज किया जाता रहा। हालांकि यह मान लिया गया था कि निर्वाचित प्रतिनिधि चाहे किसी भी जाति या धर्म का क्यों न हो, वह अपने चुनाव क्षेत्र के सभी मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करेगा लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं हुआ। आंबेडकर ने इस बारे में हमेशा ही अपनी शंका प्रकट की थी और इसलिए दलितों के लिए पृथक चुनाव क्षेत्रों की मांग की थी। उत्तर भारत में दलितों की अपनी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के उभार के पीछे यही कड़वी वास्तविकता है। यह पुस्तक पढ़ते हुए मुझे गेल ऑमवेड की पुस्तक ‘दलित विजंस’  की याद आ गई जो मैंने वर्षों पहले पढ़ी थी। इस छोटी सी पुस्तक में उन्होंने दलित समस्या के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया था। छपने के अनेक वर्ष बाद भी यह पुस्तक प्रासंगिक है।

नमित अरोड़ा ने इस पुस्तक में संकलित निबंधों में स्थान-स्थान पर अस्मिता की राजनीति और उसकी सीमाओं पर भी विचार किया है और असमानता के बरक्स उसे समझने की कोशिश की है। बलात्कार जैसी लगातार बढ़ती जा रही समस्या पर भी उन्होंने असमानता के जटिल जाल की पृष्ठभूमि में विचार किया है। जाति व्यवस्था की समाप्ति के बिना भारतीय समाज में सामाजिक असमानता को कम नहीं किया जा सकता।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, राजनीति और कला-संस्कृति पर लिखते हैं।)

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